
संजय कुमार सिंह
अब यह बताने का कोई मतलब नहीं है कि मेरे आठ अखबारों में ज्यादातर अक्सर सरकार की प्रशंसा करने वाली खबरों को तूल देते हैं, सवाल नहीं उठाते और इसी तरह सरकार विरोधियों के खिलाफ खबरों को पूरा प्रचार देते हैं। स्थिति यह है कि कल दिल्ली में आये भयंकर तूफान की खबर हो या नहीं, कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ ईडी के आरोप की खबर जरूर है। सबसे छोटी खबर द हिन्दू में है। नवोदय टाइम्स में लीड तो मौसम की खबर है लेकिन ईडी बोली (हिन्दी में पुलिस तो स्त्रीलिंग है पर ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय भी स्त्रीलिंग है?), सोनिया गांधी-राहुल गांधी ने अपराध से कमाये 142 करोड़ रुपये। कहने की जरूरत नहीं है कि अपराध से कमाये तो 10 साल से मोदी सरकार क्या कर रही थी? जब इतना समय लगा ही दिया है तो क्या अपराध से कमाया हुआ धन बरामद हुआ है या उसके निवेश की कोई नई जानकारी मिली है? कोई संपत्ति खरीदी गई है? जाहिर है ऐसा कुछ होता तो यही खबर होती। ईडी बोली, क्योंकि उससे बोलने के लिए कहा गया है। जांच में समय लगता है लेकिन 10 साल सत्ता में रहते हुए अपने प्रतिद्वंद्वी को भ्रष्ट बताने वाले आरोप में कुछ दम तो होना ही चाहिये। खासकर तब जब पप्पू साबित करने पर करोड़ों फूंकने के बाद हासिल कुछ नहीं हुआ है। ऐसे में अखबार का यह शीर्षक लापरवाह और अवमानना वाला है। ईडी का रिकार्ड ऐसा नहीं है कि उसकी बात मान ली जाये।
अमर उजाला में इस खबर का शीर्षक है, सोनिया-राहुल ने किराये से अर्जित की 142 करोड़ की आपराधिक आय। अखबार ने लिखा है कि यह दावा प्रथमदृष्टया मनी लांडरिंग का मामला बनता है। आप जानते हैं कि धन बरामदगी के बिना आम आदमी पार्टी के नेता को लंबे समय तक जेल में रखा गया और इतना बदनाम किया गया कि पार्टी दिल्ली की सत्ता से बेदखल हो गई। अब राहुल गांधी को भी ऐसे ही फंसाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन यह आय अगर घोषित नहीं है, तो चुनाव लड़ने के लिए दाखिल शपथपत्र में नहीं होगी और आय आपराधिक है तो भी नहीं होगी – क्यों नहीं गलत जानकारी देने का मामला चलाया जाता है। ईडी के आरोपों के खिलाफ खबर छपवा कर माहौल बनाने का क्या मतलब है। लेकिन यहां मुद्दा यह है कि गलत शपथपत्र दाखिल करने में राहुल गांधी और सोनिया गांधी के खिलाफ होगी तो और लोगों के खिलाफ करनी होगी जिनमें प्रधानमंत्री भी हैं। इसलिए जो कमाई हुई नहीं या गलत नहीं है या घोषित है उसके आधार पर बदनाम करने का काम किया जा रहा है। ऐसा नहीं है कि पहले यह सब नहीं होता था लेकिन मोदी सरकार तो ना खाउंगा ना खाने दूंगा के वादे पर सत्ता में आई थी। खबर छपवाने से अलग ठोस कार्रवाई वाला तरीका क्यों नहीं अपनाती है। यह सब तब जब दिल्ली में आंधी बारिश से कल सात लोगों की मौत की खबर है। आज खबर यह होनी चाहिये थी कि कल लोगों को इससे क्या परेशानी हुई और राहत व बचाव के लिए सरकार ने क्या किया और क्या कर रही है। या नहीं किया। खासकर, दिल्ली में ट्रिप इंजन सरकार से क्या बदला या कुछ नहीं बदला।
हिन्दुस्तान अखबार ने तूफान की खबर को लीड बनाया है और सात कॉलम का शीर्षक है तूफानी हवाओं ने मचाया तांडव। इस खबर के साथ इंडिगो के एक विमान की तस्वीर है (और भी अखबारों में है) बताया गया है कि ओले से विमान का अगला हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और श्रीनगर में आपात लैंडिंग कराई गई। नेशनल हेराल्ड का मामला यहां सिंगल कॉलम में है और शीर्षक है रोज होगी सुनवाई। हिन्दुस्तान टाइम्स में तूफान से दो लोगों के मरने की खबर है (पुराना एडिशन हो सकता है) लेकिन सरकार की प्रशंसा या ऑपरेशन सिन्दूर की सार्थकता बताने वाली एक खबर लीड है जिसका शीर्षक है, ऑपरेशन सिन्दूर के दौरान 3000 अग्निवीरों ने परीक्षण पास किया। यह सब तब जब कहा जाता रहा है कि सिर्फ आतंकी ठिकाने पर हमला किया गया था और पाकिस्तान ने युद्ध को बढ़ा दिया। सरकार होर्डिंग लगाकर और रेल टिकट पर विज्ञापन छपवा कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रही है लेकिन राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने पार्टी के धन से लाभ उठा लिया तो प्रचार शुरू है जबकि मामला साबित नहीं हुआ है। इसी तरह भाजपा राज्यों में पुलिस कार्रवाई नहीं हो और हाल में मध्य प्रदेश के मंत्री के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो खबर नहीं छपी लेकिन पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में लक्षित हमलों के दौरान पुलिस निष्क्रिय, गैर हाजिर थी तो उसकी खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया समेत दूसरे अखबारों में तीन कॉलम में है।
ऐसे में आज अशोका विश्वविद्याल के प्रोफेसर को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने की खबर तो सब जगह है लेकिन इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक खास है। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, अशोका के प्रोफेसर को सर्वोच्च अदालत से अंतरिम जमानत और गैग ऑर्डर मिला। खबर का इंट्रो है, एफआईआर पर कोई स्टे नहीं, तीन सदस्यों की विशेष जांच टीम उनकी पोस्ट जांच करेगी। बेशक, यह फैसले की यह खास बात है और खबर में इसे रेखांकित किया जाना चाहिये था। इंडियन एक्सप्रेस ने भी ऐसा किया है। अमर उजाला का शीर्षक है, अली खान को मिली अंतरिम जमानत, जांच पर रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पोस्ट में इस्तेमाल शब्दों के लिए लगाई फटकार। ज्यादातर अखबार न तो मंत्री और समर्थकों-प्रचारकों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होने की खबर छापते हैं दूसरी सरकार के पक्ष में किसी नागरिक के साथ अन्याय भी हुआ हो तो बताने की जरूरत नहीं समझते हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली दंगों की साजिश के आरोपी उमर खालिद को अभी तक जमानत नहीं मिली है। विशेष स्थितियों में एक बार मिली तो तमाम शर्तों के साथ। इस मामले में काफी कुछ हो चुका है पर खबरें उस हिसाब से नहीं छपी हैं। सरकारी एजेंसी अगर नेशनल हेराल्ड मामले में कई साल बाद काम कर रही है तो उमर खालिद के मामले की की जांच कब होगी कोई नहीं जानता जनहित में मीडिया को चाहिये कि वह रोज पहले पन्ने पर जनता को याद दिलाये कि राहुल गांधी के मामले की जांच अब हो रही है और उमर खालिद की अब भी नहीं हो रही है।
द टेलीग्राफ ने प्रो अली खान महमूदाबाद को जमानत मिलने की खबर को लीड बनाया है। शीर्षक है, प्रो को जमानत मिली पर जांच जारी रहेगी। आप जानते हैं कि अंग्रेजी में की गई पोस्ट के खिलाफ कार्रवाई हिन्दी में हो रही है। यही नहीं ऑपरेशन सिन्दूर अगर जरूरी और जायज भी था तो नाम चुनावी लाभ लेने वाला है और सरकार इसमें कोई कसर नहीं छोड़ रही है। इस मामले भी मुस्लिम प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई चल रही है जबकि भाजपा के मंत्री ने देश की बेटी और सेना के अफसर का अपमान किया है। जो बोले वह हिन्दी में है। माफी को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूर नहीं किया है और जांच चल रही है, गिरफ्तारी नहीं हुई है। इधर गिरफ्तारी हुई, जमानत मिली पर जांच भी चलेगी। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने उनकी पोस्ट को डॉग विसलिंग कहा है। मोटे तौर पर इसका मतलब खास लोगों को संदेश देना होता है। जो भी हो, हम जानते हैं कि प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार में मंगल सूत्र छीन लेने की बात कर चुके हैं और अब ऑपरेशन सिन्दूर ‘चला’ रहे है। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ के साथ बृजभूषण शरण सिंह और चिन्मयानंद को संरक्षण से जब बात नहीं बनी तो महिला आरक्षण और महिलाओं को प्रभावित करने के लिए क्या सब नहीं हुआ है और उससे महिलाओं को क्या लाभ मिला है उसकी चर्चा कोई नहीं करता। आप जानते हैं कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जीतने पर महिलाओं को 2500 रुपये देने की गारंटी दी थी। वादा चुनाव के तुरंत बाद से भुगतान शुरू होने का था लेकिन नहीं हो पाया। आज ढूंढ़ने पर जो खबरें मिलीं वो 20 मार्च तक की हैं और इनसे वादा पूरा होने की खबर नहीं मिलती है। आजतक की 20 मार्च की खबर का शीर्षक है, ‘दिल्ली की महिलाओं को कबसे मिलेंगे ₹2500?’ आतिशी ने बीजेपी और रेखा गुप्ता सरकार से पूछे चार सवाल। आप जानते हैं कि विपक्ष सरकारों की ऐसी योजना को नरेन्द्र मोदी रेवड़ी बांटना कहते हैं। इसका विरोध भी किया है। यही नहीं, राहुल गांधी की घोषणा के बावजूद कांग्रेस सत्ता में नहीं आई तो भी भाजपा के लोग पैसे मांग रहे थे। खबरें छप रही थीं अब भी छपती हैं। दिल्ली में लोगों को कर्नाटक का पुराना मामला याद है पर दिल्ली का ताजा नहीं। मीडिया के ऐसे पक्षपाती रुख के बावजूद देश में निष्पक्ष चुनाव हो रहे हैं यह मानना भी आश्चर्य है।
भाजपा दिल्ली में चुनावी वादा पूरा न करे तो शांति है लेकिन राहुल गांधी ने कहा था कि उनकी सरकार आयेगी तो खटाखट पैस मिलेंगे। चुनाव के बाद राहुल की सरकार नहीं आई और उस वादे का कोई मतलब नहीं था। लेकिन लोग राहुल गांधी को याद दिलाने से या पैसे मांगने पहुंच चुके हैं। जाहिर है इनमें सरकार से सहायता मांगने वाले नहीं होते हैं बल्कि जो होते हैं वे विरोधी होते हैं। इनकी खबरें भी ज्यादा छपती हैं।



