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‘पब्लिक एप’ में काम करने वाले पब्लिशर हो रहे हैं शोषण के शिकार

मीडिया इंडस्ट्री में लगभग दो साल पहले आए ‘पब्लिक ऐप’ में काम करने वाले पब्लिशर परेशान हैं। वे शोषण के शिकार हैं। भले ही इंडस्ट्री में Inshorts अपने वर्किंग कल्चर को लेकर जाना जाता हो। लेकिन इसी कंपनी के ‘पब्लिक ऐप’ में नवीन शर्मा नाम के ‘जनरल मैनेजर कंटेंट’ पद पर तैनात व्यक्ति ने यहां काम करने वाले पब्लिशर को अपनी हिटलरशाही का शिकार बनाया हुआ है।

कंपनी के भीतर अपने कुछ चेलों और एक सीनियर की बदौलत ऐसा माहौल बना दिया गया है कि यहां काम करने वाला पब्लिशर सोचता रहता है कि कहीं उसके ऊपर गाज न गिरा दी जाए। इस संस्थान में घुसने के बाद आपको कुछ दिन तक अहसास भी नहीं होगा कि अनुशासन के नाम पर दिया जा रहा मीठा जहर एक दिन आपको पूरी तरह घायल कर देगा और अचानक से दूध में गिरी किसी मक्खी की तरह बाहर निकाल कर फेंक दिए जाएगा।

यहां काम कर रहे अधिकतर बच्चे किसी भी शिक्षण संस्थान से बाहर निकलकर अपना पहला जॉब कर रहे हैं, तो उन्हें चीजें समझने में बहुत देर हो जाती है।
सीनियर के द्वारा आपको यहां काम को लेकर मानसिक तौर पर तोड़ा तो जाएगा। लेकिन कभी कोई सामने आकर आपका मनोबल बढ़ाने का प्रयास नहीं करेगा।

9 घंटे की शिफ्ट में यहां आपको इनके मुताबिक काम पूरा करना है तो यकीन मानों, आप अपनी जगह पर कमर तक सीधी तक नहीं कर पाएंगे।

अगर किसी को ये बात झूठ लगे तो जान लें कि 250 वीडियो खबरें यहां एक शिफ्ट में पब्लिश करनी होती हैं। इसमें एक खबर को सुनने और पब्लिश करने में कम से कम 2 मिनट से ऊपर का समय लगेगा। कई बार 2-3-4 मिनट तक के वीडियो भी आपके पास आएंगे। ऐसे में आपको पूरा वीडियो सुनने के लिए ज्यादा समय देना होगा। उस हिसाब से 9 घंटे में 540 मिनट के हिसाब से आप 250 ख़बर 2 मिनट के तहत 500 मिनट से पहले खबरें पब्लिश नहीं हो सकती।

कोई अगर अपनी बात रखने की सोच भी ले तो वो व्यक्ति सोचने से पहले सिस्टम से बाहर हो जाता है।

संस्थान में एंप्लॉय फ्रेंडली HR पॉलिसी बनाई गई है। लेकिन पब्लिशर के खिलाफ जाकर उसी एचआर पॉलिसी का उल्लंघन भी किया जा रहा है। पब्लिशर को ये कह कर डराया जाता है कि दूसरे संस्थानों में बॉस गाली देकर बात करते हैं, मगर यहां इन्होंने अपने बनाए तंत्र में बिना गाली दिए मानसिक तौर पर लोगों को बुरी तरह तोड़ना बहुत बेहतर तरीके से सीख लिया है।

इन तमाम बातों को सार्वजनिक तौर पर लाने का मकसद सिर्फ इतना है कि संस्थान मामले में अंदरूनी जांच बिठाकर सच्चाई जानने की कोशिश करे। एंप्लाइज का यहां इस कदर मानसिक शोषण हो रहा है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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