राजधानी समेत कई ट्रेनों में कैटरिंग शुल्क टिकट क्लास पर आधारित

रेलवे बोर्ड द्वारा लखनऊ स्थित एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को आरटीआई में दी गयी जानकारी के अनुसार शताब्दी, राजधानी तथा दुरंतो ट्रेनों में टिकट के साथ लिया जाने वाला कैटरिंग शुल्क यात्री के टिकट की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग होता है. Continue reading

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संवाददाताओं के अधिकांश सवालों का संतोषप्रद जवाब नहीं दे पाए रेलमंत्री

नई दिल्ली। ट्रेन 8 से लेकर 16 घंटे लेट चल रही है। इस भीषण गर्मी में अधिकांश रेलवे स्टेशनों पर पीने का पानी नहीं है। पानी की मशीन का ढांचा खड़ा तो है पर सूखा। एक्सलेटर लगे तो हैं पर खराब पड़े हैं। लिफ्ट का इस्तेमाल डर से यात्री करते नहीं क्योंकि पता नहीं वह बीच में कब रुक जाए। वाई फाई है जो पकड़ता नहीं। Continue reading

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मोदीजी एंड टीम टाइम से रेल न चला सकी, देश क्या चला लेंगे!

Yashwant Singh : सिर्फ भारतीय रेल ही मोदीजी एन्ड टीम की कार्यकुशलता बताने / दिखाने के लिए काफी है। जिन्हें टाइम से रेल चलवा पाना नहीं आया, राम जानें वो देश क्या चला पा रहे होंगे। Continue reading

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अतिरिक्त उपाय नहीं किए तो रेल टिकट कन्फर्म होने की कोई गारंटी नहीं

भारतीय रेल, औकात नापने का ऐसा पैमाना है जिससे हर किसी का कभी न कभी वास्ता पड़ता है। राजा हो रंक शायद ही कोई बचा हो। कुछ दिन पहले एक दिलचस्प सर्वे पढ़ा था। सर्वेकर्ता एजेन्सी ने रिश्वत देने के मामले में राजनेताओं व ब्यूरोक्रेटस से राय ली थी कि क्या आपको कभी रिश्वत देने की जरूरत पड़ी। लगभग ९० फीसद लोगों ने स्वीकार किया कि उन्होंने कभी न कभी रेलवे में रिश्वत देने की जरूरत पड़ी है। यह भी कहीं पढऩे को मिला था कि महात्मा गांधी के लिए एक बर्थ के जुगाड़ हेतु उनके सहायकों को रिश्वत देनी पड़ी थी। Continue reading

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भारतीय रेलवे की मूर्खता का नमूना… Howrah को Hawrah बना दिया

रेलवे वालों को अंग्रेजी में ‘हावड़ा’ शुद्ध नहीं लिखना आता… देखें बानगी… पश्चिम बंगाल में कोलकाता के बाद हावड़ा दूसरा बड़ा और नामी शहर है। एक ट्रेन है शक्तिपुंज एक्सप्रेस… जो मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर से हावड़ा तक जाती है।

अब आश्चर्य की बात कहें या भारतीय रेलवे की अव्वल दर्जे की मूर्खता का प्रमाण, इस ट्रेन में Howrah को Hawrah लिखा गया है। ऐसा एकाध जगह नहीं बल्कि पूरी ट्रेन में स्पेलिंग मिस्टेक की गई है।

मेरी तरफ से रेलवे विभाग और तमाम मंत्रियों को सलाह है कि विभाग में पढ़े-लिखे लोग शामिल करें या जिसको भी इस तरह का काम सौंपे तो कम से कम उसे स्टेशनों की सही स्पेलिंग बता दें।

ऐसा भी किया जा सकता है कि पूरे रेल विभाग के स्टाफ का फिर से नर्सरी में दाखिला करा दिया जाए ताकि उनकी भूल चुकी पढ़ाई-लिखाई फिर से दुरुस्त हो सके।

आशीष चौकसे

पत्रकार

संपर्क : ashishchouksey0019@gmail.com

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नाम के आगे स्पेशल जोड़कर ट्रेन का किराया तीन गुना बढ़ा दिया

हैदराबाद से एक ट्रेन जाती है दरभंगा. वाया रायपुर जाने वाली वह ट्रेन हम मैथिलों के लिये वरदान सरीखा थी. मग्गह जाने से छुटकारा पाने का आनंद कोई मैथिल ही समझ सकता है. पहले जब तक हम पटना पहुँचते थे तबतक इस ट्रेन के आने से गाम पहुंच कर चूरा दही सरपेट लेते थे. कुछ दिन के लिए यह ट्रेन बंद हो गयी थी. अभी फिर से शुरू हुई है. वही नाम, वही नम्बर, रूट भी लगभग वही, समय भी वही. बस किया यह गया है कि इस ट्रेन के नाम में ‘स्पेशल’ जोड़ दिया गया है.

इतना होने मात्र से ट्रेन का किराया काफ़ी बढ़ गया. वरिष्ठ जनों को दिया जाने वाला छूट आदि भी ख़त्म हो गया ‘स्पेशल’ होते ही… बुजुर्ग यात्री के लिये इस ट्रेन के तृतीय एसी का प्रभावी टिकट लगभग साढ़े छः सौ होता था. ‘स्पेशल’ होते ही यह किराया बिना किसी छूट के 1850 रुपया हो गया. इसे कहते हैं वित्तीय प्रबंधन. हींग लगे न फिटकरी…

पंकज कुमार झा की एफबी वॉल से.

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वरिष्ठ टीवी पत्रकार के साथ रेलवे ने किया बड़ा धोखा… देखें ये वीडियो…

Girijesh Kumar : भारतीय रेल की सवारी लगातार महँगी होती जा रही है, रेलवे को इंटरनैशनल बना देने के बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं. इन सबके बीच भारतीय रेल सेवा की हैरान करनेवाली हक़ीक़त देखिए. मैंने झाँसी से दिल्ली लौटने के लिए AC-3 में ऑनलाइन टिकट बुक किया. टिकट कन्फ़र्म था. मैसेज भी आ गया था. लेकिन ऐन यात्रा के दिन जो मैसेज आया उसमें मेरी सीट स्लीपर क्लास में दी गयी थी.

बिना किसी सूचना के, बिना किसी बातचीत के. ये उस रेलवे का हाल है जहाँ फ़ीडबैक लेने के लिए बाक़ायदा कॉल सेंटर चल रहे हैं. स्टेशन पर पहुँचकर TI अनिल कुमार शर्मा जी से पूछा तो पता चला AC3 के डिब्बे नहीं लगे इसलिए स्लीपर में ऐडजस्ट कर दिया. मैंने कहा चलिए ठीक है, बाक़ी के पैसे तो मिलेंगे? बताने लगे कि वो एक पर्ची देंगे, जिसे लेकर मैं कहीं जमा कराने जाऊँगा, तब मुझे बक़ाया राशि मिल सकेगी. बहरहाल ट्रेन चलने का वक़्त हो रहा था, लिहाज़ा मैं भागकर अपने स्लीपर क्लास बर्थ पर आ गया हूँ. देखना ये है कि जादुई पर्ची वाले TI साहब से अपनी क़िस्मत की पर्ची ले पाता हूँ या नहीं.

पूरे प्रकरण से संबंधित वीडियो ये है :

वरिष्ठ टीवी पत्रकार गिरिजेश कुमार की एफबी वॉल से.

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रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा की संसदीय सीट गाजीपुर में रेलवे स्टेशन पर अराजकता का आलम देखिए…

गाजीपुर लोकसभा संसदीय सीट से जीते मनोज सिन्हा रेल राज्य मंत्री हैं. उन्हीं के इलाके गाजीपुर के रेलवे स्टेशन पर अराजकता का आलम है. ट्रेनें आती और रुकती हैं लेकिन ट्रेनों का गेट नहीं खुलता और यात्री परेशान हो जाते हैं. टिकट होने के बावजूद यात्री ट्रेन पर चढ़ नहीं पाते. इस समस्या के संज्ञान में आने पर रेलवे स्टेशन पहुंचे भाजपा नेता राघवेंद्र सिंह, समाजसेवी सुजीत सिंह प्रिंस और अन्य लोग. इन लोगों ने देखा कि 12-12-2017 को पवन एक्सप्रेस रात्रि लगभग 11.30 बजे को स्टेशन पर आती है लेकिन इसका गेट नहीं खुलता. टिकट होने के बावजूद भी यात्री ट्रेन पर चढ़ नहीं पा रहे थे.

अराजकता का यह आलम देख भाजपा नेता राघवेंद्र सिंह, सुजीत सिंह प्रिंस और अन्य लोगों ने विरोध शुरू करत दिया और स्टेशन मास्टर के पास पहुंचे. उन्हें बताया गया कि AC बोगी से लेकर स्लीपर बोगी तक के गेट नहीं खुल रहे हैं. भाजपा नेता राघवेंद्र सिंह ने इस प्रवृत्ति का जमकर विरोध किया. तभी स्टेशन के कुछ कर्मियों ने गेट खुलवा कर यात्रियों को ट्रेन पर चढ़ाने की बजाय यात्रियों से ही गुंडों की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया. यहां तक कि गाजीपुर सिटी स्टेशन पर पुलिस वालों ने भी यात्रियों के साथ बदतमीजी करना शुरू किया और गर्दन पकड़ने लगे. इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सुजीत कुमार सिंह प्रिंस ने तैयार किया है, जो नीचे दिया जा रहा है…

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आरटीआई : उत्तर रेलवे में सात वर्षों में कुल 114 ट्रेनें लड़ी-भिड़ीं, 226 मारे गए

उत्तर रेलवे, दिल्ली द्वारा एक्टिविस्ट डॉ नूतन ठाकुर को आरटीआई में दी गयी सूचना के अनुसार 01 अप्रैल 2010 से अब तक कुल 114 ट्रेन दुर्घटनाएं हुई हैं. इनमे 110  मामलों में जाँच समिति की जाँच पूरी हो गयी है जबकि 04 मामलों में जाँच आख्या आनी बाकी है. इन ट्रेन दुर्घटनाओं में कुल 226 लोगों की मौत हुई जबकि 365 लोग घायल हुए. इन रेल दुर्घटनाओं में रेलवे के कुल 27.2 करोड़ रुपये की क्षति पहुँचने की बात बताई गयी है.

सबसे अधिक हताहत 19 अगस्त 2017 को उत्कल एक्सप्रेस के 13 डब्बों के मुज़फ्फरनगर जिले के खतौली स्टेशन पर पटरी से उतरने से हुए जिसमे 25 लोगों की मौत हुई जबकि 105 घायल हुए थे. इस मामले में अभी जाँच रिपोर्ट आनी शेष है. 20 मार्च 2015 को देहरादून वाराणसी एक्सप्रेस के रायबरेली के बछरावां स्टेशन के पास पटरी से उतरने से 39 लोगों की मौत तथा 38 लोग घायल हुए थे. इस मामले में 03 रेलवे कर्मियों का पद कम किया गया था.

नूतन को दी गयी सूचना के अनुसार इन 110 मामलों में 79, अर्थात लगभग 70% मामलों में, कोई रेलकर्मी दुर्घटना के लिए जिम्मेदार नहीं पाया गया. शेष मामलों में 172 रेलकर्मी दण्डित किये गए जिसमे 24 रेलकर्मी बर्खास्त किये गए जबकि 4 को अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गयी. दुर्घटना के विभिन्न कारणों में गैर-जिम्मेदार ड्राइविंग के कारण 66 दुर्घटनाएं घटी पायी गयी जबकि 01 मामले में हाथी के अचानक आने से घटना घटी.

RTI: 144 train accidents, 226 dead, 365 injured in NR in 07 years

As per the RTI information provided by Northern Railways (NR), Delhi to activist Dr Nutan Thakur, from 01 April 2010 till date, 114 train accidents took place in NR. Among these, enquiry has been completed in 110 cases while in 04 cases, enquiry reports are still awaited. The total number of deaths in these accidents was 226 while 365 persons got injured. The total loss caused to Railway department through these accidents has been estimated to be Rs. 27.2 crores.

The biggest casualty took place when 13 coaches of Utkal Express derailed near Khatauli station in Muzaffarnagar district on 19 August 2017 when 25 people were killed and 105 injured. The enquiry report in this case is awaited. 39 people were killed and 38 injured when the Dehradun Varanasi Express derailed near Bhachhrawan railway station in Raebareli district on 20 March 2015. 03 junior personnel were given reduction to lower grade after the enquiry. 

As per the information provided to Nutan, of these 110 cases, in 79, i.e. around 70% of total cases, no railway staff was found responsible for the train accident. In other cases, a total 172 railway personnel were given different punishments including dismissal in 24 cases and compulsory retirement in 4 cases. Among the various reasons, in 66 cases negligent driving by vehicles was found the reason of train accident, while in 01 case, elephant dashing was found to be the reason.

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नवभारत टाइम्स के दामोदर व्यास ने रेल प्रशासन को दिया करारा जवाब

मुंबई : जरा सी बारिश में भी घंटों लोकल ट्रेन रोककर मुंबईकरों की नाक में दम कर देने वाले पश्चिम रेलवे का जनसंपर्क विभाग इन दिनों हॉलीवुड की महानतम धुन का प्रचार कर रहा है। गत दिनों पश्चिम रेलवे के जनसंपर्क विभाग के ईमेल आईडी से एक न्यूज़ सभी मीडियाकर्मियों को भेजी गई.. इसमें कहीं भी रेलवे का नामोनिशान तक नहीं था… लेकिन ओफिशियल तौर पर ये मेल आई थी इसलिए भाई लोग लग लग गए इस न्यूज़ को लगाने में…

ये न्यूज़ नवभारत टाइम्स के दामोदर व्यास जी को भी रेलवे की तरफ से भेजी गई थी। दामोदर व्यास ने तुरंत उस ईमेल आईडी पर रिप्लाई भेज कर पश्चिम रेलवे को जमकर लताड़ लगाई और पूछा कि इस न्यूज़ से पश्चिम रेलवे का क्या लेना-देना है। कुछ पत्रकारों ने तो रेल मंत्री को भी ट्वीट कर ये जानकारी दे दी कि आपका पश्चिम रेलवे कर क्या रहा है.. कुछ अखबार वालों ने पश्चिम रेलवे की इस बेसिर पैर की प्रेस रिलीज को हूबहू छाप दिया कि कहीं पश्चिम रेलवे का पीआरओ नाराज न हो जाये और उनका विज्ञापन न रोक दे या उनका टिकट कन्फर्म न करे। आप भी पढिये पश्चिम रेलवे की वो प्रेस रिलीज।

यूट्यूब पर सनसनी से हॉलीवुड का भारत में अवतरण

डिजिटल वर्ल्ड आजकल यूट्यूब पर नये शानदार वीडियो से चहक उठा है। हॉलीवुड की महानतम धुनों में से कुछ धुनों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की लय में पिरोकर बनाये गये ये वीडियो दर्शकों के दिलों पर छा रहे हैं। ये वीडियो अविस्मरणीय फिल्म ‘टाइटेनिक’ की थीम पर आधारित है, जिसमें भारतीय वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया गया है।

इंडियन जैम प्रोजेक्ट के संस्थापक और प्रणेता तुषार लाल ने एक बार फिर बहुत ही खूबसूरत धुन पेश की है, जो आरएमएस टाइटन पर रहे उस महान संगीतकार को समर्पित है, जो बहुत ही ज़िंदादिल थे। जब टाइटन जहाज डूब रहा था, उन क्षणों में भी उस महान संगीतकार ने अपने संगीत को रुकने नहीं दिया। यह उत्तम रचना ऐसे ही जिंदादिल इंसानों के प्रति एक संगीतमय उपहार है।

22 वर्ष की युवावस्था में ही प्रतिभावान तुषार ने भारतीय शास्त्रीय वाद्य यंत्रों के ज़रिये पश्चिमी धुन पर सजी संगीतमय प्रस्तुतियों का रागबद्ध कर लिया था, जिसको यूट्यूब पर 1 करोड़ 30 लाख से ज्यादा लोगों ने पसंद किया है। उनका हॉलीवुड धुन का प्रसिद्ध रूपांतर ‘पायरेट ऑफ दी कैरिबियन’ उनके अन्य रूपांतर ‘हैरी पॉटर’, ‘गेम ऑफ थ्रोन’ इत्यादि की तरह 40 लाख से अधिक लोगों द्वारा देखा गया। डिजिटल दुनिया के अलावा तुषार ने सम्पूर्ण देशभर के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण पूर्वी एशिया और विश्व के अन्य देशों में अपने लाइव परफॉमेंस दिये हैं। 4 वर्ष की कम उम्र में ही तुषार ने वाद्य यंत्रों के ज़रिये अपनी साधना का सफ़र शुरू कर दिया था और यूट्यूब पर अपने चैनल पर 12 वीडियो के ज़रिये वह अपने सफ़र में बहुत आगे निकल चुके हैं।

वर्तमान में यूट्यूब पर टाइटेनिक का भारतीय संगीत संस्करण दर्शकों में सुर्खियाँ बटोर रहा है और हफ्ते के भीतर ही साढ़े 3 लाख से ज्यादा लोग इसका लुत्फ उठा चुके हैं। वर्तमान संगीत पृष्ठभूमि में तुषार ने अपनी एक पहचान बना ली है और विश्वस्तर पर ‘कम्पोजिंग लीजेंड’ के रूप में दस्तक देने के लिए वह पूरी तरह तैयार हैं।

मुंबई से पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट शशिकांत सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : 9322411335

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चार महीने पहले रेल टिकट कटाने वाले इंजीनियर का दिवाली पर घर जाने का सपना ‘वेटिंग’ ही रह गया!

Yashwant Singh : हरिद्वार में कार्यरत इंजीनियर गौरव जून महीने में तीन टिकट कटाए थे, दिल्ली से सहरसा जाने के लिए, अपनी बहनों के साथ। ट्रेन आज है लेकिन टिकट वेटिंग ही रह गया। चार्ट प्रीपेयर्ड। लास्ट मोमेंट में मुझे इत्तिला किया, सो हाथ पांव मारने के बावजूद कुछ कर न पाया। दिवाली अपने होम टाउन में मनाने की उनकी ख्वाहिश धरी रह गई। दिवाली के दिन अपने जिला-जवार में होने की चार महीने पहले से की गई तैयारी काम न आई।

धन्य है अपना देश। धन्य है भारतीय रेल। हां, सत्ता के नजदीकियों के चिंटू पिंटू मिंटू जब चाहें टिकट कटा कर सीधे रेल मंत्रालय से कन्फर्म करा सकते हैं। सरकार चाहें कांग्रेसियों की हो या संघियों की, इस देश में दो देस होने का एहसास बना रहेगा।

भड़ास एडिटर यशवंत की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Dushyant Rai प्रभु ने जुलाई में वेटिंग खत्म करने की बात कभी नहीं की थी।वाजपेयी सरकार के मालगाड़ियों के लिए अलग लाइनों (DFC)को अगर यूपीए सरकार ने पूरा किया होता तो आज किसी को टिकट के लिए रोना नहीं पड़ता। इस सरकार को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ रहा है।मालगाड़ी में अधिकतम लोडिंग करने से पुरानी पटरियों की भी हालत गंभीर हो गई थी।हजारों किलोमीटर के ट्रैक पर 2 करोड़ यात्रियों को ढोते हुए भी यह सरकार अगले साल से कई रूटों पर DFC शुरू कर देगी। लगभग 3 साल में सबको बर्थ मिलने लगेगी और यात्रा का समय भी काफी कम हो जाएगा।

Rajiv Tiwari दूर तक साफ दिखाने वाला चश्मा लगाइए, मोदी लेंस को बदलकर।

Dushyant Rai अलीगढ़ से कानपुर की यात्रा ट्रेन यात्रा आम आदमी बन कर कीजिए, काम की गति और क्वालिटी देखकर आप को अपने कमेंट के लिए बड़ी शर्म आएगी।

Rajiv Tiwari शर्म आती है दुष्यंत जी, आप जैसे अंध समर्थकों पर, जो यह मानते है भारत निर्माण केवल 3 वर्षों में हुआ है। वरना पहले तो विशाल बियाबान जंगल था यहां। ट्रेन तो लोगों ने देखी ही नहीं थी…हैं ना सही बात।

Yashwant Singh भाई Rajiv Tiwari, दुष्यंत जी अपने पुराने मित्र और खरे आदमी हैं। रेल मंत्रालय से जुड़े हैं। हम लोगों को इनकी बात को गंभीरता से सुनना चाहिए। दूसरा पक्ष हमेशा महत्वपूर्ण होता है। मालगाड़ी और यात्री रेल की लाइन अलग किए जाने की व्यवस्था से निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।

Rajiv Tiwari सहमत हूँ यशवंत भाई, लेकिन पक्ष को संतुलित तरीके से रखना भी एक कला होती है।

Sanjaya Kumar Singh दुष्यंत राय जी, दो नहीं तीन मोर्चों पर कहिए। यूपीए सरकार ने बुलेट ट्रेन भी चला दी होती तो मोदी जी को उसपर भी मेहनत नहीं करनी पड़ती। और मेट्रो चलाया था तो उसका किराया बढ़ाकर खुश होने का मौका भी नहीं मिलता।

Yashwant Singh और ये भी सच है कि 60 साल में कांग्रेस अगर सबको यात्रा सुविधा प्रदान नहीं कर पाई तो प्राइमरी अपराधी हाथ का पंजा ही है। हां, bjp चीजों को ठीक करने के नारे के साथ आई थी तो इससे उम्मीद ज्यादा है और फिलहाल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सकी है। हो सकता है सही नीति पर अमल करके आगे चीजें ठीक कर दी जाएं, जिसका हम सबको इंतज़ार है।

Rajiv Tiwari संजय जी, बुलेट ट्रेन आने से देश का चहुँमुखी विकास हो जाने वाला है, जैसा पहले की सरकारों ने मेट्रो लाकर किया। चारों ओर सुख शांति, कहीं कोई परेशान नहीं, सर्व सुविधाओं की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है और हर देशवासी उसमें गोते लगाकर पुण्य बटोर रहा है।

Rajiv Tiwari ठीक कहा आपने यशवंत भाई, कांग्रेस ने 60 साल में जो कुछ किया उसका परिणाम उसके सामने है। लेकिन 3 साल में 6 दशकों पुरानी मैली गंगा साफ करने का दावा करने वाले ये बातों के शेर खुद कहाँ खड़े हैं।

Sanjaya Kumar Singh मूल मुद्दा ये है Yashwant Singh जी कि वेटिंग लिस्ट लेने की भी तमीज नहीं है। जब तीन या चार महीने पहले बुकिंग शुरू होती है और छठ के लिए महीने भर बाद ही वेटिंग शुरू हो जाता है तो ये तय होना चाहिए कि वेटिंग कितना बुक करना है, कब तक और जो बुक हो जाए उसे कंफर्म मिलना ही चाहिए। वैसे भी अब जब अंतिम समय पर कैंसल कराने वालों को नहीं के बराबर पैसे मिलते हैं तो कुछ सीटें खाली रह जाएं पर तीन महीने पहले बुक कराने वालों को अंतिम दिन पता चले कि कंफर्म नहीं हुआ और उसे डिफेंड किया जाए कि फलाने ने वो नहीं किया और ढिमाके ने वो नहीं किया – खरा आदमी होना तो नहीं हो सकता। नौकरी हो रही है – उससे मुझे कोई एतराज नहीं है।

Dushyant Rai भाई साहब रेल का नेटवर्क इतना विशाल और इतने बोझ से दबा है कि नई सरकार रेल लाइन बिछाने, विद्युतीकरण और पुरानी लाइन सुधार में लगभग तीन गुना गति से काम कर रही है फिर भी अभी तीन साल लगेगा जनता को अपेक्षित सुविधा मिलने में।

Sanjaya Kumar Singh आप ठीक कह रहे हैं। फिर भी, जब अंतिम समय में कैंसल कराने वाले को टिकट नहीं मिलता है तो क्या यह सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए (जैसे भी और उसमें छठ स्पेशल ट्रेन में वैकल्पिक आरक्षण मिलने पर चाहिए कि नहीं पूछ लेना शामिल है) कि तीन महीने पहले अपनी जरूरत बताने वाले को निराश नहीं किया जाए। क्या इस जरूरत से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि रेलवे की लाचारी को डिफेंड किया जाए? निश्चित रूप से यह लाचारी 130 करोड़ की आबादी के कारण है और हर कोई नरेन्द्र मोदी होता तो यह स्थिति नहीं आती। पर ये कर दूगां, वो कर दूंगा – कहने से पहले भी यही स्थिति थी।

Shyam Singh Rawat मैं ट्रेन नंबर 15035 व 15036–उत्तरांचल सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रेस का इसकी शुरुआत से ही नियमित यात्री हूं जो काठगोदाम-दिल्ली रूट पर चलती है। यह ट्रेन पहले ISO 9000 तथा ISO 2001-2008 द्वारा प्रमाणित एक अच्छी सेवा थी। अभी 25 सितंबर को इस ट्रेन से दिल्ली जाना हुआ (Coach No.D-9), गाड़ी की हालत बहुत बुरी है। समय-पालन, डिब्बे के भीतर सफाई, कैटरिंग, पानी आदि सब चौपट। यहाँ तक कि मोबाइल चार्जिंग सुविधा भी खत्म। 4 अक्टूबर को इसी ट्रेन नं.–15036 से वापस आने के लिए जब दिल्ली स्टेशन पहुंचा तो नैशनल ट्रेन इक्वायरी सिस्टम पर इसका आगमन-प्रस्थान निर्धारित समय-सारणी के अनुसार ही क्रमश: 15.25 और 16.00 बजे दिखाया जा रहा था। जबकि सच्चाई यह थी कि यह ट्रेन 16.05 पर प्लेट फार्म सं―5 पर पहुंची और वहां से 16.35 पर काठगोदाम के लिए चली। यह ट्रेन अपने गंतव्य पर डेढ़ घंटा विलंब से पहुंची। इसकी शिकायत नये रेल मंत्री पीयूष गोयल से उनके फेसबुक पेज पर की जिसे कुछ ही पलों में डिलीट कर दिया गया था। शायद यह मोदी सरकार की कपटपूर्ण नीति के अनुसार ‘आल इस वैल’ दिखा कर देश में भ्रम का वातावरण बनाने का एक हिस्सा है।

Prashant M Kumar ऐसे में बस यही लगता है कि अपना देश भी परदेस हो गया

Sarwar Kamal इस देश मे दो देश होने का अहसास बना रहेगा

निखिलेश त्रिवेदी भारतीय रेलवे जैसी थी और है वैसी ही आगे भी रहेगी। कायाकल्प की उम्मीद नहीं है।

Pramod Patel यह सरकार भी फेल. . . जनता ने मौका दिया और जनता को ही लुट लिया. . .

Pankaj Kumar अरे बाबा, मैने खुद कोलकाता से मोतिहारी जाने के लिये आज से तीन महीने पहले दो टिकट एसी टू टियर की ली थी। वेटिंग 1 और 2 मिला था। आज तक सीट कंफर्म नहीं हुआ हैं। परिवार को ले जाना है इस हताशे से फ्लाइट से दूसरे रूट से टिकट लिया। जो सबकुछ मिलाकर करीब करीब चौगुना बजट बढ़ गया। सभी रेलवे के मिनिस्टर , अधिकारी कहते फिरते है कि रेलवे घाटे में चल रही है, कोई आदमी बतावें कि जिस दिन उसे यात्रा करना है और उस दिन टिकट उसे आराम से मिल जाये। सभी ट्रेनें सालों भर फ़ूल रहती है। ट्रेन की सीटों से ज्यादा रेलवे के कर्मचारी है। जो दिनभर ऑफिस में गप व डींगें हाँकते और मारते है। सैलरी लेते है सबसे ज्यादा। आखिर क्यों न रेलवे घाटे में जाये।

Sushant Saurav Kya kahein iske liye bjp se jyada congg jimmedar h agar 50 salon m Cong Kam krti to bjp aati hi nhi

Gajendra Kumar Singh प्रभु जी तो जुलाई से वेटिंग खत्म करने की घोषणा की थी । अब तो खुद ही खिसक गये ।

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बिना पैसेंजर वाली आगरा-ग्वालियर पैसेंजर ट्रेन उतरी पटरी से (देखें वीडियो)

भारतीय रेलवे का हाल इन दिनों बहुत खराब है. रेलें आए दिन दुर्घटनाग्रस्त हो रही हैं जिसके कारण लोग ट्रेनों पर चढ़ने से डर रहे हैं. कई ट्रेनें इन दिनों हादसों के दौर से गुजरी हैं जिसमें बहुत सारे लोग हताहत भी हुए हैं. आज आगरा में आगरा-ग्वालियर पैसेंजर ट्रेन की बोगी पटरी से उतर गई. इस घटना के बाद उत्तर मध्य रेलवे के आगरा डिवीजन के अधिकारियों में हड़कंप मच गया. हालांकि ट्रेन में कोई पैसेंजर सवार नहीं था वरना बड़ा हादसा हो सकता था.

बताया जा रहा है ट्रेन यार्ड से प्लेटफार्म पर लगने के लिए जा रही थी, तभी बोगी पटरी से उतर गई. भारतीय रेलवे के हादसे सबसे ज्यादा यूपी में हो रहे हैं. रेल के इन हादसों में लापरवाही भी खूब देखने को मिल रही है. आज आगरा ग्वालियर पैसेंजर ट्रेन की बोगी पटरी से उतरने का हादसा मेन लाइन पर यह हुआ होता तो निश्चित रूप से इसके गंभीर परिणाम हो सकते थे.

आगरा से फरहान खान की रिपोर्ट.

संबंधित वीडियो…

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रेलवे की लूट का एक छोटा सा अनुभव सुना रहे हैं साहित्यकार अरुण माहेश्वरी

Arun Maheshwari : रेलवे की लूट का एक छोटा सा अनुभव… इस बार 1 सितंबर को हम जब दिल्ली सियालदह राजधानी एक्सप्रेस से दिल्ली आ रहे थे, हमारे साथ 3एसी में हमारी घरेलू सहायक मंजुरी कुइल का टिकट भी था। ट्रेन चलने के काफी देर बाद पता चला कि भूल से मंजुरी का टिकट सियालदह राजधानी का न होकर कोलकाता राजधानी का बन गया था जो हावड़ा स्टेशन से छूटती है।

बहरहाल, ट्रेन ख़ाली थी इसलिये मंजुरी को बिना टिकट का यात्री मान कर उसके लिये टिकट के दाम के बराबर जुर्माना देते हुए अर्थात टिकट का दुगुना दाम देकर नया टिकट कराना जरूरी था, और हमने टिकट चेकर को वैसा ही करने के लिये कह दिया। टिकट का मूल दाम बाईस सौ रुपया था, लेकिन टिकट चेकर ने बताया कि आजकल लागू की गई प्रोग्रेसिव मूल्य प्रणाली के अनुसार उसे टिकट का दाम अट्ठाईस सौ रुपये लेना पड़ेगा और उस पर जुर्माना और जीएसटी लगाने पर कुल उनसठ सौ रुपये पड़ेगा। खैर!

ट्रेन में ढेर सारी सीटें ख़ाली जा रही है और यात्री से ‘प्रोग्रेसिव’ मूल्य वसूला जा रहा है! यह कैसी व्यवस्था है, हमारी समझ के परे है! यह क्या इसीलिये संभव हो रहा है क्योंकि रेलवे पर सरकार की इजारेदारी है! कल Suraj Prakash जी की एक पोस्ट पर पढ़ रहा था कि कैसे उन्होंने मुंबई-दिल्ली के बीच की अगस्त क्रांति के डिब्बों में क्षमता से एक तिहाई से भी कम यात्री देखे थे। रेलवे की यात्री किराये की विवेकहीन नीतियों ने भारतीय नागरिकों की रेल यात्राओं में कटौतियाँ शुरू कर दी है। कहना न होगा, यह सब मोदी सरकार की देन है।

साहित्यकार और प्रोफेसर अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

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मोदी-योगी राज में चोरी और चोरों का बोलबाला!

Yashwant Singh : अभी टिकट बुक कर रहा था, तत्काल में। प्रभु की साइट हैंग होती रही बार बार। paytm ने अलग से पैसा लिया और सरकार ने अलग से टैक्स वसूला, ऑनलाइन पेमेंट पर। ये साले भजपईये तो कांग्रेसियों से भी बड़े चोट्टे हैं। इनको रोज सुबह जूता भिगो कर पीटना चाहिए। मुस्लिम गाय गोबर पाकिस्तान राष्ट्रवाद के फर्जी मुद्दों पर देश को बांट कर खुद दोनों हाथ से लूटने में लगे हैं। ये लुटेरे खटमल की माफिक जनता का खून पी रहे हैं, थू सालों।

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कोई योगी भक्त भाजपाई समझाए कि सपा राज का यह महाचोरकट अभी तक यूपी का मुख्य सचिव कैसे बना हुआ है? अब तो बड़े अखबारों ने भी इस लुटेरे को पद पर बनाए रखने को लेकर योगी सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। ये आज के अमर उजाला में छपी न्यूज़ का एक हिस्सा है। पढ़ें और बूझें।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

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Sanjaya Kumar Singh : जीएसटी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सर्विस टैक्स 15 प्रतिशत से 18 प्रतिशत हो जाएगा। उन सेवाओं के लिए भी जो सरकार को मुफ्त देना चाहिए पर देती नहीं है या घटिया होती है। आप दूसरों से पैसे देकर जो सेवाएं प्राप्त करते हैं उसके लिए भी सरकार सेवा कर लेती है। मनमोहन सिंह की बेईमान सरकार ने सात प्रतिशत से इसकी शुरुआत की थी जो बढ़ते हुए 15 प्रतिशत थी और जीएसटी के बाद ईमानदार सरकार इसे 18 प्रतिशत कर रही है। जय हो।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

इन्हें भी पढ़िए…

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लोअर बर्थ महंगा करने को तत्पर प्रभुजी इन उपायों से भी कराएं रेलवे को भरपूर कमाई :)

रेल मंत्री को सोशल मीडिया पर मिल रहे कुछ नायाब सुझाव, देखें-जानें…. 

रेल मंत्री सुरेश प्रभु अब लोअर बर्थ / विंडो सीट बेचकर रेलवे की आय बढ़ाएंगे. इस लोअर बर्थ और विंडो सीट को पाने के लिए किराया बढ़ाये जाने की तैयारी है. सुरेश प्रभु के राज में रेलवे को कई अन्य तरीकों से भी आय हो सकता है. इस बारे में सोशल मीडिया पर तरह तरह के सुझाव प्रभु को मिल रहे हैं. कुछ सुझाव यहां संकलित करके प्रकाशित किए जा रहे हैं…

1) इंजन के साथ वाले डिब्बे का किराया ज्यादा होना चाहिये क्योंकि ये सबसे पहले पहुंचता है

२) प्लेटफार्म एक पर ठहरने वाली गाड़ियों का किराया भी ज़्यादा वसूला जाना चाहिए

3) पत्नी को मायके छोड़ने जाते हुए पुरुषों से चार गुना किराया भी लिया जा सकता है

४) ट्रेन में लटक कर यात्रा करते हुए स्पाईडर मैन की फीलिंग लेने पर एक्स्ट्रा चार्ज लगना चाहिए

५) पायदान पर गमछा बिछाकर बैठने पर दुगुना किराया होना चाहिए

६) पंखा चलाने, मोबाइल चार्जिंग करने का 50 रुपये सरचार्ज भी लिया जाना चाहिये

७) ट्रेन में बैठकर ताश खेलने पर मनोरंजन कर भी वसूल किया जा सकता है

८) सुबह पटरियों पर प्रेस कांफ्रेंस करने वालों से ५-५ रुपये वसूल करके भी सालाना अरबों रुपए की आय बढ़ाई जा सकती है

९) एक्सप्रेस ट्रेन से ज्यादा, पैसेंजर ट्रेन सैर कराती है, जंगल, पहाड़ और खेतों के बीच रोककर यात्रियों को प्रकृति से संबंध बनाने का अवसर भी प्रदान करती है, अत: उसका किराया भी बढ़ाकर उसे पर्यटन रेलगाड़ी भी घोषित किया जा सकता है

(ह्वाट्सएप / फेसबुक मैसेज)

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सुहेल देव एक्सप्रेस से नरक यात्रा (देखें वीडियो)

मोदी सरकार के इस कार्यकाल में गाजीपुर से सांसद मनोज सिन्हा ने रेल राज्यमंत्री के बतौर एक ट्रेन का तोहफा दिया जिले वासियों को. सुहेल देव एक्सप्रेस. गाजीपुर से आनंद विहार. हफ्ते में तीन दिन चलने वाली यह ट्रेन इन दिनों किसी नरक यात्रा का बोध कराती है. 14 अप्रैल 2016 को गाजीपुर से आनंद विहार के लिए चली इस सुहेल देव एक्सप्रेस के एस3 कोच में वाश बेसिन का पानी फैला गया.

लोग बर्थ के नीचे से सामान निकाल कर सीट के उपर रखने लगे क्योंकि पानी सब कुछ भिगो रहा था. न टीटीई को कुछ दिख रहा था और न कोच अटेंडेंट को. न कोई शिकायत पुस्तिका दी गई और न ही किसी ने संज्ञान लेकर वाश बेसिन ठीक कराया. लग रहा है मोदी के राज में प्रभु की रेल राम भरोसे ही चल रही है. शायद इसी को रामराज कहते हैं क्या?

वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें…

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भारतीय रेल के लिए मोदी राज है ‘नर्क काल’, ताजा अनुभव सुना रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला

Shambhunath Nath : कहीं रेलवे को बेचने की तैयारी तो नहीं!… आज रेलवे की भयानक अराजकता और रेल कर्मचारियों की लापरवाही के साक्षात दर्शन हुए। सुबह मुझे कानपुर शताब्दी (12033) पकड़कर वापस गाजियाबाद आना था। कानपुर स्टेशन से यह गाड़ी सुबह छह बजे खुलती है। कानपुर में मैं वहां जहां रुका था, वह जूही कलाँ दो के विवेक विहार डब्लू-टू का इलाका स्टेशन से करीब सात किमी होगा। सुबह पहले तो बुकिंग के बावजूद ओला ने धोखा दे दिया। वह कैब आई ही नहीं और ड्राइवर ने फोन तक नहीं रिसीव किया। तब मेरे बहनोई स्वयं मुझे छोडऩे आए। इस तरह दो लोगों की नींद में खलल पड़ा।

हम घर से साढ़े पांच पर निकले थे और रास्ते भर यही सोचकर परेशान रहे कि कहीं टाटमिल चौराहे पर जाम न मिल जाए। खैर जब स्टेशन पहुंचे तो 5.48 हो रहा था। अपना सामान उठाए मैं भागता हुआ प्लेटफार्म में दाखिल हुआ तो गाड़ी का कहीं पता नहीं जबकि नियमत: उसे साढ़े पांच पर प्लेटफार्म पर लग जाना चाहिए। आखिर वहीं से यह ट्रेन चलती है। मगर ट्रेन प्लेटफार्म पर आई ही छह बजे। पूरी भीड़ ट्रेन के दरवाजों पर टूट पड़ी। मगर दरवाजे अंदर से ही बंद थे। सब उनके खुलने का इंतजार करते रहे। अब एक आदमी था जिसने एक के बाद एक कोच के दरवाजे खोलने शुरू किए। तेरह कोचों वाली इस ट्रेन के दरवाजे खुलने में ही 15 मिनट लग गए। सारे लोग एकदम से भड़भड़ा कर चढऩे लगे। और ट्रेन पांच मिनट बाद चल दी। अब जो चढ़ाने आए थे वे तो ट्रेन के अंदर तथा जिनको चढऩा था वे बाहर। हंगामा हुआ ट्रेन फिर रुकी और चली।

हमारा कोच सी-7 था। गाड़ी में बैठते ही मच्छरों ने घेर लिया। वृहदाकार के मच्छर जो भनभनाते तो डिस्टर्ब करते और चुप रहते तो हाथों-पांवों में काट लेते। हमे जो इंडियन एक्सप्रेस अखबार दिया गया उसे पढऩे की बजाय हम मच्छरों का शिकार करते रहे। मगर मच्छरों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि ट्रेन में चढ़ा हर मनुष्य परेशान हो गया। औरतें, बच्चे सब तंग। तब मैने अपना रौद्र रूप दिखाया और टिकट चेक करने आए बाबू से कंप्लेंट बुक लाने को कहा। बुक आ तो गई मगर उसमें पहले से जो शिकायतें थीं उन पर ही कोई जवाब नहीं आया था। दूसरी सवारियां भी उखड़ पड़ीं तब एक सफाई कर्मी आया और फर्श पर पोछा लगा गया। फिर जो चाय आई लाई गई उसका पानी ठंडा था। फिर टीटी बाबू को बुलाकर शिकायत की गई तो वेटर ने बताया कि ब्वायलर काम नहीं कर रहा। एक तो ट्रेन वैसे भी डिले थी उस पर उसकी गति ऐसी जैसे बारात चल रही हो।

कानपुर से इटावा आने में ही दो घंटे लग गए। उस शताब्दी से जिसकी स्पीड कम से कम 130 रखी जाती है। और कानपुर-इटावा की दूरी महज 133 किमी की है। फिर राम-राम करते ट्रेन चली तो जो नाश्ता आया वह भी ठंडा और ऊपर से मच्छरों की भरमार। टूंडला पार करने के बाद वह कर्मचारी आया जिसके कंधे पर ट्रेन की सफाई का भार था। उसने बताया कि मच्छर तो आएंगे ही ट्रेन रात को जंगल में खड़ी की जाती है। और हमारे पास हिट है नहीं। उसकी शैली से लग रहा था कि रेलवे सफाई के वास्ते जो सामान इसे मुहैया करवाता होगा उसे यह जरूर बाजार में बेच देता होगा। मजे से गुटखा खाते हुए और खूब फूला पेट लेकर वह जैसे आया था वैसे चला गया।

अलीगढ़ में स्टाप न होते हुए भी ट्रेन रोकी गई और तब कोच में एक अधिकारी आया और उसने हिट उसी कर्मचारी से मंगवाई और छिड़काव करवाया। उसके बाद ट्रेन चली मगर स्पीड वही साठ-सत्तर वाली। इस तरह जिस गाजियाबाद में हमें साढ़े दस पर पहुंच जाना था उस पर हम साढ़े बारह पर उतरे और एक बजे घर आए। समझ में नहीं आता कि रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने शताब्दी में तमाम तरह के सुविधा शुल्क लगाकर कानपुर तक का किराया लगभग 11 सौ रुपये कर दिया है मगर न तो कोई सुविधा बढ़ाई न खानपान की गुणवत्ता ही सुधारी। जबकि दस साल के मनमोहन राज और उसके पहले की सरकारों के वक्त भी शताब्दी जाड़ों के कोहरे के दौरान को छोड़ दिया जाए तो कभी लेट नहीं होती थी।

खाने का हाल यह है कि शताब्दी खाने और नाश्ते के नाम पर दो सौ रुपये और चार सौ रुपये वसूलती है पर नाश्ता ऐसा था कि उसे खाना दूभर। दो स्लाइस और एक डिब्बी मक्खन। न नमक न कालीमिर्च पाउडर। दो ही विकल्प थे या तो दो पीस कटलेट अथवा आमलेट। दोनों ही बेस्वाद और एकरस। पिछले 28 वर्षों से यही परोसते आ रहे हैं। प्रभु ने जब पैसे बढ़ाए थे तो कहा था कि खाने की क्वालिटी सुधरेगी। मगर क्वालिटी तो और गिरी। मजे की बात कि कानपुर और लखनऊ शताब्दी में इतनी भीड़ होती है कि कभी भी दो दिन पहले टिकट नहीं मिल पाती। पर इसका फायदा रेलवे उठाता है कि जो कुछ दे दो खा ही लेंगे। क्या ट्रेन को इस तरह लेट करने तथा साफ-सफाई न करने के पीछे रेलवे को निजी हाथों में देने की तैयारी तो नहीं चल रही है।

(जो कंप्लेंट मैने की उसका नंबर और पावती मेरे पास है। सोचता हूं कि दो दिन बाद रेलवे से पूछा जाए कि मेरी शिकायत पर हुआ क्या।)

अमर उजाला समेत कई अखबारों में संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की उपरोक्त एफबी पोस्ट पर आए प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं….

Vishwanath Dwivedi रेलवे का यह सामान्य अनुभव है. पता नहीं कब सुधरेगे हम लोग. मच्छर ही नहीं चूहे भी मिलते है शतब्दी में.
Rahul Bhardwaj ये भारत में विमान यात्रा को बढ़ावा देने का परोक्ष तरीका है
gazab kumar ये तो है शताब्दी का हाल, अब ज़रा सोचिए नार्मल ट्रैन का क्या हाल रहता होगा, और नीति निर्माता लोग अपने मुद्दे पर जनता से बहस करवाते हैं। व्यवस्था नहीं सुधरेगी फिर वही होगा कि प्राइवेट को सौंप दिया जाये…
Vir Vinod Chhabra शुक्र है कि आप गोमती एक्सप्रेस में नहीं बैठे। वैसे आप सुषमा जी को भी ट्वीट कर दें। विदेश मंत्री हैं तो क्या हुआ? उनका हृदय विशाल है।
Kaushal Madan सर सभी जगह ये ही हाल है कब सुधरें भगवान जाने
Vinay Oswal सब को साथ लेने के बाद विकास होगा। अभी तो शिकायतें इकठ्ठी की जा रही हैं। फिर विचार करेंगे किस एजेंसी से निस्तारण कराएं। उसके खर्चे भी जोड़े जाएंगे टिकट में। ऐसे में उन एजेंसियों का विकास होगा। आपको गलत फहमी तो नहीं कि किसका विकास किये जाने का लक्ष्य है?
Nitish Shukla आपने चिल्लाकर ‘जय भारत माता’ नहीं बोला, बोलते ही यकीन मानिए सारी तकलीफ कम लगने लगती
Prabhat Mishra 13 मार्च को लखनऊ शताब्दी से कानपुर से आया था, जैसा खराब खाना दिया गया उसे देखकर लग रहा कि रेलवे को डाक्टर भी रेल में रखना पड़ेगा इलाज के लिए.
Rakesh Pandey एक सवाल? कहीं रेलवे की बेचने की तैयारी तो नहीं … एक जवाब! देश के हालात रेलवे जैसे ही हैं।
Om Shanker Porwal मोदीराज में सबसे बदतर व्यवस्था रेलवे की ही है, सारी ट्रेने लेट, गति आराममय, खड़ी तो खड़ी, खाना बदतर, तमाम शिकायतो के बाद भी इसका कोई पुरसाहाल नहीं है।
Akmal Faruqi आपकी एक बात से इत्तेफ़क नही रखता की 12033 अलीगढ में स्टोपेज नहीं है Shambhunath Nath ji 9.05 का शेडयूलड आने का समय है
Shambhunath Nath बहुत से लोग मेरी बहुत-सी बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। पर मैं तो वही लिखूंगा जो कानपुर में रेलवे ने एनाउंस किया। कानपुर से ट्रेन खुलते ही एनाउंस होने लगा कि यह ट्रेन यहां से चलकर इटावा और गाजियाबाद रुकेगी। अब अलीगढ़ वालों ने भी पव्वा लगवा लिया होगा। सो इसे रुकवाने लगे। आखिर भाजपा के आदि पुरुष कल्याण सिंह का गृह जिला जो है। पहले इटावा नहीं रुकती थी तो मुलायम राज में रुकने लगी थी।
Akmal Faruqi बहुत से लोग मेरी बहुत-सी बातों से इत्तेफाक नहीं रखते। आपकी इस बात से इत्तेफाक रखता हूँ
Chitaranjannath Tiwaric अच्छे दिन हैं साहब…. थोड़ा विधर्मी, कुलच्छनी ममता बैनर्जी को भी याद कर लिया जाय !!!
Nadim S. Akhter Shambhunath Nath जी, देख पा रहा हूं कि आपको पोस्ट लिखे करीब 35 मिनट हो गए. इस पर लाइक और कमेंट की संख्या को देखते हुए आपको भी अंदाजा लग रहा होगा कि लोग ट्रेन को लेकर कितने जागरूक हैं. जाने दीजिए. सबको आदत हो गई है. कितनों से लड़िएगा. हां, रेलवे से सवाल-जवाब जारी रहे तो बेहतर. अपडेट जरूर दीजिएगा. इंतजार रहेगा.
Anil Maheshwari This catering system in Indian Railways has become a big fraud. Whether you want or not, you have to pay it. It was introduced by Scindia as Railway Minister. The time has come, it should be abandoned. Anyone willing to pay can purchase items from the pantry car as is the case with the trains in the USA. Shambhunath Nath
Shambhunath Nath पेंट्री तो ओवरनाइट जर्नी वाली किसी भी ट्रेन में नहीं लगती। हम या तो स्वयं बाजार से खरीद कर चलें अथवा ट्रेन कहां से हमारे लिए खाने की व्यवस्था करेगा। इटावा और अलीगढ़ में तो सामान्य रोटी-दाल भी ढंग का मिल जाए तो बहुत है। कानपुर से दिल्ली की दूरी कुल 444 किमी की है और शताब्दी इसे पांच घंटे में पूरी करती है। इस बीच भोजन नहीं तो भाव तो मुहैया करवाएं।
Anil Maheshwari Youn are correct. I was talking about this catering business in all the trains, in particular Rajdhani and Shatabdi trains.
Shambhunath Nath ऐसा भी होगा तो रेलवे किसी एक कंपनी को ठेका देगा और अभी भी रेलवे शताब्दी में किसी को ठेका ही देती है। खाना पैक कर उसमें चढ़ा लिया जाता है। चूंकि शताब्दी अधिक से अधिक सात घंटे की यात्रा करती है इसलिए इस दूरी के लिए पेंट्री रखना मुमकिन नहीं। शताब्दी का बटर-चिकेन देख लें तो नानवेज खाना ही छोड़ देंगे। और वेज में वे अरहर की बजाय खेसारी की वह दाल परोसते हैं जिस पर 1975 में बैन लगा दिया गया था।
Anil Maheshwari That is why the choice should be left to the passenger. If one does not like tyhe Railway food, one can bring food from his house or restaurant, as we used to do in the past.
Giriraj Kishore रेलवेज़ क्या हर जन माध्यम को विशिष्ट में बदलने की योजना है। मैंने जबसे रेल में सफ़र करना आरंभ किया रेलवे में इतनी अव्यवस्था पहले कभी नहीं देखी।
Vijay Balyan विमान यात्रा को बढ़ावा देने का परोक्ष तरीका……. अच्छे दिन हैं
राजेश कुमार यादव रेल और रेलकर्मी आपसे कष्ट के लिए क्षमा चाहते हैं, साथ ही रेलवे मे खाली पदों को भरने के लिए आपसे हमारा साथ देने की अपील भी करते हैं ।
Rudresh Kumar मोदी सरकार ने सिर्फ लोगों की जेबे खाली करने के तरीके ढूंढे हैं। सुविधा देने के नहीं।
Anil Kumar Yadav प्राइवेट करने में ही भलाई है। टीटी और जो तोंद वाले भाई साहब गुटका खा कर मज़ा मार रहे थे, उनको भी पता चल जायेगा।
Sanjaya Kumar Singh रेल मंत्री पानी और चखना भिजवाने से ऊपर की शिकायतों का जवाब भी नहीं देते। और फेसबुक वालों को बिल्कुल भाव नहीं देते। ट्वीटर पर शिकायत कीजिए तब शायद सुनें भी।
Shambhunath Nath मैं फेसबुक के जरिये रेलवे मंत्री से जवाब नहीं मांग रहा बल्कि जनता को सचेत कर रहा हूं ताकि वे सब जरा-सी भी असुविधा होते ही शिकायत पुस्तिका में शिकायत दर्ज करवाएं। मेरी लिखित शिकायत को सक्षम अधिकारी ने बाकायदा दस्तखत कर पावती दी है। अलीगढ़ में जब ट्रेन रुकवाई गई तब एक अधिकारी आया और उसने बाकायदा हमारी शिकायत और सीट का भी फोटो लिया। अब कुछ न कुछ तो होकर रहेगा। मैं तो बोड़ चला जाऊँगा शिकायत करने।
Sanjaya Kumar Singh सही बात है। सभी यात्रियों को अपने अधिकारों के प्रति ऐसे ही सचेत रहना चाहिए।
Umesh Kr कही अब आपको देशविरोधी ना घोषित कर दिया जाए
Shambhunath Nath अब मैं आप सब लोगों की तरह इतना कायर तो नहीं। अपन सिर्फ फेसबुक बहादुर ही नहीं हैं कोर्ट तक जाएंगे। ऐसे नहीं यहां हठी और पागलों के बीच डटे हैं।
Rao Deepak पहले सिस्टम को ख़राब करो, फिर बीमार बता के बेच दो।
Vikas Patel भगवान भरोसे रेलवे विभाग…. और सुनने मे आ रहा है कि भोपाल का हबीबगंज स्टेशन का निजीकरण कर बंसल कंम्पनी के दिया जा रहा हैl संम्पूर्ण भारत के यही हाल…
Govind Prasad Bahuguna आपने जिस तरह हालात बयान किये उसको पढकर लगा जैसे मैं खुद सफर ही नहीं बल्कि suffer कर रहा हूँ। मेरा सुझाव है इस लेख को बिना सम्पादित किये रेल मंत्री और रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को जरूर भेज दीजिए। आप विख्यात पत्रकार हैं सब आपको जानते हैं कार्यवाही जरूर होगी। नहीं तो फिर रवीशकुमार के साथ इस इश्यू को हाइलाइट करिये ।
Suresh Sharma कार्रवाई होना चाहिए वरना लापरवाह कमिंयो को सबक नही मिलेगा ।
Nikhil Katiyar बुलेट train की तैयारी मे सरकार बिजी है असुविधा के लिये खेद है
Nimish Sharma Sir aapki is shikayat ka me samarthan karta hu,jab shatabdi ka ye hal he to sir mail express aur passenger trains to ram bharose hain
Sujata Choudhary उसके बाद जब मोबाईल पर आवाज आती है रेलवे से कोई शिकायत हो तो कृपया इस नम्बर पर बताएं ,असुविधा के लिए खेद है,।उस समय क्या इच्छा होती है बता नहीं सकती। जब अडानी को समुद्र दिया जा सकता है तो रेलवे क्या चीज है।
Smith Agrawal Delhi bhopal satabdi ka bhi bura haal hai. मैं तो कंप्लेंट करके थक गया, जवाब वही एक पुराना घिसा पिटा सा है। खैर अब तो सरकार देशभक्तो की है तो प्रश्न उठाने का तो सवाल ही नहीं उठता। वैसे भी 2020 तक वेटिंग ख़त्म करनी ही है।
Prakash Kumar Jha हम रेलवे में काम करने वाले कभी शताब्दी राजधानी नहीं चढ़ पाते…. तो उसका एक्सपीरियंस नहीं है, पर खाना सच में खराब मिलता है, उसका कारण है ठेकेदारी सिस्टम में गला काट प्रतियोगिता… जिसके कारण बहुत ऊँचे दाम पर पैंट्री लिया जाता है, ठेकेदार उसका पैसा वसूलने के लिए खराब खाना देते हैं, और ज्यादा पैसे लेते हैं, पूर्णतः निजीकरण जल्द ही होगा, उस समय स्थिति और खराब ही होगा… इतना तय है…
Pratik Bajpai बहुत बुरा हाल है रेलवे का ,विपक्षी रेलवे जैसे मुद्दे उठाने के बजाय ऊना ,नजीब, जैसे फालतू मुद्दे पर समय बर्बाद कर रहे है ।मुझे भी कुछ ऐसे ही एक्सपेरियन्स हुए है
Sudhendu Patel इसे कहते हैं मोदिजी का गुड गवेरनेंस ! प्रभु तो प्यादा ही हैं न गुरू.
Kalyan Kumar वास्तव में रेलवे का जितना बुरा हाल सुरेश प्रभु के कार्यकाल में है, उतना मैंने पहले कभी नहीं देखा…सफाई नहीं, खाना ठीक नहीं, सफर का समय लंबा और पता नहीं और कितनी कमियां समा गई हैं…शताब्दी-राजधानी से बेहतर तो लोकल ट्रेन लगने लगी है…कम से कम खिड़की खोलकर खुली हवा तो ले सकते हैं….फिर अद्भुत भारत के दर्शन भी हो जाते हैं…
Shoeib Khan टिकट लेट बुक कराओ तो चार्ज बढ़ने का प्रावधान लेकिन ट्रैन लेट हो तो कोई हर्जाना नही। मज़ेदार है न ?
Pawan Mishra You got IE in Shatabdi, good
Pankaj Singh प्रभु (सुरेश) को याद कीजिए….सब अच्छा होगा।
gazab kumar रेलवे की व्यवस्था पहले से अगर कुछ बेहतर हुई है तो उसका लाभ, गाजीपुर बनारस और पूर्वांचल के विभ्भिन ज़िलों को ही मिला है, जिसका श्रेय केवल मनोज सिन्हा जी को जाता है, सुरेश प्रभु जी से बेहतर इस विभाग को सुषमा जी देख सकतीं हैं। जब बहुमत में सुरेश प्रभु जी का ये हाल है, तो समर्थन दिए होते तब पता नहीं क्या होता।
Abhay Singhai कल मैं जलगाँव से सागर कामायनी एक्सप्रेस से आया था। ए सी बी1 कोच के टॉयलेट में पानी नहीं था अंदर पोस्टर लगे थे कि सफाई के लिये बाहर दरवाजे पर अंकित मोबाइल पर सम्पर्क करें ,परन्तु कहीं कोई नम्बर नहीं लिखा था। टॉयलेट गन्दे पड़े थे।सब प्रभु की माया है।
Raj Kumar सबसे बुरा ये है कि रेलवे अब आधे से एक घंटे की देरी को देरी मानता ही नहीं है। आपकी अगर छः बजे की ट्रेन है और ६:२० या ६:४० तक ट्रेन नहीं आयी, तब भी रेलवे उसे सही टाइम ही मानता है। और नोटिस बोर्ड पर लेट नहीं दिखता। अब ६:३० पे अनाउन्स होता है की ट्रेन समय पे हैं और ६:०० बजे प्लेटफ़ार्म पे आएगी। जबकि आपकी घड़ी में ६:३० हो रहा है। स्टेशन मास्टर और पूछ ताछ केन्द्र के लोग गुंडागर्दी करते हैं। सवारी को लगता है कि ट्रेन किसी और प्लेटफ़ार्म पर खड़ी है, इसलिए लेट नहीं दिखा रहा है। इससे अफ़रातफ़री का माहोल भी बन जाता है।
Rajesh Kumar बिल्कुल सही कहा सर जी, सफ़ाई व्यवस्था पुरी ठेकेदार के पास है,हॉस्पिटल से मरीज़ प्राइवेट हॉस्पिटल में भेजे जा रहें हैं,दवाइयाँ सीधे उपलब्ध होने की जगह स्थानीय क्रय से आ रहीं हैं, कभी-2 मिलती हैं कभी नहीं भी, कर्मचारी संविदा पर रखे जा रहें हैं, रेल कारखाने जिस चीज़ को ख़ुद बनाते थे और फ़ायदे में रहते थे वही सामान बाहर से ख़रीदा जा रहा है और अब घाटा बढ़ता जा रहा है, ठेकेदार के लोगों को न तो चार्जशीट से डर है न नौकरी जाने का…पद खाली पड़े हैं…अवैध वेंडर और दलालों की पौ बारह है, सारे निर्माण जो रेलवे ख़ुद कराती थी सब ठेके पर
धीरेन्द्र अस्थाना It is same situation in 12003 Lko to Delhi. I never expected such treat by IR.
Somnath Bhattacharya हम सबको भी यह सहना पड़ता है। कहते हैं पर कोई सुनता नहीं। आप बड़े और सम्मानित पत्रकार है शायद बात पहुँच जाये और प्रभु की कृपा हो ।
Pradeep Singh रेलवे की यह दुर्दशा बताती है कि यह कर्मचारियों की लापरवाही है। अपने देश में अच्छे कर्मचारी का चयन नहीँ किया जाता है। सामाजिक न्याय के नाम पर नौकरी दी जाती है। सामाजिक न्याय का साथ दीजिए।
Yogendra Sharma इसके लिए सीधे ठेकेदार और अधिकारी जिम्मेदार हैं। समय-समय पर इसकी न जांच होती है न निगरानी होती है।
Deepak Sootha यात्रियों के सब्र का इम्तिहान तो रोज़ होता है। कोई सुनने वाला नहीं। आपका प्रभु आराधन शायद स्वीकार हो जाय।फिर भी एक ही दिन ( inspection day) का सुधार नज़र आ सकता है। जहाँ तक रेल के बिकने का सवाल है, वह आज नहीं तो कल हक़ीक़त बनना तय है। भोपाल के हबीब गंज रेल स्टेशन से शुरुआत हो चुकी है।

मोदी राज में भारतीय रेल से संबंधित कुछ अन्य कहानियां…

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हिमगिरि एक्सप्रेस के सेकंड एसी में comesum catering ने परोसा सड़ा खाना, चोरों ने ब्रीफकेस उड़ाया

हावड़ा से लखनऊ जाने वाली गाड़ी हिमगिरि एक्सप्रेस के सेकंड एसी के A1 कोच में comesum catering द्वारा मुग़लसराय स्टेशन पर सड़े खाने की सप्लाई की गई। इस सड़े खाने के बारे में पूछने पर वेंडर ने बदतमीजी की। श्री संजीत कुमार, जो कि देवघर में एक सीमेंट व्यवसायी हैं, का 26″ का VIP का मैरून रंग का ब्रीफ़केस क्विल जं. और पटना के बीच में चोरी हो गया। बक्सर में GRP ने आकर खानापूरी करते हुवे फॉर्मल FIR लॉज कर लिया है।

पीड़ित संजीत कुमार का मोबाइल नंबर 8877180561 है। इतने बड़े बैग की चोरी बिना पुलिस और रेलवे स्टाफ के मिलीभगत के संभव नहीं है। फिर इतना सड़ा खाना ये इतने आराम से बेच लेते हैं food inspector पैसे खा के चुप बैठ जाते हैं शायद। जनता त्राहिमाम कर रही है प्रभु।

भड़ास को मिले एक पत्र पर आधारित.

इसे भी पढ़ें…

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कनफर्म रेल टिकट अब परिजनों को कर सकते हैं ट्रांसफर

This is regarding transfer of confirmed rail ticket. Very good initiative by Railway Minister Suresh Prabhu.

 1. A confirmed railway ticket can be transferred to your blood relations.

2. If a person is holding a confirmed ticket and is unable to travel, then the ticket can be transferred to his / her family members including father, mother, brother, sister, son, daughter, husband or wife.

3. For transfer of ticket, an application must be submitted atleast 24 hours in advance of the scheduled departure of the train to chief reservation supervisor with ID proof.

4. Government officials can transfer to other govt official.

5. Students can transfer ticket to other students.

Share this. It may help someone. For Details access / visit to: –

http:/www.indianrail.gov.in/change_Name.html 

उपरोक्त खबर पर दो वरिष्ठ पत्रकारों की टिप्पणियां यूं हैं :

Sanjaya Kumar Singh यह सुविधा पहले से है। पर स्टेशन जाकर कराना मुश्किल था और साहब मिलें तो हो, वरना चक्कर लगाते रहिए। ये देखिए 2 अप्रैल 2011 की खबर। वैसे इससे भी पहले है। तब भी कोई आपकी तरह गच्चा खा गया होगा। सच कहिए तो ये सरकार नई बोतल में पुरानी शराब वाली है। देखें टाइम्स आफ इंडिया की ये पुरानी खबर : TOI NEWS

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Vishnu Rajgadia कनफर्म टिकट अपने परिजन को ट्रांसफर करने का नियम 1990 से है। मोदी सरकार बनने के बाद अज्ञानी लोगों को यह कहकर बहलाया जा रहा है कि यह मोदी सरकार ने लागू किया। वैसे भी अभी बजट में इस सुविधा को कोई विस्तार नहीं दिया गया है, इसके दुरूपयोग के एक बिन्दु पर उचित रोक लगी है। एक मामले में किसी ने रियायती टिकट लेकर बाद में ऐसे परिजन को ट्रांसफर कर दी, जो उस रियायत के योग्य नहीं था। लिहाजा, ऐसे दुरूपयोग को रोकने का उपाय अभी निकाला गया है। 3 मार्च 2002 का सर्कुलर है रेलवे का जिसमे ये सारे प्रावधान हैं। इसमें दुरूपयोग के कारण 2011 में हिदायत दी गई। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की न्यूज़ देखिए : TOI NEWS

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महिला रेलकर्मी ने जीएम के साथ डुएट गाने से मना किया तो हुआ ट्रांसफर, थमा दी चार्जशीट

”पिछले 8 सालों से रेलवे में कल्चरल कोटे के तहत काम कर रही हूं। हर साल मंडल को नेशनल इंटर कंम्पटीशन में जिताती आ रही हूं। लेकिन आज तक कभी सम्मान या अवार्ड नहीं मिला। उल्टा अधिकारीयों की पर्सनल पार्टियों में घर जाकर गाना गाना पड़ता है। फिर चाहे दिवाली का मौका हो या न्यू ईयर का।” यह आपबीती है उस महिला सीनियर क्लर्क की जिसे रेलवे जीएम सत्येंद्र कुमार के साथ गाना न गाने पर सबसे बड़ी अनुशासन हीनता बताते हुये चार्जशीट और ट्रांसफर ऑर्डर दिया गया।

इतना ही नहीं, रात 2 बजे तक उन्हें पार्टी में ही रोके रखा गया। हालाँकि इस हरकत का खुलासा होते ही जीएम से लेकर डीआरएम तक अपनी बचाते दिखे और ऑर्डर वापस ले लिया गया। लेकिन इनकी ओहदे की गरमी देखिये कि किसी ने गाना नहीं गया तो चार्जशीट देकर ट्रांसफर कर दिया।

दरअसल छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जोन के जीएम सत्येंद्र कुमार 31 जनवरी को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसलिये महोदय के सम्मान में 16 जनवरी को राजधानी रायपुर में एक विदाई की हाई प्रोफाइल पार्टी का आयोजन किया गया। और इसी दौरान महिला क्लर्क को उनके साथ गाना गाने के लिए बोला गया। जिस पर पीड़िता ने मना कर दिया। हालाँकि उन्होंने इसकी वजह गाना याद न होना बताई। लेकिन यह बात चमचों के गले की फ़ांस बन गई। रायपुर डीआरएम राहुल गौतम के मुताबिक तो यह सबसे बड़ी लापरवाही है और इसीलिये जीएम के साथ डुएट न गाने जैसी अनुशासन हीनता कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी। बस इसीलिये चार्जशीट दी गई।

इस मामले को दैनिक भास्कर के सीनियर जर्नलिस्ट सन्दीप रजवाड़े ने बड़ी प्रमुखता से उठाया। मीडिया में मुद्दा गरमाता देख मण्डल अधिकारीयों के पसीने छूट गये। दी गई चार्जशीट और ट्रांसफर ऑर्डर पर उन्हें कोई जानकारी ही नहीं, ऐसी बयानबाजी करने लगे। यहां तक कि कुछ इसे खुद ही गलत ठहराते हुये कहने लगे कि ऐसा ऑर्डर निकलता है तो मजबूरन साइन करने पड़ते हैं। अब यह मजबूरी पद की है या चमचागिरी की, यह वही बेहतर बता पायेंगे।

खैर, जब कर्मचारियों की बजाय चमचों का कोई झुण्ड किसी सरकारी विभाग में घुस जाता है तो ऐसे ही तुगलकी फरमान जारी होते हैं। न जाने ऐसे और कितने किस्से होंगे जो साहब की विदाई के साथ ही दब जायेंगे। बाकी सरकारी तन्त्र में जो अपने पद का दुरुपयोग न करे, वो काहे का सरकारी। आप ज्यादतियों पर ज्यादतियां करते रहिये, ज्यादा होगा तो ट्रांसफर हो जायेगा।

आशीष चौकसे
पत्रकार, राजनीतिक विश्लेषक और ब्लॉगर

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पत्रकारों को मिलता नहीं, तो रेलवे का प्रेस कोटा आखिर जाता कहां है?

रेलवे रिजर्वेशन में पत्रकारों को कोटा देती है, लेकिन ये कोटा कुछ ही पत्रकारों को मिल पाता है. जिस तरह अखबार मालिक और उनके चट्टे-बट्टे मैनेजर खुद को ‘संपादक’ या ‘रिपोर्टर’ बताकर ‘एक्रेडिटेशन कार्ड’ हथियाकर ‘सरकारी मान्यताप्राप्त पत्रकार’ बन जाते हैं और फिर सरकार की ओर से पत्रकारों को मिलने वाली मामूली से मामूली सुविधाएं भी हड़प लेते हैं, उसी तरह ये ‘तथाकथित पत्रकार’ रेलवे का रिजर्वेशन कोटा भी कब्जा लेते हैं. इसके अलावा कुछ ऐसे पत्रकार भी हैं, जो अपने लगे-सगे लोगों के लिए कोटा सुविधा का दुरुपयोग करते हैं. ऐसे में जो असली पत्रकार हैं और रेलवे कोटे जैसी सुविधाओं के असली हकदार हैं, वे बेचारे मुंह ताकते रह जाते हैं.

मुंबई में भी पिछले कई सालों से यही देखने को मिल रहा है. पता चला है कि अखबारों के दफ्तरों से रोज 2-4 सिफारिशी पत्र सेंट्रल और वेस्टर्न रेलवे के पीआरओ के पास पहुंचे रहते हैं. फोन और एसएमएस-व्हाट्सऐप की सिफारिशें अलग. अब ये पीआरओ उन्हीं लोगों की सिफारिश मंजूर करते हैं, जिन्हें वे ‘पहचानते’ हैं यानी वे मैनेजर या पत्रकार, जो उन्हें काम के लगते हैं, जो रोज उनके यहां उठते-बैठते हैं, दो-चार काम उनके भी करते हैं यानी रेलवे के खिलाफ न्यूज नहीं छापते और जैसी वे कहें, वैसी ‘पॉजिटिव’ न्यूज छापते हैं. पता चला है कि कई अखबारों के मैनेजर तो पीआरओ को यहां तक कह रखे हैं कि फलां-फलां के हस्ताक्षर से पत्र आए तो ही सिफारिश मंजूर करना, अन्यथा नहीं. अब ये जांच का विषय है कि क्या हर अखबार से 2-4-6 लोग रोजाना गांव आते-जाते हैं? हर अखबार भी नहीं कहना चाहिए, कुछ चुनिंदा अखबारों से? क्योंकि इन्हीं अखबारों से ज्यादातर सिफारिशें रोजाना पहुंची रहती हैं.

रेलवे विभाग को इस बात की जांच करनी चाहिए कि अखबारों की ओर से आने वाली सिफारिशें उसी अखबार में काम करने वाल जेनुइन पत्रकारों के लिए होती हैं या मैनेजरों के दोस्तों-रिश्तेदारों या फिर दोस्तों के दोस्तों के लिए? क्योंकि यह एक लूट है, जिसमें अखबार-मालिकों, मैनेजरों और रेलवे पीआरओ की मिलीभगत है? खबरें यहां तक हैं कि रेलवे के कुछ लोग और कुछ पत्रकार टिकट के दलालों से मिलकर कन्फर्म टिकट दिलाने के नाम पर इस सुविधा का इस्तेमाल पैसा कमाने के लिए करते हैं. इस तरह की खबरें सच हैं या नहीं, रेलवे को इसकी जांच करनी चाहिए. अगर इस सुविधा का इस्तेमाल जेनुइन पत्रकारों को ही न मिले और कुछ भ्रष्ट लोग इसकी आड़ में धंधा करें, तो इसका बंद हो जाना ही अच्छा है. अगर आरटीआई के माध्यम से जानकारी निकाली जाए कि किस अखबार की तरफ से पिछले 5 साल-10 साल में कितनी सिफारिशें आईं और कितनी मंजूर की गईं, उनके पीएनआर नंबर से पता किया जाए कि उस टिकट पर सफर करने वाला अखबार का कर्मचारी या उसके परिजन थे, या कोई और, तो मामले की पूरी सच्चाई सामने आ जाएगी.

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रेल मंत्री सुरेश प्रभु के नेतृत्व में भारतीय रेल ने बनाया नया ‘रिकार्ड’!

Pushya Mitra : मैं जिस ट्रेन से दिल्ली जाने वाला हूँ वह आज पटना से शाम 4 बजे खुलने वाली थी मगर कल शाम ही मैसेज आ गया कि वह पटना 11 की सुबह पहुंचेगी। वह ट्रेन अभी दिल्ली से कोलकाता के रास्ते में है और 24 घंटे से अधिक लेट हो चुकी है। और यह कहानी किसी एक ट्रेन की नहीं दिल्ली पटना रुट से गुजरने वाली 50 से अधिक रेलगाड़ियों की है। और यह बहुत सामान्य मामला है। असली खबर तो इस खबर में है।

गरीब रथ 62 घंटे लेट हो चुकी है और अभी रास्ते में है। साफ सफाई और सोशल मीडिया में सक्रियता के मामले में सुरेश प्रभु जितनी शो बाजी कर लें मगर ट्रेनों के परिचालन के मामले में फिसड्डी साबित हुए हैं। सच यही है कि रेलवे का सिस्टम ठीक करना उनके जैसे व्यक्ति के बस की बात नहीं है। और वे जिस काम के लिये आये हैं, यानी रेलवे को बेचने लायक बनाने के लिये वह भी वे शायद ही कर पाएं। कोहरे के मौसम में उत्तर भारत में ट्रेनों का परिचालन ठीक करने के लिये अब किसी और प्रभु को अवतार लेना पड़ेगा।

Sanjaya Kumar Singh : प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल कहा कि रेल मंत्रालय पहले “रेवड़ी की तरह” बंटता था। एक मंत्रालय कैसे रेवड़ी की तरह बंटता था वही जानें पर हम उनका अभिप्राय समझ रहे हैं। रेवड़ी की तरह प्राप्त रेल मंत्रालय चलाने वाले राम विलास पासवान अभी उनके मंत्रालय में हैं और पता नहीं उन्हें जो मंत्रालय दिया गया है वह उन्हें किस तरह और किस आधार पर दिया गया है पर जिस सुरेश प्रभु नामक चार्टर्ड अकाउंटैंट को नरेन्द्र मोदी ने रेल मंत्रालय दिया है उसके राज में रेल किराया किस तेजी से बढ़ा आप जानते हैं।

रेवड़ी की तरह रेल मंत्रालय पाने वाले एक और रेल मंत्री लालू यादव ने कई साल ट्रेन का किराया नहीं बढ़ाने का रिकार्ड बनाया था। पर अब बच्चों के आधे किराए से लेकर वरिष्ठ नागरिकों की छूट का क्या हाल है आप सब जानते ही हैं। अब जानिए कि ट्रेन लेट चलने में (आनंद विहार – भागलपुर गरीब रथ एक्सप्रेस 22406 करीब 62 घंटे की देरी से चल रही है) रिकार्ड बना रही है। पर मोदी जी इन सबसे ऊपर, “ना खाउंगा, ना खाने दूंगा” का एलान करने वाली ईमानदार सरकार तो चला ही रहे हैं – किसी आरोप का जवाब न देने का महान कार्य भी कर रहे हैं। निरंतर नए आरोप लगाते हुए।

वरिष्ठ पत्रकार द्वय पुष्य मित्र और संजय कुमार सिंह की एफबी वॉल से.

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देशभक्त यह दूसरा वाला रेलमंत्री है!

Madan Tiwary : एक रेल मंत्री थे। उन्होंने देखा स्लीपर में वेटिंग लिस्ट लंबी है और एसी की सीट खाली जा रही है। रेलमंत्री ने बिना कोई एक्स्ट्रा चार्ज लिए अपग्रेड सिस्टम लागू कर दिया। इससे हुआ ये कि अगर आपका टिकट वेटिंग है और एसी कोच में सीट खाली है तब आपका वेटिंग टिकट एसी में अपने आप अपग्रेड हो जाएगा।

इसके बाद दूसरा रेल मंत्री आया। उसने नियम लागू किया कि जैसे जैसे सीट फुल होती जायेगी, भाड़ा भी बढ़ता जाएगा। मतलब यह कि ट्रेन में सीट की संख्या कम होती जायेगी तो आपको ज्यादा भाड़ा देना पड़ेगा। देशभक्त यह दूसरा वाला रेलमंत्री है।

बिहार के गया जिले के वकील और सोशल एक्टिविस्ट मदन तिवारी की एफबी वॉल से.

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भारत की अधिकांश रेल पटरियों की लाइफ ख़त्म हो चुकी है, ट्रेन से चलना बेहद जोखिम भरा

Subhash Chandra Kushwaha : मेरे एक प्रिय रिश्तेदार रेलवे में ट्रैक मेंटीनेंस से सम्बंधित इंजीनियर हैं. विदेशों में भी ट्रैक का निर्माण करने का अनुभव है. वे विगत १० सालों से कहा करते थे कि भारत की रेल जिस तरह बेहद कमजोर ट्रैक पर दौड़ रही है, यह बेहद जोखिमभरा है. वह बताते थे कि देश की अधिकांश पटरियों की लाइफ ख़त्म हो चुकी है मगर वे बदली नहीं जातीं. ट्रैक के नीचे गिट्टी की मोटाई मानक की आधी ही रखी जाती है. गिट्टी की कसाई ठीक से नहीं होती. ऐसे में बुलेट ट्रेन की बात छोड़िये, 100 की स्पीड में ट्रेन चलाना जोखिम भरा है.

भारतीय रेल की पटरियों पर फ़िलहाल 100 km की रफ़्तार से ट्रेन दौड़ना जोख़िम भरा है. पटरियां सड़ चुकी हैं. पटरियों के मेंटिनेंस पर जितना काम किया जाना चाहिए, उसका आधा भी नहीं होता. मौत का सफ़र करने को हम मजबूर हैं.

गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुभाष चंद्र कुशवाहा की एफबी वॉल से.

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रेल में हवाई यात्रा के सुख बनाम भारतीय रेल

कल 08792 निजामुद्दीन-दुर्ग एसी सुपरफास्ट स्पेशल से वास्ता पड़ा। निजामुद्दीन से चलने का ट्रेन का निश्चित समय सवेरे 830 बजे है सुबह सात बजे नेशनल ट्रेन एनक्वायरी सिस्टम पर चेक किया तो पता चला ट्रेन राइट टाइम जाएगी। यहीं से चलती है इसलिए कोई बड़ी बात नहीं थी। स्टेशन पहुंचा तो बताया गया प्लैटफॉर्म नंबर चार से जाएगी। प्लैटफॉर्म पर पहुंच गया तो घोषणा हुई (संयोग से सुनाई पड़ गया वरना देश भर में कई स्टैशनों के कई प्लैटफॉर्म पर घोषणा सुनाई नहीं पड़ती है और हम कुछ कर नहीं सकते) कि ट्रेन एक घंटे लेट है। परेशान होने के सिवा कुछ कर नहीं सकता था।

ट्रेन नए निर्धारित समय से खुली और कोई 23 मिनट मेकअप करती हुई 37 मिनट लेट ग्वालियर से रवाना हुई। फिर भारतीय रेल के रूप में आ गई और लेट होते हुए सुबह एक घंटा 40 मिनट देर से दुर्ग पहुंच गई। वैसे तो भारतीय रेल अपनी बीमारियों से 67 साल जूझती रही है और किसी को कोई उम्मीद पहले भी नहीं थी पर नरेन्द्र मोदी सरकार बनने के बाद चार्टर्ड अकाउंटैंट रेल मंत्री ने यात्रियों की जेब काटने के ढेरों बंदोबस्त किए हैं और उसमें एसी सुपरफास्ट स्पेशल जैसी ट्रेन चलाई है जिसमें एक दिन पहले भी बगैर किसी तत्काल, वीआईपी या फ्लेक्सी फेयर के नीचे के दो बर्थ आमने-सामने मिल जाते हैं। और लगभग खाली ट्रेन बुजुर्ग यात्रियों को बगैर वरिष्ठ नागरिकों वाली छूट के देर से ही सही, आराम से गंतव्य तक पहुंचा देती है।

इस तरह बुजुर्गों के पास बच्चों का कमाया पैसा है तो उन्हें आराम भी मिल ही रहा है। पर रेलयात्रा को किराये से लेकर अन्य तरह से भी हवाई यात्रा बनाने की कोशिशों को पूरा होने में अभी बहुत देर है और उसमें सबसे बड़ी बाधा है ट्रेन का लेट चलना। बाकी स्टेशन पर लिफ्ट, एसक्लेटर न होना, बैठने के लिए बेंच से लेकर पंखों तक का अकाल और कुलियों की लूट-मनमानी के तो कहने ही क्या हैं। लेकिन वो सब कोई मुद्दा नहीं है। जनता के पैसे से चलने वाली ट्रेन का उद्देश्य जनता को लूट कर मुनाफा कमाना हो गया है यह समझने की भी जरूरत नहीं है।

अब रेल यात्रा को हवाई यात्रा बनाने की बात चली ही है तो यह भी बता दूं कि कल निजामुद्दीन स्टेशन पर शताब्दी जैसी एक ट्रेन आकर लगी तो माथा ठनका। निजामुद्दीन से कौन सी शताब्दी? याद आया, थोड़ी देर पहले विमान परिचारिका जैसी यूनिफॉर्म में कुछ सुंदर स्मार्ट लड़कियां खड़ी थीं, अब नजर नहीं आ रही हैं। ट्रेन से ये विमान परिचारिकाएं कहां जा रही हैं? दिमाग चला और समझ में आ गया कि ये गतिमान एक्सप्रेस है और परिचारिकाएं विमान की नहीं, गतिमान एक्सप्रेस की थीं। इस पर याद आया कि जब गतिमान एक्सप्रेस चलने की घोषणा हुई थी तो भक्तों ने उसका कितना शानदार प्रचार किया था।

विदेशी ट्रेन से लेकर बड़े-बड़े विमानों के अंदर के दृश्यों की फोटो चिपकाकर उन्हें गतिमान एक्सप्रेस बताया था। कुछ अखबारों और मीडिया चैनलों के वेब पन्नों ने भी यह करामात “चित्र : सिर्फ समझने के लिए” जैसे जुमलों के साथ किया था। बाद में हुई निराशा का अंदाजा इस बात से लगता है कि ट्रेन चलनी शुरू हुई तो किसी भक्त यात्री ने उस पर कुछ नहीं लिखा। दरअसल भक्त सिर्फ तारीफ करते हैं. निन्दा नहीं। निन्दा की अपेक्षा वे हमसे करते हैं पर सरकार की नहीं, विरोधी दलों की।

लेखक संजय कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनकी फेसबुक वॉल से लिया गया है.

संजय का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं….

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रियायती रेल टिकट आनलाइन बुक करने में पत्रकारों को आ रही दिक्कत….

Attn Pls…. online Rail Concessional Ticket

Dear Journalist Friend,

If your name is consisting of more than 16 words (including space in between) would not be able to take online concessional Rail Ticket, as IRCTC site will refuse to accept your name mentioned in your concessional Railway Card.

I also got to know when one of my senior colleague Jai Prakash Pandey, faced the problem, now IRCTC issued new feed name consisting of 16 words including space : jaiprakash pande

he may enjoy online journalist concessional rail ticket now. if any of our friend has been facing same problem, he/she must have contact to IRCTC to redefine the name, or may mail me details, will be happy to assist you.

rgds
shishir soni
Vice President
Press Association
9810623319
shishirsoni9@gmail.com

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प्रभु की रेल में टायलेट के पानी से तैयार होता है टोमैटे सूप!

दूरंतो एक्सप्रेस में परोसा गया टॉयलेट के पानी से बना टोमैटो सूप… यात्रियों ने किया हंगामा… एर्नाकुलम से मुंबई जा रही दुरतों एक्सप्रेस में यात्रियों ने उस वक्त हंगामा खड़ा कर दिया जब उन्हें मालूम हुआ कि वे ट्रेन में जिस टोमैटो सूप का सेवन कर रहे हैं उसे टॉयलेट के पानी से तैयार किया गया है। इस मामले की पोल तब खुली जब एक यात्री ने कोझीकोड में स्टेशन मास्टर से शिकायत की। इसके बाद बड़ा बवाल मच गया। गुस्साए लोगों ने स्टेशन पर जमकर हंगामा किया और 15 मिनट तक ट्रेन को रोके रखा।

मीडिया रिपोर्ट्स में आरपीएफ के एक अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि एक यात्री ने ट्रेन के शौचालय में लगे नल से एक कैंटीन कर्मचारी को पानी लेते और टोमैटो सूप में मिलाते देख लिया था। इसके बाद उस यात्री ने कोझीकोड स्‍टेशन पर स्‍टेशन मास्‍टर के पास शिकायत दर्ज कराई। घटना रविवार की है। स्‍टेशन मास्‍टर ने कार्रवाई किए जाने का आश्‍वासन दिया। केंद्र सरकार जहां एक ओर देश भर में सफाई अभियान चला रही है तो वहीं भारतीय रेल में स्वच्छ और उच्च गुणवत्ता वाला खाना परोसने की बात भी करती है। दूरंतो एक्सप्रेस में हुई इस घटना से नाराज पैसेंजर्स ने इस मामले को लेकर सोशल मीडिया पर सरकार के ‘स्वच्छ भारत’ मिशन पर भी निशाना साधा है।

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नई ट्रेन के नाम को लेकर सोशल मीडिया पर तलवारें खिंचीं, राजा सुहेल देव राजपूत थे या राजभर या पासी?

Anand Kumar : आने वाली 13 अप्रैल को गाजीपुर से दिल्ली के लिए एक नयी ट्रेन शुरू हो रही है, “राजा सुहेल देव राजभर एक्सप्रेस” (ट्रेन सं० 22419). तीन दिन ये शाम 5.30 पर गाज़ीपुर से रवाना होकर सुबह 8.30 आनंद विहार टर्मिनल पहुंचेगी. वहां से बुधवार, शुक्र और रविवार को ट्रेन सं 22420 शाम 6.45 बजे चलकर सुबह 9.05 गाजीपुर पहुचेगी. अब ये ट्रेन का नाम बड़ा अनोखा है. आपको वामपंथी इतिहास में पढ़ाया ही नहीं गया होगा कि राजा सुहेल देव राजभर कौन थे. तो फिर ये थे कौन जिनके नाम पर ट्रेन चलाई गई है?

राजा सुहेल देव राजभर ने इस्लामिक हमलावर महमूद गज़नी के भांजे को मारा था. गज़नी के हमले के कुछ साल बाद महमूद का भांजा भारत पर हमला करने अपने कुछ चाचा, मामा और अन्य धर्म परिवर्तन करवाने वालों के साथ आया था. तो राजा सुहेल देव को राजाओं की संयुक्त सेना का मुखिया बनाया गया. बनारस पे हमला करने पहुंची गाज़ी की फौज को बुरी तरह हराया गया. सुहेल देव राजभर बाकी बेवक़ूफ़ हिन्दू राजाओं की तरह यहीं नहीं रुके थे. इस्लामिक हमलावर गाज़ी सलार मसूद की फौज को उन्होंने खदेड़ खदेड़ के काटा था. पचास हज़ार इस्लामिक हमलावरों में से सौ पचास भी मुश्किल से वापिस भाग पाए थे.

बाद में अंग्रेजों ने राजभरों को क्रिमिनल कास्ट घोषित कर दिया था. इस क्रिमिनल कास्ट एक्ट का नाम आपको दल हित चिंतकों ने नहीं बताया होगा. कई लोगों को इसके जरिये अंग्रेजों ने जन्म के कारण ही अपराधी घोषित कर दिया. ये एक्ट आजादी के बाद नहीं, संविधान बनने और लागू होने के भी कुछ साल बाद ख़त्म हुआ था. इस एक्ट के ख़त्म होने पर क्रिमिनल कास्ट को Denotified Caste घोषित किया गया.  मीना जैसी कई जो कभी राजा थे, वो सब Criminal Caste से OBC या फिर Sceduled Caste/Tribe घोषित हुए. बाकी कई (राजभर जैसे) Denotified Caste हो गए. वो अभी भी Denotified ही हैं. बाकि ये बस याद दिलाने के लिए था कि भारत में एक Denotified Caste भी है. फॉर्म में भरे जाने वाले SC / ST / OBC / General तो आप पहले ही जानते हैं. जानते हैं ना?

आनंद कुमार के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Akash Gaurav पहली बार इनके बारे में मुझे संघ के प्रथम वर्ग के दौरान मिली थी। दुसाध समुदाय के लोग इनके जन्मदिन के दिन इनकी पूजा करते है और सूअर की बलि चढाते हैं। कहते है कि मुल्लों को काटने के बाद राज सुहलदेव ने ही सूअर का बलि देने की प्रथा शुरू की थी।

Sushant Jha सुहेलदेव के बारे में कहीं पढ़ा था पासी थे. क्या पासी और राजभर एक ही हैं?

Anand Kumar शादी जैसे संबंधों के लिहाज से पासी और राजभर वैसे ही अलग हो जाते हैं जैसे ब्राह्मण और भूमिहार| तय करने में थोड़ी दिक्कत होगी, दोनों बहुत सी मान्यताओं में एक होंगे, मगर बहुत छोटी छोटी सी चीज़ों में अलग| जैसे सूअर का मांस खाना दोनों के लिए परंपरागत हो सकता है, ताड़ी परंपरागत हो सकती है| लेकिन जब बात सूअर पालने की आएगी तो दोनों अलग होंगे| ताड़ी के पेड़ से ताड़ी उतारने की बात होगी तो अलग होंगे|

Singh Yogendra राजभर ओबीसी में आते हैं और पासी अनुसूचित में. दोनों बिलकुल अलग जातियां हैं और हिन्दू क्षत्रिय राजाओं, अन्य सभी हिन्दुओं के साथ मिलकर मुसलमानों से लड़ती आई हैं.

Sunil Pandey हमारे बलिया में कुछ राजभरों को ‘जय सुहेल देव’ कहते सुना था.

Brijesh Rai बांसडीह विधानसभा और फेफना में अच्छी खासी आबादी है इनकी और ये जय सुहेल देव का नारा ही लगाते हैँ. आप ने सही कहा.

Vinod Mishra गाज़ी पीर के कारण अभी इतिहास मालूम हुआ. क्रिमिनल कास्ट के बारे में अनुमान था, यहा भी एक C.T.S. की आबादी है.

Singh Yogendra सुहेलदेव बैस राजपूत थे. उन्होंने 21 राजाओं का संघ बनाकर मसूद गाजी का सामना किया था. इनके साथ भर और पासी भी कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़े थे. ब्रिटिश गजेटियर में इन्हें राजपूत ही लिखा है. पर इनका साथ भर और पासियों द्वारा दिए जाने पर संदेह में कुछ अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा इन्हें भर अनुमानित कर लिया जो कि गलत है. ये त्रिलोकचंद प्रथम के पुत्र बिदारदेव के वंशज थे. भालों से लड़ने के कारण इनकी बैस वंशी शाखा भाले सुल्तान कहलाती है. वोट बैंक की गन्दी राजनीति के चलते संघ परिवार इन्हें कहीं भर तो दूसरे इलाके में पासी प्रचारित करता है. हिन्दू एकता होनी चाहिए पर अपने पुरखों का इतिहास लुटाकर कैसी एकता? क्षत्रिय इतिहास को पहले वामपंथियो अंग्रेजों कांग्रेसियों ने बिगाड़ा, अब वही काम संघी क्यों कर रहे हैं? अवध के इलाके में जहाँ पासी ज्यादा हैं वहां सुहेलदेव को पासी बताकर वोट लिए जाते हैं और पूर्वांचल में इन्हें भर जाति से जोड़कर वोट की फसल काटी जाती है. वोट बैंक के लिए भाजपा और संघ कितना नीचे गिर सकते हैं और क्षत्रिय इतिहास और संस्कृति का कितना अपमान कर सकते हैं, इसकी कोई सीमा नहीं. क्षत्रियों के इतिहास से छेड़छाड़ और अपमानित करने की कड़ी में एक और अध्याय भाजपा जोड़ने जा रही है. सलार मसूद गाजी को हराने वाले बैस राजपूत राजा सुहेलदेव बैस को दलित जाति पासी का बताकर उत्तर प्रदेश में कई कार्यक्रम आयोजित करेगी जिससे पासी जाति के वोट उसे मिल सके. इससे पहले अहिरों के वोट के लिए उन्हें यदुवंशी, काछियों के वोट के लिए सम्राट अशोक को बिना किसी कारण के काछी बताने का षड्यंत्र भाजपा कर चुकी है. यहा तक की दलितों को असली राजपूत और राजपूतों को डरपोक और नाकारा बताने का कृत्य संघ प्रमुख भागवत भरी सभा में कर चुके हैं. गौरतलब है कि ये वही भाजपा है जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोजाना आरक्षण को हमेशा के लिए जारी रखने की बात करते हैं. ये कैसा दोगलापन है? अगर इनकी नजर में दलित राजा महाराजा रहे हैं तो फिर उन्हें किस बात का आरक्षण? फिर क्षत्रियों को किस कारण आरक्षण से वंचित रखा गया है? भाजपा और संघ अपने फायदे के लिए क्षत्रिय राजपूतों के इतिहास और स्वाभिमान को ही निशाना क्यों बनाते है? क्षत्रिय राजपूतों के स्वाभिमान को इतना हलके में क्यों लिया जाता है?

Anand Kumar एक छोटा सा सवाल था Singh Yogendra जी, अभी तो राजभर denotified ही हैं ना? ये denotified हटने के बाद वो कहाँ गिनेंगे खुद को? आरक्षण का लाभ लेना चाहेंगे या आरक्षण छोड़कर जनरल में आना चाहेंगे? आप खुद भी राजभर हैं या राजनैतिक हैं और बसपा समर्थक हैं?

Singh Yogendra हम हिंदुत्व के प्रबल समर्थक हैं पर इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे पुरखों को कोई अपना बताकर पेश करे. आश्चर्य है कि जिसे सदियों से पिछली सदी के मध्य तक क्षत्रिय राजा के रूप में जाना जाता रहा, उसे अचानक से बिना सबूत के भर या पासी राजा बना दिया गया.

Anand Kumar ये गंभीर परिणाम वगैरा रहने दीजिये भाई. आप राजभर हैं? आपके परिवार में राजभरों से शादी होती है?

Singh Yogendra राजभर किसे बोल रहे हो आप? हम राजपूत हैं कोई राजभर भर नहीं और आपकी मिथ्या पोस्ट का प्रतिकार किया है. राजा सुहेलदेव बैस 11वीं सदी में वर्तमान उत्तर प्रदेश में भारत नेपाल सीमा पर स्थित श्रावस्ती के राजा थे जिसे सहेत महेत भी कहा जाता है. सुहेलदेव महाराजा त्रिलोकचंद बैस के द्वित्य पुत्र विडारदेव के वंशज थे. इनके वंशज भाला चलाने में बहुत निपुण थे जिस कारण बाद में ये भाले सुल्तान के नाम से प्रसिद्ध हुए। सुल्तानपुर की स्थापना इसी वंश ने की थी। सुहेलदेव राजा मोरध्वज के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका राज्य पश्चिम में सीतापुर से लेकर पूर्व में गोरखपुर तक फैला हुआ था। उन्हें सुहेलदेव के अलावा सुखदेव, सकरदेव, सुधीरध्वज, सुहरिददेव, सहरदेव आदि अनेको नामो से जाना जाता है। माना जाता है की वो एक प्रतापी और प्रजावत्सल राजा थे। उनकी जनता खुशहाल थी और वो जनता के बीच लोकप्रिय थे। उन्होंने बहराइच के सूर्य मन्दिर और देवी पाटन मन्दिर का भी पुनरोद्धार करवाया। साथ ही राजा सुहेलदेव बहुत बड़े गौभक्त भी थे।

Pushpendra Rana भर अभी पिछड़ा वर्ग में आते हैं और कई अन्य जातियों के साथ इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करने का मामला अभी भी चल रहा है.

Singh Yogendra हमे किसी समाज से दिक्कत नहीं. हिंदुत्व के लिए कोई भी बलिदान देने को तैयार हैं. पर पुरखों को कोई दूसरी जाति का बताए, ये स्वीकार नहीं है.

Pushpendra Rana सुहेलदेव बैस को राजभर बताने के लिए आपके पास क्या प्रमाण है?

Anand Kumar 1950 के दशक तक कोई राजभर नाम लेने वाला नहीं था, उसे क्रिमिनल कास्ट बनाया हुआ था| आज भी राजपूतों की शादियाँ होती हों राजभरों में या बैंस में तो बताइये कि हां होती है| शर्मा क्यों रहे हैं इतना? पूर्वज चाहिए, अभी वाले को नहीं अपनाएंगे? थोड़ी हिम्मत दिखाइए… ले आइये किसी राजपूत को जिसने बैंस या राजभर परिवार में शादी की हो… उसे आप क्षत्रिय मानते हों तो ठीक… नहीं मानते तो फिर जबरन मुहर्रम क्यों मना रहे हैं?

Pushpendra Rana इसके लिए नए नए साहित्य लिखे गए सेठ बिहारी लाल की तर्ज पर. सुहेलदेव बैस के वंशज पयागपुर के राजाजी ने ही सुहेलदेव बैस का स्मारक अपनी जगह पर बनवाया और उनके मेले की शुरुआत की लेकिन बाद में वोट बैंक वालो के द्वारा उसे हाईजैक कर लिया गया

Singh Yogendra महामूर्ख न बनो यार, फेसबुकिया ही बने रहो उचित रहेगा। सुहेलदेव बैस को जबरदस्ती सुहेलदेव राजभर बना दिया और तुम मूर्खतापूर्ण सवाल पूछ रहे हो? कमीनो में ब्याह तेरे जैसे करते होंगे हम नहीं.

Prashant Singh Bains बैंसो के कोई वैवाहिक सम्बन्ध नहीं रहे हैं भर जाति में। भर जाति आदि सिर्फ़ जंगलों में रह कर गुज़र बसर करने वाली छोटी जातियाँ थी। इस्लामिक आक्रमणकारियों के विरुद्ध सिर्फ़ इन जातों ने राजा सहेलदेव का साथ दिया था. 

Pushpendra Rana बैस असली क्षत्रिय वंश है और उनमे सभी क्षत्रिय वंशो की शादी होती है. भर एक अलग जाति है जिनका क्षत्रियों से कोई सम्बन्ध नहीं. कुछ क्षत्रिय गिर कर भरों में जरूर शामिल हुए हो सकते हैं. जातियों और जाति व्यवस्था के बारे में कुछ पढ़ कर आइये, फिर ये बातें करिए. और हां denotified ट्राइब का मतलब पता है? denotified में जितनी भी जाती आती थी वो bc, sc, st में बटी हुई है. अब denotified की बात कर के यहा क्या बनना चाहते हो?

Sajan Soni जब तक क्रिमिनल कास्ट बताया जाता रहा तब तक किसी ने प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, denotified caste पर भी न अब तक कोई पोस्ट मिला न किसी ने कोई जानकारी दी । आज सरकार के एक सराहनीय कदम पर किसी ने ऐतिहासिक तथ्यों को रखने की कोसिस की तो अपने ज्ञान की शेखी बघारने धमक गए। उनकी उपलब्धियों का विश्लेषण छोर जातिगत विश्लेषण पे मुद्दे को अटका दिया और हवाला इतिहास से छेर चार का!! मज़ारों पे मत्था टेकेंगे और खुद को हिंदुत्व का समर्थक बताएंएगे पर जब उपलब्धियों की बात होगी तो ये तेरा बाप ये मेरा बाप करेंगे।

Pushpendra Rana आश्चर्य है की जिसे सदियों से पिछली सदी के मध्य तक क्षत्रिय राजा के रूप में जाना जाता रहा उसे अचानक से बिना सबूत के भर या पासी राजा बना दिया गया.

Singh Yogendra राजा सुहेलदेव बैस के विषय में मिथ्या प्रचार. इस युद्ध में राजपूतो के साथ भर और थारू जनजाति के वीर भी बड़ी संख्या में शहीद हुए,राजपूतों के साथ इस संयुक्त मौर्चा में भर और थारू सैनिको के होने के कारण भ्रमवश कुछ इतिहासकारों ने सुहेलदेव को भर या थारू जनजाति का बता दिया जो सत्य से कोसो दूर है क्योकि स्थानीय राजपुतो की वंशावलीयो में भी उनके बैस वंश के राजपूत होने के प्रमाण है। सभी किवदन्तियो में भी उनहे राजा त्रिलोकचंद प्रथम का वंशज माना जाता है और ये सर्वविदित है की राजा त्रिलोकचंद( प्रथम)बैस राजपूत थे। पिछले कई दशको से कुछ राजनितिक संगठन अपने राजनितिक फायदे के लिये राजा सुहेलदेव बैस को राजपूत की जगह पासी जाती का बताने का प्रयत्न कर रहे है जिससे इन्हें इन जातियों में पैठ बनाने का मौका मिल सके। दुःख की बात ये है की ये काम वो संगठन कर रहे है जिनकी राजनीती राजपूतो के समर्थन के दम पर ही हो पाती है। इसी विषय में ही नही, इन संगठनो ने अपने राजनितिक फायदे के लिये राजपूत इतिहास को हमेशा से ही विकृत करने का प्रयास किया है और ये इस काम में सफल भी रहे है। राजपूत राजाओ को नाकारा बताकर इनके राजनितिक हित सधते हैं। पर हम अपना गौरवशाली इतिहास मिटने नहीं देंगे। वीर योद्धा, महान संगठक महाराजा सुहेलदेव बैस को शत शत नमन.

Pushpendra Rana ऐसे तो इस युद्ध में ब्राह्मण आदि और अन्य जातियों के लोग भी काम आए थे लेकिन इससे सुहेलदेव बैस ब्राह्मण नहीं हो जाते.

Anjni Kumar Sarswat किसी भी जाति के क्यों न हो वह एक वीर हिंदू थे यही पर्याप्त है गर्व करने के लिए। जय महाराजाधिराज राजराजेश्वर हिंदवी गौरव श्री सुहेलदेव

Anand Kumar राजाओं के खानदान से थे क्षत्रिय तो… बनाइये अपना एक ट्रस्ट पैसे इकठ्ठा कीजिये किसी इतिहासकार को तथ्य निकालने कहिये… देखें कब तक राजभर और बैंस में राजपूतों की शादियाँ होती रही हैं. ऐसे तो नहीं चलेगा भाई.. आपने छोड़ दिया सदियों डूबने के लिए आज कुम्भ के बिछड़े भाई हो गए हैं आपके? और कुछ नहीं मिलता तो प्रयाग और गया के पंडितों के पास करीब 800 साल का तो रिकॉर्ड मिल जायेगा शादियों का… निकालिए उसमें से देखें… जिस अँगरेज़ ने हर विरोध करने वाले को क्रिमिनल कास्ट बना दिया था उसके लिखे पर भी भरोसा नहीं करना… दल हित चिन्तक तो चलिए पहले ही चर्च के पैसे पर पलते हैं.. उनकी भी नहीं सुनते… शादी के रिकॉर्ड तो होते हैं पंडितों के पास… उस से निकाल लीजिये देखते हैं कब तक राजभर कौन सी जाति में थे.. अभी तो पिछड़े हैं ये तो मानियेगा ??

Singh Yogendra भर पिछड़े हों या दलित हों हमे कोई लेना देना नही. हमे उनसे कोई शिकवा नही. पर तुम सुहेलदेव बैस को सुहेलदेव भर लिख रहे हो इससे आपत्ति है. सुहेलदेव बैस का स्मारक खुद उनके वंशज पयागपुर के राजपूत राजा ने अपनी 500 बीघा जमीन दान में देकर बनवाया था.

Rajpal Singh Champawat Sarechan आनन्द जी आप की पोस्ट ग़लत है.. कोई लाँजिक नही..

Singh Yogendra बैस तो उच्चकुल के राजपूत हैं उनमें तो शादी होगी ही पर भरों में शादी ब्याह तुम्हारी हो सकता है हुई हो या उन्ही की पैदाइश हो तुम? सुहेलदेव बैस का स्मारक खुद उनके वंशज पयागपुर के राजपूत राजा ने अपनी 500 बीघा जमीन दान में देकर बनवाया था.

Anand Kumar आ गए जातिवादी रंगत में. बस थोड़ा सा उकसाना पड़ता है. नीच कुल का ही जब मानते हो उन्हें तो काहे उन्हें अपना पूर्वज घोषित करने पर तुले थे Singh Yogendra जी.  मान लो कि जातिवादी हो… एकता की बातें तुमसे ना हो पाएंगी… जाने दो…

Singh Yogendra अरे मुर्ख नीच कुल का सुहेलदेव बैस को नही कहा. वो बैस क्षत्रिय राजपूत कुल के थे जिसे तुम जैसे मुर्ख जबरदस्ती भर या पासी बना रहे हो. हिंदुत्व का पाठ सीखने की जरूरत तुम जैसे कायरो से नही है. जब हमारे पुरखे तुर्को अफगानो से लडकर सर कटवा रहे थे तो उस समय तुम्हारे पुरखे किसी बिल में दुबके हुए बैठे होंगे. आज भी हिन्दू हो तो हमारे पुरखो के बलिदान की वजह से. हिंदुत्व का पाठ तुम जैसे घोंचूओ से सीखने की जरूरत नहीं है.

Banti Kharayat ओ आनंद कुमार…..तुम लोग कभी नहीं सुधरोगे….ये फर्जी इतिहास रचने से तुम लोग राजपूत नहीं बन सकते रहोगे वही ही….जैसे वो तुम्हारा मसीहा जिस ने अपने ब्राह्मण शिक्षक(जिसने उसे अपने खर्चे पर पढ़ाया) की कास्ट अपने नाम के आगे जोड़ ली परन्तु हीन भावना से ग्रषित होने के कारण पूर्वाग्रह नहीं त्याग पाया जिनका सरनेम चुरा लिया उनके लिये….. दूसरे के बाप को बाप कहने से वो तुम्हारा बाप नही हो जायेगा…

Anand Kumar कुल के हिसाब से आल्हा उदल का कुल भी नीच होता था इसलिए उनकी लड़ाइयाँ होती रहती थी ना? अपनी मूर्खताओं का नतीजा इतने सालों में भी नहीं दिखा? smile emoticon गजब के अंधे होते हो भाई…

Singh Yogendra अरे अक्ल के अन्धो कौन तुम्हे सूतियापन्ति का इतिहास पढ़ा रहा है? आल्हा उदल बनाफर राजपूत वंश के थे. तुम्हे किस चूतिये ने कह दिया उनका कुल निचा होता था? बनाफर राजपूत आज भी बुन्देलखण्ड में मिलते हैं.

Anand Kumar पहले आपस में निपट लीजिये जातिवादी Singh Yogendra जी. एक बता रहा है बानफर राजपूत… एक किस्सा कहता है… थे की नहीं आल्हा उदल?

Prashant Singh Bains भर भर ही लिखते है, गोत्र नहीं। Anand जी, आल्हा कहानी नहीं है। वो वीर रस। तुम भर सोच वाले क्या जान सकते हो वीर रस क्या होता है।

Rajarsh Singh Bais खून को किसी सम्बोधन या प्रमाण की जरुरत नहीं, नाम के आगे हम सिंह इस लिये लिखते है की हम आपस में न लड़े। पर फिर भी हम आपस में लड़ते है । अगर राजपूत एक दुसरे के परस्पर विरोधी न हो तो तुम 1000 साल और आरक्षण लो तब भी हमारा कुछ नही बिगड़ेगा। भर में जा कर बैंस खोजोगे तो कहा मिलेगा हाँ अगर भरो में बैसो की नाजायज़ औलाद ढूँढो तो मैं sure हु मिल जाएगी।।।

Anand Kumar आहा एक और जातिवादी सूरमा आये. नाईट शिफ्ट है आज की. हा हा हा

Singh Yogendra जातिवादी सडांध तुम्हारे अंदर भरी हुई है. अगर मुल्ला होते तो अब तक ओकात बता दिए होते Anand Kumar जी. संघी हो इसलिए संयम है क्योंकि वोटर हम भी बीजेपी के ही हैं पर अपने इतिहास से छेड़छाड़ बर्दाश्त नही होगी. यहाँ दुष्ट वामपंथी नही बल्कि हमारे प्रिय संघी ही फर्जी इतिहास रच रहे हैं. अंग्रेजो ने गजेटियर में लिखा है कि कुछ लोग सुहेलदेव को थारु कुछ भर, कुछ बैस राजपूत तो कुछ कलहंस राजपूत बताते हैं. उनकी पूरी वंशावली आज के बैस राजपूतो में मिलती है फिर भी विवाद मान लिया जाए तो सरकार और आप उन्हें एकतरफा भर कैसे लिख सकते हो?

Prashant Singh Bains डे नाइट खेलने वाले है यहाँ।।।,, बेस नाजायज़ खेलने में माहिर है।।। ये तो ग़नीमत हो गई कि तुम्हारे सविधान ने १९५२ ऐक्ट ला दिया वरना जाने कितने ओर नाजायज़ etc … बैंसो के गुणगान कर रहे होते।… ओर ज़्यादा ठाकुरई पर बोलो तो आ जाऊँ अवध वाली।। तो मुँह छुपाते नहीं मिलेगा।।। इस इतिहास को अपनी में घुसा लो ओर हर बार जब झाड़े फिरने निकालोगे तो इसको बाँचना

Anand Kumar चलिए जातिवादी थोडा तो ऊपर आये… कम से कम चंदेल, तोमर, बैंस, राजभर से आगे उच्च कुल, नीच कुल छोड़कर अब पोलिटिकल संघी कम्युनिस्ट तक स्वागत है… ऐसे ही छूटेगी ये जातिवाद की आपकी बीमारी वैसे रानी झाँसी को क्या मानते हैं आप लोग ? आल्हा तो चलिए आपने कहानी घोषित कर दिया… रानी झाँसी क्या थी ? दलित, ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य कुछ होगी ना ??

Singh Yogendra तू क्या है पहले ये बता? रानी झांसी शूरवीर यौद्धा थी जन्मना ब्राह्मण थी. जातिवाद तुम फैला रहे हो सुहेलदेव को भर लिखकर.

Rajarsh Singh Bais हमे जातिवाद की जरूरत ही नही । वो कमजोरो का हथियार है

Anand Kumar अरे रे तू तड़ाक पर उतर आये जातिवादी Singh Yogendra जी को नाईट शिफ्ट की नौकरी में भी गुस्सा आया smile emoticon वाह वाह smile emoticon तलवार तो नहीं खींच ली grin emoticon घर में है भी की नहीं.

Singh Yogendra तुम जैसे tatpunjiyo के लिए तलवार की क्या जरूरत?

Anand Kumar वो किताब का लिंक ऊपर जो एक सूर्यवंशी क्षत्रिय को राजा बता रहे हैं किसी इलाके का उनके लिए है… सुहेलदेव वैसे क्या थे? चंद्रवंशी की सूर्यवंशी? नाग वंश वाले सूर्यवंशी होते हैं? शायद आपको पता होगा जातिवादी Singh Yogendra जी?

Singh Yogendra बिलकुल नागवंश खुद सूर्यवंश की शाखा है. http://rajputworld.blogspot.in/2013/07/blog-post_10.html?m=1

अत्रि अन्तर्वेदी मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष, सुहेलदेव को भर बतलाकर रेल चलायेंगे…. चुनावों में रेल सी देखते रह जायेंगे।

Avinash Sharma भैया Anand Kumar, ये नही मानेंगे ये तो वही बात के पक्ष धर है जहां मीठा -२गप्पऔर कड़वा कड़वा थू. वाल्मीकी, व्यास, जाबाल ऋषि बन गय् तो वो ब्राह्मण हो गये, सुहेलदेव, आल्हा ने पराक्रम कर दिया तो वो क्षत्रिय हो गये. इनसे पूछो कि गोधरा मे जो जलाये थे मिंयों ने हिंदू वो जात देख कर जलाये थे क्या. उऩका बदला लेने वाला बामन ठाकुर नही बल्की इनकी नजरो मे छोटी जात का तेली था.

शुभम शर्मा आर्य discussion गलत दिशा में चला गया। कुछ लोगो को “जातिगत superiority” का मीठा सायनाइड चूसने में अब भी मजा आता ह।

Pushpendra Rana अबे चूतिये अगर इन सब से हारते तो तू आज हिन्दू हिन्दू ना कर रहा होता. और ये आर्य समाजी बकवास अपने पास रख. २३०० साल पहले खुद megasthenes लिख गया है की जाती कभी नही बदली जा सकती थी. शुंग और kanva ब्राह्मणों से क्षत्रिय हो गए क्या? सातवाहन क्षत्रिय हो गए? विश्वामित्र ब्राह्मण हो गए? और क्षत्रिय कभी किसी गैर क्षत्रिय को क्षत्रिय नही मानता दूसरी जातियों की तरह नही तो आज दो तिहाई जनता क्षत्रिय होती

Brijesh Rai इस नाम से ट्रेंन चलाकर .भासपा (भारतीय समाज पर्टी )के साथ 2017 के चुनाव मे गठबंधन को भी हरी झंडी दे दी हैँ ..इस पार्टी के मुखिया ओमंप्रकाश राजभर के साथ भाजपा नेताओ का मेल जोल काफी चरचा मे रहा था..2012 के चुनाव मे शुहेल देव वाली पार्टी ने बनारस और आजम गढ मडल की 16 सीटो पर दमदारी के साथ चुनाव लडा था और भाजपा के उम्मिदवारो से भी ज्यदा वोट मिले थे इनको ..फागु चौहान .अम्बिका चौधरी .अब्दुल समद अंसारी जैसे नेताओं को हारना पडा था इस पार्टी की वजह से ..बनारस के दो विधानसभा मे ये बसपा से ज्यदा वोट पाये थे ….राजभर बिरादरी शुहेलदेव के नाम पर ही राजनिती करती हैँ …

Madan Tiwary जब मानसिंह अकबर से शादी का रिश्ता हो सकता है और स्वीकार्य भी था राजपूत समाज को फिर राजभर से क्यों नहीं ? वैसे उस समय रजवाड़े किसी जाति के हों उनकी आपस में शादिया होती थी क्योकि शादी का मकसद राज्य विस्तार था ।

Rajpal Singh Champawat Sarechan Abet cutiye pehle itihas pad … Wo dasi thi jiske sath akbar ki Shadi hui… Aur apwad Har jagah hotey hai …

Sonu Anil हे प्रभु ये ठकुरई कब जाऐगी

Singh Yogendra ठकुराई न होती तो आप मुल्ला होते anil जी

Sonu Anil कौन सी ठकुरई जयचंद वाली vp singh वाली या दिग्विजय सिंह वाली

सुधाँशु मणि त्रिपाठी बहराइच में सब राजा सुहैलदेव राजभर ही जानते हैं।

Swati Gupta मैं भी यही जानती हूँ. राजा सुहैल देव पासी सुना था हमने.

सुधाँशु मणि त्रिपाठी उनके स्मारक या मंदिर कह लें, वहाँ के शिलापट्ट पे यही नाम लिखा है। जो चित्तौरा झील के किनारे पर है जहाँ उन्होंने सलार मसूद को मारा था।

Tarun Kumar आरे भाई, सुहेलदेव किसी जाति के थे, हिन्दू थे, दुश्मनों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, विजयी हुए, इसलिये वो हमारे गौरव गान के नायक हैं, ना की किसी जाति विशेष के होने के।

Singh Yogendra ये दुष्प्रचार सिर्फ कुछ दशक पुराना है भर और पासी लडको ने भी इस युद्ध में राजाओं का जमकर साथ दिया था न कि सुहेलदेव पासी या भर थे. ये सारा भृम एक अंग्रेज लेखक द्वारा किये साक्ष्य विहीन अनुमान से शुरू हुआ। अंग्रेज तो राम कृष्ण को काल्पनिक बताते हैं आर्यो को विदेशी तो सब पर यकीन कर लिया जाए?

Swati Gupta मैं बहराइच में रह चुकी हूँ, इसलिये बता रही हूँ कि वहाँ के लोकल सब उन्हें पासी बताते हैं

Singh Yogendra जी और पूर्वांचल के कुछ जिलो में इन्हें भर बताकर वोट की फसल काटने की तैयारी है जबकि राजा सुहेलदेव बैस राजपूत थे जिनकी पहले और बाद की पूरी वंशावली मौजूद है

Tarun Kumar इतिहास के लेखन परम्परा ना होने से निश्चय ही समस्या हैं, लेकिन सही क्या हैं, इसका निर्णय तो तथ्य के आधार पर ही कर सकते हैं। अब अशोक कौन थे, क्षत्रिय, शुद्र या कुछ और, यह विवादित हैं, हमेशा रहेगा। जिसे जो मानना हैं माने लेकिन जाति इतिहास में कोई मायने नहीं रखती।

Swati Gupta इनका पासी ही पता था, वैसे क्या फ़र्क़ पड़ता है, थे तो हिन्दू ही, पर अभी तक उपेक्षित थे। वहाँ हम तीन साल रहे पर क्षत्रिय तो किसी ने नहीं बोला

Jaipal Singh Sindarli मित्रों आजकल कुछ तथाकथित पढ़े लिखे और राजपूतो से इर्शाभाव रखने वाले लोग हमारे योगदान को नकारते हैं। जिन जातियो को राजपूतो से नफरत है वो जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, जैसलमेर, बीकानेर, हरयाणा आदि के साथ ही सैकड़ो शहरो के नाम बदल दें। ध्यान दे कि वर्तमान भारत के सीमावर्ती क्षेत्र और पूर्व रियासते जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, जम्मू, कच्छ में राजपूत शासन ना होता तो ये भी पाकिस्तान में होते और आज राजपूत विरोधी हिन्दू टोपी पहन कर कुरान पढ़ रहे होते। शायद इन राजपूतो ने गलती कर दी मुग़ल तुर्को से लड़ाई कर के अपनी संस्कृति को बनाये रखा——
बाप्पा रावल
नागभट प्रतिहार
मिहिरभोज प्रतिहार
राणा सांगा
राणा कुम्भा
वीर पृथ्वी राज चौहान
महाराणा प्रताप
रानी दुर्गावती
वीर जयमल
वीर छत्रशाल बुंदेला
दुर्गादास राठौर
मालदेव
छत्रपति शिवाजी
महाराणा राजसिंह
रानी कर्मावती
रानी पद्मनवती
विरमदेव सोनिगरा
राजा भोज
सुहेलदेव बैस
आनंदपाल तोमर
राजा हर्षवर्धन बैस
बन्दा सिंह बहादुर
ऐसे ही हजारो योद्धा जो हिंदुत्व के लिए कुर्बान हो गए।

वीर कुंवर सिंह, आऊवा ठाकुर कुशाल सिंह,राणा बेनीमाधव सिंह,चैनसिंह परमार,रामप्रसाद तोमर बिस्मिल,ठाकुर रोशन सिंह,महावीर सिंह राठौर जैसे महान क्रांतिकारी अंग्रेजो से लड़ते हुए शहीद हो गए। आजादी के बाद सबसे ज्यादा परमवीर चक्र राजपूतो ने जीते।शैतान सिंह भाटी,जदुनाथ सिंह राठौड़,पीरु सिंह शेखावत,गुरुबचन सिंह सलारिया,संजय कुमार डोगरा जैसे परमवीरो का बलिदान क्या भुला जा सकता है? आज भी राजपूत रेजिमेंट, राजपूताना रायफल्स, डोगरा रेजिमेंट, गढ़वाल रेजिमेंट, कुमायूं रेजिमेंट, जम्मू कश्मीर रायफल्स के जवान सीमा पर दुश्मन का फन कुचलने और गोली खाने के लिए सबसे आगे होते हैं। देश के एकीकरण के लिए हमने अपनी सैकडो रियासते कुर्बान कर दी,सारी जमीदारी कुर्बान कर दी,अपने खजाने खाली कर दिए! क्या इस त्याग को यूँ ही भुला दिया जाएगा?  राजपूत मतलब राजपुत्रः गीता से लेकर रामायण तक में वर्णित है यहाँ क्षत्रियो में भगवान राम, भगवान कृष्णा से लेकर महात्मा बुद्ध भगवान महावीर से लेकर सभी सभी तीर्थनकर साथ ही लोकदेवता कल्ला जी बाबा रामदेव गोगाजी कल्लाजी सहित सैकड़ो लोकदेवता, जाम्भा जी परमार(विश्नोई मत) हुएं। ये सब क्षत्रिय राजपूत थे,क्या इनको भी मानना छोड़ दोगे?

Pushpendra Rana ये ही भर, मेव, चेरो आदि इनके पूर्वजो को परेशान करते थे, इनको लूटते थे. हिन्दुओ को पूजा पाठ तक नही करने देते थे. इनको क्षत्रियो ने ही इनके आतंक से मुक्ति दिलाई. इस बारे में ग्रन्थ भरे पड़े है. आज वोट के लिए ये आतंकी ही इनके हीरो हो गए और क्षत्रिय दुश्मन. इन जैसो पे कभी भरोसा ही नही करना चाहिए.

Dheer Singh Pundir इन संघियो का अस्तित्व राजपूतो के बलिदान पर टिका हुआ है पर इन अहसानफरमाइशो को सिर्फ नकारात्मक पक्ष ही दिखाई देता है. इतिहास की जानकारी करिये.  बाप्पा रावल और नागभट परिहार की वजह से ही अरब हमलावर सिंध से आगे भारत में पुरे 500 साल तक नही घुस पाए. वो अरब जो इस्लाम की स्थापना के कुछ ही दशको में पुरे मध्य पूर्व एशिया मिस्र ईरान इराक सीरिया जीतते हुए स्पेन तक जा पहुंचे थे. वो भारत में विफल हुए क्योंकि यहाँ बाप्पा रावल और नागभट परिहार ने राजस्थान के युद्ध में उन्हें करारी मार लगाई. जितनी सूझ बूझ और वीरता से राजपूतो ने अरबो तुर्को से देश की रक्षा की ऐसा उदाहरण विश्व में दूसरा नही है.

मूल खबर….

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गाजीपुर से दिल्ली के लिए नई ट्रेन ‘राजा सुहेल देव राजभर एक्सप्रेस’ 13 अप्रैल से, हफ्ते में तीन दिन चलेगी

गाजीपुर के सांसद और रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा की पहल पर पूर्वी यूपी के गाजीपुर जिले से दिल्ली के लिए ट्रेन शुरू हो रही है। ट्रेन को मनोज सिन्हा 13 अप्रैल की शाम पांच बजे गाजीपुर सिटी स्टेशन से हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। यह ट्रेन सप्ताह में तीन दिन चलेगी। बुधवार-शुक्रवार तथा रविवार की शाम साढ़े पांच बजे गाजीपुर सिटी स्टेशन से खुलेगी और सुबह साढ़े सात बजे दिल्ली के आनंद बिहार स्टेशन पहुंचेगी।

आनंद बिहार से यह ट्रेन मंगलवार, गुरुवार तथा शनिवार की शाम साढ़े सात बजे रवाना होगी और गाजीपुर सिटी स्टेशन पर सुबह साढ़े नौ बजे आएगी। इसका रूट गाजीपुर सिटी से औड़िहार, जौनपुर, जफराबाद, सुल्तानपुर, लखनऊ, बरेली, मुरादाबाद, गाजियाबाद से आनंदबिहार तय हुआ है। ट्रेन का नाम ‘राजा सुहेल देव राजभर एक्सप्रेस’ रखा गया है। ट्रेन का अप में 22419 और डाउन का नंबर 22420 होगा। रेलवे के कंप्यूटर में इस ट्रेन के लिए आरक्षित टिकट बुकिंग का काम 11 अप्रैल से शुरू होगा।

ट्रेन अभी चली नहीं, विवाद शुरू… इसे भी पढ़ें…

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देखिए प्रभु की रेल किस तरह आपकी जेब से लूट रही है 525 करोड़ रुपये

Sanjaya Kumar Singh : भारतीय रेल ने ‘तत्काल’ के नाम पर रेल आरक्षण की अधिकृत कालाबाजारी शुरू की थी और रेलवे में मांग व पूर्ति का अंतर इतना ज्यादा है कि इस सरकारी कालाबाजारी के बाद भी तत्काल टिकट लोगों को नहीं मिलता था। आम आदमी के लिए खुद तत्काल टिकट लेना लगभग असंभव था। यह काम दलाल और ज्यादा पैसे लेकर दूसरे लोग करते थे। कई बार शिकायतों के बाद भी स्थिति नहीं सुधरी। दूसरी ओर, संयोग से मुझे तत्काल टिकट की जरूरत ही नहीं पड़ी। या यूं कहिए कि इसका कोई भरोसा ही नहीं था, तो जब, जहां तत्काल टिकट लेकर जाना था वहां मैं गया ही नहीं। और मौका मिला तो उड़ लिया।

बहुत दिनों बाद कल तत्काल में टिकट लेने का मौका मिला तो मैंने देखा कि रेलवे सिर्फ अतिरिक्त तत्काल शुल्क नहीं लेता है बल्कि बेस फेयर यानी मूल किराया ही बढ़ा देता है और उसपर लगने वाले सभी शुल्कों के साथ तत्काल का 400 रुपए (दिल्ली से ग्वालियर के लिए) अलग से वसूला जा रहा है। मजबूरी में आप रेलवे की जो सेवा प्राप्त कर रहे हैं उसपर भारत सरकार सर्विस टैक्स यानी सेवा कर भी ले रही है। और आपसे लगभाग दूना किराया वसूला जा रहा है। एक तत्काल प्रीमियम भी है। वो और आगे की चीज है, उसपर फिर कभी।

इसमें कोई शक नहीं है कि रेल मंत्री रेल किराए के मामले में जो चाहे निर्णय ले सकते हैं और “भ्रष्ट, बेईमान व नालायक” कांग्रेस के शासन में जो सही-गलत या जनविरोधी निर्णय लिए गए थे उन्हें जारी भी रख सकते हैं। भारत में रेल गाड़ियों का कोई विकल्प नहीं है और रेलों को प्रतिस्पर्धा लगभग नहीं है। मनमानी करने की पूरी छूट भी है। ऐसे में जो नहीं हुआ वही कम है और इस तरह के विरोध सांकेतिक ही हैं। वरना विरोध तो जाटों के लिए आरक्षण मांगने वाले ही करते हैं और तब रेलवे भी वैसे ही मजबूर लगती है जैसे आम दिनों में रेल यात्री। यह अलग बात है कि जाट आंदोलन का खामियाजा भी आम आदमी ही भुगतता है। सरकार चाहती तो कह सकती थी कि तत्काल टिकट आम टिकट का दूना होगा। पर उसने ऐसा नहीं करके बेस किराए में वृद्धि की औऱ तत्काल शुल्क अलग से लगाकर टिकट का दाम दूना किया ताकि आपको तकलीफ कम महसूस हो और आप यह नहीं कर सकें कि तत्काल टिकट साधारण टिकट का दूना होता है। भ्रम बना रहे और आपके अच्छे दिन बने रहें।

आपके पास कोई विकल्प भी नहीं है। रेलवे ने घोषणा कर दी है कि आधे टिकट पर यात्रा करने वाले 5 से 12 साल के बच्चों को सोने या बैठने के लिए 22 अप्रैल से सीट नहीं मिलेगी (जाहिर है सीट लेना हो तो पूरे पैसे देने होंगे, पूरा टिकट लेना होगा)। सीट मांगने पर यह जवाब दिया जा सकता है कि 5 साल के बच्चे जिनका टिकट नहीं लगता है उनके लिए जब बर्थ नहीं मिलती या आप नहीं मांगते तो आधे टिकट वाले 12 साल के बच्चे के लिए कैसे मांग सकते हैं? तर्क में दम है। इसलिए, चुप रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इससे होने वाली असुविधा के लिए आप इन टिकटों पर भले सर्विस टैक्स भी दें पर कर क्या सकते हैं? उधर, इस चतुराई भरे निर्णय से रेलवे हर साल दो करोड़ यात्रियों को कंफर्म सीट दे पाएगी और इसके बदले 525 करोड़ रुपए कमाएगी। यह कमाई चतुर सुजान रेलमंत्री की अक्लमंदी से होगी जो अभी तक के ‘भ्रष्ट’ रेलमंत्रियों के कारण गड्ढे में जा रहा था। ये पैसे आप ही से वसूला जाएगा। ताली बजाइए। रेल मंत्री की तारीफ कीजिए। अच्छे दिनों का स्वागत कीजिए।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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