लाखों के घोटाले और इसे उजागर करने वाले पत्रकार पर गोरखपुर की प्रिंट मीडिया चुप क्यों है!

गोरखपुर के ग्रीन कार्ड घोटाले व फ्राड की घटना पर सबकुछ जानकर भी वहां की प्रिंट मीडिया चुप है। सिर्फ एक इलेक्ट्रानिक चैनल ईटीवी यूपी ने इस मामले में ढंग की खबर चलाई। उधऱ, पीड़ित पत्रकार वेद प्रकाश पाठक की लड़ाई जारी है। यहां हम फेसबुक और वाट्स एप्प पर साझा किये हुये उनके कुछ पोस्ट प्रकाशित कर रहे हैं…

80 रुपये के फ्राड केस में छिपा है लाखों का खेल!

एसपी ट्रैफिक ने 9 जनवरी 2013 को ही ग्रीन कार्ड छपाई पर प्रतिबंध लगा दिया था

फिर भी 2 साल 1 महीने 9 दिन तक चौराहों, पुलिस चौकियों और बूथ पर चला धंधा

गोरखपुर। कैंट पुलिस ने जिस 80 रुपये के ग्रीनकार्ड फ्राड में मुकदमा दर्ज किया है उसके नेपथ्य में लाखों का खेल छिपा हुआ है। वर्तमान SP Traffic Gorakhpur की जांच में कई चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। दरअसल, तत्कालीन एसपी ट्रैफिक रमाकान्त प्रसाद ने 9 जनवरी 2013 को ही ग्रीन कार्ड छपाई और वितरण करने के संस्था के काम पर प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसे में सवाल यह है कि पूरे 2 साल 1 महीने और 9 दिन तक कैसे सरेराह चौराहों, पुलिस चौकियों और बूथ पर ग्रीन कार्ड छापे और पैसे लेकर बांटे गये। ऐसा बगैर पुलिस की मिलीभगत के संभव न था। अब पुलिस खुद सवालों के घेरे में है और निष्पक्ष विवेचना से ही राज खुलकर सामने आएगा।

आरोपी संस्था वृन्दावन महिला कल्याण समिति की सचिव वृन्दा देवी ने एसपी ट्रैफिक आदित्य प्रकाश की जांच में यह बयान दिया है कि उन्हें वर्ष 2012 में 30 रुपये की दर से कार्ड छापने की अनुमति तत्कालीन एसपी ट्रैफिक रमाकान्त प्रसाद ने दी थी। तीन महीने बाद उनसे काम बंद करने के लिए कहा गया और उन्होंने काम बंद करा दिया।
इसके ठीक उलट, यातायात पुलिस के पास मौजूद रिकार्ड के मुताबिक एसपी ट्रैफिक रमाकान्त प्रसाद ने 10 फरवरी 2012 को पत्र जारी करके वृन्दावन महिला कल्याण समिति को कार्ड छापने की अनुमति दी थी। और यह अनुमति 9 जनवरी 2013 को  निरस्त की गई। यातायात विभाग के रिकार्ड के अनुसार संस्था को करीब 11 महीने कार्ड छापने की अनुमति दी गई थी जबकि संस्था सचिव का बयान है तीन महीने बाद काम बंद कर दिया गया।

चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जब संस्था ने तीन महीने में काम बंद कर दिया और एसपी ट्रैफिक रमाकान्त प्रसाद ने 9 जनवरी 2013 को काम पर प्रतिबंध लगाया तो पीड़ित के पास 18 फरवरी 2015 को ग्रीन कार्ड कैसे आ गया? दो वर्षों तक कौन लोग थे जो खुलेआम 40 रुपये से लेकर 80 रुपये तक जमा कराकर  ग्रीन कार्ड छापते और बांटते रहे। इस दरम्यान चौराहों पर बैनर लगाकर ग्रीन कार्ड बांटे जा रहे थे और ट्रैफिक पुलिस के बूथ में आवेदन लिये जा रहे थे तो ट्रैफिक पुलिस के उस समय के आला अधिकारी कहां सो रहे थे।

वृन्दावन महिला कल्याण समिति ने पीड़ित के कार्ड और दस्तावेजों के प्रति अपनी जवाबदेही से साफ शब्दों में इनकार कर दिया है। हांलाकि एसपी ट्रैफिक आदित्य प्रकाश वर्मा ने अपनी जांच आख्या में माना है कि पीड़ित को किसी संस्था या फर्म ने ही ग्रीन कार्ड छापकर दिया है।

25 लाख के कार्ड छापने की आशंका

पीड़ित वेद प्रकाश पाठक का कहना है कि अगर एक दिन में पांच हजार रुपये के कार्ड भी छापे गए हैं तो दो साल की मियाद में 25 लाख से ज्यादा का घोटाला और भ्रष्टाचार हुआ है। चूंक ट्रैफिक पुलिस व इसके आला अधिकारी भी इस उगाही में शामिल थे लिहाजा घोटाले को हर कदम पर दबाने का प्रयास किया गया। उन्होंने उम्मीद जताई है कि उनके पास उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष और ईमानदारी के साथ विवेचना हुई तो सभी आरोपी पकड़े जाएंगे। इस पूरे घोटाले का पर्दाफाश हो सकेगा।

“फर्जीवाड़े की कहानी, पीड़ित की जुबानी”

शहर के यातायात चौराहे पर यातायात पुलिस बूथ में बैठे वृन्दावन महिला कल्याण समिति के कर्मचारी ने पीड़ित वेद प्रकाश पाठक से से 80 रुपये लेकर उन्हें 18 फरवरी 2015 को एट फर्जी ग्रीन कार्ड पकड़ा दिया। वेद ने इसके खिलाफ लड़ने का मन बना लिया। वेद ने बताया कि इस लड़ाई का आगाज हुआ 21 फरवरी 2015 को। उन्होंने आईजी जोन गोरखपुर से शिकायत की। मामले की जांच एसपी ट्रैफिक गोरखपुर को मिली। फर्जीवाड़े की यह घटना ज्यादातर मीडियाकर्मियों को थी लेकिन कलम नहीं चलीः चूंकि फ्राड करने वाली संस्था समाजवादी पार्टी की रसूखदार नेता से जुड़ी थी लिहाजा राजनीतिक दबाव में एसपी ट्रैफिक रमाकान्त प्रसाद जी ने मामला मैनेज कर दिया। दो साल बाद वेद ने आरटीआई से जानकारी पायी कि उनके प्रकरण में कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

महंत योगी आदित्यनाथ सीएम बने और जनता दरबार लगाने लगे तो उनकी थोड़ी आस बढ़ी। 01 मई 2017 को उन्होंने योगी से मिलकर इस प्रकरण की शिकायत की थी। एसपी ट्रैफिक श्रीप्रकाश द्विवेद्वी को जांच मिली लेकिन यहां भी मामला मैनेज हो गया। सीएम से मिलना बेकार हो गया। उनका मन बहुत दुखी हुआ लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारी।
फेसबुक और ट्विटर के जरिये वर्तमान एसपी ट्रैफिक श्री आदित्य प्रकाश वर्मा जी की जानकारी में उन्होंने पूरा प्रकरण लाया। मुख्यमंत्री के एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली (आईजीआरएस) के जरिये आईजी जोन महोदय, डीआईजी रेंज महोदय और एसएसपी गोरखपुर महोदय से शिकायत भी की। इस बार जांच एक ईमानदार कार्यशैली वाले अफसर श्री आदित्य प्रकाश वर्मा जी के हाथ में थी। उन्होंने मामले की निष्पक्षता से जांच की और उनके निर्देश पर कैंट थाने में आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 419, 420 के तहत मुकदमा कायम हुआ है।

पीड़ित पत्रकार वेद प्रकाश पाठक की फेसबुक वाल से.

मूल खबर….

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जुझारू पत्रकार के संघर्ष के चलते ट्रैफिक पुलिस की मिलीभगत से ठगी करने वालों पर दर्ज हो सका मुकदमा

ढाई साल पहले घटी एक घटना ने मुझे बेहद आघात पहुंचाया था। शहर के यातायात चौराहे पर यातायात पुलिस बूथ में बैठे वृन्दावन महिला कल्याण समिति के कर्मचारी ने आपके साथी से 80 रुपये लेकर उसे फर्जी ग्रीन कार्ड पकड़ा दिया। यह फ्राड हुआ तो हजारों के साथ लेकिन बात मुझे खल गई। इतनी पढ़ाई लिखाई करने और पत्रकार होने का क्या मतलब, अगर कोई बीच चौराहे पर आपको पुलिस की संरक्षण में ठग ले। मैंने हास, परिहास और उपहास की परवाह किये बिना इस ठगहाई के खिलाफ लड़ने की ठान ली। मेरे दोस्तों, मीडिया के कुछ साथियों, कई अपने लोगों और यहां तक की यातायात पुलिस ने भी मुझे समझाने का प्रयास किया लेकिन मैंने सिर्फ अपने दिल की सुनी।

लड़ाई का आगाज हुआ 21 फरवरी 2015 को। मैंने आईजी जोन गोरखपुर से शिकायत की। मामले की जांच एसपी ट्रैफिक गोरखपुर को मिली। फर्जीवाड़े की यह घटना ज्यादातर मीडियाकर्मियों को थी लेकिन कलम चली तो सिर्फ शान-ए-पूर्वांचल इवनिंग तूफान के पत्रकार साथियों की। खासतौर से अतुल मुरारी तिवारी जी ने बगैर हित-अहित की परवाह किये इस मुद्दे पर बेबाकी से लिखा। चूंकि फ्राड करने वाली संस्था समाजवादी पार्टी की रसूखदार नेता से जुड़ी थी लिहाजा राजनीतिक दबाव में एसपी ट्रैफिक रमाकान्त प्रसाद जी ने मामला मैनेज कर दिया। दो साल बाद मैं आरटीआई से जान पाया कि मेरे प्रकरण में कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

महंत योगी आदित्यनाथ सीएम बने और जनता दरबार लगाने लगे तो थोड़ी आस बढ़ी। 01 मई 2017 को मैंने योगी से मिलकर इस प्रकरण की शिकायत की थी। एसपी ट्रैफिक श्रीप्रकाश द्विवेद्वी को जांच मिली लेकिन यहां भी मामला मैनेज हो गया। सीएम से मिलना बेकार हो गया। मन बहुत दुखी हुआ लेकिन फिर भी हिम्मत नहीं हारी। फेसबुक और ट्विटर के जरिये वर्तमान एसपी ट्रैफिक श्री आदित्य प्रकाश वर्मा जी की जानकारी में मैं पूरा प्रकरण लाया।

मुख्यमंत्री के एकीकृत शिकायत निवारण प्रणाली (आईजीआरएस) के जरिये आईजी जोन महोदय, डीआईजी रेंज महोदय और एसएसपी गोरखपुर महोदय से शिकायत भी की। इस बार जांच एक ईमानदार कार्यशैली वाले अफसर श्री आदित्य प्रकाश वर्मा जी के हाथ में थी। उन्होंने मामले की निष्पक्षता से जांच की और उनके निर्देश पर कैंट थाने में आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 419, 420 के तहत मुकदमा कायम हुआ है। इस मुकदमे को मैं देर से ही सही अपनी प्राथमिक जीत मानता हूं। अगर निष्पक्षता से विवेचना हुई तो लाखों का खेल उजागर होगा और दोषी जेल जाएंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।

वेद प्रकाश पाठक
मजीठिया क्रांतिकारी
स्वतंत्र पत्रकार व सोशल मीडिया एक्टिविस्ट
मोबाइल 8004606554
मेल cmdsewa@gmail.com

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इस पत्रकार ने योगी को शशि शेखर से किया सचेत

गोरखपुर। हिंदुस्तान अखबार में काम कर चुके, “हिंदवी” (सीएम योगी का अखबार, जो अब बंद हो चुका है) के पूर्व विशेष संवाददाता और इन दिनों स्वतंत्र पत्रकार के रूप में सक्रिय वेद प्रकाश पाठक ने एक ट्वीट के माध्यम से सीएम योगी को सतर्क किया है। वेद ने ट्वीट के जरिये सीएम को आगाह किया है कि वे शशि शेखर जैसे संपादक से सतर्क रहें, जो पत्रकारों का मजीठिया वेज बोर्ड का एरियर व वेतन निगल चुके हैं। यह ट्वीट वेद ने उन मुलाकातों को देखते हुये किया जो इन दिनों हिंदुस्तान अखबार प्रबन्धन क्राइसिस मैंनेजमेंट के लिये कर रहा है।

दरअसल, अखबार प्रबन्धन के खिलाफ दो दर्जन से ज्यादा आरसी जारी हो चुकी हैं। ये सभी आरसी लखनऊ, आगरा और बरेली के श्रम विभाग से जारी हुई हैं। प्रबन्धन इन्हें री-कॉल कराने की तैयारी में है। ये सभी आरसी मजीठिया वेज बोर्ड के नान-इम्प्लीमेंटेशन से जुड़ी हैं। री-कॉल के बाद प्रभाव का इस्तेमाल कर प्रबन्धन आरसी रद्द करवाना चाहता है। बगैर शासन और सरकार के सहयोग के यह कार्य संभव न होगा।

इस काम के लिये अखबार प्रबन्धन बड़ी चालाकी से यूपी के नये सीएम योगी आदित्यनाथ की खुशामद में जुटा हुआ है। यहां से कई संपादक योगीजी से मिल चुके हैं। मकसद सिर्फ एक है कि योगीजी को भ्रामक सूचनाएं देकर अपने फर्जीवाड़े पर पर्दा डाला जाए और हजारों पत्रकारों को उनके अधिकारों के प्रति हतोत्साहित किया जाए। सीएम को किये गये ट्वीट में वेद प्रकाश पाठक ने उन्हें यह भी बताया है कि संपादक शशि शेखर का मकसद यूपी में हिंदुस्तान अखबार के खिलाफ लगभग 40 वादों को प्रभावित करना है।

योगी से कौन कौन संपादक आज सुबह मिला है, डिटेल दे रहे हैं भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह… नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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मैंने प्रधान संपादक योगी आदित्यनाथ से सीखा है निर्भीक और निष्पक्ष लेखन

मित्रों,

मैं इसे सौभाग्य मानता हूं कि मैंने प्रिंट पत्रकारिता की पहली खबर ही मीडिया प्रतिरोधी निर्भीक लेखन से की। यह लेखन तत्कालीन अखबार “हिंदवी” के प्रधान संपादक, गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी और गोरखपुर सदर सीट से सांसद योगी आदित्यनाथ जी से ही सीखने को मिला। दरअसल यह प्रतिरोधी लेखन स्थानीय मीडिया (गोरखपुर के कुछ मीडिया संस्थानों) की एक भ्रामक खबर के खिलाफ था। स्थानीय मीडिया की भ्रामक खबर के खिलाफ जो रिपोर्ट मैंने लिखी उसकी हेडिंग कुछ यूं थी- “पुलिस और मीडिया के गठजोड़ ने ही सुनील सिंह को कराया तड़ीपार”।

यह खबर हिंदवी साप्ताहिक में चौड़े से छपी भी। और जहां तक मुझे याद है यह खबर मेरे प्रिंट पत्रकारिता के जीवन की पहली खबर थी। आज मुझे लगता है कि अगर मीडिया में रहते हुये भी कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा कभी-कभी की जाने वाली शरारतों के खिलाफ निष्पक्ष और बिना डरे लिख पाता हूं तो यह ताकत अब के सीएम और मेरी पहली खबर को अनुमोदित करने वाले मेरे तत्कालीन प्रधान संपादक, महंत योगी आदित्यनाथ जी की पहली व्यावहारिक पाठशाला में मिली सीख से ही मिल पाती है।

बात वर्ष 2007 में दीपावली के त्योहार के आसपास की है। हिंदवी साप्ताहिक अखबार (जिसके प्रधान संपादक योगीजी ही थे) में मेरा पहला दिन था। मैं संपादक डा प्रदीप राव के निर्देशन में काम कर रहा था। शाम का समय था। तब हिंदवी का दफ्तर गोरखनाथ मंदिर में ही था। अचानक योगीजी दफ्तर में आए और उस खबर को बनवाने का निर्देश डाक्टर प्रदीप राव को दिया। डा. राव ने कहा कि खबर पाठक जी से बनवा लेते हैं। फिर हेडिंग को लेकर चर्चा होने लगी। योगीजी भी चर्चा में शामिल हुए और खबर की हेडिंग व भाषा तय हो गई। इसके बाद मैंने पूरी खबर लिखी।

प्रकरण कुछ यूं था। गोरखपुर के जिला प्रशासन ने एक हिस्ट्रीशीटर सुनील सिंह को तड़ीपार करने का आदेश कर दिया था। हिन्दू युवा वाहिनी के अध्यक्ष का नाम भी सुनील सिंह ही था। स्थानीय मीडिया में खबर ऐसी आई जैसे कि हियुवा के प्रदेश अध्यक्ष ही तड़ीपार हो गए हों। जबकि तड़ीपार कोई और हुआ था। इस भ्रामक कवरेज के खिलाफ योगीजी ने अपने अखबार हिंदवी के जरिये आवाज बुलंद की। हिंदवी का प्रकाशन अब नहीं होता है लेकिन यह साप्ताहिक अखबार जब तक छपा, अपनी निर्भीक भाषा और शैली के लिये मशहूर रहा।

यह भी एक तथ्य है कि योगीजी उन जनसेवकों में से नहीं हैं जो मीडिया की भ्रामक रिपोर्ट पर शांत रहें। वह मीडिया को खूब सम्मान देते हैं, मीडियाकर्मियों की पूरी मदद भी करते हैं लेकिन गलतियों पर संवैधानिक तरीके से कड़ा प्रतिरोध जताने से कभी नहीं चूकते हैं। लिहाजा मीडिया को अब और सतर्कता से रिपोर्टिंग करते हुये यूपी में किसी भी प्रकार की भ्रामक पत्रकारिता से हमेशा बचना होगा। और यही आगामी वर्षों में सूबे और देश की मीडिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि अब जो शख्सियत सीएम के कुर्सी पर बैठी है वह सिर्फ साधु या जनसेवक नहीं, बल्कि एक निर्भीक और निष्पक्ष पत्रकार भी रही है।

वेद प्रकाश पाठक

(पूर्व संवाददाता, हिंदवी)

स्वतंत्र पत्रकार (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश)

मोबाइल और वाट्स एप्प नंबर-8004606554

ई-मेल : cmdsewa@gmail.com 

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मजीठिया की जंग : सुनवाई के लिए आज हम तीन पत्रकार पहुंचे तो उप श्रमायुक्त गोरखपुर गायब मिले

 

मेरी लड़ाई पत्रकारों या अखबारों से नहीं, कंपनियों की शोषक नीतियों से लड़ रहा हूं

मित्रों,

दस साल हो गए पत्रकारिता में। इस दरम्यान टीवी, रेडियो, कई दैनिक सांध्य अखबारों, दैनिक भास्कर, हिंदुस्तान जैसे कार्पोरेट अखबारों, साप्ताहिक अखबारों, डिजीटल मीडिया और मैगजीन में सेवाएं दीं। स्वतंत्र पत्रकार के रूप में डिजीटल मीडिया व एक सांध्य दैनिक अखबार में लेखन और रेडियो पत्रकारिता अभी भी जारी है। एक बात स्पष्ट करना चाहता हूं। मेरी लड़ाई न किसी अखबार से है और न ही किसी पत्रकार से। मैं उन कंपनियों से लड़ रहा हूं जो अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों के साथ धोखा कर रही हैं। उनका आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण कर रही हैं। इस लड़ाई में शोषित सभी पत्रकार साथी मेरे साथ हैं। बस चंद ऐसे पत्रकार मेरे विरोधी हैं जो कंपनियों द्वारा गुमराह किये जा रहे हैं। ऐसे विरोधी साथियों के प्रति भी मेरी पूरी हमदर्दी है। भरोसा है कि एक न एक दिन वह भी मेरे साथ जरूर आएंगे।

आज उप श्रमायुक्त गोरखपुर के यहां मेरी, हिंदुस्तान के सीनियर कापी एडिटर सुरेंद्र बहादुर सिंह और आशीष बिंदलकर की सुनवाई थी। हम डेट पर पहुंचे तो उप श्रमायुक्त मौजूद नहीं थे। अगली तारीख 16.11.2016 की मिली है। हम प्रत्येक तारीख का मजबूती से मुकाबला करेंगे। एक तथ्य हमे निराश कर रहा है। गोरखपुर में हिंदुस्तान अखबार चलाने वाली कंपनी हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लिमिटेड ने 11.11.2011 से लेकर अब तक किसी को मजीठिया वेज बोर्ड का एरियर नहीं दिया है। जबकि माननीय सुप्रिम कोर्ट के आदेशानुसार 7 फरवरी 2015 तक चार बराबर किश्तों में समूचे एरियर का भुगतान कंपनी को स्वयं करना था। कंपनी ने ऐसा नहीं किया। इसके बावजूद यूनिट से सिर्फ दो साथियों ने बगावत किया। यानी गोरखपुर में कंपनी के अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले सिर्फ तीन हैं। बाकी दो दर्जन से ज्यादा वर्तमान और एक दर्जन पूर्व साथी चुप हैं। शायद इसलिये भी की, बोलेंगे तो पेट पर लात पड़ेगी। पूर्व साथियों के चुप्पी के कारण अलग-अलग हैं। वर्तमान साथियों ने एरियर मांगा तो फौरी तौर पर वे पैदल हो जाएंगे और उनकी रोजी-रोटी की रक्षा का त्वरित संवैधानिक समाधान भी नहीं है।

कहना यह चाहता हूं कि कानून, कंपनी के सामने असहाय नजर आ रहा है। हालात ने एक बुद्धिजीवी कौम को मौन रहने के लिये अभिशप्त कर दिया है। जो लोग हमारी इस दशा के बारे में सुनते हैं वे या तो तंज कसते हैं या फिर दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। लोग भरोसा नहीं कर पा रहे हैं कि पत्रकार और अखबारों में काम करने वाले भी इतने असहाय और शोषण के शिकार हो सकते हैं। कड़वा सच, समाज के गले नहीं उतर पा रहा है। लेकिन सच तो सच है और उसकी स्वीकारोक्ति के अलावा कोई विकल्प नहीं है। और उसे स्वीकार करना ही होगा।

सबसे ज्यादा नाराजगी मेरी उन साथियों से है जो कंपनी से बाहर हैं, लेकिन “छपास सुख” के लाभ की निरंतरता के लिये अपने एरियर का वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की धारा 17(1) में क्लेम नहीं नहीं लगा रहे हैं। एक और आंकड़ा निराश करने वाला है। पूरे देश में अकेले हिंदुस्तान अखबार और हिंदुस्तान टाइम्स से जुड़े लगभग 1000-5000 के बीच कर्मचारी/पूर्व कर्मचारी (पत्रकार/गैर पत्रकार कर्मचारी) हैं जो वेज बोर्ड के लाभार्थी हो सकते हैं, लेकिन दावा सिर्फ 27 ने किया है। जिन्होंने दावा किया है उन्हें अब किसी प्राइवेट मीडिया हाउस में एंट्री नहीं मिलेगी। शायद यह डर भी एक बड़ा कारण हैं क्लेम न करने के पीछे।

मैं देश के सभी हिंदुस्तानी साथियों (वर्तमान/पूर्व) से अपील करता हूं कि वे आय के वैकल्पिक स्रोतों का इंतजाम कर, ऐसे कंपनियों की चाकरी छोड़ दें। मजबूत विरोध करें। कंपनी पर क्लेम करें और दमदारी से लड़कर अपना हक लें। हम सभी को ऐसी रक्तहीन संवैधानिक क्रांति करनी चाहिये कि हालात बदलें और आने वाली पीढ़ियों को इस बदलाव का लाभ मिले। यकीन मानें आपकी यह लड़ाई न अखबारों के खिलाफ होगी, न पत्रकारिता के विरोध में और न ही पत्रकारों के विरूद्ध। आपका मोर्चा स्वच्छ, स्वस्थ और भयमुक्त निष्पक्ष पत्रकारिता का मार्ग प्रशस्त करेगा।

“मजीठिया क्रांति की जय”

आपका साथी
वेद प्रकाश पाठक “मजीठिया क्रांतिकारी”
स्वतंत्र पत्रकार, कवि, सोशल मीडिया एक्टिविस्ट
संयोजक-हेलमेट सम्मान अभियान गोरखपुर 2016
पता-ग्राम रिठिया, टोला पटखौली, पोस्ट पिपराईच
जिला गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड-273152
मोबाइल और वाट्स एप्प नंबर-8004606554
ट्विटर हैंडल-@vedprakashpath3

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एचएमवीएल के एचआर हेड को उप श्रमायुक्त गोरखपुर ने जारी किया नोटिस

हिन्दुस्तान अखबार को चलाने वाली कंपनी हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड (एचएमवीएल) के एचआर हेड को उप श्रमायुक्त गोरखपुर ने नोटिस जारी किया है। नोटिस के जरिये कंपनी के प्रतिनिधि को बुलाया गया है ताकि कंपनी अपना पक्ष रख सके। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 7 फरवरी 2015 तक सभी अखबार चार किश्तों में मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर का पूर्ण भुगतान कर दें। नवम्बर की 11 तारीख और वर्ष 2011 से 10 जनवरी 2013 तक के मेरे एरियर का भुगतान कंपनी को 18 प्रतिशत कंपाउंड ब्याज के साथ मुझे बिना मांगे देना चाहिये था। मैंने बड़ी विनम्रता से माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई समयावधि का इंतजार किया। जब एक पाई कंपनी ने नहीं भेजा तब कंपनी के एचआर हेड और समूह संपादक को पत्र भेजकर अपना एरियर मांगा। इस बेशर्म कंपनी ने जवाब तक नहीं दिया।

मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से सबसे कमजोर श्रेणी की कंपनी को सीनियर स्टाफ रिपोर्टर को कम से कम 8000-10000 मासिक की बेसिक देनी चाहिये। इन नबाबों ने सिर्फ 3750 रूपये प्रति माह बेसिक दिया, जबकि ये क्लास वन में आते हैं और उस हिसाब से इन्हें मुझे 17000 मासिक का बेसिक देना चाहिये था। इस कंपनी ने मुझे लगभग 15000 का कुल मासिक वेतन दिया जबकि देना 63000 मासिक चाहिये था। एचएमवीएल कंपनी, एचटी मीडिया समूह का अंग है जिसका औसत रेवेन्यू 1000 करोड़ प्रति वर्ष से ज्यादा रहा है। लिहाजा कंपनी को क्लास वन के हिसाब से एरियर देना पड़ेगा। अब करीब 14 माह के बकाये एरियर का कंपनी को ब्याज समेत भुगतान करना होगा।

हालांकि यह ढीठ कंपनी इतनी आसानी से पैसा नहीं देगी। एमाउंट पर विवाद फंसाकर लेबर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़वाएगी। हम भी लड़ने को तैयार हैं। हम वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट की जिस धारा 17(1) के तहत लड़ रहे हैं, उसमें क्लेम पाने का अधिकार मेरे बच्चों तक का है। यानी इस पीढ़ी में लड़ाई पूरी न हुई तो अगली पीढ़ी उस लड़ाई को लड़ सकेगी। और कंपनी जब तक इस लड़ाई को खींचेगी तब तक प्रति वर्ष 18 प्रतिशत कंपाउंड ब्याज लगता रहेगा। यानी यह लड़ाई एक प्रकार का बीमा कवर भी है। कंपनी भी यह तथ्य जानती है लेकिन वह मामले को सिर्फ इस नाते लिंगर आन करेगी और 2-10 साल तक फंसाएगी ताकि दूसरे पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी लड़ने की हिम्मत न जुटा सकें। और हो भी यही रहा है। पूरे यूपी में एचएमवीएल के साथी घुट रहे हैं लेकिन क्लेम नहीं लगा पा रहे हैं।

जिन 14 लोगों ने यूपी में मजीठिया को लेकर क्लेम लगाया/शिकायत की उनमे से 13 टर्मिनेट हो गए और एक का तबादला कर दिया। उनको भी देर सबेर टर्मिनेट कर देंगे। हांलाकि इन 14 में जो भी अंत तक लड़ेगा वह मजीठिया वेज बोर्ड के साथ हैवी मुआवजा लेकर बहाल होग। बस नुकसान इतना होगा कि चुप बैठे साथियों का हक मारा जाएगा, क्योंकि जब तक ये साथी चुप्पी तोड़ेंगे तब तक एचएमवीएल कंपनी नये नाम से अवतार ले चुकी होगी। ऐसे में कोई क्लेम नहीं हो पाएगा और बाकी साथी शायद अपने हक से हाथ धो बैठें। कंपनी भय का व्यापार कर अपने मकसद में सफल होती दिख रही है। जो साथी इस लड़ाई में हैं या आने वाले हैं वे हौसला रखें। आय के अन्य उचित साधनों की तलाश कर लें। हम यह लड़ाई जरूर जीतेंगे। जो लड़ेगा, वह विजयी होगा और उसके दिन जरूर बदलेंगे।

“मजीठिया क्रांति की जय”

आप सभी का साथी
वेद प्रकाश पाठक “मजीठिया क्रांतिकारी”
स्वतंत्र पत्रकार, कवि, सोशल मीडिया एक्टिविस्ट
संयोजक-हेलमेट सम्मान अभियान गोरखपुर 2016
आवास-ग्राम रिठिया, टोला पटखौली, पोस्ट पिपराईच
जनपद गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड-273152
मोबाइल व वाट्स एप्प नंबर-8004606554
ट्विटर हैंडल-@vedprakashpath3

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मजीठिया के लिए लड़ रहे क्रांतिकारी मीडियाकर्मियों के पक्ष में एक पत्रकार की आम जन से अपील

स्वच्छ, स्वस्थ, निष्पक्ष, गुणवत्तायुक्त पत्रकारिता सभी की डिमांड है। इसके लिये जवाबदेह हिन्दी मीडिया संस्थानों को सस्ते और सर्वगुण समपन्न पत्रकार चाहिये। पिछले 10 सालों से पत्रकारिता में पाने वाली सेलरी बताऊं, उससे पहले इसकी पढ़ाई का खर्च बताता हूं। 2 लाख खर्च करके पहली पढ़ाई पूरी की तो 3000 रूपये महीने की नौकरी 2007 में मिली। काम 14 घंटे। अच्छे संस्थान में नौकरी की प्रत्याशा में 1 लाख और खर्च कर ट्रेनिंग ली। मेरठ में नौकरी मिली। दाम 4000 रूपये महीने। थोड़े दिन बाद दैनिक भास्कर जैसा बड़ा समूह ज्वाइन किया। पहले 8000 महीना दिया और 2010 तक यह रकम 9500 हो गई। कामकाज ठीकठाक था लिहाजा गोरखपुर हिंदुस्तान में ज्वाइनिंग मिल गई। 2010 में रिपोर्टर पद पर 12000 में ज्वाइन किया और 2013 में सीनियर स्टाफ रिपोर्टर पद से 15000 प्रति माह की पगार के साथ बीमारी के कारण विदाई हो गई।

पुलिस विभाग के एक सिपाही से भी कम वेतन में कार्पोरेट अखबारों ने 14-18 घंटे तक रगड़ा सो बीमार तो होना ही था। ऊपरी कमाई कभी नहीं की लिहाजा पत्रकारिता की पढ़ाई के कर्ज के साथ इलाज का कर्ज भी जुड़ गया। डेस्क वर्क का अनुरोध किया तो सदाशयी सम्पादक व कंपनी ने रिजाइन ले लिया। 2013 के बाद कई जगहों पर फुटकर पत्रकारिता की और स्वतंत्र लेखन जारी है। कहीं से 5000 महीने मिले तो कहीं से 8300। यहां तक की 3500 पर भी काम करना पड़ा। आज भी ऐसे ही फुटकर इनकम से गाड़ी खिसक रही है।

कार्पोरेट हिंदी अखबारों में कुछ अपवादों को छोड़कर तनख्वाह वैसी ही मिलती है, जैसा मैने बताया। उनके लिये टिक पाना आसान है जो घर से मजबूत हैं, शौकिया पत्रकार हैं, पत्रकारिता के कवच में अपने धंधे कर रहे हैं, ठेठ सामान्य जीवनस्तर के साथ ईमानदारी से काम कर रहे हैं, अच्छे लाइजनर हैं या फिर पहुंचे हुये फकीर हैं। मेरे जैसे भी कुछ लोग हैं जो इनमें से किसी श्रेणी में नहीं आते लिहाजा बाहर हैं।

कार्पोरेट हिंदी अखबारों से निकलने के बाद अक्सर मेरे शुभचिंतकों ने सवाल किया कि आपने हिंदुस्तान अखबार क्यों छोड़ दिया। मैं उन्हें क्या-क्या समझाता। मीडिया संस्थान 15000 में सुबह 8 बजे से लेकर रात 12 बजे तक का समय हमसे छीन लेते है। इस समय में दौड़िये, समाज-नेताओं और अफसरों को झेलिये, संस्थान के उल्टे-सीधे काम करवाइये, पद पर बैठा आदमी कितना भी गंदा हो उससे संबंध बेहतर रखिये। अगर कोई चूक हुई तो गाली, मार और मुकदमा खुद झेलिये। साप्ताहिक अवकाश तय तो है लेकिन मिलेगा की नहीं गारंटी नहीं। शोषण के ढेर सारे उपबन्ध अखबार प्रबन्धन के पास होते हैं जिनको पत्रकार 24 घंटे झेलते हैं लेकिन इस दर्द को बाहर लाने से बचते हैं, हालांकि ये हालात सभी पत्रकारों पर लागू नहीं हैं।

अब प्वाइंट पर आते हैं। जब सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने फैसला दे दिया कि मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर दिया जाए, तब भी मीडिया संस्थान नंगा नाच दिखा रहे हैं। कोर्ट के आदेश का हवाला देकर जिस पत्रकार ने भी वेतन बढ़ाने की मांग की उसे गेट आउट कर दिया गया। जिन पत्रकारों की नौकरी का नेचर ऐसा हो वे कंपनी की नीतियों के खिलाफ नागरिक हितों के लिये कितना लड़ पाएंगे, यह यक्ष प्रश्न है। मीडिया हाउसेस, समाज और सिस्टम पर भारी हैं।

हालत यह है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बेंच 2 सालों की सुनवाई में अपनी ही सर्वोच्चता की खिल्ली उड़ाने के खिलाफ इन हाउसेज पर एक्शन नहीं ले सकी। देश के पीएम, राज्यों के सीएम, केंद्रीय श्रम विभाग, राज्य श्रम विभाग, समूचा पुलिस तंत्र आज मीडिया मालिकानों के साथ खड़ा है। यहां तक की समाज के कुछ खास विशिष्ट वर्ग भी मीडिया समूहों के साथ हैं। सब चाहते हैं कि पत्रकारिता टाप क्लास की हो लेकिन बहुत कम लोग चाहते हैं कि पत्रकारों का पारिश्रमिक भी सम्मानजनक हो। यह दोहरा चरित्र खतरनाक है। न्याय व्यवस्था, सत्ता और समाज, सबल को कुछ नहीं बोल पा रहा है और निर्बल हमेशा कोसे जा रहे हैं।

मैं समाज से अपील कर रहा हूं कि मजीठिया की लड़ाई सिर्फ हम 1000-500 लड़ रहे चंद पत्रकारों की लड़ाई नहीं है। यह एक सामाजिक परिवर्तन की भी लड़ाई है। पत्रकारिता को दोषमुक्त करने की पहल है। सत्ता और समाज, मीडिया समूहों पर दबाव बनावें कि योग्यतम पत्रकार सम्मानित पारिश्रमिक के साथ रखे जाएं और ब्लैक शिप्स को हतोत्साहित किया जाए। यह दबाव इन लड़ने वाले पत्रकारों के साथ खड़ा होकर बनाया जा सकता है। आप एक छोटा सा कदम उठाकर पत्रकारिता और समाज को बचा सकते हैं। मीडिया हाउसेज को संदेश दें कि वे भी समाज का हिस्सा हैं। वे समाज से हैं न कि समाज उनसे।

आपको करना कुछ नहीं है। बस इस पोस्ट को शेयर करिये और आप जिस भूमिका में हैं (अफसर, जज,वकील, नेता, व्यापारी, पुलिसकर्मी, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, श्रम विभाग से जुड़े हैं), उसी तरीके से अपनी भूमिका के हिसाब से अपनी इच्छानुसार इन मजीठिया क्रांतिकारियों की मदद करें। इस पोस्ट को वायरल करावें ताकि मीडिया घरानों का सड़ांध सच सबके सामने आये। आज अगर समाज हमारी मदद को चूक गया तो कल इसकी कीमत समाज को ही चुकानी है। आज जिस मनमानी का हम शिकार हो रहे हैं, कल आपको भी होना है , इस बात की मैं गारंटी ले सकता हूं।

वेद प्रकाश पाठक
स्वतंत्र पत्रकार
मो व वाट्स एप्प- 8004606554
ई-मेल-pathakvedprakash1@gmail.com
पता-ग्राम रिठिया, टोला-पटखौली, पोस्ट-पिपराईच, जिला-गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड-273152
ट्विटर पता-@vedprakashpath3

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‘हिन्दुस्तान’ और ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ के साथियों से एक पत्रकार की अपील

“हिन्दुस्तान” और “हिन्दुस्तान टाइम्स” से पूरे देश में जुड़े साथियों से खुली अपील है कि आप मजीठिया वेज बोर्ड अवार्ड के लिये 17(1) के तहत जमकर क्लेम करें। अगर 11 नवम्बर 2011 के बाद कभी भी रिटायर हुये हैं या जबरन रिजाइन ली गई है तब भी आपका एरियर बनता है। एरियर बनवाने में कोई दिक्कत हो तो मुझसे सम्पर्क करें। अगर आप काम कर रहे हैं तो डरने की जरूरत नहीं है। कंपनी आपको ट्रांसफर करेगी, सस्पेंड कर सकती है, टर्मिनेट करेगी और इनके लोग धमकियां भी देंगे, जैसा कि इन दिनों पूरे देश में हो रहा है। लेकिन भरोसा रखें, ये बिगाड़ कुछ नहीं पाएंगे।

ये वही लोग हैं जो किसी खबर पर एक नोटिस (नाजायज नोटिस पर भी) पर सिर पकड़ लेते हैं। माफीनामा तक छापते हैं। ये लोग सिर्फ आपके डर का फायदा उठा रहे हैं। आप को भरोसा दिला रहा हूं कि अगर न्यूनतम वेतन (मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार) मांगने के बाद ये उत्पीड़न करते हैं, तो कोर्ट का ऐसा डंडा गिरेगा कि अक्ल ठिकाने आ जाएगी। अगर कोई धमकी देता है तो मुकदमे की तहरीर दें। पुलिस प्रभाव में मुकदमा नहीं लिखेगी, लेकिन कोर्ट से 156/3 में मुकदमा / परिवाद जरूर दर्ज होगा।

भरोसा रखिये, जब आप आंखों में विश्वास के साथ मैदान में होंगे तो इनकी रूह कांप जाएगी। रोजी-रोटी का भय मन से निकाल दें। कचहरी के बाहर चिट्ठी टाइप करेंगे तब भी हजार रूपया रोज लेकर जाएंगे। मंदिर के बाहर शादी-ब्याह की फोटो बनाएंगे तब भी बच्चे भूखे नहीं मरेंगे। कुछ नहीं कर सकते तो मुझसे मिलियेगा, आपके साथ आपके लिये भीख मांगेंगे। चाय भी बेच लेंगे। विश्वास करें, यह सब ज्यादा दिन नहीं करना पड़ेगा।

हमारे डर का लाभ कंपनी को नहीं मिलना चाहिये। हम कटोरा लेकर घूमेंगे लेकिन उन कथित नये नजरिये का दावा करने वाले क्रूर लोगों से लड़ेंगे, जो कद-पद में हमसे बहुत बड़े हैं, लेकिन कलेजा बहुत छोटा है। हमारे हक पर कुंडली मारकर बेठे हैं। ये वही लोग हैं जो योग्यतम पत्रकार और प्रोफेशनल्स की बात करते हैं और तनख्वाह देते हैं नगर निगम कर्मचारी के चतुर्थ श्रेणी के साथी से भी कम। ये चाहते हैं कि पत्रकार हमेशा समाज की सहानुभूति पर पलें और इनकी अपनी जेबें भरती रहें।

कुछ साथी यह भी सोच रहे हैं कि वे मीडिया में जो सम्मान पा रहे हैं, वह बाहर आने पर नहीं पाएंगे। आपकी सोच आंशिक सत्य हो सकती है। पूरा सच नहीं है। एक बात का विश्वास दिलाता हूं कि अगर आप मजीठिया की जंग लड़े तो भले ही कुछ दिनों के लिये अखबार से बाहर जाना पड़ेगा लेकिन आपकी कई पीढ़ियां सम्मान पाएंगी। समाज में लोग आपकी मिशाल देंगे और आपके बच्चों की तरफ हाथ दिखाकर कहेंगे कि इसके बाप/दादा हक के लिये बिड़ला जी की कंपनी से भिड़े थे।

अब डरिये मत। थोड़ा हिम्मत जुटाइये। क्लेम करिये। अगर क्लेम के बाद कार्रवाई हो तो साक्ष्य जुटाइये। हम सभी कोर्ट से बहाली पाएंगे। अगले विजयादशमी के पहले सारे रावण जलेंगे। अब तक एचएमवीएल और एचटी मीडिया के जिन साथियों ने क्लेम किया है और कार्रवाई हुई है, वे मुझसे सम्पर्क करें। हम उनका साथ देंगे।

दोस्त, जो साथी यह सोच रहे कि उन्हें घर बैठे लाभ मिल जाएगा, वे पूरी तरह सही नहीं हैं। ऐसा कोई चमत्कार नहीं होगा। अभी भी वक्त है, देर न करें। क्लेम लगाएं। दिक्कत हो तो फोन करें या कभी भी ई-मेल करें।

आपका साथी
वेद प्रकाश पाठक
पूर्व सीनियर स्टाफ रिपोर्टर
हिन्दुस्तान मीडिया वेन्चर्स लिमिटेड (गोरखपुर यूनिट)
मोबाइल-8004606554
cmdsewa@gmail.com

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शोभना भरतिया ने कोई कार्यवाही न की तो हिंदुस्तान के पत्रकार ने पत्र किया सार्वजनिक, आप भी पढ़ें

मैंने एचएमवीएल की मुखिया और बिड़ला जी की उत्तराधिकारी श्रीमती शोभना भरतिया को यह रजिस्ट्री से भेजा गया पत्र और ई-मेल है। पत्र इस भरोसे से लिखा कि वह अपने प्रबंधतंत्र पर नकेल कसेंगी। लेकिन शोभना भरतिया भी अपने तंत्र के चंगुल में हैं और सभी अत्याचार और अनाचार को मौन सहमति दे रखा है। मैंने उन्हें तय समय देते हुये कहा था कि अगर उस अवधि में ठोस एक्शन नहीं हुआ तो मैं पत्र सार्वजनिक करने के लिये बाध्य होउंगा।

वायदे के मुताबिक पत्र सार्वजनिक कर रहा हूं, आप सभी पढ़ें। “हिन्दुस्तान” अखबार प्रबन्धन के अत्याचार की कहानी। टार्गेट पर मैं भी हूं। कभी भी मेरे खिलाफ झूठे मुकदमे, जेल भिजवाने की साजिश, संदिग्ध तरीके से हत्या और वाहन दुर्घटना के जरिये मेरी हत्या का प्रयास हो सकता है। हालांकि मुझ पर राहु ग्रह की छाया है और ये लोग मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। इनके सारे प्रयास विफल होंगे और जीत मेरी ही होगी।

-वेद प्रकाश पाठक, पूर्व वरिष्ठ संवाददाता, हिंदुस्तान गोरखपुर यूनिट, उत्तर प्रदेश


ये है पूरा पत्र…

आदरणीय शोभना मैडम,

हमारे पूर्वांचल (पूर्वी उत्तर प्रदेश में) जब भी किसी के उदारता या दानशीलता का उदाहरण देना होता है तो एक लोकोक्ति प्रचलित है। वह कुछ इस प्रकार है-‘‘टाटा बिरला भईल बाटा का’’ यानी आप टाटा या बिड़ला हैं क्या? यह आपका सौभाग्य है कि आप उस बिड़ला खानदान की वंशज हैं। रुपये-पैसे में अंबानी परिवार बहुत आगे है लेकिन कोई अंबानी परिवार को उस सम्मान के साथ नहीं बुलाता है जिस सम्मान के साथ बिड़ला खानदान को याद किया जाता है।

बिड़ला परिवार से जुड़े हिन्दुस्तान टाइम्स और हिन्दुस्तान हिन्दी अखबार के कंपनी का चेयरपर्सन होने का गौरव भी  आपको हासिल है। इन कंपनियों का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। सरकार की तरफ कभी भी किसी वेज बोर्ड की सिफारिश आई तो उसे सबसे आगे बढ़कर लागू करने का काम आपकी कंपनी और बिड़ला परिवार ने किया। मुझे लगता है कि मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आपका प्रबंधतंत्र आपको सही सलाह नहीं दे रहा है या फिर गुमराह कर रहा है। ऐसा करके प्रबंधतंत्र के लोग न केवल आपकी, आपके कंपनी की बल्कि बिड़ला जी के सम्मानित नाम को धक्का पहुंचा रहे हैं। ऐसा वे इसलिये कर रहे हैं क्योंकि समूह की कुल बंटने वाली तनख्वाह में से आधे पर उनका एकाधिकार है। इन हालात में आपको पत्र लिखने की जरूरत महसूस हुई लिहाजा लिख रहा हूं।

मैडम, मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अखबारकर्मियों के हित में स्पष्ट फैसला दे रखा है। उसको लागू न करना सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना है और अपने ही कर्मचारियों के हक पर डांका डालने जैसा है। उससे भी ज्यादा गंदा काम यह है कि वेज बोर्ड के हिसाब से सैलरी मांगने पर कर्मचारियों को तरह-तरह से उत्पीड़ित करना। आपके प्रबंधतंत्र के लोग कर्मचारियों को वेज बोर्ड से वंचित रखने के लिए निम्नतम स्तर पर आ चुके हैं और आपके सम्मानित बिड़ला परिवार की साख खराब कर रहे हैं। ऐसे कई वाकये हैं लेकिन कुछ चुनिंदा मामलों का जिक्र कर रहा हूं।

सबसे चर्चित मामला लखनऊ के हिन्दुस्तान हिन्दी अखबार का है। वहां 13 कर्मचारियों ने मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने के लिए लेबर डिपार्टमेंट में प्रार्थना पत्र दिया। आपके एचआर हेड राकेश गौतम फौरन लखनऊ पहुंच गए। वहां के सम्पादक केके उपाध्याय और राकेश गौतम ने कर्मचारियों को प्रेशर में लिया। 8 कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए डंटे रहे। उन्हें कैंपस से बाहर करवा दिया गया और गेट पर उनकी फोटो लगाकर एंट्री बैन कर दी गई। इन 8 में शामिल एक चीफ रिपोर्टर आलोक उपाध्याय के खिलाफ संस्थान की एक महिला कर्मचारी से यूपी की महिला हेल्पलाइन 1090 पर छेड़खानी की शिकायत करवाई गई और संस्थान के भीतर विशाखा कमेटी की जांच बिठा दी गई। आलोक पर दबाव बनाया जा रहा है कि अगर उन्होंने मजीठिया का क्लेम वापस नहीं लिया तो कमेटी के रिपोर्ट के आधार पर उनकी नौकरी भी जाएगी और उन्हें जेल भी जाना पड़ेगा। आप चाहें तो इस घटिया स्तर के कार्य की खुद के स्तर से जांच करा लें। अगर आलोक दोषी हैं तो उन्हें जेल जाना चाहिए लेकिन अगर निर्दोष हैं तो उन लोगों पर कार्रवाई करिये जो लोग इतने घटिया स्तर के प्रबंधन में शामिल होकर आपकी, आपके कंपनी और बिड़ला जी के सम्मान को धूल में मिला रहे हैं।

अब बात अपनी करता हूं। 6 सितम्बर 2010 को मैंने एचएमवीएल गोरखपुर यूनिट ज्वाइन किया। नितान्त कम तनख्वाह पर मुझे इस प्रकार से उत्पीड़ित किया गया कि छह महीने की नौकरी में लीवर, हाई बीपी की बीमारी हो गई। दो साल बाद तक अस्थमा के भी चपेट में आ गया। मेरी लास्ट डेजिगनेशन सीनियर स्टाफ रिपोर्टर की थी। स्वास्थ्य संबंधी दिक्कत बढ़ने पर 31 दिसम्बर 2012 को मैंने स्थानीय सम्पादक से डेस्क पर काम करने का अनुरोध किया। फौरन मुझे डराकर इस्तीफे की नोटिस लिखवा ली गई। नोटिस पीरियड 28 फरवरी 2013 तक के लिए थी और मुझे 10 जनवरी 2013 को ही रीलिव कर दिया गया। बड़ी मिन्नतें करने पर सिर्फ 10 दिन की तनख्वाह 29 अप्रैल 2013 को मुझे मिल पाई। मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अंतरिम राहत राशि और एरियर आज तक न मिल पाया। पिछले साल 18 फरवरी 2015 को एचआर हेड और प्रधान संपादक को रजिस्टर्ड डाक से पत्र भेजकर मैंने मजीठिया वेज बोर्ड का क्लेम और नौकरी वापसी की मांग की थी। पूर्व सम्मानित कर्मचारी से प्रबंधतंत्र से जुड़े लोगों ने कोई संवाद नहीं किया। विवश होकर मैंने भी उपश्रमायुक्त कार्यालय गोरखपुर में हाल ही में शिकायत दर्ज कराई है। मुझे भी प्रबंधतंत्र के लोगों से खतरा महसूस हो रहा है। ये लोग अखबारी शक्तियों का दुरूपयोग कर मुझे फर्जी मामले में फंसाने से लेकर जान से मरवाने तक का काम कर सकते हैं। ऐसा हुआ तब भी आपके सम्मानित परिवार की ही छवि खराब होगी।

आप एक गौरवशाली परंपरा को निभाने वाले परिवार की बेटी हैं। हमारी मुखिया हैं। लिहाजा यह पत्र आपको इस भावना के साथ भेज रहा हूं कि सबसे पहले प्रबंधतंत्र से जुड़े ऐसे लोगों पर नकेल कसी जाए जो आपको व आपके परिवार को कलंकित कर रहे हैं। मजीठिया वेज बोर्ड को लागू किया जाए। सभी कर्मचारियों का उत्पीड़न बंद हो और मेरे साथ भी सम्मानित व्यवहार करते हुए गोरखपुर यूनिट में मुझे वापस लिया जाए। अगर मुझ बीमार आदमी को आपकी कंपनी नहीं ढोना चाहती तो कम से कम 58 लाख का एकमुश्त मुआवजा, एरियर व अंतरिम राहत राशि का मुझे लाभ दिया जाए ताकि मैं जीवनयापन कर सकूं।मुझे उम्मीद है कि इस ई-मेल और इसी पत्र के रजिस्टर्ड प्रति पाने के दस दिन के भीतर आप महत्वपूर्ण फैसला लेंगी। 04 अक्टूबर 2016 को मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई है। अगर इससे पहले आपने कर्मचारियों की दीवाली मनवा दी तो यह एक नजीर होगी। रहा कंपनी पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ का सवाल तो प्रबंधतंत्र से कहिये की पूरा दिमाग इस बोझ को कम करने और आय बढ़ाने में लगाएं न कि नकारात्मक अभियान में। आपकी संदेशात्मक कार्रवाई, उत्तर और निर्णय की प्रतीक्षा रहेगी।

वेद प्रकाश पाठक
पूर्व वरिष्ठ संवाददाता
हिंदुस्तान, गोरखपुर
यूपी
कंपनी नेम- एचएमवीएल
मो.न.-8004606554, 8953002955
पूरा पता-ग्राम-रिठिया, टोला-पटखौली, पोस्ट-पिपराईच
जिला-गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, पिन कोड-273152

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