‘समाजवादी जंगलराज’ में ट्रेंड यूपी की ‘भयमुक्त’ पुलिस की इस हकीकत को सुनेंगे तो कांप जाएंगे…

Yashwant Singh : महिला दिवस के दिन रामपुर में बस के अंदर महिला से गैंगरेप किया गया. यह खबर आपने टीवी पर और अखबारों में देखी पढ़ी होगी. ये भी पढ़ा देखा होगा कि गैंगरेप के दौरान नवजात बेटा हाथ से गिरा और मर गया. महिला नवजात बच्चे को दवा दिलाने आई थी और गांव लौट रही थी. बस में बैठते ही नशे में डूबे ड्राइवर और कंडक्टर ने कुकर्म अंजाम दिया. जिस बच्चे को दवा दिलाने आई थी, वो पंद्रह दिन की उम्र वाला नवजात इस छीनाझपटी और गैंगरेप में गिरकर जीवन से हाथ धो बैठा.

अब सुनिए आगे की असल कहानी, जो कहीं कहीं छपी है, लेकिन ज्यादातर जगह दबा दी गई है. सोशल मीडिया से गायब है यह प्रकरण. वो लोग जो भाजपा और मोदी से तो लड़ते हैं लेकिन समाजवादियों के जंगलराज पर कुछ बोलने में काठ माफिक हो जाते हैं, इस पूरे प्रकरण से ध्यान हटाए बैठे हैं. महिलाएं और लड़कियां भी इस मसले को लेकर कोई अभियान, कंपेन नहीं चला रहीं. वजह बस ये कि ये जघन्य कांड एक गांव की महिला के साथ हुआ. अगर यही दिल्ली की किसी लड़की या महिला के साथ हुआ होता तो कितना बवाल मचा होता अब तक. चलिए पहले रामपुर कांड में पुलिस की भूमिका के बारे में जान लीजिए.

महिला से गैंगरेप और बच्चे की हत्या मामले में ‘समाजवादी जंगलराज’ की भ्रष्ट पुलिस की सक्रियता देखिए. रात में महिला थाने गई तो थानेदार ने बिना एफआईआर लिखे और बिना मेडिकल कराए उस महिला को घर भेज दिया. एसओ मीडिया से झूठ बोला कि महिला दारू पी रखी थी और थोड़ी बहुत छेड़खानी हुई है. हुआ यूं कि महिला को रोता-बिलखता देख स्थानीय लोग उसकी मदद में जुटे और तुरंत इलाकाई शीशगढ़ थाने खबर की. समाजवादी जंगलराज में ट्रेंड भयमुक्त थानेदार यानि एसओ ने पहले तो दो होमगार्ड मौके पर भेजे, जो महिला को देखकर लौट गए. फिर एक दरोगा आया. उसने मदद करने और आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने की जगह महिला के पति को बुलाकर महिला को उसके साथ भेज दिया.

बाद में जब मीडिया के लोगों ने एसएसपी आरके भारद्वाज को इस जघन्य घटना की गंभीरता के डिटेल बताए तो एसएसपी ने अफसरों को थाने दौड़ाया. तब कहीं कार्रवाई के लिए नवजात के शव के साथ पीड़ित महिला को फिर शीशगढ़ थाने बुलाया गया. कल्पना करिए, अगर मीडिया वाले भी सोए रहते (समाजवादी जंगलराज में मीडियाा भी सत्ता की अफीम चाट कर ज्यादातर सोई ही रहती है) तो पुलिस वाले इस जघन्य कांड को पी गए होते. मालूम है, इस पूरे मामले पर दलित, पिछड़ा, मुस्लिम ताने-बाने में घिरे जातीय व सांप्रदायिक मानसिकता वाले लोग यूपी की अखिलेश सरकार के खिलाफ न शेम शेम के नारे लिखेंगे और न कोई अभियान चलाएंगे. हम लोग जब गलत को गलत कहना बंद कर सिर्फ अपने स्वार्थ के हिसाब से अच्छा बुरा कहते लिखते हैं तो ये खतरनाक स्थिति होती है.

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भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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