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संवाददाताओं के अधिकांश सवालों का संतोषप्रद जवाब नहीं दे पाए रेलमंत्री

RAIL

नई दिल्ली। ट्रेन 8 से लेकर 16 घंटे लेट चल रही है। इस भीषण गर्मी में अधिकांश रेलवे स्टेशनों पर पीने का पानी नहीं है। पानी की मशीन का ढांचा खड़ा तो है पर सूखा। एक्सलेटर लगे तो हैं पर खराब पड़े हैं। लिफ्ट का इस्तेमाल डर से यात्री करते नहीं क्योंकि पता नहीं वह बीच में कब रुक जाए। वाई फाई है जो पकड़ता नहीं।

स्टेशनों पर बने फु़ड प्लाजा में चार्जेज इतने अधिक और खाने का क्वालिटी इतनी घटिया कि यात्री अपना या फिर बाहर का खाना खाने में ही भलाई समझते हैं।

टिकट की मारामारी इतनी कि कहीं भी आने जाने की योजना तीन महीने पहले बनानी पड़ती है। कुली की लूटमार पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं। फ्लैक्सी किराया तो रेलवे वसूल रहा है लेकिन सुविधाओं के नाम पर यात्रियों को मिल रहा है बाबाजी का ठूल्लू। प्लेटफॉर्म पर न तो बैठने की पर्याप्त जगह है और न ही वेटिंग रूम में रुकने का प्रबंध। भारतीय रेल व रेलवे की यह हकीकत कब सुधरेगी इसका रेल मंत्री के
पास कोई तर्क संगत जवाब नहीं है।

लेकिन मंत्री ने यह दावा जरूर किया कि विगत चार वर्षों में जो काम हुआ है वह ऐतिहासिक है। दरअसल ये सारे सवाल देश के विभिन्न राज्यों के संवाददाताओं ने रेल मंत्री पीयूष गोयल से वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए पूछे। रेल मंत्री ने चार साल की उपलब्धियां गिनाने के लिए बीते दिनों एक संवाददाता सम्मेलन किया था।

मंत्री महोदय अपने पूरे अमले के साथ नेशनल मीडिया सेंटर में मौजूद थे। हॉल खचाखच भरा था। प्रेस इंर्फामेशन ब्यूरो (पीआईबी) के सौजन्य से आयोजित इस संवाददाता सम्मेलन को देश भर के विभिन्न राज्यों के मी़डिया सेंटर से जोड़ा गया था। मंत्री पर सवालों की बौछार थी लेकिन उनके पास दो ही जवाब था कि पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया। विरासत में उन्हें बीमार रेल मिली है। सुधारने के प्रयास जारी हैं। दूसरा, आपका सवाल बहुत स्पेसिफिक है। मैं संसद में जवाब नहीं दे रहा हूं।

पीयूष गोयल ने कहा कि रेलवे में पूंजीगत निवेश बढ़ा है। नई लाइनों को चालू करने की गति बढ़ी है। रेल और परिवहन विश्वविद्यालय बड़ोदरा में खुलने को तैयार है। कोयले की कमी नहीं है। कोयले का आयात काफी कम हुआ है। इन उपलब्धियों का आम यात्री से क्या लेना देना है… इसका तर्क संगत जवाब देने में रेल मंत्री लड़खड़ा गए। यात्रियों को तो महंगे दरों पर टिकट खरीदना पड़ रहा है और सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा। यह सवाल दिल्ली से पूछा गया था। जवाब था…हमें विरासत में बीमार रेलवे मिला था… समय तो लगेगा।

दिल्ली के ही किसी संवाददाता ने सवाल दागा, जर्जर पुल, पुराने ट्रैक, स्टेशनों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव…ऐसे में बुलेट ट्रेन क्यों? मंत्री बोले, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और बुलेट ट्रेन दोनों अलग अलग हैं। ऐसी बात वही करते हैं जो मोदीजी के विकास से जलते हैं। एक अन्य सवाल, ट्रेंने कब तक समय पर चलने लगेंगी? जवाब, मेंटेनेंस का एरियर जमा हो गया था। उसे हटाया जा रहा है। हटते ही ट्रेन राइट टाइम चलने लगेंगी।

इलेक्ट्रीफिकेशन के काम में क्या प्रोग्रेस है? 2017-18 में 4087 किलोमीटर इलेक्ट्रीफिकेशन का काम हुआ है जो यूपीए 2 सरकार के मुकाबले काफी ज्यादा है। चेन्नई से किसी महिला संवाददाता ने सवाल किया, विकलांगों के लिए रेलवे क्या कर रहा है? मंत्री ने कहा सरकार प्रतिबद्ध है विकलागों की सुविधा बढ़ाने के लिए। इस साल के अंत तक काफी सुधार दिखेगा।

पूणे, इम्फाल, रांची आदि से संवाददाताओं द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में मंत्री ने कहा कि सवाल बेहद स्पेसिफिक हैं। मैं तैयार हो कर नहीं आया हूं। लिख कर भेज दीजिएगा, जवाब बाद में दे दूंगा। जयपुर से एक रिपोर्टर ने पूछा, राजस्थान के लिए योजनाएं क्या हैं ? जवाब मिला…कोई नई योजना नहीं है। पुरानी घोषणाओं को पूरा करना मंत्रालय की प्राथमिकता है।

एक संवाददाता ने पूछा कि रेलवे के रेवेन्यू का एक बड़ा हिस्सा टीटी और टाउट की जेब में चला जाता है। उसे रोकने की क्या योजना है? मंत्रीजी ने हल्के फुल्के में इस गंभीर सवाल को टाल दिया। चलने दिया जाता तो सवालों का सिलसिला लंबा चलता लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

लेखक संदीप ठाकुर दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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