सुभाष सिंह सुमन-
अर्थव्यवस्था में मंदी आए न आए, शेयर मार्केट में मंदी लगभग तय लग रही है. अर्थव्यवस्था में मंदी का मतलब है लगातार दो तिमाही में वृद्धि दर शून्य से नीचे रहे. मार्केट में मंदी का मतलब है हालिया उच्च स्तर से 20% टूट जाए. जैसे अभी निफ्टी गिरकर 21 हजार से नीचे आए, तो कहेंगे बाजार मंदी में गया.
भारत के लिए अर्थव्यवस्था में मंदी बहुत दूर की कौड़ी है. मौजूदा स्थिति में गारंटी के साथ कहा जा सकता है- भारत में आर्थिक मंदी नहीं आएगी. लेकिन अमेरिका में आएगी. अगर टैरिफ पर इसी तरह तनातनी रही तो निश्चित आएगी. और जब अमेरिका में आर्थिक मंदी आएगी, भारत पर भी असर होगा. भारत में असर अर्थव्यवस्था पर कम, शेयर बाजार पर बहुत होगा.
2008 की मंदी में भारतीय अर्थव्यवस्था पर जो असर हुआ था, उसमें सिर्फ एक तिमाही के लिए वृद्धि दर 6% से नीचे गई थी, लेकिन शेयर बाजार अपने पीक से 60% गिरा था. अभी लगभग उसी तरह के हालात बन रहे हैं.
2 अप्रैल से पहले तक स्थिति कोविड वाली थी और मजबूत रिकवरी आने भी लगी थी. अब स्थिति 2008 वाली लग रही है. कम से कम मुझे अब बाजार से अगले 6-8 महीने उम्मीद नहीं है, बशर्ते टैरिफ के मामले में कुछ अच्छा बदलाव न हो. इसकी उम्मीद कम है. ट्रंप सनके हुए हैं. वो किसी की सुनेंगे नहीं. आदमी ईगो पर चल रहा है.
चीन के पास झुकने का कोई कारण नहीं है. चीन अभी वैश्विक व्यवस्था के परिवर्तन के दौर में लगभग उसी भूमिका में है, जिसमें 100 साल पहले अमेरिका था. तब शक्ति का केंद्र यूरोप से अमेरिका शिफ्ट हुआ था. अब अमेरिका से एशिया में शिफ्ट होने की बारी है. इस मारामारी में अमेरिका की बर्बादी तय लग रही है. चीन कितना नुकसान झेल सकता है, इसका अनुमान सही से लगाया नहीं जा सकता. चीन जितना खुला है, उससे ज्यादा बंद है. उसकी सबसे बड़ी ताकत है वहां लोकतंत्र नहीं है और यही सबसे बड़ी कमजोरी भी है.
टैरिफ से ज्यादा मनोरंजक खेल कहीं और हो रहा है. चीन के केंद्रीय बैंक ने अपने यहां के सभी सरकारी बैंकों को डॉलर खरीदने से मना किया है. इसके चलते अमेरिकी केंद्रीय बैंक को रेट बढ़ाना पड़ेगा. लेकिन ट्रंप फेडरल रिजर्व पर चढ़े हुए हैं कि रेट कम करो. चीन के पास 760 अरब डॉलर का अमेरिकी बॉन्ड है. बॉन्ड मार्केट बता रहा है कि चीन इसे डंप करने लगा है. जितना चीन डंप करेगा, बॉन्ड की यील्ड बढ़ेगी. बॉन्ड की यील्ड बढ़ने का मतलब है उसपर ज्यादा ब्याज देना होगा. ब्याज भरना है अमेरिका को. मतलब उसके कर्जे मंहगे हो जाएंगे. अमेरिका के लिए पैसा जुटाना मुश्किल हो जाएगा. तो यहां बहुत दिलचस्प खेल होने वाला है और चीन के पास अपर हैंड है.
भारत की स्थिति सबसे मजेदार है. मैं अभी तक मोदीजी पर भड़का हुआ था. कारण भावनात्मक अधिक थे. मुझे निजी तौर पर अमेरिका के सामने भारत का आत्मसमर्पण वाला रवैया पसंद नहीं आ रहा था. अभी तक मुझे इसके लिए तार्किक कारण नहीं मिल रहे थे. अब मैं थोड़ी साफ तस्वीर देख पा रहा हूं. अभी जो हालात बने हैं, यहां पर अगर अमेरिका के साथ भारत जीरो टैरिफ डील कर ले, मजा ही आ जाए. इसके ऊपर से सरकार एक और मिनी बजट ले आए. लगभग हर साल लाती ही है. फिर होगा क्या कि वैश्विक शक्ति का केंद्र, जिसे अमेरिका से अब एशिया में शिफ्ट होना है, उसका ज्यादा से ज्यादा हिस्सा चीन की जगह भारत की तरफ आएगा.
(ये सब कयास हैं. असल में क्या होगा, मैं क्या, कोई नहीं जानता.)


