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सुख-दुख

प्रभाष जोशी अभियानी पत्रकारिता करते थे!

बिपेन्द्र कुमार-

हिंदी पत्रकारिता पर चर्चा होती है तो अक्सर दो नाम साथ-साथ ले लिये जाते हैं-राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी। हालंकि दोनो की पत्रकारिता अलग तरीके की थी।

राजेंद्र माथुर पूरी तरह पत्रकारिता के प्रति समर्पित थे। पत्रकारिता की मर्यादाओं का ख्याल रखते थे। जबकि प्रभाष जोशी अभियानी पत्रकारिता करते थे। इस अभियान में वे कभी पत्रकारिता से छिटक सरकार बनाने-गिराने का हिस्सा बन जाते थे। नेताओं के आगे-पीछे करने में जुट जाते थे। यहां पत्रकारिता का जो नुकसान होता था उसकी भरपाई उनकी शैली या उनके द्वारा गढे देसज व सरल शब्दों को याद कर नहीं की जा सकती।

बहरहाल आज मौका पुण्यतिथि पर राजेंद्र माथुर को याद करने का है। उनकी स्मृति को नमन।

देवप्रिय अवस्थी- आपने सही लिखा. इसकी वजह दोनों की पृष्ठभूमि थी. माथुर साहब अकादमिक पृष्ठभूमि से आए थे और प्रभाष जी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आए थे. मुझे गर्व है कि मैंने दोनों महान संपादकों के साथ दो-दो पारियों में काम किया. दोनों में कौन ज्यादा बड़ा है, यह कहना मेरे लिए मुश्किल है. हालांकि खुद आंदोलन की पृष्ठभूमि से होने के कारण माथुर साहब की तुलना में प्रभाष जी हमेशा ही मेरे दिल के ज्यादा करीब रहे हैं.

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