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संदीप ने जिस तरीके से हत्या किए जाने की आशंका जताई थी, वैसे ही उन्हें मारा गया, पढ़िए पत्र

भिंड में रेत माफिया और पुलिस के गठजोड़ का स्टिंग करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा ने अपनी जिस किस्म की हत्या किए जाने की आशंका जताई थी, उनकी हत्या वैसे ही कर दी गई. पुलिस प्रशासन और शासन से उनका गुहार लगाना, पत्र लिखना सब बेकार गया.

भिंड में रेत माफिया और पुलिस के गठजोड़ का स्टिंग करने वाले पत्रकार संदीप शर्मा ने अपनी जिस किस्म की हत्या किए जाने की आशंका जताई थी, उनकी हत्या वैसे ही कर दी गई. पुलिस प्रशासन और शासन से उनका गुहार लगाना, पत्र लिखना सब बेकार गया.

रेत मफिया द्वारा भेजे गए एक ट्रक ने रांग साइड जाकर बाइक से जा रहे संदीप को कुचल कर मार डाला. पढ़िए वो पत्र जो संदीप ने शासन-प्रशासन को भेजा था और एक्सीडेंट कराकर हत्या करा दिए जाने की आशंका जताई थी….

संदीप शर्मा की जघन्य हत्या पर ग्वालिय के पत्रकार Arpan Raut फेसबुक पर लिखते हैं :

एक पत्रकार को मरना ही चाहिए! पत्रकार एक ऐसा जीव है जो दूसरों के लिए आजीवन संघर्ष करता है। उसकी सामाजिक बुराइयाँ व भलाइयाँ कभी व्यक्तिगत नही होती। बस अख़बार मे १२ पॉइंट बोल्ड की बायलाइन स्टोरी और चैनल पर एक्सक्लूसिव ब्रेकिंग उसका धर्म है। जबकि उसका जब अंत होता है तो वह नितांत अकेला होता है। जिनके लिए वह ख़बरें लिखता, गढ़ता और बुनता है वो कभी पलटकर साथ नही देते। जिस अख़बार व चैनल के लिए वह अपना पूरा जीवन दे देता है वह भी बुरे समय में पहचान तक नही दिखाते। मसला भिंड में पत्रकार संदीप शर्मा से जोड़कर कह रहा हूँ।

अंचल का खनन माफ़िया इतना क़द्दावर है कि वह पत्रकार से पहले एक आईपीएस समेत कई पुलिस वालों को भी खा चुका है। रूपये की पंजीरी जब बँटती है तो फिर पुलिस मरे या पत्रकार जवाबदार और नज़दीकी भी दोमुँहे साँप बन जाते है। एक मुँह से माल खाते है दूसरे से उपवास रखते है। हैरानी तब हुई है कि संदीप केवल कांग्रेस , आम आदमी या वामियो और कला क्षेत्र से जुड़ा पत्रकार नही था।

कल शहर के बुध्दीजीवी वर्ग के आव्हान पर सत्ता से जुड़ा एक व्यक्ति दुख जताने नही आया, और ना ही हाइ फाइ क्लब वाले आंटी अंकल जो फोटो खिंचाकर खुदको सबसे बड़ा समाजसेवी होने का स्वाँग रचते है। विपक्ष का आना लाज़िमी है कि वह सत्ता का विरोध करना चाहता है। उनके आने का आशय यह तो नही कि मरने वाला पत्रकार सत्ता की विरोधी था ! वह सत्ता का नही वरन भ्रष्टाचार व अव्यवस्था का विरोधी था। खैर, आज सुबह हम हकीकत में इन सभी को कोसने का नैतिक हक़ भी खो चुके है। दरअसल कल के विरोध प्रदर्शन में केवल एक समाचार पत्र ने ही जगह दी। बाकी सब बड़े ही बेशर्मी से नज़रअंदाज़ कर गये। यक़ीन मानिये एक पत्रकार की हत्या का विरोध मीडिया हाउस ही बेशर्मी से अनदेखा करने लगे तो उसे मर ही जाना चाहिए।

मूल खबर :

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