चौकीदार … है!

राजा बोला रात है,
रानी बोली रात है,
संतरी बोला रात है,
ये सुबह-सुबह की बात है!

गोरख पाण्डेय की उपरोक्त पंक्तियों के सहारे अपनी बात शुरू करता हूं। आप सबको यह बताते हुए मुझे अति प्रसन्नता हो रही है कि उस संतरी से, जिसने राजा के कहने पर ‘दिन’ को ‘रात’ बोला था, अचानक मेरी मुलाकात हो गई। अब जब मुझे पता चला कि यह अपने गोरख भाई वाला संतरी है तो प्रसन्नता भी हुई और थोड़ी उत्सुकता भी! सोचा, अब उससे दो-चार अंदर की जानकारी ले ली जाए!

वैसे भी देश में चौकीदारों को लेकर गहमागहमी का माहौल है। पहले भी हमारे जानकारी में कुछ चौकीदार रहे जो गाहे-बगाहे रास्ते में मिल जाने पर पाव लग्गी करते थे और लगे हाथ थानेदार की मुखबिरी भी हमसे कर लिया करते! बखरी- टोला के होने के नाते एक चौकीदार से तो मैं अक्सर ही तंबाकू लेकर खाया करता! गोया कि मुझे चाय की राजनीतिक सफलता का थोड़ा भी भान नहीं था नहीं तो मैं खैनी की जगह चाय पर ही पूरा समय दिया होता! खैर हमारे यहां कहा भी जाता है- मुकद्दर से ज्यादा कुछ नहीं मिलता! मैंने भी इसे अपने प्रारब्ध का बहीखाता मानकर संतोष कर लिया।

बात चौकीदार की हो रही थी तो यह बड़ा सुखद विषय रहा कि जहां हमने चौकीदारों को लाल रंग के साफे और स्लेट रखे देखा था जो अपनी पारी आने पर थाने के मुंशी से अपनी स्लेट पर तारीख लिखवा कर उस दिन की रोजी रोटी पक्की कराते, पर ये क्या… आज का चौकीदार तो दस लखिया सूट पहनकर घूमता है!

इन सब बातों को देख कर कभी- कभी मुझे लगता है कि जिस ‘विकास’ को हम ‘सराब’ की तरह ढूंढ रहे हैं वह तो अपने गली -मोहल्ले पर “मैं भी चौकीदार” की टोपी लगा कर घूम रहा है! खैर सराब तो मृगमरीचिका है। और, असली ‘शराब’ पर तो चौकीदार छोड़ अन्य लोगों का जाना वर्जित है क्योंकि यह शराब नहीं विकास की मृग मरीचिका है जो चौकीदार की टोपी पहनाकर देश में रोजगार को बढ़ावा तो दे रही है, लेकिन असल में टोपी पहनने वालों को यह नहीं मालूम कि चौकीदार की टोपी ‘जुमले की टोपी’ है जिसमें दो करोड़ रोजगार छुपा हुआ है!

इधर बीच देश के सबसे बड़े चौकीदार ने इस महान राष्ट्र को चौकीदार बनाने के लिए एक जन आंदोलन छेड़ रखा है जिसमें वह बता रहे हैं कि देश की चौकीदारी गांधी जी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत की तरह है जिसमें हम संसाधनों के रखवाले हैं। वह जनता में भी “मैं भी चौकीदार” का भाव जगा रहे हैं! बड़ा चौकीदार पूछ रहा है ‘हाउ इज जोश’! नए चौकीदार चीख रहे हैं ‘हाई सर’!

सब कुछ कितना अदभुत है! भारत में यह पहला चौकीदार सम्मेलन है जिसने देश की कई समस्याओं के समाधान का रास्ता ढूंढ निकाला है! अब हर चौकीदार इंप्लायड हो चुका है! देश की गरीबी को एक झटके में खत्म करने का यह नुस्खा इतना प्रभावशाली है कि पिछले 70 साल में भारत ही नहीं अपितु दुनिया के किसी भी देश ने इस तरह की उपलब्धि हासिल नहीं की है! इसलिए यह बड़ा चौकीदार बार-बार हमें विश्व गुरु बनने का सपना दिखाता है, क्योंकि उसे मालूम है कि भारत के शिक्षा, गरीबी, बीमारी का इलाज उसके पास ही है, और वह भी अचूक है। इतना सब कुछ देखने के बाद मैं अपने सिर पर हाथ फिराता हूं। बड़ी अफसोस के साथ आज मुझे कहना पड़ रहा है कि मुझे देश सेवा के लिए अपने पिछले दशकों में ऐसा शुभ अवसर क्यों नहीं प्राप्त हुआ।

खैर, गोरखजी के संतरी से थोड़ी बहुत गुफ्तगू शुरू होती है तो उससे बात करने में एक ‘आम संतरी’ और एक शासक वर्ग के ‘खास संतरी’ का अंतर भी मालूम चलता है!

पहला तो यही संतरी बताता है कि जब तक मैं गोरखजी का संतरी था तब तक ‘दिन को दिन और रात को रात’ कह लेता था, लेकिन पेट की भूख नहीं मिटती थी! पेट था या अग्निकुंड जिसमें आग लगी ही रहती थी! जी तोड़ मेहनत करता तब जाकर कुछ नसीब होता और जब नसीब होता तो एक दो लोगों का अतिरिक्त भार मेरे ऊपर बढ़ जाता और फिर मैं भूखे ही सो जाता! तभी एक दिन इन सब चीजों से तंग आकर मैंने उस कवि उस संघर्षशील जुझारू भारतीय नौजवान की नौकरी को छोड़ ‘सरकारी संतरी’ की नौकरी पकड़ ली। फिर क्या, वहां काम कम ‘सलाम’ ज्यादा था! सलाम करने के कई फायदे थे। पेट की आग भी बुझती थी और कमर को झुका कर घुटनों तक ले जाने से स्वास्थ्य लाभ भी होता था! जिंदगी और वह भी सेहतमंद, बिना किसी झटके के ऐसे ही मिल सकता था!

यद्यपि मैं बड़ी गौर से उसकी बातें सुनता रहा और उसके निर्णय क्षमता की दाद देता रहा कि कम से कम उसके इस निर्णय ने देश के ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ को कुछ तो सहारा दिया होगा! ऐसे चौकीदारों की वजह से ही भारत हो ना हो विश्व के ‘मानव विकास सूचकांक’ में अब तक चली आ रही अपनी स्थिति में जरूर कुछ ना कुछ सुधार पाया होगा!

आगे उस संतरी ने आज के ग्लैमरस चौकीदारों को देख कर थोड़ा रश्क भी किया, कि काश कोई बड़ा प्रधान चौकीदार मुझे भी मिल गया होता, तो मैं कहां से कहां होता! और उसने यह भी बताया कि देश के नौकरशाहों, उद्योगपतियों, नेताओं को ऐसे चौकीदार उस समय भी मिल जाते थे जिससे उनकी आने वाली पीढ़ियां भी चौकीदारी के उन गुणों को आत्मसात कर अपने आने वाली पीढ़ियों के कष्ट को हर लेती थी और उन्हें सुख समृद्धि ऐश्वर्य वैभव से भर देती थी। नौकरशाहों ने तो इसमें नए कीर्तिमान ही स्थापित किए थे!

खैर सन्तरी ने तभी सीटी बजाया और तंबाकू थूकते हुए मुझे झाड़ू थमा दिया। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, उसने अपने कंधे में जो सीटी का फीता डाल रखा था, उसको जेब से बाहर निकाला। इसमें सिटी की जगह एंड्रॉयड फोन निकला! मैं थोड़ा भौचक्का हुआ तो उसने हंसते हुए कहा कि ‘बाबूजी यह न्यू इंडिया है! आप घबराते काहे को हैं , यहां चौकीदार का काम सीटी बजा कर सावधान करना नहीं बल्कि चौकीदार को देख कर स्वयं सावधान होने का है! क्योंकि अब का चौकीदार अगर आपके मोहल्ले में पहुंचा और आप सावधान नहीं हुए तो कब आपकी ‘गुप्त फाइल’ गुम हो जाए और कब आपके आलमारी में रखी खून-पसीने की कमाई सड़क पर आ जाए, आपको मालूम भी ना चलेगा।’

मैं अभी समझ ही पाता कि मेरे हाथों में झाड़ू और बगल में ‘सरकारी थूक’ के साथ उसने मेरी फोटो खींच दी! गोया हम लोग तो अपने घर-द्वार को बचपन से ही खरहर से बुहारते रहे थे, लेकिन झाड़ू के साथ फोटो खींचवाना मेरे लिए एक नया अनुभव था। फिर हमने सोचा कि चलो भी यह तो ‘न्यू इंडिया’ है तो इसमें कुछ तो नया होगा ही! अब न्यू इंडिया केवल घटनाओं को देखता ही नहीं बल्कि उस पर सर्जिकल स्ट्राइक भी करता है! उस चौकीदार भाई ने झट से उस फोटो को सोशल मीडिया में डाल दिया और साथ ही साथ देश के प्रधान चौकीदार को टैग कर दिया। इस सर्जिकल स्ट्राइक के बाद फिर क्या होना था, अब तो लोगों ने दे दनादन मेरे समर्पण, इच्छाशक्ति, त्याग व बलिदान को देख कर तारीफों के पुल बांधना शुरू कर दिया! और इसे देश सेवा के प्रति बढ़ा हुआ एक महान कदम माना गया! कईयों नवयुवक-नवयुवतियों ने तो कमेंट बॉक्स में फूल और दिल की झड़ी लगा दी। एक ने तो डिनर की भी दावत दे डाली! न्यू इंडिया में इतना सब कुछ एक झटके में पाकर मैं अपने दशकों के संघर्षशील अनुभव को कुछ देर के लिए भूल ही बैठा और लगा कि यह बड़ा वाला चौकीदार पहले क्यों नहीं आया! मुझे जीवन में अफसोस तो बहुत चीज़ों से था, लेकिन क्या करता फिर वही मुकद्दर आड़े आ जाता!

थूक की महिमा हमने केवल उन लोगों के जीवन में ही महसूस किया था जिन्हें ‘थूक कर चाटने’ का हिम्मत हासिल होता था! उनके ऐश्वर्य वैभव को देखता तो यह लगता था की थूक कर चाटने वाला इंसान कितना उदार- उदात्त- अहंकार-शून्य और विनम्र होता होगा! पर न्यू इंडिया में तो थूक को चाटने की भी जरूरत नहीं थी! केवल थूक कर छोड़ देने की भावना की जरूरत थी, क्योंकि जिसको जरूरत होती वह थूक को खुद ही उठाता और उससे अपना ‘अभिषेक’ कर लेता!

आजकल मीडिया के कई चौधरियों को देख कर यही लगता है कि उन्होंने कितने संघर्ष से अपने जीवन में थूक कर चाटने की परंपरा को जीवित रखा है! खैर इस प्रतिभा का सालों-साल भारतीय राजनीति में क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर विस्तार ही हुआ है। अभी पिछले ही दिनों एक पार्टी प्रवक्ता ने चौकीदार प्रमुख को अपना बाप बता दिया! बड़ी दिक्कत की बात है। मेरे दो- दो बाप जैसी कहानी अब तक सिनेमा में ही दिखती थी! राजनीति में इस तरह का हस्तक्षेप वाकई अनुकरणीय था! कईयों ने जिसको चौकीदारी परंपरा से लगाव नहीं था इसको अपनी आधुनिकता पर हमला बताया।

नए-नए बाप के मिलने से पुराने बाप लगातार ‘मार्गदर्शक- मंडल’ के शिकार होते जा रहे हैं! नौबत तो यह आ गई है कि मौलिक बाप का चूल्हा- चौका अंत में कहीं और किसी और के घर जल रहा है! और यह एक बहुत बड़ी वजह बन गई है हमारे समाज में ओल्ड एज होम खुलने की!

जो बाप चौकीदारी युग के पूर्व से ही कच्छा से लेकर हाफ पैंट पहनते मिले हो, वह अंततः चौकीदार युग में अपने कच्छे बनियान तक को अपने बनाए घर -आंगन में रखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं! यह सब कुछ अकस्मात नहीं हो रहा इसके पीछे चौकीदार प्रमुख के रक्त में व्यापार का बहना बताया जा रहा है! चूकि व्यापार लाभ-हानि को देख कर ही की जाती है तो फिर किस बात की मुरौवत!जिस चीज की डिमांड है उसे ही आगे किया जा रहा है! बुजुर्ग मां-बाप को तो राजेश खन्ना के सिनेमा में भी नहीं पूछा जाता था और अब तो यह चौकीदार का न्यू इंडिया है, जहां लोगों के पास ‘न्यू-विल’ है मतलब नई इच्छा शक्ति! जिसमें ‘सबके साथ सबके विकास’ की बात की जा रही है और यह तभी संभव है जब सबको अवसर दिया जाए। यहां अवसर की समता पर खासा ख्याल रखा जा रहा है। इसके ही मद्देनजर पुरानी मां बाप को पदच्युत किया जा रहा है, क्योंकि सारे पकोड़े कुछ विशेष मां-बाप अकेले ही क्यों गटक जाए!

वैसे भी पकोड़ा बेचना आसान काम नहीं रहा। अब इस न्यू इंडिया में यह या तो उत्कृष्ट श्रेणी का या यूं कहें कि यह ‘ए क्लास’ जॉब है! पकौड़ा बेचने से देश में कितनी बेरोजगारी घटी है इसका अनुमान लगाने के लिए चौकीदार ने देश में बेरोजगारी के आंकड़े बताने वाले संस्थान के काम पर ही रोक लगा दी है, और एक गुप्त आदेश दे रखा है कि अब देश में बेरोजगारी नहीं रोजगार के आंकड़े बताए जाएंगे क्योंकि बेरोजगारी नकारात्मकता लेकर आती है! इस नकारात्मकता से देश का मनोबल गिरता है और देश के मनोबल का गिरना देश के झुकने के जैसा है, और यह चौकीदार इस देश को झुकने नहीं देगा!

तभी से यह संस्थान देश में पकौड़े बेचने वालों की संख्या का पता लगा रहा है और इसमें इतने आश्चर्यजनक और चौंकाने वाले आंकड़े सामने आ रहे हैं कि चौकीदार ने यह निर्णय दिया है कि देश में जो लड़के कुछ विश्वविद्यालय में पढ़ लिख कर शोध कर अपने समय को बर्बाद कर रहे हैं उससे स्वयं उनकी ही नहीं बल्कि देश की उत्पादकता पर असर पड़ रही है इसलिए चौकीदार द्वारा यह निर्णय लिया गया है कि इन संस्थानों की फीस बढ़ा दी जाए और साथ ही साथ शोध करने वालों की संख्या घटा दी जाए। सच में चौकन्ना चौकीदार जाग रहा है व वाह भारत को विश्व गुरु बनाने के प्रति प्रतिबद्ध है।

बीते दिनों एक छोटे चौकीदार ने इसका सर्वे भी कर डाला जब उसने एक शिक्षण संस्थान में जाकर ‘कंडोम’ तक गिन डाले थे यद्यपि देश की आंतरिक सुरक्षा का को देखते हुए उन्होंने इसका खुलासा नहीं किया कि जिस कंडोम को वह संस्थान के झाड़ियों या कूड़ेदान से बटोरे थे, वह प्रयोग हो चुका था या प्रयोग किया जाना शेष था! चुकी हाफ पैंट के कई भोले बच्चों का यह दुर्भाग्य रहा कि अपनी जवानी में वह कंडोम देख ही नहीं पाए और जो देखे भी उन्होंने उसको गुब्बारा बनाकर डंडियों में बांधकर जय जय संस्कृति ही करते रहे गए!

वैसे तो जय जय बोलना लोकतंत्र में एक अनिवार्य हॉबी बनता जा रहा है। जिस चौकीदार के पास जय जय बोलने वाले ज्यादा हैं उनकी ही चौकीदारी ढंग से चल पाती है। इस बोलने की कला में उनका आत्मविश्वास उनका समर्पण सब कुछ खुलकर बाहर आ जाता है । इधर बीच लोकतंत्र में संवाद को बढ़ाने के लिए ऐसी ही एक सेना तैयार की जा रही है । जो सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर अद्भुत संस्कारी शब्दों से लोगों के सम्मान में लगातार इजाफा कर रहें हैं! जिससे एक दूसरे की मां- बहन- बेटी तक से खुलकर रिश्ता जोड़ा जा रहा सके! रोजगार देने की यह पहल भी अनूठी है! ट्रेन बस टैक्सी या अखबार इत्यादि में जब घर बैठे हजारों कमाए का विज्ञापन देखने से यह महसूस होता है कि यह कोई दूर की कौड़ी नहीं है! लखपति बनने का यह सुनहरा दौर है शायद यही संस्कारी सेना बेटी को भी बचा रही है और बेटों को पढ़ा भी रही है, लोगों में खुशी की लहर भी व्याप्त है! क्योंकि जनता को मालूम है कि उनकी बेटियों के रखवाले हर घर- दुकान-पार्क हर जगह पर बैठे हैं!रोमियों के लिए तो खास कर अलग से चौकीदारों का इंतजाम किया गया है!

भारतीय सभ्यता के इतने बड़े काल में यह पहला मेक इन इंडिया प्रोडक्ट है जिस पर पूरे देश को नाज है! वह केवल मां बहन की रक्षा ही नहीं करते,बल्कि ‘मां गंगा’ के बुलाने पर उन्होंने मां के सफाई का प्रण भी लिया है! चूकि संदेश स्पष्ट ना होने की वजह से अभी चौकीदार समझ ही नहीं पा रहे हैं कि साफ क्या करना है ?चूकि कीचड़ वह साफ कर नही सकते, क्योंकि उनको मालूम है कि ‘फूल’ इसी में खिलना है सो उन्होंने ‘जेब’ पर ही फोकस कर लिया है!

मां गंगा परेशान होकर शिव के पास गई हैं लेकिन शिव कुछ बोलते कि इससे पहले ही चौकीदार ने शिव को मुक्त कराने का प्रण ले लिया है! शिव भोले हैं वह कंफ्यूज हैं कि मैं कहां- किस बंधन में हूं कि मुझे मुक्त कराना है! तभी उनके सामने के कई मंदिर व मकानों को गिराने की आवाजें आ रही हैं। कई महान चौकीदार अपनी पलटन के साथ वहां खड़े हैं। शिव के पास गंगा को देखकर सभी चौकीदार प्रफुल्लित हो उठते हैं और भाव विभोर होकर कह उठते हैं कि- हे माता आपने इतना कष्ट क्यों किया! अब हम महादेव से आप की कनेक्टिविटी डायरेक्ट कर देंगे, बीच में कोई समस्या ही नहीं आएगी!

खैर कनेक्टिविटी जोड़ने में चौकीदारों का कोई जवाब नहीं इनके इस हुनर को देख कर बरबस ही लोग कह उठते हैं ‘जिओ’ जियो मेरे लाल! खैर चौकीदार है तो मुमकिन है इस विश्वास पर सब कुछ चल रहा है! इसी विश्वास पर इन लोगों ने घर वापसी का एक छोटा रिचार्ज भी शुरू किया है जिसके तहत आप अपने को शुद्ध कर सकते हैं!

शुद्धीकरण के साफ-साफ आंकड़े मौजूद तो नहीं है। लेकिन दुनिया के अखबारों ने भी माना है की यह विश्व गुरु की बहुत सफल योजना है! इसी को आगे बढ़ाते हुए प्रमुख चौकीदार ने घोषणा किया है कि मैं भी चौकीदार की टोपी लगाने वाले चाहे जो भी हो, जहां से भी हो और जो भी करते रहे हो या कर रहे हो,उनके सारे पाप धूल जाएंगे! वह मोक्ष को प्राप्त होंगे!बहुत से लोगों ने इस अभियान से जुड़कर मोक्ष को प्राप्त भी किया है!

अंततः पूरे भारतवर्ष में सदियों से चली आ रही उत्सव परंपरा ठहरने का नाम ही नहीं ले रही! लोग कुछ करना तो चाहते हैं लेकिन चौकीदार एक नया उत्सव लेकर सामने आ जाता है! सब फकीरी में मस्त होते जा रहे हैं!

अबकी नया उत्सव चटाई लेकर बैठने का है! इस आयोजन में राजपथ से लेकर तहसील-ब्लाक तक के सभी चौकीदार अपनी चटाई पर बैठ श्वास को ऊपर-नीचे खींच रहे हैं,अनुलोम-विलोम कर रहे हैं! और जिनके पास चटाई नहीं है वह ‘एकता’ के लिए दौड़ लगा रहे हैं! एकता में लिंग मत ढूंढिए क्योंकि एकता खुद को ही ढूंढ रही है। वह मोहल्ले मोहल्ले जा रही है लेकिन कोई उस पर भरोसा नहीं कर रहा सभी अपने जैसे चौकीदारों के साथ ही बात करना घूमना या बसना चाह रहे हैं!

एकता परेशान होकर गौ माता के पास पहुंचती है कि–हे माता कुछ तो कल्याण करो, विश्व गुरु को आपस में जोड़ने का प्रयास करो! ‘गाय’ तो ‘मां’ शब्द सुनते ही कांप उठती हैं! वह भागने लगती है। एकता उसके पीछे दौड़ रही हैं और उसके पीछे चौकीदार दौड़ रहे हैं! दौड़ की यह प्रतियोगिता अनवरत चल रही है। तभी माता को भागते देख एक लुंगी-टोपी-दाढ़ी वाला आदमी उसे रोक लेता है! एकता भागकर उसके पास आती है और कहती है कि–हे लुंगी-टोपी-दाढ़ी धारण करने वाले मानव अपनी मां को पानी पिलाओ! वह एकता की मां को लेकर निकलता है, तभी चौकीदारों की टीम वहां पहुंचती है! मामला तब चौकीदार के पाले में पहुंचता है।

यद्यपि चौकीदार दिन-रात के मेहनत से परेशान हैं। पर वह तो देश की ज़िम्मेदारी है जो इन्हें बिना कुछ खाए पीए अनवरत काम कराए जा रही है! फिर भी इंसान तो इंसान है, वह झल्लाकर चिल्ला उठता है कि– ‘कहां ले जा रहा है मेरी मां को’!

मां कुछ समझाना भी चाह रही है! लेकिन मौके की नज़ाकत समस्या को योजना आयोग तक पहुंचाने का नही है! योजना आयोग को वैसे भी नीति आयोग में बदला जा चुका है।! वैसे भी चौकीदार का मानना है कि निर्णय तो चुटकियों में लिए जाते हैं। संस्कारी चौकीदार एक्शन के लिए तैयार है।

एकता भीड़ को देखकर, कुछ बोलने से बढ़िया अपनी इज्जत को बचाना ही सही समझती है! तभी चौकीदारों की फौज में से कोई उस आदमी की लूंगी खींचता है तो कोई दाढ़ी! वह आदमी जान बचाकर भागता है! हांफता है, फिर भागता है और पहुंच जाता है अपने घर !

चौकीदार उसके घर पहुंचते हैं। घर का दरवाजा तोड़कर उसके अंदर घुसते हैं ।घर के कोने-कोने में ‘मां’ को ढूंढा जा रहा है! तभी वह दाढ़ी वाला मिलता है और तभी मिलती है रसोई में रखी फ्रिज! फ्रिज का दरवाजा खोला जाता है! और तभी चौकीदारों का दिमाग फ्रीज़ हो जाता है, क्योंकि उसमें रखा है मांस!

अब यह पता नहीं है कि यह ‘मां का मांस’ है कि कुछ और! चौकीदार अपनी मां के लिए भावुक होते हैं वह अपने अतीत में खो जाते हैं और अपमानबोध से भर उठते हैं! सोचते हैं कि ऐसे ही नहीं हम लोगों से पूर्व में चौकीदारी छीन ली गई!

वह हिंसा करते हैं, एकता पीछे से चीख रही है लेकिन देश का चौकीदार तो जाग चुका है! फिर क्या यहां- वहां कई जगह चौकीदार सड़कों पर उतर कर अपनी मां को बचा रहे होते हैं! एकता पुनः चीख रही होती है!

“मेरा देश बदल रहा है” यह चौकीदार बता रहा है और हम महसूस भी कर रहे हैं, लेकिन ‘भारत मां’ क्या कर रही हैं? अंदर से आवाज आती है- वह तो 70 साल से सो रही हैं! खैर मां चुप है अपने बेटों को चौकीदार बनते देख रही है।उनके मन में क्या-क्या चल रहा है यह किसी को नहीं पता! लेकिन उनकी कुछ संताने जो अभी भी चौकीदार नहीं बन पाई है वह चीख रही है कि– “चौकीदार …है!”

इस व्यंग्य कथा के लेखक पीकेपी यानि प्रकाश कुमार ‘पूरबिहा’ एक पढ़े-लिखे मनमौजी नौजवान हैं.

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