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उत्तर प्रदेश

जिन सब्जियों का यह पीक सीज़न है, उनका भी दाम आसमान पर, जियो रजा हुक्मरानों… खूब लूटो!

Dayanand Pandey :  हरी मटर पचास रुपए किलो, टमाटर चालीस रुपए किलो, गोभी तीस रुपए पीस, पत्ता गोभी बीस रुपए, पालक चालीस रुपए किलो, बथुआ चालीस रुपए किलो, चना साग अस्सी रुपए किलो। इन सब्जियों का यह पीक सीज़न है। फिर लहसुन दो सौ रुपए किलो। फल और दाल तेल तो अय्यासी थी ही, अब लौकी, पालक आदि भी खाना अय्यासी हो गई है। जियो रजा हुक्मरानों! ख़ूब जियो और ख़ूब लूटो! दूधो नहाओ, पूतो फलो! यहां तो किसी संयुक्त परिवार में रोज के शाम के नाश्ते में मटर की घुघरी और भोजन में निमोना नोहर हो गया है। हम लखनऊ में रहते हैं। यहीं का भाव बता रहे हैं। अब कोई मुफ़्त में ही खा रहा है या कम भाव में, तो खाए। अपनी बला से। हमें क्या?

Dayanand Pandey :  हरी मटर पचास रुपए किलो, टमाटर चालीस रुपए किलो, गोभी तीस रुपए पीस, पत्ता गोभी बीस रुपए, पालक चालीस रुपए किलो, बथुआ चालीस रुपए किलो, चना साग अस्सी रुपए किलो। इन सब्जियों का यह पीक सीज़न है। फिर लहसुन दो सौ रुपए किलो। फल और दाल तेल तो अय्यासी थी ही, अब लौकी, पालक आदि भी खाना अय्यासी हो गई है। जियो रजा हुक्मरानों! ख़ूब जियो और ख़ूब लूटो! दूधो नहाओ, पूतो फलो! यहां तो किसी संयुक्त परिवार में रोज के शाम के नाश्ते में मटर की घुघरी और भोजन में निमोना नोहर हो गया है। हम लखनऊ में रहते हैं। यहीं का भाव बता रहे हैं। अब कोई मुफ़्त में ही खा रहा है या कम भाव में, तो खाए। अपनी बला से। हमें क्या?

अब इन मूर्ख शिरोमणियों का भी क्या करें जो समझते हैं कि फल, सब्जी और अनाज मंहगा होता है तो बढ़ा पैसा किसान की जेब में जाता है। मूर्खों, नासमझो यह किसान तो सर्वदा कंगाल रहता है। अनाज या सब्जी एक हज़ार रुपए किलो भी बिके तो भी उसे उस की लागत मिलनी मुहाल है। यह सारी मंहगाई और उस का मज़ा बिचौलिए, अफ़सर और सत्तानशीं उठाते हैं। शरद पावर जैसे कृषि माफ़िया उठाते हैं। वायदा कारोबार के कारोबारी उठाते हैं।

आप की समझ में यह सीधी सी बात क्यों नहीं आती कि आलू हो, टमाटर हो या गेहूं, चावल पूरे देश में एक भाव कैसे बिकने लगा है? क्या यह बाटा का जूता है कि वुडलैंड का जैकेट कि रेमंड का कपड़ा कि कोई दवा या फ्रिज टी वी या कार, स्कूटर कि पूरे देश में एक एमआरपी लागू है? मूर्खों किसान और नागरिक सभी बेभाव लुट रहे हैं। लूटने वाले लुटेरे मुट्ठी भर ही हैं। दिमाग का जाला साफ करो मूर्खों। किसान तो ख़ुद मंहगाई की आग में झुलसता रहता है, वह भला क्या किसी को मंहगाई में झुलसाएगा।

वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार दयानंद पांडेय के फेसबुक वॉल से.

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