रेल में खेल (2) : बैकडोर से पैसे लेकर पैन्ट्रीकार तक में ठूंसने का जो काम हो रहा है वो किस अच्छे दिन का नमूना है?

Vineet Kumar : स्लीपर की टॉयलेट में 12-14 लोग घुसे हैं… पैंट्री कार में 1500-2000 रुपए लेकर घुसाया जा रहा है…. आप कह सकते हैं कि इतनी भीड़ में क्या व्यवस्था होगी भला? लेकिन जिनकी टिकट बहुत पहले से कन्फर्म है, वो अन्दर तक नहीं जा सके और ट्रेन गुजर गयी? ये सिर्फ भीड़ है फिर इसमें भ्रष्टाचार के भी अंश घुले हैं? मोदी सरकार क्या, इससे पहले की भी सरकार नागरिक सुविधाओं में तेजी से कटौती करती आयी है. लेकिन ये मौजूदा सरकार जो नागरिक को ग्राहक मानती है, उनके बीच प्रशासन नहीं मार्केटिंग के जाल बिछाना चाहती है लेकिन ग्राहकों को चूसने के मामले में धंधेबाजों और कार्पोरेट से भी दो कदम आगे निकल जाए तो उसे आप क्या कहेंगे?

छठ पूजा को लेकर बिहार की ट्रेनों में जो अफरातफरी मची है, लूटखसोट और बैकडोर से पैसे लेकर पैन्ट्रीकार तक में ठूंसने का काम हो रहा है, वो किस अच्छे दिन का नमूना है, ये तो वही बताएंगे जो महसूस करते हैं. लेकिन जिसने जायज तरीके से पैसे देकर टिकट लिए हैं, कन्फर्म टिकट है, वो इस अफरातफरी में बाल-बच्चे सहित प्लेटफॉर्म पर ही रह जाते हैं, उनके लिए सरकार की ओर से क्या जवाब है? क्या रेलवे का काम सिर्फ टिकट कन्फर्म कर देना भर है या फिर सुरक्षित यात्रा की जिम्मेदारी भी लेनी है. तिस पर ये कि कई न्यूज चैनल जो इस सरकार के बनने के पूर्व से ही प्राइवेट दूरदर्शन हो गए हैं, इस पूरे मामले को इस तरह से दिखा रहे हैं कि दर्शक को लगे गलती पैसेंजर की है, पता नहीं क्यों भीड़ बढ़ा रहे हैं या फिर जैसे फोकट में बिना टिकट लिए जा रहे हों.

बात बहुत साफ है अगर आप नागरिक को ग्राहक के हिसाब से देखते हैं तो आपको ग्राहक की शर्तों पर खरा उतरना होगा..अगर बाकी के उत्पाद और सेवा के लिए जागो ग्राहक जागो है तो रेलवे के लिए क्यों नहीं ?

यदि बाकी के उत्पाद और सेवाओं की गड़बड़ी के लिए कन्ज्यूमर फोरम है और जागो ग्राहक जागो है तो फिर भारतीय रेल को लेकर उपभोक्ता यहां क्यों न जाएं ? भारतीय रेल ही क्यों, जब सरकार नागरिक को ग्राहक और प्रशासनिक एवं सेवा संस्थान को दूकान तो फिर उसका निबटारा इस आधार पर क्यों न हो ?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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