योगी राज में कप्तान साहब जयकारा लगवा रहे- ‘बोलबम’! देखें वीडियो

यूपी के जिला अंबेडकर नगर के कस्बा टांडा में कावड़ यात्रा के दौरान फील्ड में उतरे पुलिस अधीक्षक संतोष कुमार मिश्रा ने तेज आवाज में कहा- ”थोड़ा जयकारा लगवाओ बोलबम…”. Continue reading

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भाजपा विधायक ने धमकाया तो इंस्पेक्टर ने छोड़ दिया दुष्कर्म का आरोपी

बीजेपी एमएलए दिनेश खटिक

भाजपा के विधायक जी लोग तो इंस्पेक्टर को कुछ समझ ही नहीं रहे… मेरठ में मवाना थाने के एसओ से एक विधायक की बातचीत का ये आडियो सुनें. पुलिस की नौकरी कितनी मुश्किल होती है, यह टेप सुनकर समझ में आता है. धमकी का असर भी हुआ. अभिलेखों में बदलाव कर इंस्पेक्टर ने आरोपी को छोड़ दिया. Continue reading

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प्रबंध संपादक को धमकाने वाले दरोगा ने यूं मांगी सरेआम माफी, देखें तस्वीरें

Dev Nath : दरोगा धमकी प्रकरण में मेरे साथ खड़े रहने वालों का अभिनंदन। यह मित्रों और मीडिया में आई खबरों का नतीजा ही है कि दरोगा जी अपनी दबंगई भूल गए और लखनऊ में मुझसे मिलकर माफी मांग ली। दरोगा जी भले लगे इसलिये हमने भी दिल से माफ कर दिया।

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फर्जी मुठभेड़ का मुद्दा उठाने पर थानेदार ने भेजा लीगल नोटिस, सोशल एक्टिविस्ट ने भी भेजा जवाब


लखनऊ : जेल में बंद निर्दोषों को छुड़ाने और मुठभेड़ में मारे गए निर्दोषों के परिजनों को न्याय दिलाने के लिए बनाए गए संगठन ”रिहाई मंच” के महासचिव राजीव यादव ने आजमगढ़ के कन्धरापुर थाना प्रभारी अरविन्द यादव की क़ानूनी नोटिस का जवाब भेज दिया है. अपने जवाब में राजीव ने कहा कि पुलिस प्रशासन फर्जी मुठभेड़ों का सवाल उठाने पर नोटिस भेज रही है लेकिन जान-माल की धमकी देने वाले पुलिसकर्मी पर कोई कार्रवाई नहीं कर रही है. ये कैसा राज है. पुलिस महकमें ने बस कार्रवाई का आश्वासन दे कर चुप्पी साध ली है. Continue reading

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यूपीकोका में न्यायिक हिरासत अवधि साल भर, पुलिस रिमांड 60 दिन

आतंकवाद विरोधी कानून से भी कठोर है यूपीकोका… हाल में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा यूपीकोका अर्थात उत्तर प्रदेश संगठित अपराध नियंत्रण विधेयक- 2017 लाया गया है जो कि आतंकवाद विरोधी कानून (विधि विरुद्ध क्रिया-कलाप निवारण अधिनियम-1967) से भी कठोर है. इसमें पुलिस को इस प्रकार की शक्तियां दी गयी हैं जो कि आज तक किसी भी कानून में नहीं दी गयी हैं. योगी सरकार ने इसे बड़ी चालाकी से विधान सभा के पटल पर रखा और अगले दिन ही इसे ध्वनिमत से पारित भी करा दिया.

अधिकतर विधायकों तथा विरोधी पक्ष के सदस्यों तक को इसे उपलब्ध नहीं कराया गया. इस कारण अधिकतर विधायक इसके लोकतंत्र तथा मानवाधिकार विरोधी प्राविधानों के बारे में जान तक नहीं सके और वे उस पर कोई चर्चा तथा आपत्ति भी नहीं उठा पाए. इसके अभाव में विपक्ष केवल इसके विपक्षगण तथा दलितों एवं मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा और इसके कठोर प्रावधानों और पुलिस को बहुत शक्तियां दिए जाने की बात नहीं उठा सका. यही स्थिति प्रेस की भी रही. वह केवल सरकार के संगठित अपराध पर नियंत्रण पाने के दावे तथा विपक्ष द्वारा अपने विरुद्ध दुरूपयोग के आरोप की ही बात करता रहा. किसी ने भी इस कानून के कठोर प्राविधानों तथा पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों पर कोई चर्चा नहीं की तथा आपत्ति नहीं उठाई.

फिलहाल यह बिल विधानसभा से पास हो कर विधान परिषद् को भेजा गया है जिसे सलेक्ट कमेटी को संदर्भित कर दिया गया है. यदि यह किसी तरह वहां से भी पास हो जाता है तो फिर यह राष्ट्रपति को स्वीकृति  के लिए भेजा जायेगा जहाँ पर इसे स्वीकृति मिल जाने की पूरी सम्भावना है. यह ज्ञातव्य है कि जो मायावती इस समय इसका विरोध कर रही है उसी मायावती ने अपने शासनकाल में 2008 में इसे विधान सभा और विधान परिषद् से पास कराकर कर राष्ट्रपति के पास भेजा था परन्तु वहां पर इसे स्वीकृति नहीं मिल पायी थी. वर्तमान में विपक्ष द्वारा इस बिल का सही और जोरदार ढंग से विरोध नहीं किया गया जिस कारण यह विधान सभा में बड़ी आसानी से पास हो गया. विपक्ष केवल इसके विपक्षीगण, दलितों और मुसलामानों के विरुद्ध दुरूपयोग की बात करता रहा परन्तु बिल के अति कठोर प्राविधानों और पुलिस को दी जा रही असीमित शक्तियों की बात नहीं उठा सका जिस कारण भाजपा के लिए उनका प्रतिकार करना बहुत आसान रहा.

वास्तव में इस कानून के कठोर प्राविधान जिनका दुरूपयोग होने की पूरी सम्भावना है हमारी चिंता का मुख्य विषय होना चाहिए. इस कानून के अंतर्गत सबसे कड़ा प्रावधान यह है कि इसकी धारा 28(2) में सीआरपीसी की धारा 167 जिसमें न्यायालय को गिरफ्तार व्यक्ति को अपराध की प्रकृति के अनुसार 15 दिन, 60 दिन तथा 90 दिन तक जेल (न्यायिक हिरासत) में रखने के अधिकार को बढ़ा कर 60, 180 तथा 365 दिन कर दिया गया है. इसका अर्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति इस कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया जाता है तो उसे एक वर्ष तक अदालत में मुकदमा शुरू होने से पहले जेल में रहना पड़ सकता है जब कि सामान्य कानून के अंतर्गत यह अवधि अधिकतम 90 दिन ही थी. इसके मुकाबले में आतंकवाद विरोधी कानून  के अंतर्गत यह अवधि क्रमशः 30, 60 तथा 90 दिन ही है. इस प्रकार गिरफ्तार व्यक्ति को जेल में रखने के मामले में यूपीकोका के प्रावधान अधिक कठोर हैं. अब अगर यूपीकोका के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति मुकदमे में छूट भी जाता है तो उसे विवेचना के दौरान 365 दिन तक जेल में रहना पड़ सकता है. यह सर्वविदित है कि पुलिस बहुत से मामलों में निर्दोष व्यक्तियों को गिरफ्तार करके जेल में डाल देती है जहाँ उन्हें इस कानून के अंतर्गत लम्बे समय तक जेल में रहना पड़ सकता है.

इस कानून का ऐसा ही दूसरा कड़ा प्राविधान पुलिस रिमांड को लेकर है. वर्तमान में सामान्य अपराधों में पुलिस को अधिकतम रिमांड 15 दिन तक ही मिल सकता है जबकि इस कानून की धारा 28(3)(क) में इसे बढ़ा कर 60 दिन कर दिया गया है. इसके विपरीत आतंकवाद विरोधी कानून में पुलिस रिमांड की अधिकतम अवधि 15 दिन की ही है. यह सर्वविदित है कि पुलिस रिमांड के दौरान पुलिस हिरासत में गिरफ्तारशुदा व्यक्तियों का उत्पीड़न (टार्चर) किया जाता है जिस कारण कई बार उस व्यक्ति की मौत तक हो जाती है. हमारे देश में पुलिस हिरासत में टार्चर की शिकायतें बहुत अधिक होती हैं तथा पुलिस कस्टडी में मौतों की संख्या भी बहुत अधिक है. वैसे भी उत्तर प्रदेश पुलिस मानवाधिकार हनन के मामलों में देश में अव्वल है जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़ों से स्पष्ट है. इसके अनुसार 2013-14 से 2015-16 के दौरान पूरे देश में से 44% शिकायतें अकेले उत्तरप्रदेश से थीं. इसी माह 10 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने भी कहा है कि मानवाधिकार हनन की 67% शिकायतें पुलिस के विरुद्ध हैं. अब यूपीकोका के अंतर्गत पुलिस रिमांड की अवधि को 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन करना पुलिस को टार्चर के लिए खुली छूट देना है.

इतना ही नहीं, इस कानून की धारा 33 (तीन) में जेल में निरुद्ध व्यक्ति से मुलाकात की प्रक्रिया को भी कठिन कर दिया गया है. इसके अनुसार जेल बंदी से मुलाकात जिलाधिकारी की पूर्वानुमति से ही हो सकेगी और वह भी हफ्ते में अधिकतम दो बार ही. इसी प्रकार इस कानून की धारा 28(4) के अंतर्गत आरोपी को किसी भी न्यायालय से अग्रिम जमानत नहीं मिल सकेगी. इस कानून की धारा 3 (ख) और 5 में यह प्रावधान किया गया है कि न्यायालय इस कानून के अंतर्गत किसी मामले में अदालती कार्रवाही प्रकाशित करने पर प्रतिबंध लगा सकता है जिसका उलंघन करने पर सम्बंधित व्यक्ति को 1 माह की सजा तथा 1 हज़ार रूपये का जुर्माना तक हो सकता है. इस प्रकार यह कानून प्रेस की अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी प्रतिबंधित करता है. इसी प्रकार इस कानून में किसी व्यक्ति के एक मामले में दण्डित होने के बाद दूसरे मामले में बढ़ी हुयी सजा दिए जाने का भी प्राविधान है.

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि यद्यपि यूपीकोका संगठित अपराध को कम करने में कुछ हद तक उपयोगी हो सकता है परन्तु इसमें विवेचना के दौरान आरोपी को सामान्य अपराध में अधिकतम 90 दिन की बजाये एक साल तक जेल में रखने तथा पुलिस रिमांड की अवधि 15 दिन से बढ़ा कर 60 दिन किया जाना मानवाधिकारों के हनन और टार्चर को बढ़ावा देना है. इस कानून के कई प्रावधान आतंकवाद विरोधी कानून से भी कड़े हैं जिनके दुरूपयोग की पूरी सम्भावना है.    

लेखक एस.आर. दारापुरी यूपी में पुलिस महानिरीक्षक के पद पर कार्य कर चुके हैं और रिटायरमेंट के बाद फिलवक्त जन मंच उत्तर प्रदेश के संयोजक के रूप में समाज के शोषित तबके की लड़ाई लड़ रहे हैं.

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पुलिस सिर्फ एक धोखा है, इससे विश्वास उठाना ही आपके लिए शुभ होगा!

कार की टक्कर के बाद पत्रकार तड़पता रहा, पुलिस वाला पास भी नहीं आया… दोस्तों, अपने अनुभव के आधार पर पुलिस को लेकर अपनी बात रख रहा हूं। 11 अक्टूबर की रात लगभग 11:30 पर लखनऊ के सेंट फ्रांसिस स्कूल के पास एक तेज रफ़्तार वैगन आर ने पीछे से मेरी बाइक पर जोरदार टक्कर मारी और वो तेजी से निकल गया। अपनों के आशीर्वाद से मेरी जान तो बच गई लेकिन शरीर पर चोट आई थी। लेकिन दिल पर गहरा घाव वो पुलिसकर्मी दे गया, जो दूर से यह सब देखता रहा। लेकिन उसने करीब आकर ये देखने की जहमत तक नहीं उठाई कि इतनी तेज टक्कर होने के बाद घायल बाइक सवार यानि मैं, जिंदा हूं या मर गया। बन्दे ने पास की दूकान से गुटखा ख़रीदा, खाया और निकल गया।

इसके बाद अब मेरी सोच पुलिस वालों को लेकर बिलकुल बदल गई है। जबसे पत्रकारिता में आया हूं, हमेशा पुलिसकर्मी से जुडी जब भी कोई वसूली, रिश्वतखोरी की खबर आती या फिर किसी और कारणों से उन पर उंगली उठती तो मुझे लगता कि कुछ पुलिसवालों की वजह से सभी को गलत ठहरा दिया जाता है। लेकिन पहले सीएमएस चौक के पास हुए एक्सीडेंट जिसमें घायल की जान पुलिसकर्मी की लापरवाही से गई, और फिर अपने साथ हुए हादसे में एक पुलिसकर्मी का गैर-संवेदनशील रवैया देख कर इनसे विश्वास उठ गया है।

अब सिर्फ एक चीज समझ आई कि अपने भरोसे रहिए… ये पुलिस वाले किसी के भी सगे नहीं हैं। ये भी समझ में आ गया कि आखिर फरियादी दबंगों की देहरी पर क्यों जाते हैं, थाने क्यों जाने से डरते हैं। मित्र, आप सबको मेरी तरह से बिन मांगी एक सलाह है। जान लीजिए, ध्यान दीजिए, याद रखिए…. पुलिस सिर्फ एक धोखा है… इस धोखे से आपका विश्वास उठना-उठाना ही आपकी सेहत के लिए शुभ होगा।

Regards,
ashish sharma ‘rishi
lucknow
mo- 09721921921
rishimantra@gmail.com

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बहुत उदार और उदात्त है यूपी पुलिस, थाने से भाग जाने देती है लफंगों को (देखें वीडियो)

यूपी की बहादुर पुलिस खुद भले चोर बदमाश न पकड़ पाए लेकिन जब कोई दूसरा पकड़ कर पुलिस को सौंपता है तो पुलिस वाले पूरी उदारता बरतते हुए उसे चले जाने देते हैं… शायद इसीलिए कहा जाता है चोर पुलिस मौसेर भाई.. नीचे कमेंट बाक्स में दिए गए एक वीडियो को देखिए…

लड़की बात रही है कि फीमेल बाथरूम में वीडियो बनाने वाले एक युवक को पकड़ कर पुलिस को सौंपा गया लेकिन पुलिस ने उस युवक को भाग जाने दिया… मामला आगरा का है…. धन्य है हमारी यूपी पुलिस.. एक सैल्यूट तो बनता ही है जी, इस अदभुत उदात्तता और मानवीयता के लिए…

देखें वीडियो…

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काम बोलता है : चार घंटे तक इमरजेंसी में कराहती रही बूढ़ी मां, बेटे को जबरन थाने में बिठाये रखा

वाराणसी। यूपी में चल रहे चुनावी दंगल में भले ही ‘काम बोलता है’ का धुन आम मानुष के लिए सुशासन होने का दावा भर रहा हो पर जमीन पर थानों में वर्दी की दबंगई के आगे आम आदमी का गूंगापन और लाचारी बोल रहा है। बीते रविवार यही नजारा देखने को मिला जब अपनी 92 वर्षीय बूढ़ी मां माया देवी को उन्हीं की बहू कंचन और उसके मामा मंगला प्रसाद ने मार-पीट कर घायल कर दिया। बेटा घनश्याम जायसवाल ने तत्काल इसकी सूचना 100 नम्बर पर डायल कर दी और पुलिस से मदद मांगी तो मौके पर पहुंची पुलिस ने समझौते की बेशकीमती सलाह देकर अपना पल्ला झाड़ लिया। 

घबराया बेटा जब एम्बुलेंस में चोटिल मां को लेकर कबीरचौरा स्थित मण्डलीय चिकित्सालय पहुंचा तो वहां मौजूद डाक्टर ने मामले को पुलिस केस बताकर पहले एफआईआर करने की सलाह दी। परेशान घनश्याम मां को वहां इमरजेंसी वार्ड में तन्हां छोड़कर सिगरा थाने पहुंचा तो उल्टे माताकुण्ड चौकी इंचार्ज लक्ष्मण यादव ने घनश्याम को थाने में रात 9 बजे तक बिठाये रखा। इस दौरान लगातार उस पर समझौता करने के लिए दबाव बनाया जाता रहा। उधर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पड़ी बूढ़ी घायल मां घंटो दर्द से कराहती रही।

घटना की जानकारी मिलने पर वहां पहुंचे चंद पत्रकारों ने जब डाक्टर से इस बारे में बात की तब कही जाकर उनका इलाज शुरू हुआ। असंवेदनशील तंत्र यहां किस तरह आम जन की जिदंगी से खेल रहा है, ये उसकी एक बानगी है।

घटना की जानकारी लेने थाने पहुंचे पत्रकारों के सामने एसओ सिगरा ने जब चौकी इंचार्ज से घटना के बारे में पूछा तो वहां भी चौकी इंजार्च मामले की लीपा-पोती करने में लगे रहे। चार घंटे तक फरियादी को थाने में क्यों रोके रखा, इस सवाल पर चौकी इंचार्ज महोदय के पास कोई जवाब नहीं था। फरियादी घनश्याम जायसवाल के तहरीर को भी चौकी इंचार्ज ने अपने पास दबा कर रख लिया। बाद में एसओ महोदय की फटकार के बाद चौकी इंचार्ज ने तहरीर उन्हें दिया।

घटना की गंभीरता को देखते हुए एसओ ने फौरन बहू कंचन और उसके मामा के खिलाफ मुकदमा कायम करने के साथ चौकी इंचार्ज को अस्पताल जाकर चोटिल माया देवी का बयान लेने का आदेश दिया। फिलहाल 92 साल की बूढ़ी माया देवी मण्डलीय अस्पताल के आर्थोपेडिक वार्ड के वार्ड न. 6 के बेड न. 10 पर जिस्मानी दर्द से ज्यादा समय के साथ अर्थहीन होते जा रहे रिश्तों और असंवेदनशील प्रशासन के दर्द से ज्यादा दुःखी है, जहां काम नारों और विज्ञापनों में बोल रहा है।

सोमवार को जब इस मामले में एसओ सिगरा से मोाबाइल पर बात की गई तो उनका जवाब था कि एफ.आई.आर दर्ज कर ली गई है, धाराओं के बारे में थाने से जानकारी लें। सिगरा थाने पर फोन करने पर दूसरी तरफ से आवाज आयी यह नम्बर इस समय काम नहीं कर रहा है। खबर लिखे जाने तक पीड़िता का मेडिकल मुआयना तक नहीं हुआ था।

वाराणसी के पत्रकार भाष्कर गुहा नियोगी की रिपोर्ट.

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यूपी के इस दरोगा ने खुद खोल दी अपनी पोल (सुनें टेप)

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले में एक दरोगा और डॉयल-100 सिपाही के बीच बातचीत का एक ऑडियो वायरल हुआ है। इस ऑडियो में दारोगा ने डॉयल-100 के सिपाही से अपने अवैध कामकाज में दखल न देने की हिदायत दी है। इस तरह दरोगा ने खुद ही अपने तमाम अवैध कामकाज की पोल खोलकर रख दी है। दरोगा का नाम राकेश शर्मा है जो मूरतगंज पुलिस चौकी में प्रभारी के बतौर तैनात है। दरोगा की वायरल ऑडियो ने पुलिस महकमे को शर्मशार कर दिया है।

मूरतगंज हाइवे पर तैनात डॉयल-100 के सिपाही अकबर खां से बातचीत के दौरान दरोगा ने अपने तमाम अवैध सिस्टम में दखल न देने की हिदायत दी है। ऑडियो वायरल होने के बाद कौशांबी पुलिस के अफसर उस डॉयल-100 सिपाही के खिलाफ ही कार्यवाही की कवायद कर रहे है जिसने दरोगा की शर्मनाक करतूत को टेप किया है। कौशांबी के नेशनल हाइवे पर मूरतगंज पुलिस चौकी स्थापित है। हाइवे से गुजरने वाले वाहनों से अवैध वसूली की जाती है। प्रतिबंधित मवेशी से लदे वाहन ही नहीं बल्कि अवैध मिट्टी बालू व गिट्टी से लदी ओवरलोड गाड़ियां भी पुलिसिया सिस्टम को सलाम करके ही गुजरती हैं।

वायरल ऑडियो में डॉयल-100 के सिपाही अकबर खां ने सूचना के बाद प्रतिबंधित मवेशी से लदे वाहन को रोकने की हिमाकत की तो वाहन चालक मुरारगंज चौकी प्रभारी की हनक पर अभद्रता पर उतारू हो गया। डॉयल-100 सिपाही ने जब चौकी प्रभारी से बात की तो दरोगा ने साफ शब्दों में सिस्टम में न दखल देने की हिदायत दी। दरोगा ने कहा कि जितना भी अवैध कार्य हो रहा है वो सब थाना व पुलिस चौकी के सिस्टम में है और इस बात की जानकारी मुझे व मेरे इंस्पेक्टर को भी है। सिस्टम में किसी भी प्रकार का दखल बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।

टेप सुनने के लिए नीचे क्लिक करें :

धारा सिंह की रिपोर्ट. संपर्क : scribe.dsyadav@gmail.com

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यूपी में जंगलराज : धरना देने पर पुलिस वाले पीटते रहे, लड़के इंकलाब जिंदाबाद बोलते रहे (देखें वीडियो)

Yashwant Singh : ये वीडियो अंग्रेजों के जमाने का नहीं है. आज की तारीख का है. पुलिस वाले पीटे जा रहे हैं और ये नौजवान इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं. इनका अपराध बस इतना है कि इन्होंने भोपाल में आठ लोगों को फर्जी मुठभेड़ में मार दिए जाने के घटनाक्रम का विरोध करते हुए न्यायिक जांच की मांग को लेकर धरने पर बैठे थे. ढेर सारे पुलिस वाले आए और बिना चेतावनी दिए माइक दरी छीन झपट कब्जे में लेकर युवकों को पीटना शुरू कर दिया.

दो लोगों को तो थाने ले जाकर इस हद तक टार्चर किया गया कि बेहोश हो गए. इन्हें गंदी गंदी गाली दिया. सिमी आतंकी का तमगा देते हुए मुठभेड़ में मार डालने की धमकी दी. जी, सही समझे, पुत्तर प्रदेश के जंगलराज का यह मामला है, वह भी राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके हजरतगंज में.

सोचिए, यूपी में क्या खूब विकास हो रहा है. मुझे मालूम है कि इस स्टेटस को न भाजपाई लाइक करेंगे और न ही सपाई, और न ही इन दोनों दलों के शुभचिंतक और प्रशंसक. सेलेक्टिव और टारगेटेड क्रिटिसिज्म व जर्नलिज्म करने वाले अपनी सुविधा के हिसाब से लाइक शेयर करते हैं. अगर आप खुद को निष्पक्ष मानते हैं तो जरूर इसे लाइक करके शेयर करें ताकि यूपी पुलिस के क्रूर चेहरे को एक्सपोज किया जा सके.

वीडियो लिंक ये है :

https://www.youtube.com/watch?v=omXNQ2B-NyE

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

पूरे प्रकरण को जानने समझने के लिए इसे पढ़ें…

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मुकुल द्विवेदी, फिर इस देश में कभी पैदा मत होना… (पढें पुलिस अधिकारी शशि शेखर का दर्द)

आदरणीय मुकुल द्विवेदी मेरे बहुत अच्छे मित्र और सहकर्मी थे। मुकुल और मैं अलीगढ में 2007 में हुए दंगे में साथ साथ ड्यूटी कर रहे थे। तब भी कई गोलिया चली थी लेकिन हम दोनों सुरक्षित रहे। ऑफिसर कॉलोनी में मुकुल और मेरा आवास एक साझा चारदीवारी से जुड़ा हुआ था। तब वो सीओ सिटी फर्स्ट थे और मैं सीओ अतरौली। रात को अक्सर हमदोनो एक साथ ही 2. 00 बजे भोर ड्यूटी से वापस आते, पहले ठहाके लगाते फिर सोने जाते। मुकुल एक निहायत ही शरीफ, मृदुभाषी, संवेदनशील और भावुक इंसान थे।

मुकुल ने अपने जीवन का सबसे बहुमूल्य समय अपने मासूम बच्चों और पत्नी को नहीं बल्कि पुलिस और समाज को दिया है। मैं गवाह हूँ उनके हाड़तोड़ मेहनत और प्रतिबद्धता का। मुकुल शेरो- शायरी के भी शौक़ीन थे। आम आदमी तो प्यार में शायर बनता है लेकिन हिन्दू मुस्लिम दृष्टिकोण से साम्प्रदयिक शहरों में नियुक्ति से पुलिस वाले शायर बन जाते है। मुकुल दोनों प्रकार से बने हुए शायर थे।

मुकुल आज हमारे बीच नहीं है। पुलिस की नियति अपने ही लोगों द्वारा मारे जाने की है। पुलिस की मौत पर जश्न मनाने वालों खुश रहो। हम यूँ ही मुकुल बन कर मरते रहेंगे। मुकुल किसी आतंकवादी या डकैतों से लड़ता हुआ मारा जाता तो हमें गर्व और दुःख होता लेकिन आज शर्म और दुःख है। विदा मुकुल, अब कभी मत मिलना। और आखिरी बात, इस देश में फिर कभी पैदा मत होना।

पुलिस अधिकारी शशि शेखर के एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

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यूपी में जंगलराज : लाख रुपये न देने पर पुलिस वालों ने पीटकर मार डाला और लाश हवालात में टांग दिया

यूपी की संभल पुलिस का बर्बर चेहरा… युवक की हवालात में मौत… परिजनों ने पुलिस पर लगाया हत्या का आरोप… हवालात के शौचालय में फाँसी पर झूलता मिला युवक का शव… पुलिस अधीक्षक ने थाना प्रभारी समेत सात पुलिस कर्मियो को किया निलंबित… मजिस्ट्रेटी जाँच के दिए आदेश… परिजनों ने काटा हंगामा…. भारी पुलिस बल मौके पर तैनात… कई थानों की पुलिस को बुलाया गया…  

संभल की थाना धनारी पुलिस पर एक युवक की हत्या का आरोप लगा है. 11 अप्रैल को धनारी थाने में एक किशोरी के अपहरण का मामला दर्ज हुआ था. पीड़ित पक्ष ने चार लोगों के खिलाफ थाने में मामला दर्ज करवाया था. चार लोगो में एक राम नरेश यादव भी शामिल था. राम नरेश जनपद अलीगढ़ का रहने वाला था. इसी कड़ी में देर रात धनारी पुलिस ने अलीगढ़ के थाना गंगोइ के ग्राम रतलोइ में दबिश दी. मौके से पुलिस को युवती तो बरामद हुई नहीं पर पुलिस राम नरेश को गिरफ्तार कर लाई.

युवक को थाने पर लाकर पूछताछ की. पुलिस का कहना है जब हमने हवालात में देखा तो युवक दिखाई नहीं दे रहा था. जब हमने अंदर जा कर देखा तो युवक हवालात के शौचालय में फाँसी के फंदे पर लटका हुआ था. दूसरी ओर मृतक राम नरेश के परिजनों का कहना है कि इन्होंने ही राम नरेश की हत्या की है. परिजनों का कहना है कि इन्होंने एक आरोपी को एक लाख रुपये लेकर छोड़ दिया था और हमसे भी एक लाख रुपये की मांग कर रहे थे. एक लाख रुपय नहीं देने पर इन्होंने हमारे भाई की हत्या कर उसको फाँसी का रूप दे दिया.

वहीं शाम होते होते मामले को शांत करने के लिए एसपी सम्भल अतुल सक्सेना ने कार्रवाई करते हुए थाना प्रभारी ब्रजेश यादव समेत सात पुलिस कर्मियों को निलंबित कर दिया. साथ ही पूरे मामले की मजिस्ट्रेटी जाँच के आदेश भी दे दिए हैं. वहीं इस घटना को लेकर एक बार फिर उत्तर प्रदेश का जंगलराज सुर्खियों में है. शव का पंचनाम भर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. नीचे दिए गए वीडियोज में परिजनों और एसपी संभल के बाइट के साथ साथ पूरे मामले को समझने के लिए पर्याप्त विजुअल हैं.

https://youtu.be/cI_zfgIGpl8

https://youtu.be/dwqpqK-qpRc

https://youtu.be/qMg2FLkbv-4

https://youtu.be/JkP6HE-1gp0

https://youtu.be/vpxdjsrHrR0

संभल से मोहम्मद सद्दाम की रिपोर्ट. संपर्क : 9997331892 और 9528571125

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कोतवाल संजयनाथ तिवारी पर फिर रपट दर्ज

इसके अलावा 14 अन्य पुलिसकर्मियों पर भी केस…. कोतवाल संजय पर इसके पहले भदोही, लखनउ, वाराणसी, जौनपुर, इलाहाबाद में भी दर्ज है लूट, हत्या डकैती, बलातकार व माफियाओं से साठगांठ कर आपराधिक वारदातों को अंजाम देने की रपट…  वर्दी की धौंस जमाकर करता रहा है अवैध वसूली, कई बार हो चुका है निलम्बित… दस हजार करोड़ से भी है उसके पास अधिक की संपत्ति …अरसे से हो रही है भ्रष्ट कोतवाल के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग…

-सुरेश गांधी-

जी हां, ताजा मामला रायबरेली का है जहां शहर कोतवाली में तैनात रहे पूर्व कोतवाल संजयनाथ तिवारी समेत 14 पुलिस कर्मियों पर मारपीट का मामला दर्ज किया गया है। यह मुकदमा अल्पसंख्यक आयोग के आदेश पर पुलिस ने दो साल बाद दर्ज किया है। इसके पहले भदोही में पत्रकार को सरेराह मारने-पीटने व माफियाओं से मिलकर 25 लाख से भी अधिक की घर-गृहस्थी लूटवाने का मुकदमा दर्ज है। इतना ही नहीं इसके पहले लखनउ के गाजीपुर कोतवाली क्षेत्र में एसटीएफ की वर्दी में तीन अन्य इंस्पेक्टरों के साथ एक ज्वेलरी की डेढ़ करोड़ की संपत्ति लूटने के साथ ही वाराणसी व इलाहाबाद में नौ से अधिक हत्या का मुकदमा का दर्ज है।

इस भ्रष्ट कोतवाल की खासियत है कि अब तक जिन कोतवाली क्षेत्र में यह रहा है वहां संभ्रात लोगों को सरेराह मारकर दहशत फैलाता है और फिर बलातकारियों, माफियाओं, डकैतो, चोरों से मिलकर न सिर्फ घटनाओं को अंजाम दिलवाता है बल्कि उनसे करोड़ो-अरबों की वसूली भी करता रहा है। इसके शिकायतों की जांच पूर्व एडीजी अरुण कुमार कर चुके है। लेकिन सत्ता के करीबी रहे एक एसएसपी के जरिए शीर्ष नेतृत्व को अच्छी-खासी रकम पहुंचाकर मलाईदार थानों में तैनाती कराता रहा है। इसके अलावा पीड़ितों के आरोपों से बचाव के लिए दलाल पत्रकारों व ढोंगी समाजसेवियों से बयान लेकर करता रहा है अपनी बचत। आरोप है कि इसके पास दस हजार से भी अधिक की अवैध संपत्ति है, जिसकी सीबीआई जांच की मांग लगातार की जा रही है। घटनाओं को अंजाम देने के बाद पीड़ितों को धमकी देता है कि अगर उसके खिलाफ आवाज उठाई तो और फर्जी मुकदमें दर्ज कर देंगे। हालांकि मुकदमें दर्ज होने के बाद होते ही पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया है।

बता दें, रायबरेली के पूर्व सभासद मोहम्मद सगीर खान ने अल्पसंख्यक आयोग में शिकायत की थी कि 18 मार्च 2014 को रायपुर में आयोजित दंगल में दो समुदायों के बीच कुछ विवाद हो गया था। उसी विवाद को शांत कराने के लिए पुलिस अफसरों ने उसे व अन्य कई लोगों को कोतवाली बुलवाया। कोतवाली पहुंचने पर कोतवाल संजय नाथ तिवारी ने बगैर किसी पूछताछ के न सिर्फ अपशब्दों का प्रयोग किया बल्कि कोतवाली का गेट बंद कराकर चौदह अन्य पुलिसकर्मियों के साथ मिलकर मारापीटा व पिस्टल भी तानी। इसके बाद भ्रष्ट कोतवाल ने सगीर के साथ कई निर्दोष लोगों के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर दी। मामले में एसपी ने अल्पसंख्यक आयोग के समक्ष उपस्थिति होकर अपना पक्ष रखा था। आयोग ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए कोतवाल संजय नाथ तिवारी समेत 14 अन्य पुलिस कर्मियों के विरुद्व मारपीट का मामला दर्ज करने का आदेश दिया। कोतवाली प्रभारी लक्ष्मीकांत मिश्र ने बताया कि आयोग के आदेश पर मामला दर्ज करके जांच शुरू कर दी गई है। कुछ इसी तरह की वारदात बिगडैल व अवैध वसूली में लिप्त कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने भदोही में भी घटनाओं को अंजाम दी।

भदोही में पूर्वांचल के ईनामी माफियाओं से मिलकर एक पत्रकार की न सिर्फ मकान मालिक से घर-गृहस्थी लूटवा दिया बल्कि फर्जी मुकदमा भी दर्ज कर दिया। इस मामले में भी पीड़ित पत्रकार सुरेश गांधी की याचिका पर हाईकोर्ट के निर्देश पर भदोही कोतवाली में कोतवाल समेत दर्जनभर लोगों के खिलाफ रपट दर्ज है। आरोप है कि ंभदोही में तैनाती के दौरान दंगा कराने की बड़ी साजिश रची थी, लेकिन समय से पहले हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर इसे बर्खास्त कर दिया गया था। जौनपुर में अभद्रता करने के आरोप में विधायक नदीम जावेद ने इस भ्रष्ट इंस्पेक्टर को कोतवाली में ही चप्पल से पीटा था। वाराणसी में सिगरा थाना क्षेत्र के तीन अल्पसंख्यक युवकों को घर से ले जाकर गोली मार दी थी और बयान दिया था कि मुठभेड़ में मारा है। कुछ इसी तरह इलाहाबाद में भी हत्या व लूट की घटनाओं को अंजाम दिया है। लखनउ के नाका कोतवाली में एक गरीब चाय बिक्रेता को शुक्ला जैसे माफिया बताकर हत्या कर दी थी। जबकि यह चाय बिक्रेता रोजाना इसकों चाय पिलाने थाना में ही जाता था। सभी मामलों की सुनवाई विभिन्न अदालतों में जारी है।  

लेखक संजय गांधी भदोही के वरिष्ठ पत्रकार हैं और कोतवाल संजयनाथ तिवारी द्वारा लंबे समय तक उत्पीड़ित किए गए हैं.

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इंस्पेक्टर ने बताया यूपी पुलिस की इज्जत बचाने का तरीका- ”राजनीतिक लोगों से मेलजोल न बढ़ाएं”

Vinod Sirohi : पुलिस से थानों या सार्वजनिक जगहों में बदतमीजी करने वाले कुछ राजनीतिक लोग एसा जानबूझकर करते हैं| अपनी दबंग छवि बनाने के लिए और उसे कैश करने के लिए| ऐसे कुछ लोग जानबूझकर पुलिस से उलझते हैं और उनके अनुशासन का फाइदा उठा कर इन्सल्ट करने की कोशिश करते हैं| थानों में घुस कर गाली गलौच करना तोडफोड करना हमला करना ऐसे ही लोग निश्चित केलकुलेशन के साथ करते हैं, और अक्सर व बार-बार करते हैं| उनके साथ उनके स्थानीय समर्थकों का जमावड़ा भी होता है| कभी ज्यादा मामला उलझने पर जन ताकत का बेजा स्तेमाल करने से नहीं चूकते हैं|

पुलिस की सीमाएं होती हैं और उलझने के बाद होने वाली पुलिस जाँचों में पुलिस वाला अकेले ही लड़ पाता है, खुद की लड़ाई खुद| और अक्सर सस्पेंड और नाना प्रकार की सजा पा जाता है| कुछ घाघ राजनीतिक व्यक्ति ये सब जानते हैं| इसके बाबजूद भी पुलिस के कुछ लोगों के कारण साधारण से लोगों का दुस्साहस बढ़ने लगा है| प्रत्येक पुलिस वाले को चाहिए कि अनावश्यक राजनीतिक लोगों से मेल जोल बढ़ाना, उनसे सिफ़ारिश कराना, उनकी मनौती करना बिलकुल नहीं करे| निडर रूप से कम शब्दों में नपे तुले अंदाज में ही बात करें|

रिजर्व रहना सीखें| सार्वजनिक जगहों पर आदर्श आचरण पैदा करें| खराब लोगों से कतई संबंध न रखें, उनके समारोहों में भी हिस्सा न बने| समाज के अच्छे ईमानदार लोगों की मदद लें और उनसे ही मेलजोल रखें| पुलिस के चंद लोगों की आकांछाओ ने पुलिस की छवि को प्रभावित किया है और फालतू के लोग भी पुलिस से दुर्व्यवहार करने लगे हैं| न्यायपालिका की तरह पुलिस वालो को भी सार्वजनिक समारोहों व सार्वजनिक छवि वाले व्यक्तियों के व्यक्तिगत समारोहों से दूर रहने चाहिए| कोई राजनीतिक और पुलिस गठबंधन नहीं करना चाहिए और न दिखना|

यूपी पुलिस के इंस्पेक्टर विनोद सिरोही के फेसबुक वॉल से.

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दुनिया सुधर जाएगी लेकिन न तो यूपी का ‘समाजवादी जंगलराज’ सुधरेगा और न सुधरेगी अपढ़ व भ्रष्ट यूपी पुलिस

Request for intervention as post Nirbhaya legal reforms fails to reform UP police

Respected Madam,

In wide public interest I want to draw your kind attention towards poor implementation of Sec 166 (A) (c) Indian Penal Code,  a post Nirbhaya amendment in criminal law, on recommendations of Justice Verma Committee. Section 166 (A) (c) inserted in IPC, makes non-registration of FIR an offence,  in case of acid attacks, molestation/ sexual harassment, rape and women trafficking. It was made punishable by a rigorous imprisonment for a minimum period of 6 months which can be extended up to 2 years. This Criminal Law  (Amendment) Act came into force from February 2013.

But despite of that, cases of non-registration of FIR  by police cases continue to come in light  and the victims are forced to approach higher authorities or some time courts also.Cases are registered only on later’s intervention. Needless to mention that delay in cases of rape may be fatal for the case in trial court.

I have studied some cases. In  first case of 2013 in Thana Bithri Chainpur District Bareilly, FIR of gang rape was lodged after 6 months when the aggrieved victim approached ADG Police Lucknow. We sent the matter to higher police authorities and the UP Govt to register a case under Sec 166 (A) (c) against the SO, but nothing was done.  On dated 03-02-2016, in another case of gang rape FIR was lodged in thana Baradari  after direction of Magisrtate court. In another recent case of Thana Shahi of Bareilly district, police demanded Rs 20000 to register FIR which was ordered by Magistrate. The incident came to light as the demand was recorded in mobile phone. I have cited these cases only for example. I can produce relevant papers relating these two cases. In none of the cases new law was invoked. (Pl see attachments nos. 1, 2 and 3)

On dated 17-11-2015, I filed an RTI with Ministry of Home Affairs (MHA), GOI, seeking details of cases registered through out India, under newly inserted Sec 166(A) (c) IPC, since Feb 2013. But MHA, having no information,  transferred the RTI to National Crime Record Bureau (NCRB). NCRB too replied that “no information was available on the issue”. Their publication ‘Crime in India’ also did not contain any information regarding Sec 166(A)(c).  (See attachment no. 4)

Only case, I found on internet, was registered in Bengaluru on 18.07.2014 in a high profile matter that too after a furore in State Assembly. (See attachment no. 5). After  a period of three years has elapsed since new law came into force, I fear not a single police officer is punished under the law till date.

I trust that  you, as the Honorable Minister of Women and Child Development, will take up the matter at appropriate fora. I also feel that the Government  should conduct a study of such cases and see that this important amendment is enforced in letter and spirit so that complete justice is done to women victims. 

With  regards,

Dr Pradeep Kumar
Associate Prof in Law
Bareilly College, Bareilly 243005
Mobile: 9719122372
jagarpk@gmail.com

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बलिया में सिपाही ने की अवैध वसूली की शिकायत तो एसपी ने किया सस्पेंड, आहत सिपाही ने दिया इस्तीफा (देखें वीडियो)

उत्तर प्रदेश के बलिया जनपद के नरही थाने के पिकेट पर हो रही अवैध वसूली की शिकायत करना एक सिपाही को महंगा पड़ गया. एसपी ने शिकायत करने वाले सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. इससे आहत निलम्बित सिपाही ने पुलिस हेड क्वार्टर इलाहाबाद को अपना त्याग पत्र भेज दिया है. उसने जान-माल की सुरक्षा की गुहार भी की है.

नरही थाने पर चंद दिनों पहले तैनात हुए सिपाही संतोष कुमार वर्मा का कहना है कि 03 जनवरी की रात 09 बजे से भरौली चेक पोस्ट पर उनकी ड्यूटी लगी थी. वे जब ड्यूटी पर पहुंचे तो वहां एक व्यक्ति द्वारा अवैध गाड़िया चेक पोस्ट से पार करायी जा रही थी. इसका विरोध करते हुए सिपाही संतोष कुमार ने उक्त व्यक्ति को पकड़कर थाने के एसएचओ को सूचित किया. एसएचओ मौके पर पहुंचे और उक्त व्यक्ति को आजाद करते हुए सिपाही संतोष को ही जबरिया थाने लेकर चले आये.

जब इसकी शिकायत सिपाही ने एसपी से की तो एसएचओ रामरतन सिंह भड़क गये. सिपाही का आरोप है कि एसएचओ ने उसे न सिर्फ गालियों से नवाजा, बल्कि उसके मुंह पर जबरदस्ती शराब गिराकर पीएचसी के चिकित्सक से मेडिकल भी करवाया. हद तो तब हो गयी जब एसपी अनीस अहमद अंसारी ने सिपाही को ही सस्पेंड कर दिया. सिपाही पर अनुशासनहीनता का आरोप लगा है. विभाग से मिले इस प्रतिदान से आहत और निलम्बित सिपाही ने अपना त्याग पत्र पुलिस हेड क्वार्टर को भेज दिया. सिपाही ने कहा कि वह रिक्शा चला कर अपने परिवार का पेट पाल लूँगा लेकिन पुलिस की नौकरी नही करूँगा क्योकि यहाँ सच्चाई की कोई कीमत नहीं.

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sipahi ne diya estifa one

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sipahi ne diya estifa three

sipahi ne diya estifa four

sipahi ne diya estifa five

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बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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यूपी पुलिस रातों रात इतनी बहादुर हो गई कि उसको पत्रकारों को दौड़ा दौड़ा कर पीटना भी आ गया! …आखिर क्यों!!

उत्तर प्रदेश पुलिस ने आगरा में कई पत्रकारों को जमकर लाठियों से पीटा और उनको घायल कर दिया। बताया जाता है कि उनके कैमरे तक तोड़ दिय गये। पत्रकार असली थे या नक़ली..? दलाल थे या ईमानदार..? कवरेज कर रहे थे या ब्लैकमेल…? हो सकता है कुछ लोगों के मन में इस दखद समय में इसी तरह के विचार आ रहे हों! हो सकता है कि कुछ प्रेस क्लबों में शराब के नशे मे धुत कुछ कथित क़लम के सिपाही सरकार को गिराने से लेकर एक एक को देख लेने का प्लान भी बना भी चुके हों!

इस शर्मनाक हादसे के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की जितनी भर्त्सना की जाए कम है और पत्रकारों के हक़ में खड़ा होने में अब भी देर की जाए तो सबसे बड़ी शर्म की बात है। लेकिन इस मौक़े पर एक सवाल का जवाब आप सभी से मांगने की गुस्ताखी करना चाहता हूं,…! कि इस स्थिति के लिए आख़िर ज़िम्मेदार कौन है? क्या अपराधियों के आगे चूहा साबित होने वाली और प्रेस कांफ्रेसों में बड़े बड़े दावे करके पत्रकारों से छपवाने वाली पुलिस रातों रात इतनी बहादुर हो गई कि उसको पत्रकारों को दौड़ा दौड़ा कर पीटना भी आ गया?

नहीं क़तई नहीं! पुलिस को बहादुर बनाया हमारे ही कुछ कथित पत्रकार साथियों ने..! शाम को एक बोतल और कभी कभी घर के लोगों को घुमाने के लिए मांगी जाने वाली कार या फिर थोड़ा बहुत मंथली पाने पत्रकारों को आप न जानते हों..! तो हर शहर के कुछ पत्रकारों से मालूम कर लेना… लंबी फहरिस्त मिल जाएगी। ये वही जमात है, जो पुलिस की  प्रेस कांफ्रेंस में पुलिस की तरफ से बतौर प्रवक्ता बनकर असल सवालों को पूछने वालों को चुप करने का ठेका लिये रहती है। भले ही किसी चैनल में काम करें या न करें… भले ही उनके कथित चैनल को बंद हुए जमाना हो गया हो मगर पुलिस के साथ इनकी जत्थेदारी शहरभर में जानी जाती है।

अगर किसी पगले या जुझारू पत्रकार ने सच्चाई लिख भी दी तो पुलिस से पहले खुद ही उसका खंडन करना इनकी ड्यूटी होती है। हर शहर के लिए दावा है मेरा…. अगर आपके शहर में जांच करा दी जाए तो 98 फीसदी पत्रकारों के पास न तो किसी चैनल का आई कार्ड होगा न कोई नियुक्ति पत्र। न किसी को सैलरी मिलती होगी न ही कोई नंबर एक की आमदनी। लेकिन उनके ठाठ बाट आपको दंग करने के लिए काफी होंगे।

किसी की सुनी सुनाई बात नहीं करता मैं। न ही किसी पर आरोप लगाना यहां मेरा मक़सद है। लेकिन सिर्फ चार साल पहले 3 मई 2011 को गाजियाबाद प्रशासन ने कथिततौर पर तत्तकालीन मायावती सरकार के इशारे पर गाजियाबाद के एक पत्रकार के खिलाफ चंद मिनट के अंदर कई थानों में कई एफआईआर दर्ज कर डाली थीं। वो पत्रकार जिसने सहारा और इंडिया टीवी सहित कई राष्ट्रीय चैनलों पर बतौर एंकर और कॉरसपॉंडेंट और पे रोल पर रहते हुए लगभग 17 साल कार्य किया हो। जिस पत्रकार के हाथों नियुक्त किये गये दर्जनों लोग देश के कई शहरों में कार्यरत हों।

जिस पत्रकार का दावा हो कि देशभर में कोई एक इंसान अपने बच्चों कसम खाकर बता दे कि किसी से उसने रिश्वत या एक रुपया भी लिया हो। उसी पत्रकार के खिलाफ गाजियाबाद प्रशासन ने न सिर्फ झूठी एफआईआर दर्ज करा दीं बल्कि उसके परिवार को प्रताणित किया। और सरकार के खिलाफ खबर न लिखने के लिए मजबूर करने के लिए घर की लाइट और पानी तक काट दिया। उस पत्रकार झुकने के बजाए एक माह तक जनरेटर चलाया। पत्रकार का पागलपन सिर्फ इतना है कि उसने प्रशासन के आगे झुकने के बजाय हाइकोर्ट की शरण ली और कई साल तक लड़ने के बाद प्रशासन की पोल खोल दी। पत्रकार का हौंसला जीता….उसके साथियों का भरोसा जीता।

लेकिन अफसोस इस सारी लड़ाई के बीच शहर के कई पत्रकार प्रशासन के भ्रष्ट सिस्टम के सामने दीवार की तरह खड़े होकर प्रशासन के करप्ट लोगों के लिए काम करते रहे। कई ने लिखित में एफिडेविट दिये। कई दलालों ने प्रशासन के करप्ट लोगों को कहा कि कुछ नहीं होगा। ऐसे बहुत पत्रकार घूमते हैं।  ये कहानी नहीं बल्कि मेरे अपने साथ होने वाली घटना है।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ कई पत्रकारों को पुलिस ने फंसाया दबाव बनाया। जो झुक गया ठीक नहीं तो जाओ जेल। अपने जनून और पागलपन के दमपर भड़ास चलाने और भारतीय पत्रकारिता को एक नया आयाम देने वाला यशवंत नोएडा पुलिस के हाथों प्रताड़ित किया गया। मुझ सहित कितने पत्रकारों ने इसको आंदोलन बनाया? इस मामले में सबसे ज्यादा खुद को सबसे ज्यादा दोषी मानते हुए भले ही मैं यह बहाना कर लूं कि मैं खुद उन दिनों पुलिस से बचने और अदालत के चक्करों मे फंसा हुआ था।

लेकिन सच्चाई यही है कि आगरा की घटना अचानक नहीं हुई। ये कतई नहीं माना जा सकता कि आगरा में जो कुछ हुआ अचानक हो गया। इस सबके लिए पुलिस से ज्यादा हम सब दोषी हैं। आगरा में पुलिस के हाथों जो कैमरे और पत्रकारों के हाथ पैर टूटे हैं वो पुलिस की लाठी से नहीं बल्कि पत्रकारों की खुद की लापरवाही, गलती और दलाली का नमूना भर है।

लेखक आज़ाद ख़ालिद टीवी जर्नलिस्ट हैं। सहारा टीवी, इंडिया टीवी, डीडी आंखो देखी, इंडिया न्यूज़ समेत कई राष्ट्रीय चैनलों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। वर्तमान में oppositionnews.com में कार्यरत हैं।

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स्कूल यूनीफार्म में नाबालिग छात्रा ने थाने में पुलिस वालों को चाय पिलाया (देखें वीडियो)

देश के प्रधानमंत्री भले चाय बेच चुके हों और चाय बेचने का बार बार गर्व से जिक्र करते हों लेकिन उनके पीएम बनने के बाद भी बाकी चाय वालों की जिंदगी में अच्छे दिन नहीं आ पाए हैं. स्कूली ड्रेस में एक नाबालिग छात्रा चाय बेचने की मजबूरी के कारण थाने में पुलिस वालों को चाय पिलाने पर मजबूर है, वह भी फ्री में. बाल अधिकार जैसे कानून के होने के बावजूद खुद पुलिस वाले इसकी सरेआम धज्जियां उड़ाते हं. आजमगढ़ क्षेत्र के डीआईजी, बलिया के पुलिस अधीक्षक और गड़वार थाना के पुलिस कर्मी इसी कक्षा चार की छात्रा के हाथों दी गई चाय को चुस्कियां लेकर पीते रहे.

बलिया के गड़वार थाने का दौरा करने डीआईजी राम रतन श्रीवास्तव पहुंचे. उन्होंने पुलिस अधिकारियों के साथ थाना गड़वार में मीटिंग की. बाहर स्कूल ड्रेस में एक नाबालिग छात्रा पुलिस वालों को घूम- घूम कर चाय पिलाताी रही. कक्षा 4 में पढ़ने वाली इस 10 वर्षीय लड़की का कहना है कि पुलिस वालों ने उसे चाय के बदले पैसे तक नहीं दिए. वो हर दिन थाने में पुलिस वालों को चाय देने आती है. घटना के बारे में डीआईजी से पूछा गया तो उनका कहना था कि चाय बेचने वाली बच्ची के पिता के खिलाफ लेबर एक्ट के तहत मुकदमा होना चाहिए पर उन पुलिस वालों के खिलाफ क्या कार्यवाई की जायेगी जो बच्ची के हाथों चाय लेकर पीते रहे, इस सवाल पर वे चुप्पी साध गए.

संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें>

https://www.youtube.com/watch?v=5hnc_pY7onU

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https://www.youtube.com/watch?v=72yzXLKU4K4

बलिया से संजीव कुमार की रिपोर्ट.

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पीएम की चंडीगढ़ यात्रा के दौरान चौकसी के नाम पर पुलिस ने पत्रकार के पिता को उठाकर थाने में डाल दिया

चंडीगढ़ में एक न्यूज चैनल के पत्रकार अमित चौधरी जो अभी तक दूसरों की परेशानियों, उन पर हुए अत्याचारों को दिखाते और बताते रहे हैं, आज खुद उसका शिकार हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के चलते उनके साथ वो सब हुआ जिसे वह ‘तानाशाही, जुल्म, अत्याचार, प्रताड़ना और भयावह’ जैसे शब्दों के जरिये बयां करते हैं। यही नहीं, कारगिल युद्ध में देश के लिए दुश्मन से लोहा लेने वाले ब्रिगेडियर देवेंद्र सिंह के बेटे का निधन हो गया, उन्हें सेक्टर 25 के श्मशान घाट में बेटे का अंतिम संस्कार नहीं करने दिया गया। क्योंकि प्रधानमंत्री की रैली के चलते श्मशान घाट को पार्किंग में बदल दिया गया था। सोशल मीडिया के चलते अमित और ब्रिगेडियर देवेंद्र की तकलीफ का पता हमें लग भी गया लेकिन हजारों-लाखों लोग ऐसे हैं जिनके पास अपनी तकलीफ और पीड़ा बताने के लिए स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया का मंच नहीं है लेकिन असहनीय पीड़ा है।

आउटलुक में मनीषा भल्ला की रिपोर्ट…

चंडीगढ़ मेरा होम टाउन है। यहीं से पत्रकारिता की शुरुआत की थी। कई प्रधानमंत्री यहां आए लेकिन जो आज हुआ ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ था। ऐहतियातन हिरासत के नाम पर बुजुर्गों को उठाकर नजरबंद कर दिया गया, स्कूल-कॉलेज और यहां तक कि श्मशान भी बंद कर दिए गए। अमित के परिवार के साथ जो हुआ उसके बाद उन्होंने देश तक छोड़ने का फैसला कर लिया है। बीती रात अमित चंडीगढ़ में प्रधानमंत्री की होने वाली रैली की कवरेज के मामले में व्यस्त थे। उन्होंने इंटरनेशनल एयरपोर्ट की रिपोर्टिंग के लिए पैकेज बनाया और रैली के लिए एंट्री पास का इंतजाम किया। रात 11 बजे जीरकपुर जो कि चंडीगढ़ से 20-22 किलोमीटर पर है अपने घर आकर बैठे ही थे कि उन्हें उनके 70 वर्षीय बुजुर्ग पिता जयपाल सिंह का फोन आया। जयपाल सिंह ने अपने बेटे से कांपती आवाज में कहा कि सेक्टर-31 के पुलिस थाने वालों ने उन्हें जबरन पुलिस थाने बिठाकर रखा है।

अमित का कहना है कि यह सुनकर उनके होश उड़ गए क्योंकि उनके पिता पुराने कांग्रेसी विचारधारा के जरूर हैं लेकिन राजनीति में सक्रिय नहीं। अमित बताते हैं, ‘मैंने पुलिस थाने फोन लगाया तो कोई बात करने के लिए तैयार नहीं। मैंने फौरन दूसरे टीवी चैनल के पत्रकार दोस्तों को फोन किया और चंडीगढ़ रवाना हो गया।।’ थाने में पुलिस ने उनके पिता का फोन लेकर अपने पास रख लिया। जयपाल सिंह हरियाणा के एजूकेशन डिपार्टमेंट से रिटायर हुए हैं और समय बिताने के लिए चंडीगढ़ के जीरकपुर  में शौकिया तौर पर एक दुकान करते हैं।

अमित के अनुसार, उन्होंने चंडीगढ़ के आईजी, एसएसपी, एएसपी यानी पुलिस के तमाम बड़े अधिकारियों को फोन लगाया लेकिन न तो किसी ने उनका फोन उठाया और न कॉल बैक किया। उनके अनुसार रह-रह कर वह यह सोच रहे थे कि उनके पापा के पास न तो कोई फोन है, और न ही कोई अधिकारी उनका फोन उठा रहा है, ऐसे में अपने बुजुर्ग पिता को छुड़वाने के लिए वह करें तो क्या करें। अमित राष्ट्रीय टीवी चैनलों और अखबारों के दूसरे पत्रकार साथियों के साथ पुलिस स्टेशन पहुंचे। वहां भी पुलिस वालों ने उनकी एक नहीं सुनी। ऐसा पहली दफा हो रहा था कि वह पुलिसकर्मियों के सामने असहाय महसूस कर रहा थे क्योंकि मामला पिता का था। वह कहते हैं ‘एग्रेसिव भी नहीं हो सकता था, मैं जानता हूं कि रात में थानों में क्या होता है।‘

पुलिस स्टेशन में एक न चलने पर सभी पत्रकार रैली स्थल पर गए ताकि वहां अधिकारियों से मुलाकात कर लें। लेकिन पता लगा कि सभी वहां से जा चुके हैं। अभी तक रात के दो बज चुके थे। चारों ओर से हारने के बाद अमित ने चंडीगढ़ प्रेस क्लब के सचिव नलिन आचार्य को साथ लिया। नलिन ने चंडीगढ़ के भाजपा नेता संजय टंडन से लेकर तमाम भाजपा नेताओं को फोन किया लेकिन हर किसी ने या तो बहाने बनाए या बोला कि वह शहर से बाहर हैं, या एक दफा बात करने के बाद अपना फोन स्विच ऑफ कर दिया। आखिरकार पुलिस स्टेशन दोबारा जाने पर पुलिस का कहना था कि एक पत्र पर लिख कर जाओ कि आपके पापा किसी प्रोटेस्ट में शामिल नहीं होंगे तभी उन्हें छोड़ा जाएगा, अमित ने ऐसा ही किया। बाकायदा लिख कर दिया। पूरी रात यहां-वहां धक्के खाने के बाद अमित सुबह अपने पापा को घर लेकर आए।

वह कहते हैं, ‘मान लो मेरे पापा कांग्रेसी हैं भी तो भी क्या 70 साल के आदमी के साथ ऐसा करेंगे, मेरी बूढ़ी मां घर में अकेली बीमार रहती हैं।’ अमित का कहना है कि पुलिस की बेशर्मी इस बात में दिखती है कि वह रात 11.30 बजे पापा को झूठ बोलकर ले गए कि थाने में सीनियर सिटिजन की एक बैठक है और वहां जाकर उन्हें नजरबंद कर दिया। अमित कहते हैं, कल की रात मेरी जिंदगी की सबसे भयावह रात थी। जो लोग कवरेज के लिए हमारे आगे पीछे घूमते हैं उन लोगों ने हमारे फोन नहीं उठाए। उनका कहना है कि उन्होंने कल वाले हादसे से देश छोड़ने का फैसला कर लिया है। वह कहते हैं ’हमारे कुछ करने से चीजें ठीक तो होंगी नहीं, अगर ऐसे ही हमें यातनाएं मिलनी हैं तो यहां रहने का मन नहीं। हालात अब पहले वाले न हैं न रहेंगे।’

‘आउटलुक’ में मनीषा भल्ला की रिपोर्ट.

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भगवान के बाद पुलिस का नाम लेते हैं लोग : डीआईजी आरके चतुर्वेदी

देवरिया । गोरखपुर जोन के डीआईजी आरके चतुर्वेदी का कहना है कि प्रदेश में पुलिस विभाग के कर्मचारियों का व्यवहार और आचरण ठीक न होने की वजह से जनता अत्यधिक दुःखी है। उन्होंने कहा कि भगवान या ईश्वर के बाद पहले डाक्टरों का नाम आता था लेकिन अब भगवान के बाद पुलिस का नाम लिया जाता है और लोग पुलिस पर अत्यधिक विश्वास करने के लिए विवश हैं क्योंकि डाक्टर तो केवल शरीर का ईलाज कर सकता है लेकिन पुलिस शारीरिक, आर्थिक और मानसिक तीनों समस्याओं का इलाज करती है। यह कहना है गोरखपुर जोन के नवागत उप पुलिस महानिरीक्षक आर के चतुर्वेदी का।

वे देवरिया के पुलिस लाईन में अपराध समीक्षा बैठक में उपस्थित पुलिस विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों को सम्बोधित करने के बाद इस संवाददाता से वार्ता कर रहे थे। प्रदेश में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के मददेनजर गोरखपुर परिक्षेत्र के जिलों में अब प्रत्येक दिन गांव या क्षेत्र का बीट सिपाही सीधे पुलिस अधीक्षक से मिलेगा तथा पूरे गांव के बारे में छोटी सी छोटी जानकारी सीधे पुलिस अधीक्षक को उपलब्ध कराएगा। जिससे गांव के हर छोटे बड़े अपराधियों की कुण्डली बीट पुस्तिका के माध्यम से तैयार हो जाएगी। पुलिस अधीक्षक उस कान्सटेबिल की बीट पुस्तिका का अध्ययन करेंगे और बदले में उस कान्सटेबिल की व्यक्तिगत समस्याओं की सुनवाई करते हुए उसके निराकरण का प्रयास करेगें। उन्होंने कहा कि कान्सटेबिल और हेड कान्सटेबिल सबसे अधिक जिम्मेदार पुलिस कर्मी है। लेकिन उसे विभाग में ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता है। पुलिस अधीक्षक सीधे एस ओ या सी ओ से किसी घटना के बाबत वार्ता कर अपनी डयूटी पूरी कर लेते है।

देवरिया से ओपी श्रीवास्तव की रिपोर्ट.

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सपा अध्यक्ष ने दरोगा की जीभ काट लेने की धमकी दी, आईपीएस अमिताभ ने की डीजीपी से जांच की मांग

वाराणसी : सपा सरकार के जमाने में जो न हो जाए, कम ही है. वाराणसी जिले के सिगरा थाने के लल्लापुर चौकी के दारोगा रामसरीख को पहले तो समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष राज कुमार जायसवाल ने फोन पर जीभ काटने की धमकी दी। इसके बाद एसएसपी ने कार्य की लापरवाही बरतने के आरोप में चौकी प्रभारी को लाइनहाजिर कर दिया। इस बीच सोशल मीडिया पर एक रिकॉर्ड आडियो वायरल हो गया। रिकार्ड में सुनाई दे रहा है कि सपा महानगर अध्यक्ष राजकुमार जयसवाल दरोगा की जुबान काटने की धमकी दे रहे हैं। साथ ही कई एसओ के जिला कार्यालय में बैठे होने की  बात कहते हुए बता रहे हैं कि कई दरोगा तुम्हारी शिकायत कर रहे हैं। तुम्हे लाइन में बैठा दूंगा। 

यह घटना जानने के बाद आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने दारोगा रामसरीख से तथ्यों की जानकारी ली और उसके बाद डीजीपी और आईजी ज़ोन वाराणसी को पत्र लिख कर फोन रिकॉर्डिंग की जांच कराते हुए उसके अनुसार समस्त वैधानिक और प्रशासनिक कार्रवाई किये जाने का अनुरोध किया है ताकि विभाग में गलत सन्देश नहीं जाए। उन्होंने उच्चाधिकारियों को बताया है कि जायसवाल ने फोन पर कहा कि लोग दारोगा की उसी तरह तारीफ़ कर रहे हैं, जैसे शोले फिल्म में अमिताभ बच्चन ने धन्नो की मौसी से धर्मेन्द्र की तारीफ की थी। उन्होंने सीधे धमकाते हुए कहा कि लाइन में भेजने पर उन्हें अक्ल आएगी। साथ ही कहा कि वे लोगों की जीभ काट लेते हैं। साथ ही दारोगा को बेवकूफ और बदतमीज बताते हुए कहा कि उन्हें समाजवादी पार्टी के लोगों की बात सुननी और करनी पड़ेगी। जायसवाल के धमकाने के बाद एसएसपी वाराणसी जोगेंद्र कुमार ने उलटे दारोगा रामसरीख को लाइन हाज़िर कर दिया।

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https://bhadas4media.com/article-comment/4594-up-mei-matam

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

SP leader: SI Dharmendra of Sholay, will chop tongue  

Varanasi Mahanagar President of Samajwadi Party Raj Kumar Jaiswal has openly threatened Lallapur outpost incharge Ramsarikh of chopping his tongue. He called Ramsarikh on phone to say that people are praising him like Amitabh Bachchan praised Dharmendra before Dhanno’s aunt in Sholay.

Sri Jaiswal directly threatened the SI of sending him to Police Lines. He said he chops off people’s tongue who wade it far. He called the SI an idiot and il-mannered, saying that he was bound to listen to Samajwadi Party people and to follow their dictates.

After this episode, instead of taking any action against the politician, SSP Varanasi Jogender Kumar sent the SI to Police Lines.

Coming to know of this episode IPS officer Amitabh Thakur talked to the SI Ramsarikh, after which he has written to DGP and IG Zone Varansi to get the audio tape of conversation enquired and take all necessary legal and administrative action, to avoid wrong signal in the department.

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पुलिस विभाग में “लीडरशिप” को कुत्सित प्रयास बताने पर आईपीएस का विरोध

लखनऊ पुलिस लाइन्स के मुख्य आरक्षी बिशन स्वरुप शर्मा ने अपने सेवा-सम्बन्धी मामले में एक शासनादेश की प्रति लगा कर अनुरोध किया कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश जारी होने के 33 साल बाद भी इसका पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया. पुलिस विभाग के सीनियर अफसरों को श्री शर्मा की यह बात बहुत नागवार लगी कि “उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है” और पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है.

एएसपी लाइंस, लखनऊ मनोज सी ने एसएसपी लखनऊ को पत्र लिख कर इसे लीडरशिप करने का “कुत्सित” प्रयास बताते हुए इस “अनुशासनहीनता” के लिए श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की बात कही. आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने डीजीपी को पत्र लिख कर वरिष्ठ अफसरों को घिसीपिटी सोच छोड़ने और अकारण अनुशासनहीनता और दंडात्मक कार्यवाही के हथियार का प्रयोग बंद करने के निर्देश देने का अनुरोध किया है ताकि उत्तर प्रदेश पुलिस में कामकाज का बेहतर माहौल पैदा हो.

IPS raises voice against “leadership” in police called dirty

Head Constable Bishun Swarup Sharma from Lucknow Police Lines had presented a Government Order in one of his service matters, showing his pain at the GO not being enforced for policemen evenh after 33 years of its promulgation. Senior Officers of police department found it completely improper that “he made an attempt to gain sympathy of the departmental policemen” and asked in writing for collective welfare of police persons.

ASP Lines Lucknow Manoj C wrote to SSP Lucknow considering this a “despicable” attempt of leadership, categorizing it as “gross indiscipline” and seeking disciplinary action against Sri Sharma. IPS Officer Anmitrabh Thakur has written to DGP requesting him to direct the senior officers to get over their old mindset and stop using the tool of indiscipline and disciplinary action unnecessarily, and help create a better work enivironment in UP Police.

डीजीपी को लिखा गया पत्र….

सेवा में,
पुलिस महानिदेशक,
उत्तर प्रदेश,
लखनऊ

विषय- वरिष्ठ अधिकारियों की अधीनस्थ अधिकारियों के प्रति सोच बदलने हेतु अनुरोध

महोदय,

कृपया निवेदन है कि मुझे पुलिस विभाग के सूत्रों से श्री मनोज सी, सहायक पुलिस अधीक्षक, लाइंस, लखनऊ का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ को प्रेषित पत्र दिनांक 17/02/2014 की प्रति प्राप्त हुई (प्रतिलिपि संलग्न). इस पत्र में मुख्य आरक्षी 348 स०पु० श्री बिशुन स्वरुप शर्मा, पुलिस लाइंस, लखनऊ के आकस्मिक अवकाश से सम्बंधित एक प्रकरण में श्री शर्मा को भेजे कारण-बताओ नोटिस पर उनके द्वारा दिए जवाब में उनके द्वारा शासनादेश और पुलिस मुख्यालाय के परिपत्र की प्रति संलग्न कर यह टिप्पणी अंकित बतायी गयी है कि उन्हें इस बात का अपार दुःख और कष्ट है कि शासनादेश के जारी होने ने 33 साल बाद भी इस शासनादेश का पूर्ण लाभ पुलिस कर्मचारियों को नहीं दिया गया.

श्री शर्मा के इस कथन पर एएसपी श्री मनोज सी की टिप्पणी निम्नवत है-“इस तथ्य से उसने विभाग के पुलिस कर्मचारियों की सहानुभूति प्राप्त करने का एक प्रयास किया है”. उन्होंने यह भी कहा कि श्री शर्मा ने पुलिस विभाग के कर्मचारियों को लाभ दिलाने की सामूहिक बात लिखित रूप से प्रकट की है, जो लीडरशिप करने का “ कुत्सित” प्रयास है और “अनुशासनहीनता” की श्रेणी में आता है. उन्होंने इसके लिए एसएसपी लखनऊ से श्री शर्मा पर दंडात्मक कार्यवाही की संस्तुति की. साथ ही उन्होंने प्रतिसर निरीक्षक को अधीनस्थ पुलिस कर्मियों को अनुशासन में रखने हेतु उन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के निर्देश दिए जिसपर  प्रतिसर निरीक्षक ने निर्देशों के अनुपालन में कार्यवाही के लिए अपने अधीनस्थ हो लिखा.

मैंने एसएसपी लखनऊ कार्यालय से इस सम्बन्ध में की गयी कार्यवाही की जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया किन्तु मुझे कोई जानकारी नहीं मिल सकी. निवेदन करूँगा कि श्री शर्मा के व्यक्तिगत प्रशासनिक/विभागीय मामले से मेरा कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह उनके और विभाग के बीच का मामला है जिसमे मुझे कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है पर जिस प्रकार से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा इस पत्र के माध्यम से पुलिस के अधीनस्थ अधिकारी द्वारा शासनादेश का पालन नहीं होने पर उनके कष्ट व्यक्त करने को ‘कुत्सित प्रयास’ और ‘घोर अनुशासनहीनता’ माना गया है और उनके विरुद्ध मात्र इस कारण से दंडात्मक कार्यवाही की बात कही गयी है, यह प्रथमद्रष्टया ही हमारे लोकतान्त्रिक देश में देश के प्रत्येक नागरिक को संविधान प्रदत्त अधिकारों पर अनुचित हस्तक्षेप और वरिष्ठ अधिकारी के रूप में प्रदत्त अधिकारों का अनुचित प्रयोग करने का उदहारण दिख जाता है जो चिंताजनक है.

हम सब इस बात से अवगत हैं कि अन्य नागरिकों की तुलना में पुलिस बल को एसोसियेशन बनाने के लिए कतिपय बंदिश हैं जो पुलिस बल (रेस्ट्रिकशन ऑफ राइट्स) एक्ट 1966 में दी गयी हैं. इसी प्रकार पुलिस बल में विद्रोह/असंतोष के लिए उकसाने के सम्बन्ध में पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 है. लेकिन इन अधिनियमों में द्रोह उत्पन्न करने के लिए किये गए कार्यों अथवा बिना सक्षम प्राधिकारी के अनुमति के एसोसियेशन बनाने पर रोक है, इसमें कहीं भी एक वाजिब बात को कहने या सामूहिक हित की बात सामने रखने को मना नहीं किया गया है. इसके विपरीत पुलिस (इनसाईटमेंट ऑफ़ डिसअफेक्शन) एक्ट 1922 की धारा 4 (Saving of acts done by police associations and other persons for certain purposes.—Nothing shall be deemed to be an offence under this Act which is done in good faith.— (a) for the purposes of promoting the welfare or interest of any member of a police-force by inducing him to withhold his services in any manner authorised by law; or (b) by or on behalf of any association formed for the purpose of furthering the interests of members of a police-force as such where the association has been authorised or recognised by the Government and the act done is done under any rules or articles of association which have been approved by the Government) में तो इससे बढ़ कर गुड फैथ (सद्भाव) के साथ पुलिस बल के कल्याण अथवा हित में उनकी सेवाओं तक को रोकने को अनुमन्य किया गया है जबकि इस मामले में श्री शर्मा द्वारा मात्र पूर्व में पारित एक शासनादेश के उसकी सम्पूर्णता में पालन कराये जाने की बात कही गयी है.

मैं नहीं समझ पा रहा कि एक पूर्व पारित शासनादेश के पालन के लिए आग्रह करना और उसके कथित रूप से अनुपालन नहीं होने को किस प्रकार से कुत्सित कार्य और घोर अनुशासनहीनता माना जा सकता है जिसके लिए उन्हें दण्डित किया जाए. साथ ही अब जब पूरी दुनिया में लीडरशिप की जरुरत बतायी जाती है और स्वयं हमारे देश की प्रशासनिक व्यवस्था में हर जगह लीडरशिप के गुणों के बढ़ोत्तरी की बात कही जाती है, उस पर बल दिया जाता है, उसके लिए सेमिनार और ट्रेनिंग कराये जाते हैं, ऐसे में लीडरशिप के कथित प्रयास को “कुत्सित प्रयास” कहे जाने की बात भी अपने आप में विचित्र और अग्राह्य है.

मैंने उपरोक्त उदहारण मात्र इस आशय से प्रस्तुत किया कि यह उदहारण यह दिखाता है कि उत्तर प्रदेश के कई वरिष्ठ पुलिस अफसर किस प्रकार से अनुशासन के नाम पर किसी भी आवाज़ और किसी भी सही बात को दबाने और उसे अनुशासनहीनता या अपराध घोषित करने का कार्य कर रहे हैं जो न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि प्रदेश पुलिस की क्षमता और प्रभावोत्पादकता के लिए भी अहितकारी है. अतः मैं आपसे इस प्रकरण को एक गंभीर उदहारण के रूप में आपके सम्मुख इस निवेदन के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ कि कृपया इसे एक दृष्टान्त बताते हुए समस्त अधिकारियों को मार्गदर्शन देने की कृपा करें कि वे अनुशासनहीनता और सही/वाजिब कहे जाने के अंतर को स्पष्ट रूप से समझें और घिसी-पीटी सोच के तहत अधीनस्थ अधिकारियों की प्रत्येक बात को अनुशासनहीनता बता देने की वर्तमान मानसिकता को समाप्त करें क्योंकि यह छद्म-अनुशासन उत्तर प्रदेश पुलिस के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है और अब समय आ गया है जब पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के इस युग में पुरातनपंथी मानसिकता का त्याग कर वरिष्ठ और कनिष्ठ अधिकारियों के मध्य अकारण ओढ़ी गयी दूरी समाप्त की जाए और इस प्रकार अनुशासन के नाम पर दण्डित किये जाने की परंपरा का पूर्ण परित्याग हो ताकि पुलिस विभाग में कामकाज का बेहतर माहौल तैयार हो और अकारण पैदा हुई दूरी समाप्त हो.

भवदीय,
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमतीनगर, लखनऊ
# 094155-34526
पत्र संख्या- AT/Complaint/104/2015
दिनांक- 03/04/2015

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देवरिया में तैनात दरोगा शांति भंग के अपराध में भेजा गया मेरठ जेल

मवाना (मेरठ) : जनपद देवरिया में तैनात एस टी एफ के दरोगा को शान्ति भंग की आंशका के चलते उप जिलाधिकारी ने पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया। जनपद मेरठ की मवाना तहसील के ग्राम तिगरी में रास्ते को लेकर सुबह के समय दो पक्षो में विवाद हो गया। सूचना पर उपजिलाधिकारी अरविन्द कुमार सिंह पुलिस क्षेत्राधिकारी डी पी सिंह व तहसीलदार भूपेन्द्र बहादुर पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुंचे।

वहां एक पक्ष से देवरिया में तैनात एसटीएफ के दारोगा शैलेश ने पुलिस प्रशासनिक अधिकारियों पर पिस्टल तान कर गाली गलौच व अभ्रद व्यवहार किया. इस पर पुलिस दोनों पक्षों से आरोपी दारोगा शैलेश, सतीश, राकेश, लोकेश, अमरीश को थाने ले आयी. इन्हें शांति भंग में निरुद्ध करते हुए उप जिलाधिकारी न्यायालय में पेश किया. इस पर उपजिलाधिकारी अरविन्द कुमार सिंह ने दोनो पक्षों से सभी पांचों आरोपियों को पुलिस हिरासत में जेल भेज दिया।

मेरठ के मवाना से पत्रकार संदीप नागर की रिपोर्ट.

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यूपी में जंगल राज : पुलिस वाले ने आठ साल के इस बच्चे के साथ क्या किया, देखें वीडियो

यूपी में पुलिस पहले से ही हैवान थी और आज भी है. कोई बदलाव सुधार नहीं आया है. फिरोजाबाद के थाना सिरसागंज में थाने के अन्दर पुलिस 8 वर्ष के मासूम बच्चे पर जुल्म ढा रही है. मासूम बच्चे को पट्टे से बर्बरता से मारती पुलिस इसे अपनी मर्दानगी का सबूत समझ रही है. पुलिस ने पॉकेट मारी के आरोप में 8 वर्ष के बच्चे पकड़ा था. थाने का हेड कांस्टेबल धनीराम इस बच्चे के लिए कैसे यमराज बन जाता है, देखिये यह कुछ सेकेंड्स का वीडियो…

https://www.youtube.com/watch?v=3A5Ytvbh4do

पुलिसिया हंटर की गूँज जब आला अधिकारियों के कानों में पहुंची तो जिले के कप्तान ने इस हेड कांस्टेबल को सस्पेंड कर दिया…. क्या इस दीवान और संबंधित थाने के थानेदार को नौकरी से बर्खास्त नहीं कर देना चाहिए?

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ये है अखिलेश यादव की नाक तले काम कर रही लखनऊ पुलिस की हकीकत

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आज डीआईजी लखनऊ आर के चतुर्वेदी को पत्र लिख कर लखनऊ पुलिस की हकीकत बताई है. पत्र में उन्होंने कहा है कि उनकी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने स्वयं से सम्बंधित एक शिकायती पत्र थाना गोमतीनगर में भेजा पर थानाध्यक्ष और एसएसआई सहित सभी ने पत्र रिसीव करने तक से मना कर दिया. श्री ठाकुर ने इस सम्बन्ध में एसएसआई से फोन पर बात करना चाहा तो उन्होंने इससे भी मना कर दिया.

इसके बाद श्री ठाकुर ने डीआईजी को फोन कर गहरी नाराजगी जाहिर की जिसके तुरंत बाद डीआईजी ने थानाध्यक्ष को फोन किया जिन्होंने झूठ कह दिया कि पत्र पहले ही रिसीव हो गया है जबकि सच्चाई यह थी कि डीआईजी की डांट के बाद पत्र रिसीव करना शुरू किया गया था. श्री ठाकुर ने डीआईजी को इस सभी बातों से अवगत कराते हुए इस मामले को एक नजीर के रूप में देखते हुए कठोर कार्यवाही के लिए कहा है ताकि लखनऊ पुलिस में वास्तविक सुधार हो और जनता का वास्तविक भला हो.

सेवा में,
श्री आर के चतुर्वेदी,
डीआईजी रेंज,
लखनऊ

विषय- थाना गोमतीनगर में पत्र रिसीव नहीं करने, बात तक करने से इनकार करने, पत्र ले गए व्यक्ति से अनुचित आचरण किये जाने विषयक

महोदय,

कृपया आज समय 01.48 बजे मेरे सीयूजी नंबर 094544-00196 से आपके सीयूजी नंबर 094544-00212 पर किये गए फोन कॉल और इसके उत्तर में आप द्वारा 02.00 बजे किये गए कॉल का सन्दर्भ ग्रहण करें. आपको स्मरण होगा कि मैंने आपको कॉल कर अवगत कराया था कि मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर की ओर से एक प्रार्थनापत्र (प्रतिलिपि संलग्न) ले कर एक व्यक्ति थाना गोमतीनगर में रिसीव कराने गए थे जहां उपस्थित सभी लोगों ने पत्र रिसीव करने से साफ़ इनकार कर दिया था. मैंने यह भी बताया था कि जब पत्र ले गए व्यक्ति ने फोन मिला कर थाने के लोगों से मुझसे फोन से बात करने को कहा तो उन्होंने इससे तक इनकार कर दिया था. मैंने आपको निवेदन किया था कि थाने पर थानाध्यक्ष तथा एसएसआई बैठे हैं पर कोई भी व्यक्ति पत्र रिसीव नहीं कर रहा है.

मैंने आपसे निवेदन किया था कि आप और सभी वरिष्ठ अधिकारी लगातार कहते हैं कि थानों पर सभी पत्र तत्काल रिसीव होंगे पर यह उसकी वास्तविक स्थिति है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि मैं मात्र अपना पत्र रिसीव करवाने हेतु यह फोन नहीं कर रहा, बल्कि इस मामले को एक नजीर के रूप में देखने के लिए कर रहा हूँ कि थाने पर इस प्रकार खुलेआम प्रार्थनापत्र रिसीव नहीं किये जा रहे हैं, क्या इस पर कोई कार्यवाही भी हुआ करती है और आप जैसा सक्षम अधिकारी क्या इस पर कोई कार्यवाही करेगा.

आपने मुझसे कहा था कि आप अभी मामले को देख रहे हैं और मुझे सूचित करेंगे. आपने कुछ देर बाद मुझे फोन कर बताया था कि वह पत्र तो पूर्व में रिसीव हो गया है जिस पर मैंने आपको बताया था कि मुझे अभी-अभी थाने पर मौजूद व्यक्ति ने बताया कि थानाध्यक्ष अभी-अभी किसी का फोन हाथ में लिए सर-सर करते निकले हैं और पत्र रिसीव करने के आदेश दिए हैं. मैंने यह भी बताया था कि अभी तक पत्र रिसीव नहीं हुआ है, बल्कि आपके फोन के बाद पत्र रिसीव करने की कार्यवाही शुरू हुई है. मैंने आपसे निवेदन किया था कि इस मामले को यूँ ही बीच में छोड़ने की जगह इसमें कोई ठोस कार्यवाही करें ताकि सही सन्देश जाए.

बाद में मेरी पत्नी डॉ नूतन ठाकुर ने भी आपसे फोन कर इस मामले में ठोस कार्यवाही का निवेदन किया था पर अब तक कुछ भी नहीं हुआ दिखता है. निवेदन है कि हमारे लिए यह एक अकेला मामला नहीं, एक उदहारण है कि किसी प्रकार स्वयं लखनऊ जनपद में पुलिस द्वारा थाने पर व्यवहार किया जा रहा है. जैसा मैंने आपको बताया था कि थाने के लोग जानते हैं कि मैं एक आईपीएस अफसर हूँ, तब उन्होंने उस समय तक पत्र रिसीव नहीं किया जबतक मैंने आपके समक्ष अपनी गहरी नाराजगी और भारी कष्ट व्यक्त नहीं किया था और जब तक आपने इसे पुनः थानाध्यक्ष गोमतीनगर को आगे संप्रेषित नहीं किया था.

निवेदन करूँगा कि यदि यह एक उस आदमी के साथ स्थिति हो जो मौजूदा समय में आईपीएस पद पर तैनात है तो आम आदमी की स्थिति का अनुभव स्वयं किया जा सकता है. अतः जैसा आपके विषय में आम शोहरत है और जैसा मैंने आपसे फोन पर भी कहा था कि आप एक सक्षम अधिकारी माने जाते हैं, मैं समझता हूँ यह आपका उत्तरदायित्व बनता है कि मात्र पत्र रिसीव होने को प्रकरण का अंत समझने की जगह इसे प्रकरण की शुरुआत मानते हुए इसे एक उदहारण के रूप में देखने की कृपा करें. तदनुसार यदि आपको मेरी बातों में कोई अर्थ दिख रहा हो तो न सिर्फ इस मामले में
आवश्यक जांच कर आवश्यक कार्यवाही कार्यवाही करने की कृपा करें बल्कि इस सम्बन्ध में भविष्य में किसी घटना की पुनरावृति को रोकने के लिए भी सभी आवश्यक निर्देश निर्गत करने की कृपा करें.

पत्र संख्या-AT/Complaint/85/15                                  
दिनांक- 26/02/2015
(अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
# 94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

प्रतिलिपि- डीजीपी, यूपी, लखनऊ को कृपया आवश्यक कार्यवाही हेतु

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यूपी पुलिस के सीओ आशुतोष मिश्रा की कारस्तानी : पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेंद्र तिवारी को छह साल जेल कटवा दिया

04 सितम्बर 2009 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में महेंद्र कुमार की हत्या हुई जिसमे अनिल कुमार त्रिपाठी नामजद हुए और पिच्चू मिश्रा आरोपों के घेरे में आये. विवेचना के दौरान विवेचक सीओ अजीतमल आशुतोष मिश्रा ने जबरदस्ती पिच्चू मिश्रा की जगह धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र चंद्रशेखर को पुच्ची मिश्रा बताते हुए 11 सितम्बर 2006 को गिरफ्तार कर इटावा जेल भेज दिया जबकि वे जानते थे कि यह पिच्चू मिश्रा नहीं है.

धर्मेन्द्र तिवारी के खिलाफ आरोप पत्र भी लग गया और वे छह साल से ऊपर जेल में रहे. वे 07 अक्टूबर 2012 को तब छूटे जब अपर सत्र न्यायाधीश, औरैया ने 06 अक्टूबर के अपने आदेश में यह स्पष्ट कर दिया कि वह पुच्ची मिश्रा नहीं, धर्मेन्द्र तिवारी हैं. जज ने तमाम बैनामे, परिवार रजिस्टर, रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड जैसे ताम साक्ष्य को देखने के बाद यह आदेश दिया था.

जेल जाने के पहले धर्मेन्द्र तिवारी के पास 10 पहिये के दो ट्रक थे और 30-40 हज़ार प्रति माह की अच्छी आमदनी थी पर इस दौरान उनका पूरा कारोबार ख़त्म हो गया और आज वे पैसे-पैसे के मोहताज हैं. उनका घर गिर गया है और 11 साल का बच्चा मात्र तीसरे क्लास में है.

अब आईपीएस अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने उनकी लड़ाई को उठाते हुए इस पूरे प्रकरण को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजा है और कोर्ट के आदेश के आधार पर श्री धर्मेन्द्र को पुलिस द्वारा फर्जी फंसाए जाने के सम्बन्ध में कम से कम पांच करोड़ मुआवजा और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है.

Spent 6 years in jail on police action, 5 crore compensation sought  

One Mahendra Kumar was murdered on 04 September 2009in Anantram, police station Ajitmal, district Auraiya in which Anil Kumar Tripathi was named accused and Picchu Mishra’s name came in light. During investigation, then CO Ajitmal Ashutosh Mishra arrested Dharmendra Kumar Tiwari son of Chandrashekhar calling him Picchu Mishra on 10 September 2006, while definitely knowing that he is not Picchu, who was sent to Etawah jail.

Later Chargesheet was submitted against Picchu Mishra, with Dharmendra remaining in jail and facing trial for more than 6 years. He was released from jail on 07 October 2012 only after orders of ADJ Auraiya dated 06 October which clearly stated that this man was Dharmendra Tiwari and not Picchu Mishra. The Judge based his order on several sale deeds, family register, vehicle registration certificate, driving licence, voter identity card, ration card and such other fundamental documents.

Before going to jail Dharmendra Tiwari had two 10-tyre trucks and his monthly income was Rs. 30-40,000. During this period, his income evaporated, his house got dilapidated and today his 11 year son is studying only in class 3.

Now IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur have taken up his cause, writing to National Human Rights Commission, to order a compensation of Rs. 5 crores for Sri Dharmendra and appropriate legal action and delinquent police officers.

Dear Amitabh Thakur,

The Commission has recieved your complaint and it has assigned diary number as 1519251

with the following details:-

Victim
Dharmendra Kumar Mishra
Address
s/o Late Chandrashekhar Tiwari, r/o Mandir Mahewa, ps Bakewar, district- Etawah
Incident dated
01/01/1900
Incident Type
ILLEGAL ARREST
Incident Place
Auria
AURIA , UTTAR PRADESH

NHRC, New Delhi, INDIA.

मूल पत्र….   

सेवा में,
मा० अध्यक्ष महोदय,
मा० राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,
नयी दिल्ली

विषय- श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी पुत्र स्व० चंद्रशेखर तिवारी निवासी मंदिर महेवा, थाना बकेवर, जनपद इटावा के साथ हुए घोर मानवाधिकार उल्लंघन में उन्हें समुचित मुआवजा देने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित करने विषयक  

महोदय,
हम आपके समक्ष एक ऐसा प्रकरण प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमे हमें प्राप्त अभिलेखों और हमें बताये तथ्यों के अनुसार एक व्यक्ति को पुलिस अफसरों द्वारा जानबूझ कर दूसरा व्यक्ति दिखा कर हत्या जैसे गंभीर मामले में जेल भेज दिया गया और उसके खिलाफ आरोप पत्र भी प्रेषित कर दिया गया जिसका नतीजा यह रहा कि वह पूर्णतया निर्दोष व्यक्ति पुलिस अफसरों के जानने-समझने के बाद भी छः वर्ष से अधिक अवधि के लिए जेल में निरुद्ध रहा जिस दौरान उसका पूरा कारोबार नष्ट हो गया, उसकी बीवी और बच्चे सड़क पर आ गए और उस समय लाखों का वह आदमी आज पैसे-पैसे को मोहताज है.

यह व्यक्ति तब जेल से छूट पाया जब सत्र न्यायलय के सामने यह पूरी तरह साबित और स्थापित हो गया कि वह मुकदमे में प्रकाश में आया व्यक्ति नहीं है बल्कि एक दूसरा पूरी तरह अनजान आदमी है जिससे उस मुकदमे का दूर-दूर तक कोई भी वास्ता नहीं था बल्कि जिसे मात्र कुछ पुलिस अफसरों की व्यक्तिगत लालच ने जेल तक पहुंचा दिया था.

उपरोक्त अभिलेख और तथ्यों के आधार पर हमारी दृष्टि में यदि मा० आयोग ने इस मामले में संज्ञान लेकर इस पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा दिलाने और दोषी पुलिसकर्मियों को दण्डित किये जाने का कार्य नहीं किया तो यह न्याय की दृष्टि से निश्चित रूप से घातक होगा.

प्रकरण यह है कि दिनांक 04/09/2005 को क़स्बा अनंतराम, थाना अजीतमल, जिला औरैया में श्री महेंद्र कुमार पुत्र श्री आशाराम निवासी रूपसाहब मुदैना, थाना अजीतमल, जनपद औरैया की हत्या हुई जिसके सम्बन्ध में मु०अ०स० 235/2005 धारा 302, 307, 504 आईपीसी तथा 3(2)(5) एससी एसटी एक्ट का मुक़दमा थाना अजीतमल पर श्री आशाराम द्वारा पंजीकृत कराया गया. इसमे श्री अनिल कुमार त्रिपाठी पुत्र श्री रामस्वरुप नामजद हुए. विवेचक सीओ अजीतमल श्री अजय प्रताप सिंह द्वारा प्रारंभ की गयी जिसमे लगातार कई विवेचक बदले और श्री वंशराज सिंह यादव, सीओ अजीतमल इसके विवेचक हुए.

श्री वंशराज ने वादी श्री आशाराम के बयान दिनांक 03/10/2005 (विवेचना का परचा संख्या VI) के आधार पर तीन अज्ञात व्यक्तियों के नाम प्रकाश में लाये- श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा,  थाना बकेवर, इटावा, श्री बृजेश मिश्रा पुत्र श्री बीर मिश्र निवासी निवासी बम्हौरा, थाना बकेवर, इटावा तथा श्री राजीव पुत्र श्री बदन निवासी बहेड़ा थाना बकेवर, इटावा.

इसके बाद श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल ने दिनांक 01/11/2005 को इसकी विवेचना ग्रहण की. दिनांक 20/12/2005 को उपरोक्त चारों (श्री अनिल कुमार त्रिपाठी, श्री बृजेश मिश्रा, श्री राजीव चौधरी और श्री पुच्ची मिश्रा) के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया.
इस समय तक श्री धर्मेन्द्र तिवारी कहीं प्रकाश में नहीं थे और उनसे इस मामले का कोई साबका नहीं पड़ा था. श्री धर्मेन्द्र तिवारी के अनुसार उनको पहली बार इस मामले की जानकारी दिनांक 10/09/2006 को रात करीब दस बजे उस समय हुई जब ये अपने घर मंदिर महेवा, थाना बकेवर के बाहर खड़े थे. उसी समय अचानक पुलिस की जीप आई और श्री धर्मेन्द्र को पकड़ कर थाने ले गयी. घर पर पकड़ने के पहले कोई बात नहीं बताई. जीप में कहा कि थाने चलिए, आपके खिलाफ वारंट है. अजीतमल थाने पर पुलिसवालों ने बताया कि श्री पुच्ची मिश्रा पुत्र श्री चंद्रशेखर निवासी बम्हौरा के नाम से वारंट है, उसकी जगह आपको हाज़िर होना पड़ेगा. श्री धर्मेन्द्र ने इसका प्रतिवाद किया. उस समय तक उनके भाई श्री जीतेन्द्र तिवारी भी थाने आ गए थे. उन्होंने भी इसका प्रतिवाद किया तो पुलिसवालों ने उनको भी थाने पर बैठा लिया. कहा कि इसे थाने पर हाज़िर होना पड़ेगा नहीं तो श्री जीतेन्द्र को भी झूठा केस लगा कर बंद कर देंगे.

श्री धर्मेन्द्र का कहना है कि कोई विकल्प नहीं होने पर दोनों भाई थाने पर चुपचाप बैठे रहे. सुबह श्री धर्मेन्द्र को थाने की जीप पर बैठा पर औरैया कोर्ट ले गए और श्री पुच्ची मिश्रा दर्शा कर मा० न्यायालय में हाज़िर करा दिया. श्री धर्मेन्द्र ने मा० सीजेएम, औरैया से कहा कि वे पुच्ची मिश्रा नहीं हैं धर्मेन्द्र कुमार तिवारी हैं लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गयी और श्री धर्मेन्द्र को जेल भेज दिया गया.

अभिलेखों के अनुसार पुलिस की यह कार्यवाही श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ अजीतमल के कार्यकाल में उनके निर्देशों और आदेशों पर हुई. इसके बाद श्री धर्मेन्द्र इटावा जेल भेज दिए गए. श्री आशुतोष मिश्रा, सीओ ने एससीडी पर्चे (केस डायरी) में कहीं भी श्री धर्मेन्द्र को कहीं से भी गिरफ्तार करना नहीं दिखाया बल्कि केस डायरी में लिखा कि श्री पुच्ची मिश्र मा० न्यायालय में हाज़िर हुए और उनका बयान लिया जा रहा है जबकि श्री धर्मेन्द्र के अनुसार वास्तविकता यह थी कि उन्हें पिछली रात उनके घर से अजीतमल थाने की पुलिस उठा कर ले आई थी. श्री आशुतोष मिश्रा ने दिनांक 11/09/2006 के केस डायरी में लिखा कि पुच्ची मिश्र से अपराध के बारे में पूछा गया तो पुच्ची मिश्र ने कहा कि वे अपनी बात न्यायालय के समक्ष रखेंगे.

इस प्रकार तथ्य बताते हैं कि श्री आशुतोष मिश्र ने श्री पुच्ची मिश्र का जो नाम दिनांक 03/10/2005 को श्री वंशराज यादव के विवेचना के समय श्री आशाराम के बयान में आया था, उसे दिनांक 10/09/2006 को मनमर्जी श्री पुच्ची की जगह श्री धर्मेन्द्र को स्वतः ही श्री पुच्ची बना दिया गया और उन्हें स्थानीय पुलिस किए द्वारा गिरफ्तार करा कर मा० न्यायालय में पेश कर जेल भिजवा दिया गया. श्री धर्मेन्द्र को आज तक यह नहीं पता कि विवेचक श्री आशुतोष ने ऐसा क्यों किया और ऐसा करने के पीछे उनका क्या मकसद था या क्या मजबूरी थी पर श्री धर्मेन्द्र को इतना अवश्य ज्ञात है कि उन्हें श्री पुच्ची के स्थान पर पकड़ कर मा० न्यायालय लाया गया और उसके बाद वे जेल भी भेज दिए गए.

श्री आशुतोष ने दिनांक 16/09/2006 को इस मामले में श्री पुच्ची के नाम पर जेल में निरुद्ध श्री धर्मेन्द्र सहित सभी अभियुक्तगण के खिलाफ आरोपपत्र मा० न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया और इसके बाद नतीजा यह रहा कि श्री धर्मेन्द्र छः साल तक बिना किसी कारण, बिना किसी दोष के जेल में सड़ते रहे और इस बीच उनका परिवार, उनका कारोबार और वे स्वयं पूरी तरह बर्बाद होते गए. इसके बाद ट्रायल के समय श्री धर्मेन्द्र बार-बार मा० न्यायालय आते रहे और उनकी पुकार भी धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में होती रही और मा० न्यायालय के आर्डर शीट पर भी वे श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी के नाम से ही हस्ताक्षर करते थे. इस प्रकार मा० न्यायाधीश सहित सभी अधिवक्तागण और पुलिस वाले यह जानते थे कि यह व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र हैं पर इसके बाद भी उन्हें श्री पुच्ची के रूप में जेल में रहना पड़ा और दर्जनों बार मा० न्यायालय में सबों की जानकारी के बाद भी श्री पुच्ची के रूप में आना पड़ा.

इस मामले में सपूर्ण सत्यता तब सामने आई जब मा० न्यायालय अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अ0एक्स कैडर, ।। औरैया श्री के पी सिंह, एचजेएस द्वारा सत्र परीक्षण सं0-155/2006 में दिनांक 06/10/2012 को आदेश पारित किया गया. मा० न्यायालय के आदेश ने दूध का दूध पानी का पानी कर दिया. मा० न्यायालय के आदेश ने यह पूरी तरह स्थापित और सिद्ध कर दिया कि जो व्यक्ति पिछले छः साल से जेल में निरुद्ध था वह श्री पिच्चु मिश्रा नहीं बल्कि श्री धर्मेन्द्र कुमार तिवारी है. उदहारण के लिए मा० न्यायलय ने अपने आदेश के पृष्ठ 24 के तीसरे प्रस्तर में कहा- “यहीं पर अब प्रश्न यह उठता है कि जो अभियुक्त पुच्ची मिश्रा के नाम से प्रकरण में परीक्षित हो रहा है क्या वह धर्मेन्द्र तिवारी है या पुच्ची मिश्रा है। बचाव पक्ष की ओर से जो भी साक्ष्य प्रस्तुत किये गये हैं उन साक्ष्यों के आधार पर यह साबित है कि अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी है न कि पुच्ची मिश्रा है। अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के तमाम दस्तावेजीय साक्ष्य उसके द्वारा प्रस्तुत भी किया गया है.”

आदेश के पृष्ठ 25 से लगायत पृष्ठ 27 तक कई ऐसे अभिलेखों और गवाहों का उल्लेख किया गया है जो निर्विवादित रूप से स्थापित कर देते हैं कि निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं श्री धर्मेन्द्र थे. उदहारण के लिए मा० न्यायालय ने कहा-“बचाव पक्ष (अभियुक्त पुच्ची मिश्रा) द्वारा अपने को धर्मेन्द्र तिवारी होने के निम्नलिखित दस्तावेजीय साक्ष्य प्रस्तुत किये हैं जिससे उसका नाम पुच्ची मिश्रा नहीं है बल्कि धर्मेन्द्र तिवारी लिखा है। परिवार रजिस्टर प्रदर्श ख-1 को डी0डब्लू0-2 केशव सिंह ने साबित किया है जिसमें परिवार की मुखिया बैकुण्ठी देवी दर्ज है। परिवार रजिस्टर के पेज संख्या-120 से लेकर 121 पर क्रम संख्या-416 पर बैकुण्ठी देवी व उनके बाद प्रेमादेवी, जितेन्द्र कुमार, सुषमा देवी, धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर, सागर पुत्र धर्मेन्द्र कुमार आदि दर्ज है। चन्द्रशेखर के दो लड़के धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार लिखा है। धर्मेन्द्र का उर्फियत में कोई नाम नहीं लिखा है। पुच्ची मिश्रा भी उर्फियत में दर्ज नहीं है। धर्मेन्द्र की पत्नी का उर्फियत में नाम रश्मि दर्ज है। डी0डब्लू0-2 ने यह भी कहा है कि उर्फियत में नाम यदि पुच्ची मिश्रा होता तो अवश्य दर्ज होता। गवाह ने आगे यह भी कहा है कि दौरान पड़ताल मैंने बैकुण्ठी देवी के परिवार के पुरूष सदस्यों के बारे में धर्मेन्द्र व जितेन्द्र के बारे में जानकारी की तो पता चला कि ये ब्राहम्ण जाति के त्रिपाठी लिखते हैं। मिश्रा लिखने की कोई जानकारी नहीं मिली। प्रदर्श ख-1 को अपने हस्तलेख, हस्ताक्षर में बैकुण्ठी देवी के परिवार रजिस्टर को जारी करना साबित किया है। इस परिवार रजिस्टर से भी धर्मेन्द्र का पुच्ची मिश्रा साबित होना नहीं पाया जाता। इसी प्रकार डी0डब्लू0-1 दिवाकर पाण्डेय ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत महेवा थाना बकेबर जिला इटावा ने भी अपनी शहादत में कहा है कि बैकुण्ठी देवी के चन्द्रशेखर लड़के थे जिनके दो लड़के जितेन्द्र व धर्मेन्द्र हैं। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र को पहचानता है। 10-15 दिन वर्ष पूर्व बृजेश मिश्रा का परिवार रहता था, उनके दो लड़के पुच्ची मिश्रा व गुड्डू मिश्रा थे। पुच्ची 12-13 साल का तथा गुड्डू 2-3 वर्ष का रहा होगा। हाजिर अदालत अभियुक्त धर्मेन्द्र तिवारी का नाम पुच्ची मिश्रा नहीं रहा न उन्हें पुच्ची मिश्रा कह कहर पुकारा जाता है। धर्मेन्द्र तिवारी व जितेन्द्र तिवारी का कोई उपनाम भी नहीं है। धर्मेन्द्र के पास ट्रक का व्यापार करते हैं। ग्राम प्रधान होने के नाते उनके व उनके परिवार के बारे में जानता हूं। डी0 डब्लू0-3 अतिबल सिंह रजिस्ट्रार कानूनगो ने भी भारत निर्वाचन आयेाग द्वारा जारी पहचाना पत्र (निर्वाचन कार्ड) नं0-यू0पी0/66/303/402113 प्रदर्श ख-4 एवं एस0डी0ए0म भर्थना द्वारा धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर के नाम दिनांक 01.05.1995 को जारी होना साबित किया है। इसी प्रकार डी0डब्लू-4 लाखन सिंह, वरिष्ठ लिपिक, ए0आर0टी0ओ0 कार्यालय इटावा ने भी एल0एम0वी0 लाइसेंस नंबर-44445 प्रदर्श ख-3 व धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर के नाम दिनांक 14.07.2000 को जारी होना साबित किया व उस पर धर्मेन्द्र कुमार की फोटो लगी होना भी साबित किया है। लाइसेन्स का नवीनीकरण दिनांक 09.05.06 से दिनांक 08.05.09 तक किया जाना व पुनः फोटो धर्मेन्द्र की लगवाना साबित किया है। नवीनीकरण पर तत्कालीन ए0आ0टी0ओ0 श्रीमती रचना यद्वंशी के हस्ताक्षर भी साबित किया। यह भी कहा कि धर्मेन्द्र कुमार की नई फोटो मिलाकर नवीनीकरण किये थे। इसी गवाह द्वारा लाइसेन्स बुक में लगी फोटो को हाजिर अदालत अभियुक्त की फोटो होना तथा गाड़ी पंजीयन रजि0 में गाड़ी नम्बर-यू0पी0 75एफ/8641 का पंजीकरण धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर निवासी महेवा मन्दिर तहसील भर्थना जिला इटावा के नाम होना आर0सी0 फार्म नंबर-23 में पंजीकृत स्वामी धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर व आर0सी0 प्रदर्श ख-5 उक्त ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेखर का होना पंजीयन रजिस्टर प्रदर्श ख-6 पर ट्रक का मालिक धर्मेन्द्र कुमार पुत्र चन्द्रशेख का नाम होना साबित यिा है। इसी प्रकार डी डब्लू0-5 मनोज कुमार अस्थाना निबन्धक लिपिक ने भूमिंख्या-354/2 में से 17 डिस0 का विक्रयनामा /24 भाग क अखिलेश कुमार के पक्ष में दिनांक 01.11.199 तहरीर किया जाना व बैनामे के दस्तावेज पर धर्मेन्द्र कुमार व जितेन्द्र कुमार पुत्रगण चन्द्रशेखर मूल निवासी टकरूपुरा की फोटो लगा होना साबित किया है। फोटो पर जिेन्द्र कुमार व धर्मेन्द्र कुमार के नाम अंकित होना कहा है। का0 सं0-100 ख/10 दस्तावेज की सतय प्रतिलिपि प्रदर्श ख-7 को साबित किया है। दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति आज न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है कहा है। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो धर्मेन्द्र कुमार वाला व्यक्ति न्यायालय में मेरे समक्ष उपस्थित है, का कथन किया। गवाह ने दस्तावेज में लगी फोटो को देख कर अदालत में मौजूद अभियुक्त जो कस्टडी में जेल में लाया गया है, की धर्मेन्द्र कुमार के नाम पर पहचान की ओैर कहा कि मेरे दस्तावेज में धर्मेन्द्र कुमार की फोटो मुल्जिम धर्मेन्द्र से मेल खाती है। इसी प्रकार डी0डब्लू0-6 बाल भ्यासी जिसे अभियोजन के अनुसार घटना स्थल पर वरवक्त घटना मौजूद होना कहा जाता है, ने बयान में पुच्ची मिश्रा निवासी मोहल्ला नरायनपुर जिला औरैया द्वारा गोली चलाना कहा है। धर्मेन्द्र को भी जानता है, कहा है। हाजिर अदालत अभियुक्त की पहचान धर्मेन्द्र तिवारी के रूप में किया और प्रकरण में गोली चलाने वाले व्यक्ति को पुच्ची मिश्रा बताया जिसकी कद काठी धर्मेन्द तिवारी से भिन्न बताया।“

मा० न्यायालय ने स्पष्ट कहा- “जो कार्य अभियोजन द्वारा कार्यवाही शिनाख्त कराना चाहिये था उस कार्य का निर्वहन बचाव पक्ष की ओर से किया गया है, उसकी ओर से तमाम सबूत पेश किये गये हैं जो यह साबित करते ही नहीं बल्कि उससे स्पष्ट रूप से निर्विवाद रूप से यही साबित होता है कि प्रकरण में विचारित तथा कथित पुच्ची मिश्रा, धर्मेन्द्र तिवारी है। यही अभियोजन के चक्षुदर्शी साक्षी बाल भ्यासी जो डी0डब्लू-6 के रूपमें बचाव पक्ष ने परीक्षित कराया है, उसके साक्ष्य से भी साबित होता है।“

मा० न्यायलय ने कहा- “जब इस तथ्य का साक्ष्य अभियोजन ने प्रस्तुत किया है कि पुच्ची मिश्रा ने गोली चलायी थी तब अभियुक्त धर्मेन्द तिवारी नहीं पुच्ची मिश्रा ही है यह साबित करने का भार अभियोजन पर था जबकि अभियोजन के इस दायित्व को बचाव पक्ष द्वारा निर्वहन करते हुए साबित किया गया है कि अदालत में जिसका विचारण हो रहा है व व्यक्ति पुच्ची मिश्रा नहीं धर्मेन्द तिवारी है। धर्मेन्द तिवारी होने का तमाम दस्तावेजी साक्ष्य भी उसकी ओर से दाखिल करके साबित भी किया गया है।“

मा० न्यायलय के उपरोक्त समस्त टिप्पणी इस बात को निर्विवादित रूप से स्थापित करते हैं कि जेल में निरुद्ध व्यक्ति श्री पुच्ची नहीं बल्कि उनके नाम पर श्री धर्मेन्द्र थे. मा० आयोग के समक्ष प्रस्तुत इस वाद/शिकायत का मूल आधार भी मा० अपर जिला एवं सत्र न्यायालय, आर एक्स कैडर-II, औरैया का आदेश दिनांक 06/10/2012 है. उपरोक्त आदेश के आधार पर मा० न्यायलय द्वारा निकले गए निष्कर्ष की पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति पुलिस की गलती (जानबूझ कर अथवा अनजाने) के कारण ही छः वर्ष तक प्रताड़ित हुआ, लगातार जेल में रहा, उसकी पत्नी और बेटा सड़क पर आ गए और उसका पूरा व्यवसाय चौपट हो गया.

श्री धर्मेन्द्र के अनुसार जिस समय वे गिरफ्तार किये गए थे उस समय उनकी उम्र 28-29 वर्ष की थी. वे एकदम युवा थे और उनके अनंत संभावनाएं थीं. उनके मन में काफी कुछ करने की तमन्ना और जज्बा था.उन्होंने हाल में दो नयी गाड़ियां दस पहिया ट्रक ख़रीदा था. उन्होंने महेवा कसबे का जिला पंचायत से तहबाजारी का ठेका भी 3.66 लाख रुपये में लिया था जिससे उन्हें लगभग 6-7 लाख रुपये साल की आमदनी की उम्मीद थी. वे हर माह लगभग 35-40 हज़ार रुपये कमा ले रहे थे. उस समय उनके एक ट्रक की कीमत 14 लाख रुपये थी जिसकी आज के समय कीमत पच्चीस लाख रुपये के आसपास होगी. इस तरह एक युवा आदमी, जिसकी युवा पत्नी और ढाई साल का बच्चा था,  उसे पुलिस ने दूसरा आदमी, जिससे उनका दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं था और न ही कोई लेना-देना था, बना कर उसके घर से फर्जी पकड़ कर हत्या का मुलजिम बना दिया और इसके साथ ही उसका सब कुछ बर्बाद हो गया. श्री धर्मेन्द्र, उसकी पत्नी और बच्चे का तीन लाख का बीमा जस का तस पड़ा रह गया क्योंकि घर में खाने के लाले पड़ गए थे, बीमा कौन जमा करता. आज श्री धर्मेन्द्र का बेटा ग्यारह साल का हो गया है पर पिता के गाइडेंस के बिना वह कक्षा तीन में पढने को मजबूर है. पत्नी भी इस हादसे से पूरी तरह से टूट चुकी है. इस बीच श्री धर्मेन्द्र का महेवा स्थित घर भी गिर गया, पूरा खंडहर हो गया, उसे बनाने वाला कोई नहीं था. आज श्री धर्मेन्द्र के बच्चे उसके कानपुर स्थित भाई श्री जितेन्द्र के घर में रहने को मजबूर हैं जबकि स्वयं श्री धर्मेन्द्र भाई श्री जितेन्द्र के महेवा स्थित घर में रहते हैं और वे स्वयं भी अर्ध-विक्षिप्त अवस्था में न्याय के लिए यहाँ-वहां भटक रहे हैं. इसी दौरान उन्हें कुछ लोगों ने हमारे बारे में भी बताया तो वे यहाँ चल कर आये हैं.

ऊपर लिखी सभी बातों के बाद हमारी दृष्टि में यह मा० आयोग का कर्तव्य हो जाता है कि श्री धर्मेन्द्र और उनके परिवार के साथ पूर्ण न्याय किया जाए. हमारी दृष्टि में इसके कम से कम दो अनिवार्य अंग होने चाहिए-

1. श्री धर्मेन्द्र को पुलिस के गलत कार्यों के कारण होने वाले समस्त कठिनाईयों, परेशानियों, अन्याय, कारावास आदि और उनके परिवार के साथ घटित समस्त दुर्व्यवस्थाओं और दुर्दशा के लिए उन्हें राज्य की ओर समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए. जहां तक हम समझ पा रहे हैं और जहां तक उपरोक्त तथ्य इंगित कर रहे हैं, यह मुआवजा कम से कम पांच करोड़ रुपये होना चाहिए

2. श्री धर्मेन्द्र की इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार समस्त पुलिसकर्मियों के विरुद्ध समस्त आवश्यक विधिक और प्रशासनिक कार्यवाही की जाए

हमें विश्वास है कि मा० न्यायालय के उपरोक्त आदेश के आलोक में मा० आयोग इस प्रकरण की गंभीरता को समझते हुए इसमें तत्परता के साथ सम्पूर्ण न्याय करेगा क्योंकि यह मामला मानवाधिकार उल्लंघन का एक अत्यंत ज्वलंत प्रकरण दिख पड़ता है.

पत्र संख्या-AT/Complaint/86/15                                  
दिनांक- 27/02/2015

डॉ नूतन ठाकुर
अमिताभ ठाकुर)
5/426, विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
94155-34526
amitabhthakurlko@gmail.com

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गौरी हत्याकांड : यूपी पुलिस पर गंभीर मानवाधिकार हनन का आरोप

सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने कल अपने पति अमिताभ ठाकुर के साथ गौरी हत्याकांड के कथित घटनास्थल पर अभियुक्त की बहन डॉली से बातचीत के आधार पर उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग और यूपी के डीजीपी को अभियुक्त के परिवार वालों के मानवाधिकार उल्लंघन के सम्बन्ध में शिकायत की है. डॉली ने इन्हें बताया था कि पुलिस गिरफ़्तारी की रात 12 बजे और फिर 4 बजे सुबह बिना महिला पुलिस के आई थी और उन लोगों ने डॉली सहित महिलाओं से अभद्रता की थी.

यही नहीं वे डॉली और उसकी माँ के एक-एक सूटकेस भी बिना लिखापढ़ी के अपने साथ ले गए जिसमे उनके कपडे और गहने थे. डॉली के अनुसार उनके पास पहनने लायक कपडे तक नहीं हैं और वह लोगों से मांग कर कपडे पहन रही है. इसके अलावा अभियुक्त का मकान भी पुलिस ने बिना कोर्ट के आदेश के पूरी तरह सीलबंद कर दिया है, जिससे उसके परिवार के लोग बाहर रहने को मजबूर हैं. डॉ ठाकुर ने इन्हें गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन बताते हुए तत्काल इन्हें दूर कराये जाने की मांग की है.

Gauri murder- complaint about serious Human Right violation of accused family

After her visit, along with husband Amitabh Thakur, to alleged scene of crime of Gauri murder case, social activist Dr Nutan Thakur has registered a complaint before UP Human Rights Commission and DGP regarding serious human rights violation of accused’s family.

Dolly told them that in the night of arrest, the police came to their house at 12 midnight and again at 4 in the morning without any lady constables and misbehaved with the women in the house. They also took away one suitcase each consisting of their clothes and jewellery, from Dolly and her mother, without presenting a seizure memo. As per Dolly, they do not have clothes to wear and are forced to borrow clothes from others. The police have also sealed the accused house without any legal authority forcing the entire family to seek shelter in others’ house. Calling them serious human rights violation, Dr Thakur has immediate sought appropriate action.

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यूपी के डीजी कमलेन्द्र प्रसाद के खिलाफ गवाही देंगे आईजी अमिताभ ठाकुर

आईजी नागरिक सुरक्षा अमिताभ ठाकुर अपने ही डीजी कमलेन्द्र प्रसाद के खिलाफ मशहूर गीतकार संतोष आनंद के बेटे संकल्प आनंद आत्महत्या मामले में पुलिस के सामने गवाही देंगे. उन्होंने आज प्रमुख सचिव गृह और डीजीपी को पत्र लिख कर इस बात से अवगत कराया है. पत्र में उन्होंने यह कहा है कि श्री प्रसाद के साथ पिछले लगभग डेढ़ माह में काम करते हुए उन्होंने उनकी कार्यप्रणाली में वे सभी बातें देखीं जो संकल्प आनंद ने अपने सुसाइड नोट में कहा था.

श्री प्रसाद नीचे के अफसरों पर दबाव बना कर उनसे आलेख लिखवा कर तमाम निर्णय करते हैं. साथ ही वे अपने काम में इतने अधिक जानकार हैं कि यह असंभव है कि उनकी जानकारी के बिना उनके दफ्तर में कोई भी सही या गलत काम हो जाए और श्री प्रसाद द्वारा उनकी गैरजानकारी में कोई काम हो जाने की बात पूर्णतया अमान्य है. उन्होंने श्री प्रसाद द्वारा नागरिक सुरक्षा में भी अस्थायी नियुक्ति और कंस्ट्रक्शन कार्य कराने का काम शुरू किया, जिनमे उनके द्वारा संकल्प आनंद ने अपने सुसाइड नोट में धन वसूली के आरोप लगाए हैं. इन तथ्यों के आधार पर श्री ठाकुर ने श्री प्रसाद की इस आत्महत्या में भूमिका की गहरी आशंका व्यक्त करते हुए इन तथ्यों को विवेचक के सामने लाने की बात कही है.

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यूपी में जंगलराज : आधी रात दरवाजा तोड़कर घर में घुसी पुलिस ने पत्रकार को हवालात में बंद कर धमकाया

बरेली से खबर है कि मीडियाकर्मी योगेन्द सिंह पर कार सवार बदमाशों ने हमला बोल दिया. इस प्रकरण को लेकर मुकदमा नवम्बर 115 /014 थाना देवरनिया बरेली में दर्ज है. योगेंद्र का आरोप है कि पुलिस ने हमलावरों के साथ मिलकर सांठगांठ कर लिया है. पुलिस मामले के गवाहों को धमका रही है. गवाही करने पर झूठे मुकदमे में फंसाने की बात कह रही है. बाद में पुलिस ने मामले में एफआर लगवा दी. इस मामले के विवेचना अधिकारी सीओ बहेड़ी बनाए गए थे. योगेंद्र ने बताया कि विवेचना अधिकारी के ऑफिस के एक कर्मचारी ने फोन कर जानकारी दी कि डीआईजी ने मुकदमे को विवेचना के दौरान ही खत्म करवा दिया. इस तरह आला अधिकारियों के दबाव में मुकदमे में एफआर लग गई. आरोपियों विनय अग्रवाल उर्फ गुड्डू, डा०पंकज अग्रवाल, मनोज, विनीत अग्रवाल आदि पर कई अलग-अलग थानों व जिलों में निम्न अपराधिक मुकदमे दर्ज हैं…

1- मु०अ०स०887 /० 4 धारा 302 ,201 थाना प्रेम नगर बरेली सर्राफ मधु अग्रवाल हत्या काण्ड के संदिग्ध अभियुक्त है
2-मु०अ०स०384 /14 धारा -147, 354, 323, 504, 506, 342 आईपीसी 3[1] [10] एस सी /एस टी एक्ट थाना बिनावर जनपद बदायूँ के अभियुक्त उक्त लोग है
3 -मु ० अ o स o 439 /o14धारा -147 354 323 354 504 506 आई पी सी 3 [१][१०]एस सी /एस टी एक्ट थाना प्रेम नगर जिला बरेली के अभियुक्त उक्त लोग है
4 -मु o अ o स o 2027 /12 ए o सी o जे o एम o धारा 452 323 504 506 थाना प्रेम नगर बरेली के अभियुक्त उक्तलोग है
5 -मु o अ o स o 115 /14 धारा 323 504 506 342 आई पी सी ३[१][१०]एस ० सी ० /एस टी एक्ट थाना देवरनिया बरेली

योगेंद्र ने बताया कि अभियुक्त विनय कुमार अग्रवाल उर्फ़ गुड्डू ने थाना कोतवाली में एसएसपी बरेली धर्मवीर यादव से मिलकर मेरे और मेरे कैमरा मैन के खिलाफ झूठा आरोप लगाया. इन आरोपों में कहा गया कि हम सभी ने पाँच लाख रुपए रंगदारी माँगी तथा अवैध तमंचा दिखा कर जान से मार देने की धमकी दी. इस फर्जी मुकदमे की पेशबन्दी करते हुए पुलिस ने मीडिया कर्मी के दरवाजे तोड़ कर घर में घुस गए. ये सब रात 12 बजे हुआ. मीडियाकर्मी योगेंद्र की घर की महिलाओं बच्चों को गन्दी गन्दी गालियां दी. दरोगा राजेंद्र यादव सहित दर्जनो पुलिस कर्मियों ने घर का सारा सामान उलट पुलट डाला. मीडिया कर्मी योगेन्द्र को गरियाते हुए गाड़ी में डाल कर पुलिस कर्मी थाने ले गये. विनय अग्रवाल के खिलाफ लिखाये मुकदमे वापस लेने की शर्त पर पुलिस ने मीडिया कर्मी योगेन्द्र को छोड़ा. आधा दर्जन गम्भीर आपराधिक मुक़दमों के अभियुक्त विनय व उसके साथियों को बरेली पुलिस पिछले कई सालों से नहीं पकड़ रही है. लेकिन इस अपराधी द्वारा लिखाये गये झूठे मुक़दमे में मीडियाकर्मी योगेन्द्र को मात्र चंद घंटों में ही गिरफ्तार कर लिया गया और घर के दरवाजे सामान आदि को बरेली पुलिस ने आधी रात को तोड़ कर फेक दिया.

एसएसपी बरेली धर्मवीर यादव खुद को सपा नेता प्रोफ़ेसर राम गोपाल यादव का बहुत करीबी मानते हैं. लेकिन सच्चाई ये है कि इनकी कप्तानी में बरेली में अपराधियों के हौसले बुलंद हैं. मीडियाकर्मी योगेन्द्र का कहना है कि सपा के राज में उनका और उनके परिवार के लोगों की जान खतरे में हैं. अगर उनके या उनके परिजनों का किसी भी तरह का नुकसान होता है तो इसके लिए जिम्मेदार एसएसपी बरेली होंगे. पीड़ित मीडियाकर्मी योगेन्द्र पाल सिंह का मोबाइल नंबर 09410498584 है.

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यूपी में जंगलराज : जौनपुर में पुलिस द्वारा एक युवक की बेरहमी से पिटाई का लाइव वीडियो देखें

पूर्वोत्तर राज्यों के दौरे पर गये देश के प्रधानमंत्री ने अपने सम्बोधन में भले ही फिल्मों में पुलिस की ख़राब छवि दिखाए जाने की बात कही और पुलिस को स्मार्ट बनने के लिए मन्त्र भी दे डाले लेकिन पुलिस सुधरने को कतई तैयार नहीं है. इस वीडियो को देख लीजिए. इसके दृश्य देख कर एक बार सोचने पर मजबूर हो जाएंगे. ये किसी निर्माता निर्देशक द्वारा बनाई गयी फिल्मी सीन नहीं है. ये रीयल वीडियो है. बीच सड़क पर पुलिस के दो जवान एक युवक को डंडे से पीटते हुए ले जा रहे हैं.

देर रात को बीच सड़क पिटाई करती ये पुलिस जौनपुर जिले के नगर कोतवाली की है. इस युवक का क्या अपराध था और पुलिस इसे क्यों पीट रही थी, फिलहाल इस बात का पता नहीं चला सका है. लेकिन जिस वक्त पुलिस इस युवक को बीच सड़क पर पीट रही थी उस वक्त वहा पर सब्बेदारी में शामिल होने गये एक युवक ने अपने कैमरे से पुलिस की इस करतूत को कैद कर लिया. इस मामले पर बोलने से पुलिस के अधिकारी बच रहे हैं.

वीडियो देखने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें…

https://www.youtube.com/watch?v=CpGjvryoI6s

जौनपुर से अजय पांडेय की रिपोर्ट. संपर्क: 9452316004 और 7398532105

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