सुधीर अवस्थी ‘परदेशी’-
उद्देश्यों से भटकाव की स्थिति में चाहे किसी भी स्थिति में कुछ भी पतन की ओर ही जाता है। कहीं ना कहीं आधुनिक दौर में पत्रकारिता अपने उद्देश्यों से भटक रही है। भारत देश की आजादी में अहम भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता आज निज स्वार्थों के कारण शासन प्रशासन की गुलामी करती नजर आ रही है। जो ईमानदार पत्रकार अखबार ऐसा नहीं कर सके वह गर्दिश में वर्तमान का दौर गुजार रहे हैं।
अखबार के मालिक और पत्रकार दोनों ही सच्चाई का सामना करके अपनी जान का जोखिम मोल नहीं लेना चाहते। जिस समाज के लिए पत्रकार खबर लिखता है। वह समाज भी कहीं ना कहीं पत्रकार से किनारा कर रहा है। तो फिर ऐसे में किसके लिए ईमानदारी के साथ पत्रकारिता हो यह सवाल भी लोगों के मन में कौंध रहा है। जिसके चलते पत्रकारिता लगातार पतन की ओर कदम बढ़ाती जा रही है।
सभी अखबार और पत्रकार ऐसे हो यह कहना अन्याय होगा क्योंकि तमाम लोग गर्दिश में ईमानदार कार्यशैली और सच्चाई का साथ देने की सजा पा रहे हैं। अब खबरों के प्रकाशन का निर्धारण शासन प्रशासन की गाइडलाइन तय करती है। कहीं ना कहीं न्यायालय भी सरकारी गवाही और लिखा पढ़ी को ही मुख्य आधार मानकर अपना निर्णय सुनाते हैं जिससे कि लगातार पत्रकारों का मनोबल टूट रहा है और पत्रकारिता अपने उद्देश्यों से भटक कर पतन के रास्ते पर प्रशस्त हो रही है।
कभी देशहित और जनहित की मंशा लेकर शुरू की गई पत्रकारिता इन दोनों रॉब रुतबा और पहचान के लिए की जा रही है। सोशल मीडिया पर मनमानी कहने वालों ने तो पत्रकारिता की छीछालेदर ही कर दी। मामूली से स्वार्थ को लेकर सकारात्मक और नकारात्मक खबरों के प्रकाशन और प्रसारण से कहीं ना कहीं लोग आहत नजर आते हैं।
पत्रकारिता के पतन को रोकने के लिए निष्पक्ष निडर लिखना होगा। उसकी सुरक्षा का दायित्व शासन प्रशासन को संभालना होगा। सामाजिक संगठनों को पत्रकारिता के समर्थन में आगे आना होगा और न्यायालय को भी भरपूर संरक्षण देकर पत्रकारिता के पतन को रोकने में अपनी अहम जिम्मेदारी निभानी होगी। अधिकारी और नेता अपने खिलाफ लिखी गई खबर कभी बर्दाश्त नहीं करते। देश के कानून को बरगला कर मन माने तरीके से कानूनी कार्रवाई लोगों के साथ अमल में लाई जाती है। वह निंदनीय होती है। जिससे समाज के लोग परेशान और आहत होते हैं। इस दौरान किसी पत्रकार ने वास्तविक पूरी मनगढ़ंत कहानी का पर्दाफाश किया तो कहीं ना कहीं अधिकारी कर्मचारी उस पत्रकार के खिलाफ मनमाने तरीके से कानूनी कार्रवाई का खाका तैयार करके उसे परेशान करने का काम करते हैं। इसी भय से पत्रकारिता जनमन पीड़ा को शब्द न दे पाने के कारण लोगों के दिल में अपनी लोकप्रियता खो रही है।


