सैयद मोहम्मद इरफान-
उत्तराखंड के गाँवों से मैदानों की तरफ़ होने वाला पलायन बरसों से चर्चा में है। मैदानी लोग जिन पहाड़ों में सैलानियों की तरह आते जाते हैं उन्होंने इस सच्चाई को कभी नज़दीक से नहीं देखा है कि जिन घरों में ताले लगा कर गए लोग कभी वापस नहीं लौटे उन गावों में इक्का दुक्का लोगों का रहना कितने अनिश्चय और एकाकीपन का दुःख समेटे हुए है।
पत्रकार से फ़िल्मकार बने विनोद कापड़ी ने एक बड़ी महत्वाकांक्षी फ़ीचर फ़िल्म Pyre (चिता) के ज़रिये पहली बार उस दुनिया में हमारी खिड़की खोली है।

फ़िल्म ऐसे ही एक गाँव में रह रहे 85 वर्षीय बूढ़े और उसकी 80 वर्षीय पत्नी की कहानी है जो अपने जर्जर हो रहे घर में रह रहे हैं और जिनके जीने का सहारा कुछ बकरियां और गाय हैं और एक उम्मीद कि 30 साल पहले गाँव छोड़कर बंबई गया उनका बेटा एक दिन लौटेगा। गाँव में मुश्किल से दस और लोग हैं जो उनके देखते देखते गाँव छोड़कर मैदानों में चले जाते हैं। अब सवाल यह है कि बढ़ती उम्र और बीमारी में वे कितने दिन और जियेंगे ? और जब मरेंगे तो उनको चिता कैसे मिलेगी ? बूढ़ा इस अपरिहार्यता को समझता है और जीते जी अपनी और और अपनी पत्नी की चिताएं अपने घर के सामने ही बना लेता है। आपस में सुख दुःख बाँटते हुए और प्राकृतिक आपदाओं के सामने हारते हुए आखिरकार बूढ़ा अपनी चिता पर ही आख़िरी साँसें लेता है जबकि उसकी पत्नी चिता को आग देती है।
अपने अंतिम संवादों में बूढ़ी औरत अपना सहारा बूढ़े हिमालय को बताती है और कहीं भी जाने से इंकार कर देती है।
पूरी फिल्म बहुत ऊंचाई पर उजड़ रहे एक गाँव में ही चलती है। बस एक बार हम नीचे एक अस्पताल की झलक देख पाते हैं जहां बड़ी मुश्किलों से बूढ़ा अपने गाँव के दो नौजवानों की मदद से अपनी बुढ़िया को दिखाने लाया है। जिस घर में बुड्ढे बुढ़िया रहते हैं उसके अंदर की दुनिया के अंधेरों, उजाड़ और अंतहीन इंतज़ार के अलावा बाहर की दुनिया बेहद सुन्दर, नयनाभिराम और सही अर्थों में देवताओं का निवास दिखती है। और यही है जो आपको फिल्म से बांधे रखती है।
उत्तराखंड के प्राकृतिक सौंदर्य को मैंने तो पहले कभी ऐसा नहीं देखा जैसा फिल्म के छायाकार ने इसमें दिखाया है। हरियाली, ऊंचाइयां, गहराइयाँ और आकाश तक पहुँचती पर्वतमालाएं, इंद्रधनुष, पहाड़ी झरने और चट्टानें इतनी कविताओं के सांकेतिक सन्दर्भ पेश करते हैं कि बकरियां और उनके चारागाह चित्रों में बदल जाते हैं।
एक समय ऐसा लगने लगता है कि दृश्यों को रोककर उन्हें फ्रेमों में मढ़ लिया जाए और दीवार पर सजा कर नीचे सोफ़े पर बैठे देवभूमि में होने का गर्व महसूस किया जाए। बेहतरीन वस्त्र विन्यास, मेक अप और आर्ट डायरेक्शन ने कहानी में खुल रही दुनिया को विश्वसनीय बनाए रखा और बुड्ढे बुढ़िया की भूमिका कर रहे स्थानीय (नॉन एक्टर्स) ने चकित कर देने वाले परिणाम दिए। संगीत और साउंड डिज़ाइन बहुत उत्साह से किया गया है जो विषय से उखड़कर चमत्कारों में उलझ गया है।
दुनिया भर के फिल्म फेस्टिवल्स फिल्म का गर्मजोशी से स्वागत कर रहे हैं और लगभग हर डिपार्टमेंट के लिए फिल्म पुरस्कार जीत कर ला रही है।
मुझे तो अशोक दद्दा Ashok Pande ने कहा था इसलिए जाना ही था। उनका नाम परदे पर देखकर खुशी हुई।
विनोद कापड़ी और पूरी टीम को तहे दिल से शुक्रिया। इसलिए भी कि पहाड़ों में शूटिंग के सारे तार एक साथ जोड़ना और वो भी नॉन एक्टर्स के साथ, चुनौती भरा काम है जिसे विनोद कापड़ी ने प्रोफेशनल फिनेस के साथ अंजाम दिया है।
भाई विनोद कापड़ी की फ़िल्म The Pyre देखना एक अनुभव था। पहाड़ों के विस्थापन पर पहले भी बहुत कुछ पढ़ा है। पंकज बिष्ट जी की ‘उस चिड़िया का नाम’ से लेकर हिमांशु जोशी जी की कहानियों तक हर बार पढ़ा और उदास हुआ हूँ। The Pyre स्क्रीन पर चलती कविता है..लंबी उदास कविता। बिना लाउड हुए, बिना मेलोड्रामा के एक ऐसी कविता जो आपके बहुत भीतर उतर कर आत्मा में एक मौन भर देती है। विनोद भाई का इसकी स्क्रीनिंग के लिए आमंत्रण देने के लिए बहुत आभार और आमा-बूबू को सादर पैलाग! -अशोक कुमार पांडेय
फ़िल्म स्क्रीनिंग के बाद की कुछ अन्य प्रमुख टिप्पणियाँ-


