मुझे मेरे पक्षपाती संपादक से बचाओ और इन सवालों के जवाब दिलवाओ….

है तो यह किसी फिल्मी धुन पर आधारित गाने का रूपांतरण लेकिन अखबारों पर पूरी तरह से लागू है। अखबार में काम करने वाला कोई कर्मचारी नहीं होगा जो अपने सम्पादक या मैनेजर से पीड़ित न हो। पीड़ित तो अन्य विभाग मसलन विज्ञापन, सर्कुलेशन एकाउंट, एचआर और प्रिंटिंग विभाग में कार्यरत कर्मचारी भी होंगे लेकिन मुद्दा सम्पादक पर इसलिए केन्द्रित है कि यह अखबार की रीढ़ कहलाता है। जिस तरह मरीज के बिना अस्पताल का, छात्र के बिना शिक्षक का, अपराध के बिना पुलिस विभाग का मुवक्किल के बिना वकील या यात्री के बिना बस या ट्रेन का कोई महत्व नहीं है उसी तरह अखबार का सम्पादक के बिना कोई महत्व नहीं है। लेकिन सम्पादक नामक यह संस्था धीरे-धीरे अपना महत्व खोती जा रही है।

आज सम्पादक मैनेजर का गुलाम होकर रह गये हैं। या यूं कहीं कि धीरे-धीरे मैनेजर होते जा रहे हैं। दीया क्या सर्च लाईट लेकर भी तलाशें तो नाम मात्र के सम्पादक अपनी असली भूमिका में मिलेंगे। चुने हुए अखबारों को ही लें तो पता चलेगा कि 5 से 10 फीसद सम्पादक मिलेंगे जिनका ताल्लुक लिखने-पढ़ने में रह गया है। समाचार पत्रों के संस्करण युग ने स्थानीय सम्पादकों की कलम छीन ली है, उन्हें मैनेजर बनाकर रख दिया है। अब चूंकि सम्पादक मैनेजर बन गया यानि शोषक बन गया तो चीजों को मैनेज करने के लिए वह कर्मचारियों का खून चूसेगा ही।

अब जयादातर अखबारों पर मजीठिया की तलवार लटक रही है। पहले अखबार के मालिकों ने ना-नुकुर किया, अब गर्दन फंसती देख चोर रास्ता निकालने में दिन-रात एक किए हुए हैं। पुराने और महंगे कर्मचारियों से जबरन इस्तीफा लेना, कर्मचारियों की भर्ती न करना आसान रास्ता है। विश्व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाले अखबार का दावा करने वाले दैनिक जागरण ने तो सर्वाधिक कर्मचारियों को निकालने का कीर्तिमान स्थापित कर डाला। दो-तीन साल में सैकड़ों कर्मचारी दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंका तो खुद को विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहने वालों में सहारा इंडिया का राष्ट्रीय सहारा भी पीछे नहीं रहा। सबसे कम संस्करण के बावजूद सबसे ज्यादा कर्मचारी (अनुपात में) निकाले। आज इन अखबारों का कर्मचारी गुलामों मी तरह काम कर रहा है। न श्रम कानूनों का पालन कर रहा है और न सेवा शर्तों का। इन जैसे अखबारों के मालिक या मालिकों का गुलाम सम्पादक क्या इन बातों का जवाब दे पायेंगे या देना चाहेंगे कि…..

किस नियम के तहत वे अपने कर्मचारियों से आठ घंटे की ड्यूटी ले रहे हैं। श्रमजीवी पत्रकार संघ के तहत शिफ्ट छह घंटे की है।

कर्मचारी का मानक क्या है? एक संस्करण में कितने कर्मचारी होने चाहिए?

एक कर्मचारी को कितना काम करना चाहिए? मसलन एक रिपोर्टर के पास कितनी बीट हो और डेस्क पर काम करने वाले के पास कितने पेज या कितने कॉलम खबर पढ़नी चाहिए, एडिट करना चाहिए या रिराइट करना चाहिए।

रात्रि पारी में कर्मचारियों को घर तक पहुंचाने की व्यवस्था आपके दिल्ली संस्करण के कर्मचारियों के ऊपर ही क्यों लागू है?

मजीठिया वेज बोर्ड ने ठेका प्रथा समाप्त कर दी है या इसकी अधिकतम सीमा एक साल कर दी है फिर सालों साल से ठेके पर काम क्यों लिया जाता है?

संवादसूत्र सात-सात साल बाद भी नियमित कर्मचारी क्यों नहीं हुए।

दस साल बाद भी लोगों को क्यों नहीं प्रमोट किया गया जबकि नियम दस साल का है?

नियमित सालाना इंक्रीमेंट क्यों नहीं लगाया जाता?

दो साल से डीए शून्य क्यों है?

न्यूनतम बोनस 8.33 प्रतिशत देना अनिवाय है फिर बोनस क्यों नहीं दिया गया?

अधिकतर अखबारों में कर्मचारियों की संख्या काफी कम हो गई है। लोग कमरतोड़ काम कर रहे हैं। उनको आवश्यकता पर छुट्टी नहीं दी जाती है। चहेते ही अपनी इच्छा के अनुसार छुट्टी पा रहे हैं। आये दिन कर्मचारियों के साप्ताहिक अवकाश तक जो कि उनका अधिकार है बाकी अवकाश सुविधा रद्द कर दिये जाते हैं। कर्मचारी इतने कम हैं कि एक दो कर्मचारी के छुट्टी पर चले जाने पर पूरी व्यवस्था ही चरमरा जाती है। पहले तो कभी-कभी पर अब ऐसा अक्सर होने लगा है कि दो-दो कर्मचारियों के बल पर एक-एक डेस्क चल रही है। इस पर भी पक्षपात जमकर हो रहा है। छोटी से छोटी गलती होने पर लोगों को दंडित किया जाता है बड़ी से बड़ी गलती होने पर चहेतों को अभयदान दे दिया जाता है। ऐसा क्यों? क्या मालिक का चमचा…. (चमचा इसलिए कि वह सम्पादक बनता है) गुलाम यह बताने का कष्ट करेगा कि ऐसा क्यों?

देहरादून से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.
                                   

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