शोभना भरतिया ने कोई कार्यवाही न की तो हिंदुस्तान के पत्रकार ने पत्र किया सार्वजनिक, आप भी पढ़ें

मैंने एचएमवीएल की मुखिया और बिड़ला जी की उत्तराधिकारी श्रीमती शोभना भरतिया को यह रजिस्ट्री से भेजा गया पत्र और ई-मेल है। पत्र इस भरोसे से लिखा कि वह अपने प्रबंधतंत्र पर नकेल कसेंगी। लेकिन शोभना भरतिया भी अपने तंत्र के चंगुल में हैं और सभी अत्याचार और अनाचार को मौन सहमति दे रखा है। मैंने उन्हें तय समय देते हुये कहा था कि अगर उस अवधि में ठोस एक्शन नहीं हुआ तो मैं पत्र सार्वजनिक करने के लिये बाध्य होउंगा।

वायदे के मुताबिक पत्र सार्वजनिक कर रहा हूं, आप सभी पढ़ें। “हिन्दुस्तान” अखबार प्रबन्धन के अत्याचार की कहानी। टार्गेट पर मैं भी हूं। कभी भी मेरे खिलाफ झूठे मुकदमे, जेल भिजवाने की साजिश, संदिग्ध तरीके से हत्या और वाहन दुर्घटना के जरिये मेरी हत्या का प्रयास हो सकता है। हालांकि मुझ पर राहु ग्रह की छाया है और ये लोग मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। इनके सारे प्रयास विफल होंगे और जीत मेरी ही होगी।

-वेद प्रकाश पाठक, पूर्व वरिष्ठ संवाददाता, हिंदुस्तान गोरखपुर यूनिट, उत्तर प्रदेश


ये है पूरा पत्र…

आदरणीय शोभना मैडम,

हमारे पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश में) जब भी किसी के उदारता या दानशीलता का उदाहरण देना होता है तो एक लोकोक्ति प्रचलित है। वह कुछ इस प्रकार है-‘‘टाटा बिरला भईल बाटा का’’ यानी आप टाटा या बिड़ला हैं क्या? यह आपका सौभाग्य है कि आप उस बिड़ला खानदान की वंशज हैं। रुपये-पैसे में अंबानी परिवार बहुत आगे है लेकिन कोई अंबानी परिवार को उस सम्मान के साथ नहीं बुलाता है जिस सम्मान के साथ बिड़ला खानदान को याद किया जाता है।

बिड़ला परिवार से जुड़े हिन्दुस्तान टाइम्स और हिन्दुस्तान हिन्दी अखबार के कंपनी का चेयरपर्सन होने का गौरव भी  आपको हासिल है। इन कंपनियों का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। सरकार की तरफ कभी भी किसी वेज बोर्ड की सिफारिश आई तो उसे सबसे आगे बढ़कर लागू करने का काम आपकी कंपनी और बिड़ला परिवार ने किया। मुझे लगता है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आपका प्रबंधतंत्र आपको सही सलाह नहीं दे रहा है या फिर गुमराह कर रहा है। ऐसा करके प्रबंधतंत्र के लोग न केवल आपकी, आपके कंपनी की बल्कि बिड़ला जी के सम्मानित नाम को धक्का पहुंचा रहे हैं। ऐसा वे इसलिये कर रहे हैं क्योंकि समूह की कुल बंटने वाली तनख्वाह में से आधे पर उनका एकाधिकार है। इन हालात में आपको पत्र लिखने की जरूरत महसूस हुई लिहाजा लिख रहा हूं।

मैडम, मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अखबारकर्मियों के हित में स्पष्ट फैसला दे रखा है। उसको लागू न करना सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना है और अपने ही कर्मचारियों के हक पर डांका डालने जैसा है। उससे भी ज्यादा गंदा काम यह है कि वेज बोर्ड के हिसाब से सैलरी मांगने पर कर्मचारियों को तरह-तरह से उत्पीड़ित करना। आपके प्रबंधतंत्र के लोग कर्मचारियों को वेज बोर्ड से वंचित रखने के लिए निम्नतम स्तर पर आ चुके हैं और आपके सम्मानित बिड़ला परिवार की साख खराब कर रहे हैं। ऐसे कई वाकये हैं लेकिन कुछ चुनिंदा मामलों का जिक्र कर रहा हूं।

सबसे चर्चित मामला लखनऊ के हिन्दुस्तान हिन्दी अखबार का है। वहां 13 कर्मचारियों ने मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने के लिए लेबर डिपार्टमेंट में प्रार्थना पत्र दिया। आपके एचआर हेड राकेश गौतम फौरन लखनऊ पहुंच गए। वहां के सम्पादक केके उपाध्याय और राकेश गौतम ने कर्मचारियों को प्रेशर में लिया। 8 कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए डंटे रहे। उन्हें कैंपस से बाहर करवा दिया गया और गेट पर उनकी फोटो लगाकर एंट्री बैन कर दी गई। इन 8 में शामिल एक चीफ रिपोर्टर आलोक उपाध्याय के खिलाफ संस्थान की एक महिला कर्मचारी से यूपी की महिला हेल्पलाइन 1090 पर छेड़खानी की शिकायत करवाई गई और संस्थान के भीतर विशाखा कमेटी की जांच बिठा दी गई। आलोक पर दबाव बनाया जा रहा है कि अगर उन्होंने मजीठिया का क्लेम वापस नहीं लिया तो कमेटी के रिपोर्ट के आधार पर उनकी नौकरी भी जाएगी और उन्हें जेल भी जाना पड़ेगा। आप चाहें तो इस घटिया स्तर के कार्य की खुद के स्तर से जांच करा लें। अगर आलोक दोषी हैं तो उन्हें जेल जाना चाहिए लेकिन अगर निर्दोष हैं तो उन लोगों पर कार्रवाई करिये जो लोग इतने घटिया स्तर के प्रबंधन में शामिल होकर आपकी, आपके कंपनी और बिड़ला जी के सम्मान को धूल में मिला रहे हैं।

अब बात अपनी करता हूं। 6 सितम्बर 2010 को मैंने एचएमवीएल गोरखपुर यूनिट ज्वाइन किया। नितान्त कम तनख्वाह पर मुझे इस प्रकार से उत्पीड़ित किया गया कि छह महीने की नौकरी में लीवर, हाई बीपी की बीमारी हो गई। दो साल बाद तक अस्थमा के भी चपेट में आ गया। मेरी लास्ट डेजिगनेशन सीनियर स्टाफ रिपोर्टर की थी। स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत बढ़ने पर 31 दिसम्बर 2012 को मैंने स्थानीय सम्पादक से डेस्क पर काम करने का अनुरोध किया। फौरन मुझे डराकर इस्तीफे की नोटिस लिखवा ली गई। नोटिस पीरियड 28 फरवरी 2013 तक के लिए थी और मुझे 10 जनवरी 2013 को ही रीलिव कर दिया गया। बड़ी मिन्नतें करने पर सिर्फ 10 दिन की तनख्वाह 29 अप्रैल 2013 को मुझे मिल पाई। मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अंतरिम राहत राशि और एरियर आज तक न मिल पाया। पिछले साल 18 फरवरी 2015 को एचआर हेड और प्रधान संपादक को रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजकर मैंने मजीठिया वेज बोर्ड का क्लेम और नौकरी वापसी की मांग की थी। पूर्व सम्मानित कर्मचारी से प्रबंधतंत्र से जुड़े लोगों ने कोई संवाद नहीं किया। विवश होकर मैंने भी उपश्रमायुक्त कार्यालय गोरखपुर में हाल ही में शिकायत दर्ज कराई है। मुझे भी प्रबंधतंत्र के लोगों से खतरा महसूस हो रहा है। ये लोग अखबारी शक्तियों का दुरूपयोग कर मुझे फर्जी मामले में फंसाने से लेकर जान से मरवाने तक का काम कर सकते हैं। ऐसा हुआ तब भी आपके सम्मानित परिवार की ही छवि खराब होगी।

आप एक गौरवशाली परंपरा को निभाने वाले परिवार की बेटी हैं। हमारी मुखिया हैं। लिहाजा यह पत्र आपको इस भावना के साथ भेज रहा हूं कि सबसे पहले प्रबंधतंत्र से जुड़े ऐसे लोगों पर नकेल कसी जाए जो आपको व आपके परिवार को कलंकित कर रहे हैं। मजीठिया वेज बोर्ड को लागू किया जाए। सभी कर्मचारियों का उत्पीड़न बंद हो और मेरे साथ भी सम्मानित व्यवहार करते हुए गोरखपुर यूनिट में मुझे वापस लिया जाए। अगर मुझ बीमार आदमी को आपकी कंपनी नहीं ढोना चाहती तो कम से कम 58 लाख का एकमुश्त मुआवजा, एरियर व अंतरिम राहत राशि का मुझे लाभ दिया जाए ताकि मैं जीवनयापन कर सकूं।मुझे उम्मीद है कि इस ई-मेल और इसी पत्र के रजिस्टर्ड प्रति पाने के दस दिन के भीतर आप महत्वपूर्ण फैसला लेंगी। 04 अक्टूबर 2016 को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। अगर इससे पहले आपने कर्मचारियों की दीवाली मनवा दी तो यह एक नजीर होगी। रहा कंपनी पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का सवाल तो प्रबंधतंत्र से कहिये की पूरा दिमाग इस बोझ को कम करने और आय बढ़ाने में लगाएं न कि नकारात्मक अभियान में। आपकी संदेशात्मक कार्रवाई, उत्तर और निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी।

वेद प्रकाश पाठक
पूर्व वरिष्ठ संवाददाता
हिंदुस्तान, गोरखपुर
यूपी
कंपनी नेम- एचएमवीएल
मो.न.-8004606554, 8953002955
पूरा पता-ग्राम-रिठिया, टोला-पटखौली, पोस्ट-पिपराईच
जिला-गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड-273152

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