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सुख-दुख

पत्रकारिता में कहाँ तक जाना चाहते हो? जवाब मिला- दिल्ली तक!

दिनेश पाठक-

एक नौजवान से कल मुलाकात हुई। उम्र 22-23 साल होगी। एक साल से प्रतिष्ठित हिंदी अखबार में इंटर्नशिप के नाम पर निःशुल्क सेवा दे रहा है। पत्रकारिता से एमए पास इस युवा के मुताबिक उसे आगे का रास्ता नहीं समझ आ रहा है। कैसे आगे बढ़ेगा? मुझसे समझना चाहता था। इसी गरज से मेरे साथ था।

जब भी मैं किसी युवा से मिलता हूँ तो सबसे पहला सवाल यही होता है कि अपने बारे में बताइये। इस नौजवान से भी यही कहा।
सटीक जवाब न देकर वह इधर-उधर की बातें करने लगा। कई बार एक ही सवाल दोहराने के बाद उसने अपने बारे में कुछ आधारभूत जानकारी दी। यह भी बताया कि अखबार के लिए मैंने यह प्रोग्राम कवर किया। वह प्रोग्राम कवर किया। जब मैंने पूछा कि बीते एक साल में आपने ट्रांसलेशन करके कितनी खबरें बनाई तो बोला कि टाइम ही नहीं मिलता। सुबह से देर रात तक दफ्तर या फील्ड में गुजर जाते हैं।

मेरा अगला सवाल यह था कि अंग्रेजी कैसी है? मैंने और स्पष्ट किया कि अंग्रेजी में खुद को 10 में से कितने नम्बर देंगे? युवा ने कहा कि आठ।

मेरा अगला सवाल था कि पत्रकारिता में आप कहाँ तक जाना चाहते हो? जवाब मिला दिल्ली तक।

अब कन्फ्यूज होने की बारी मेरी थी। क्योंकि करियर पाथ को लेकर कन्फ्यूज युवा से जब बात हो रही हो तो स्वाभाविक रूप से मैं जो जवाब सुनना चाहता था वह यह कि मैं किसी बड़े अखबार का संपादक या टीवी चैनल का संपादक या फिर विज्ञापन की दुनिया का बेताज बादशाह या फ़िल्म मेकर आदि बनना चाहता हूँ।

पर, इस नौजवान ने जगह के रूप में दिल्ली तक यात्रा करने की जानकारी दी। भाव फिर भी समझ आ गया। पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसी भी छोटे जनपद का युवा दिल्ली में आकर पत्रकारिता करना चाहता है, यह भी चाहत अच्छी कही और मानी जाएगी।
फिलहाल उसे मैंने कुछ निम्नवत सुझाव दिया और शुभकामना के साथ विदा किया।

-अगर अंग्रेजी अच्छी है तो तत्काल हिंदी पत्रकारिता की इंटर्नशिप छोड़कर अंग्रेजी में संभावना तलाशे।

-अगर लगता है कि कुछ प्रैक्टिस जरूरी है तो उसे शुरू करे। इसमें अंग्रेजी बोलना, ट्रांसलेशन, दोनों शामिल है।

-प्रैक्टिस के लिए अलग अलग विषय के पांच सौ शब्दों के अनुवाद रोज करने का सुझाव दिया।

-वर्बल इंग्लिश ठीक करने के लिए किसी ऐसे दोस्त के साथ रोज कम से कम आधा घण्टा गुजारने और सारी बातचीत इंग्लिश में ही करने की सिफारिश की, जिसकी इंग्लिश वाकई अच्छी हो।

-क्योंकि अगर किसी इंग्लिश न्यूज पेपर के एडिटर के पास जाओगे तो बेहतर होगा कि बातचीत का माध्यम अंग्रेजी ही हो।

-अगर किसी नौजवान में हिंदी / अंग्रेजी, दोनों में लिखने की समझ है तो उसका भविष्य आज भी उज्ज्वल है।

ये सभी सुझाव उस युवा की ओर से इंग्लिश के संदर्भ में दिए गए 8/10 नम्बर के आधार पर दिए गये।

करीब आधा घण्टा की बातचीत में मुझे बिल्कुल ऐसा नहीं लगा कि यह नौजवान आठ नम्बर पा सकता है। हाँ, जज्बा जरूर महसूस किया।

मैं देखने को आतुर हूँ कि दो-तीन महीने बाद इस नौजवान में क्या बदलाव आता है। फिलवक्त, मेरी शुभकामनाएं इस युवा को भी और उसकी तरह के अन्य नौजवानों को भी, जो पत्रकारिता में हाथ आजमाना चाहते हैं।

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