पीएम की चंडीगढ़ यात्रा के दौरान चौकसी के नाम पर पुलिस ने पत्रकार के पिता को उठाकर थाने में डाल दिया

चंडीगढ़ में एक न्यूज चैनल के पत्रकार अमित चौधरी जो अभी तक दूसरों की परेशानियों, उन पर हुए अत्याचारों को दिखाते और बताते रहे हैं, आज खुद उसका शिकार हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के चलते उनके साथ वो सब हुआ जिसे वह ‘तानाशाही, जुल्म, अत्याचार, प्रताड़ना और भयावह’ जैसे शब्दों के जरिये बयां करते हैं। यही नहीं, कारगिल युद्ध में देश के लिए दुश्मन से लोहा लेने वाले ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह के बेटे का निधन हो गया, उन्हें सेक्टर 25 के श्मशान घाट में बेटे का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया। क्योंकि प्रधानमंत्री की रैली के चलते श्मशान घाट को पार्किंग में बदल दिया गया था। सोशल मीडिया के चलते अमित और ब्रिगेडियर देवेंद्र की तकलीफ का पता हमें लग भी गया लेकिन हजारों-लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास अपनी तकलीफ और पीड़ा बताने के लिए स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया का मंच नहीं है लेकिन असहनीय पीड़ा है।

आउटलुक में मनीषा भल्ला की रिपोर्ट…

चंडीगढ़ मेरा होम टाउन है। यहीं से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। कई प्रधानमंत्री यहां आए लेकिन जो आज हुआ ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ था। ऐहतियातन हिरासत के नाम पर बुजुर्गों को उठाकर नजरबंद कर दिया गया, स्कूल-कॉलेज और यहां तक कि श्मशान भी बंद कर दिए गए। अमित के परिवार के साथ जो हुआ उसके बाद उन्होंने देश तक छोड़ने का फैसला कर लिया है। बीती रात अमित चंडीगढ़ में प्रधानमंत्री की होने वाली रैली की कवरेज के मामले में व्यस्त थे। उन्होंने इंटरनेशनल एयरपोर्ट की रिपोर्टिंग के लिए पैकेज बनाया और रैली के लिए एंट्री पास का इंतजाम किया। रात 11 बजे जीरकपुर जो कि चंडीगढ़ से 20-22 किलोमीटर पर है अपने घर आकर बैठे ही थे कि उन्हें उनके 70 वर्षीय बुजुर्ग पिता जयपाल सिंह का फोन आया। जयपाल सिंह ने अपने बेटे से कांपती आवाज में कहा कि सेक्टर-31 के पुलिस थाने वालों ने उन्हें जबरन पुलिस थाने बिठाकर रखा है।

अमित का कहना है कि यह सुनकर उनके होश उड़ गए क्योंकि उनके पिता पुराने कांग्रेसी विचारधारा के जरूर हैं लेकिन राजनीति में सक्रिय नहीं। अमित बताते हैं, ‘मैंने पुलिस थाने फोन लगाया तो कोई बात करने के लिए तैयार नहीं। मैंने फौरन दूसरे टीवी चैनल के पत्रकार दोस्तों को फोन किया और चंडीगढ़ रवाना हो गया।।’ थाने में पुलिस ने उनके पिता का फोन लेकर अपने पास रख लिया। जयपाल सिंह हरियाणा के एजूकेशन डिपार्टमेंट से रिटायर हुए हैं और समय बिताने के लिए चंडीगढ़ के जीरकपुर  में शौकिया तौर पर एक दुकान करते हैं।

अमित के अनुसार, उन्होंने चंडीगढ़ के आईजी, एसएसपी, एएसपी यानी पुलिस के तमाम बड़े अधिकारियों को फोन लगाया लेकिन न तो किसी ने उनका फोन उठाया और न कॉल बैक किया। उनके अनुसार रह-रह कर वह यह सोच रहे थे कि उनके पापा के पास न तो कोई फोन है, और न ही कोई अधिकारी उनका फोन उठा रहा है, ऐसे में अपने बुजुर्ग पिता को छुड़वाने के लिए वह करें तो क्या करें। अमित राष्ट्रीय टीवी चैनलों और अखबारों के दूसरे पत्रकार साथियों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां भी पुलिस वालों ने उनकी एक नहीं सुनी। ऐसा पहली दफा हो रहा था कि वह पुलिसकर्मियों के सामने असहाय महसूस कर रहा थे क्योंकि मामला पिता का था। वह कहते हैं ‘एग्रेसिव भी नहीं हो सकता था, मैं जानता हूं कि रात में थानों में क्या होता है।‘

पुलिस स्टेशन में एक न चलने पर सभी पत्रकार रैली स्थल पर गए ताकि वहां अधिकारियों से मुलाकात कर लें। लेकिन पता लगा कि सभी वहां से जा चुके हैं। अभी तक रात के दो बज चुके थे। चारों ओर से हारने के बाद अमित ने चंडीगढ़ प्रेस क्लब के सचिव नलिन आचार्य को साथ लिया। नलिन ने चंडीगढ़ के भाजपा नेता संजय टंडन से लेकर तमाम भाजपा नेताओं को फोन किया लेकिन हर किसी ने या तो बहाने बनाए या बोला कि वह शहर से बाहर हैं, या एक दफा बात करने के बाद अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया। आखिरकार पुलिस स्टेशन दोबारा जाने पर पुलिस का कहना था कि एक पत्र पर लिख कर जाओ कि आपके पापा किसी प्रोटेस्ट में शामिल नहीं होंगे तभी उन्हें छोड़ा जाएगा, अमित ने ऐसा ही किया। बाकायदा लिख कर दिया। पूरी रात यहां-वहां धक्के खाने के बाद अमित सुबह अपने पापा को घर लेकर आए।

वह कहते हैं, ‘मान लो मेरे पापा कांग्रेसी हैं भी तो भी क्या 70 साल के आदमी के साथ ऐसा करेंगे, मेरी बूढ़ी मां घर में अकेली बीमार रहती हैं।’ अमित का कहना है कि पुलिस की बेशर्मी इस बात में दिखती है कि वह रात 11.30 बजे पापा को झूठ बोलकर ले गए कि थाने में सीनियर सिटिजन की एक बैठक है और वहां जाकर उन्हें नजरबंद कर दिया। अमित कहते हैं, कल की रात मेरी जिंदगी की सबसे भयावह रात थी। जो लोग कवरेज के लिए हमारे आगे पीछे घूमते हैं उन लोगों ने हमारे फोन नहीं उठाए। उनका कहना है कि उन्होंने कल वाले हादसे से देश छोड़ने का फैसला कर लिया है। वह कहते हैं ’हमारे कुछ करने से चीजें ठीक तो होंगी नहीं, अगर ऐसे ही हमें यातनाएं मिलनी हैं तो यहां रहने का मन नहीं। हालात अब पहले वाले न हैं न रहेंगे।’

‘आउटलुक’ में मनीषा भल्ला की रिपोर्ट.

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