सहाफत अखबार में काम करने गए मोहम्मद इरफान के साथ क्या हुआ, जानिए उनके पत्र से

Media friends, aaj mai aap sabhi newspaper ke friends aur social media ke logo ko apna dard batana chahta hu ki maine print media ke circulation deptt. me taqreeban 15 saal diye jisme The hindu, Janmadhyam aur Inquilab jaise newspaper shamil hai. Maine ek august ko sahafat urdu daily join kiya tha. Aman abbas sb ne mujhe kai baar call karke bulaya tha aur kaha ki mere sahafat ka circulation incharge ban jaiye.

mai apni team bhi laya aur aman ke kehne par usey join karwaya jisme reporter aur marketing ka banda shamil tha. Khair maine join kar liya aur khuda gawah hai ki maine har lamha apni duty perform ki but salary mangte rehne par aman abbas sb mujhe taltey rahe aur had kal 18 sep 2017 ko ho gayi jab raat der tak aman sb ne mujhe office bitha kar rakha aur akhir me kehne lage ki mujhe circulation ki koi zarurat nahi aur aap ja sakte hai, kal se mat aana.

Puri tarah se mai financially toot chuka tha, inhone mithi baten karke mujhse apne akhbar ka circulation sahi karwaya.  kyunki 50 din kaam kar ke sahafat me maine apni pocket se sarey paise laga diye, ab mujhe salary milni thi jo mera haq tha. Par aman abbas ne kaam nikal kar mujhse keh diya ki aapki ab koi zarurat nahi. Chaliye theek hai par kya jab tak maine kaam kiya tab tak ki salary nahi milni chahiye mujhe Aur ye log sirf logo ke kharab waqt ka fayeda uthate hai aur unka exploitation karte hai.

Jab inki is harkat ke bad maine pata kiya to inke staff ne bataya ki kafi employees ka inhone misuse kiya hai aur salary ke len den me bahut badnam hai. aman sb ne bahut zindagi tabah ki hai baki mauqe par apni baat se mukar jate hai. Aise logo ne akhbar ko badnam kar rakha hai. Aap sabhi log is akhbar aur aman abbas ke jhanse me kabhi na aaye ki baad me rona padey.

Aap media friends ko ye batakar mai inform kar dena chahta hu ki aman sb jaise fraud shaks ki baton par kabhi bharosa na karen. Mai kis takleef aur pareshani se guzar raha hu ye sirf mai janta hu aur aise waqt me sahafat se jo dokha mujhe mila aap sab hazrat hi insaf karen. Aise log akhbar ko badnam kartey hai logo ki imandari ka mazak banate hai.

Shukriya.

Aapka bhai

Mohammad irfan

Circulation incharge

Sahafat urdu daily

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रिपोर्टरों का पैसा खा गया यह चैनल!

सेवा में,
सम्मानित चैनल हेड / सीनियर्स / रिपोर्ट्स / स्टाफ
नेशनल वायस चैनल

आप और हम लोगों ने नेशनल वायस न्यूज़ चैनल को बड़ी मेहनत से आगे बढ़ाया और कम समय में मेहनत के बलबूते पर आगे तक लेकर गए और उस मेहनत की मलाई किसी ओर को समर्पित की गई। हमने दिन रात मेहनत कर लगभग दो साल तक चैनल को अपने खून पसीने से सींचा मगर हमारे सीनियर्स, चैनल के उच्चाधिकारियों ने हमारी मेहनत की मलाई खूब अच्छे से खाया और अपना पेट भरा। साथ ही उनका भी भरा जो उनके चाटुकार थे। मैंने अपनी मेहनत से चैनल को खूब काम करके दिया। खुद भूखा रहा। मगर चैनल को भूखा नहीं रहने दिया। उसका पेट भरता रहा। अपने करियर को देखते हुए घर में झूठा दिलासा देता रहा कि मैं एक अच्छे चैनल में काम कर रहा हूँ। मुझे अच्छा मेहनताना मिलता है। दिल टूट गया जब मेरे पिताजी ने एक दिन कहा कि अपनी कमाई से कुछ घर भी लेकर आया कर। मगर उन्हें कहाँ पता था कि मेरी मेहनत की कमाई तो चैनल के बड़े लोगों में बंट रही है।

सभी को यह बता दूं मुझे पत्रकारिता में लंबा समय हो गया है। मगर मैंने कभी चैनल के नाम पर दलाली नहीं की। मैंने मेहनत की और मेहनताना के नाम पर कुछ नहीं मिला। चैनल के उच्च साथियों से पता चलता कि हमें अगले माह से वेतन दिया जाएगा। मैं दुबारा काम शुरू कर देता। मगर आश्वासन के अलावा कुछ नहीं मिला। ईमानदारी का बड़ा अच्छा फल मिला। उसके लिए आप सभी का तहे दिल से धन्यवाद। उच्च अधिकारियों द्वारा लुभावने लड्डू जो दिए जाते रहे, उनका भी धन्यवाद। आप लोगों को मान गए कि आप लोग मैनेज करने में एक्सपर्ट हैं। मेरी अन्य सभी साथियों के लिए एक सलाह। आप लोगों को भी लुभावने वादे किये जा रहे हैं मगर वह पूरे नहीं होने वाले। बाकी क्या कहूं। सभी तो विद्वतजनों में गिने जाते हैं।

बड़े बुजुर्ग कह कर गये है कि जो गरीब की मेहनत को कुचलता है तो उसका जरूर बुरा होता है। मगर मैं यह नहीं चाहूंगा। मैं तो यह चाहूंगा कि आप लोगों का चैनल दिन रात तरक्की करे। सिर्फ इस बात से डरता हूँ चैनल को किसी मेहनती व्यक्ति की दिल से हाय न लग जाये क्योंकि जिसने मेहनत की होगी वह व्यक्ति चैनल के लिए की गयी मेहनत पर जरूर रोया होगा। दुःख तो इस बात का होता है जब चैनल का वरिष्ठ अधिकारी ये बात बताने पर जवाब देता है कि चैनल किसी रिपोर्टर से पूछ कर काम नहीं करता। बाद में वह अपने ही रिपोर्टर को कहता है कि आपको बात करने की तमीज नहीं। वैसे चैनल की दुकान चला रहे उस व्यक्ति को बता दूं, धंधे की इज्जत करना सीखो, साथ ही उनकी भी जो लोग आपकी दुकान चलाने में आपका सहयोग दे रहे हैं। हर आदमी बिकाऊ नहीं होता।

आप लोगों के साथ काम करने का मौका मिला उसके लिए आप सभी का धन्यवाद. और एक जरुरी बात… जितने भी लोग यह सोचते है की आपका ये चैनल ETV चैनल को टक्कर दे रहा है या देगा तो वह सरासर गलतफहमी में जी रहा है। अपने दिल से पूछें कि चैनल उस नेटवर्क के बराबर है या नहीं। यह चैनल कभी एक जगह पर नहीं टिक सकता। इसका उदाहरण यह खुद ही देता रहा है। कभी नोएडा तो कभी लखनऊ। सोचनीय विषय यह जो खुद ही एक जगह पर टिका नहीं हो वह दूसरे को कैसे टिका पायेगा। हो सके तो चैनल जो वायदे किये थे, जो बिल मंगवाए थे, उन्हें पूरा करे। भगवान न करे कि कोई मेहनत का मेहनताना न मिलने पर भूखा सोये। 

धन्यवाद
कुलदीप थपलियाल
thapliyalkuldeep312@gmail.com

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लखनऊ के ‘लाइव टुडे’ चैनल के मालिक और प्रबंधन की दादागिरी

हाल ही में लखनऊ में पैदा हुआ एक चैनल इस क्षेत्र के शुरुआती दौर के पत्रकारों के लिए एक अच्छा प्लेटफ़ार्म बनके उभरा, लेकिन चैनल के मालिक और प्रबंधन की दादागिरी यहां भी चरम पर है। अपने चैनल के माध्यम से दुनिया को नियम कानून याद दिलाने वाले गोमती नगर के लाइव टुडे चैनल ने खुद कितने नियम माने, ये यहां के कर्मियों से पूछा जाए तो बेहतर। यहां लेबर लॉ को तो ऐसे तोड़ा जाता है मानो ये कानून इनके बाप की बपौती है। यहां कर्मचारियों को कभी भी बिना किसी नोटिस के निकाल दिया जाता है। अगर कोई इसका विरोध करे तो उसको यहां की एचआर व्हाट्सएप्प मैसेज भेज कर उसकी औकात बताती है।

वैसे तो नियम ये कहता है कि किसी कर्मचारी को जिसने 3 महीने से ज्यादा वक़्त तक उसी संस्था में काम किया हो उसे बिना नोटिस के नहीं निकाला जा सकता। मगर यहां की एक एम्प्लोयी जो कि यहां 6 महीने से कार्यरत थी, उसे बिना किसी पूर्व सूचना के एक शाम निकाल दिया गया। उसे एक सप्ताह तो छोड़िये, एक मिनट पहले तक भी कोई नोटिस नहीं मिला। घर जाते वक़्त वहां की एच आर ने पूरा अनप्रोफेशनल रवैया दिखाते हुए अगले दिन से ना आने का फरमान सुना दिया। एम्प्लोयी ने जब प्रबंधन से हक़ की बात की तो कैसा जवाब उसे मिला, ये आप सब भी ज़रूर देखें।

यहां तो माहौल ऐसा है जैसे चैनल के मालिक हैं और पैसे की ताकत है तो नियम कानून अपनी जेब में रखकर चलेंगे। यहां से जा चुके कई कर्मचारी आज भी अपने पीएफ के पैसे के लिए भटक रहे हैं। पीएफ का पैसा तो काट लिया जाता है पर आज तक न किसी को पीएफ का अकाउंट नंबर मिला है न कोई पैसा। यहां फायर एनओसी चैनल के पास नहीं है। निकलने के लिए यहां एक ही गेट है, अगर कभी आग लग जाए तो सारे कर्मचारी दम घुटने के कारण मर जाएंगे। यहां किसी भी कर्मचारी का स्वास्थ्य बीमा नहीं है। कुछ कर्मियों का कहने के लिए पीएफ कटता है, और ज्यादातर का तो पीएफ ही नहीं कट रहा। कुछ का कट भी रहा तो उसके खाते का कुछ अता पता ही नहीं हैं।

बहुत से कर्मी चुप हो कर ये सब बर्दाश्त करके चले गए। गलत को सही समझ कर चले गए। पर माफ़ कीजिए गलत बर्दाश्त करने वाले, गलत करने वालों से ज्यादा गलत होते हैं। इसलिए ये लेख है कि कम से कम आप साहस तो करें अपनी बात रखने का, आगे तो सब राम भरोसे। मगर ऐसे चैनल जो नियमों को नहीं मानते, उन्हें नियम कानून याद दिलाना पड़ेगा ताकि कमजोरों का शोषण करने का रिवाज़ खत्म हो मीडिया जगत से।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

Nivedita Singh <nivedita9616@gmail.com>

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दैनिक जागरण ने मेरा पैसा नहीं दिया तो हाईकोर्ट जाऊंगा

पटना के बाढ़ अनुमंडल से दैनिक जागरण के पत्रकार सत्यनारायण चतुर्वेदी लिखते हैं-

मैं सत्यनारायण चतुर्वेदी दैनिक जागरण बिहार संस्करण के स्थापना व प्रकाशनकाल से बाढ़ अनुमण्डल से निष्ठा व ईमानदारी पूर्वक संवाद प्रेषण का कार्य करता रहा हूँ. नये सम्पादक जी के आने के कुछ ही महीने बाद वर्ष 2015 के अक्टूबर माह से अचानक मेरी खबरों के प्रकाशन पर रोक लगा दी गयी जो अब तक जारी है। इस बारे में मैंने रोक हटाने का निवेदन श्रीमान सम्पादक जी से किया, लेकिन कुछ नहीं हुआ।

मेरा जून 2015 से अक्टूबर 2015 तक का पारिश्रमिक सहित सभी खर्च का भुगतान अब तक नहीं किया गया है। दैनिक जागरण के महाप्रबंधक श्रीमान आनन्द त्रिपाठी जी भी स्थापना काल से हमें अच्छी तरह से जानते हैं। नये सम्पादक जी के यहां आने से पहले श्रीमान महाप्रबंधक जी एवं पूर्व के सम्पादक जी हर माह मुफस्सिल सम्वाददाताओं के साथ बैठक करते थे। पर नए सम्पादक जी के आने के बाद कोई बैठक नहीं हुई। मेरी खबरों के प्रकाशन पर से तत्काल रोक नहीं हटाई गयी और सरकार द्बारा निर्धारित पारिश्रमिक की भुगतान नहीं किया गया तो बाध्य होकर वाजिब हक पाने के लिये उच्च न्यायालय, पटना से गुहार लगायेंगे। मेरे जैसे कई पत्रकार पीड़ित हैं।

Satya Narayan
stnarayan00@gmail.com

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रांची एक्सप्रेस अखबार में मीडियाकर्मियों का शोषण, स्टाफ चिंतिंत

रांची एक्सप्रेस का नया प्रबंधन अपने स्टाफ के साथ तानाशाही भरा रवैया अपना रहा है. यहां के स्टाफ को दो माह बाद सेलरी दिया जाना आम बात हो गयी है. दो माह बाद भी कुछ स्टाफ को सेलरी दी जाती है, कुछ को नहीं. शिकायत करने पर कोई सुनवाई नहीं होती है. स्टाफ को प्रबंधन द्वारा न तो कोई आईडी दिया गया है, न ही पीएफ की सुविधा. ऐसे में कई स्टाफ लेबर कोर्ट में जाने वाले हैं.

समय पर वेतन न मिलने के कारण स्टाफ के लिए अपना परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. कई अच्छे स्टाफ पिछले तीन माह का वेतन न मिलने के कारण प्रबंधन को जवाब देकर चले गये हैं. ऐसे में बाकी बचे लोग अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं. प्रबंधन उनसे तानाशाही भरा रवैया अपना कर काम ले रहा है, मगर सैलरी मांगने पर आग-बगूला हो जाता है. दूसरी तरफ प्रबंधन के लोग अखबार के प्रोपेगंडा के लिए बड़े-बड़े होटलों में प्रोग्राम कर पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं. साथ ही प्रबंधन अपनी नाकामियों का ठीकरा संपादकीय स्टाफ पर फोड़ रहा है, जबकि इस अखबार के संपादकीय विभाग में ज्यादातर मेहनती व अनुभवी लोग हैं जो विभिन्न प्रतिष्ठित अखबारों में काम कर चुके हैं.

गौरतलब है कि रांची एक्सप्रेस अखबार झारखंड का काफी पुराना समाचारपत्र है. एक समय था जब इस प्रदेश में इस अखबार की तूती बोलती थी. इस अखबार को सरकार के आईपीआरडी से अन्य अखबारों की तरह ऐड मिलता है. मगर स्टाफ को वेतन देने में यह अखबार कंजूसी कर रहा है.  वस्तुस्थिति यह है कि जून माह बीतने के बावजूद ज्यादातर स्टाफ को अप्रैल माह का वेतन भी नहीं नसीब नहीं हुआ है.

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‘चक दे’ में काम कराते हैं लेकिन सेलरी नहीं देते

मेरा नाम रणजीत कौर है और मैंने ‘चक दे’ में 8 जून 2016 को ज्वाइन किया था, बतौर न्यूज़ एंकर इन पंजाबी. स्टार्टिंग में बड़ी बड़ी बातें की गयी थीं. पर था कुछ नहीं. नाईट ड्यूटी थी और सिक्योरिटी के नाम पर कुछ नहीं था. एक छोटी सी बिल्डिंग में इसका ऑफिस है, फरीदाबाद में. वहीं कॉल सेंटर चलते हैं. वहीं न्यूज़ चैनल भी है. इस चैनल का मालिक एनआरआई है.

यहां गणेश नायर है जो सुब कुछ देखते हैं. नाईट में जो लड़कियां रहती हैं उनकी सेफ्टी के लिये कुछ भी नहीं है. गणेश नायर अपने नीचे काम करने वालों का शोषण करते हैं. कहने को तो ये चैनल बताते हैं लेकिन इनके पास कोई लाइसेंस नहीं है चैनल चलाने का. ये दरअसल वेब न्यूज़ चैनल चलाते हैं. यहां पर लड़कियों को बिना कारण परेशान किया जाता है. जिसे भी इम्प्लॉयी को रखा जाता है उसे एक या दो महीने काम कराके बिना सेलरी के ही वापस भेज दिया जाता है.

मैंने नाईट शिफ्ट की है जिससे मेरी हेल्थ तो खराब हुई ही, साथ में मैं फाइनेंशली भी काफी वीक हुई. गणेश नायर फालतू की बातें करता था. वह लुभावनी बातें करके शोषण करने के मौके ढूंढत था. मेरे अलावा बहुत से लोग हैं जिनकी सेलरी उसने नहीं दी. साथ में मेंटली परेशान किया वह अलग से. बात मेरे लिए पैसों का नहीं है. ऐसे काम बंद होने चाहिए जहां काम करने वालों का हर तरह से शोषण किया जाता है. मैं नहीं चाहती मेरे बाद कोई दूसरा बंदा इस चैनल के झांसे में फंसे और अपना वक्त, पैसा बर्बाद करे.

रणजीत कौर
jesikajesus84@gmail.com

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80 प्रतिशत पत्रकारों को सेलरी से मतलब, सरोकार से नहीं

देश को जगाने वाले खुद अंधेरे में, कौन बोले उनके लिए…  जो देश को जगा रहे हैं उनकी भी कोई सुधि लेने वाला है सभी को उनसे बस समाचार चाहिए चोखा। मतलब सही और रोचक। देश की पूरी ईमानदारी पत्रकार से ही चाहिए। जो पत्रकार लिखता पढ़ता है वह सच्चा भी होता है। 80 प्रतिशत ऐसे पत्रकार है देश में। उन्हें बस अपनी सैलरी से ही मतलब है। समाचार वहीं लिखने का प्रयास करते है जिसमें सच्चाई होती है। हर मीडिया कंपनी में ऐसे लोग है तभी आप सच्चाई को समझ और जान पा रहे है।

10 प्रतिशत खबरें सोशल मीडिया से आप को मिल जाती है। बाकि की सही और सटीक खबरें वहीं सच्चे पत्रकार अपनी रिपोर्टिंग से आप तक सामने लाते है। यह सब सही है लेकिन उनकी बात करता कौन है। उन्हें बस खबरों के लिए किया जाता है बाकि के लिए दलालों और लाइजनरों को। देश में 10 प्रतिशत ऐसे पत्रकार है जो दिनभर नेताओं और अधिकारियों की खुशामती में लगे रहते है। समय समय पर वो खुद फोटो फेसबुक, टविटर और अन्य सोशल मीडिया पर खुद अपलोड भी करते रहते है और 90 प्रतिशत ऐसे भी पत्रकार है जिनके पास खुद नेताओं और अधिकारियों के आते है।

वो बेचारे इसी में मस्त रहते है। उन्हें अधिकारी फोन करता है। नेता उन्हें फोन करता है। वो इसी गलतफहमी में पूरा जीवन मुफलिसी में बिता देते है। ऐसे पत्रकार न तो परिवार के हो पाते हैं और न ही समाज के। केवल बस खबरें ही लिखते लिखते सेवानिवृत्त हो जाते हैं। देश में ऐसे बहुसंख्यक पत्रकार है जिनके पास अपना घर नहीं है। हां एक बात हमने देखी है किसी को जब ​कही से न्याय नहीं मिलता तो उसके लिए मीडिया ही एक अंतिम जरिया बचता है। फिर भी लोगों को सच्चे पत्रकारों की कोई कद्र नहीं है।

एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी भी घर का मालिक है

जरा ईमानदारी की बात करने वालों से एक सवाल है। जो कह रहे है अखिलेश के राज में कुछ पत्रकारों ने माल कमाया है उनकी शामत आने वाली है। क्या पत्रकार माल कमा सकता है। नहीं। वो 10 प्रतिशत ऐसे लोग है जिनको कभी नहीं लिखना पढ़ना है लेकिन पत्रकार  है। सरकार ऐसे लोगों को मान्यता कार्ड भी दे देती है। जो लिखने पढ़ने वाले है उन्हें कभी नहीं कार्ड जारी होता है। सरकारी वाहन का चालक भी घर बना लेता है लेकिन क्या कोई पत्रकार घर बना पा रहा है नहीं। यह बात कुछ के गले भी न उतरे तो क्या लेकिन उनकी आत्मा को जगाने का काम करेगी।

संतोष कुमार पांडेय
वरिष्ठ रिपोर्टर
पत्रिका, आगरा
pandey.kumar313@gmail.com

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महिला पत्रकार ने अपने स्टेट हेड पर लगाए कई गंभीर आरोप

छत्तीसगढ़ में चैनल और अखबार बने उगाही का जरिया… न्यूज चैनल /अखबारों के रिपोर्टर व पत्रकार हो रहे शोषण के शिकार… पत्रकार संगठनों की भूमिका पर भी उठे सवाल..

स्टेट हेड/ एडिटर की आड़ में न्यूज चैनल करते हैं उगाही… छत्तीसगढ़ बना चारागाह… छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना के बाद छत्तीसगढ़ सरकार के जनसम्पर्क विभाग से डीपीआर लेने के फेर में छत्तीसगढ़ में कुकुरमुत्ते की तरह न्यूज चैनलों की बाढ़ आ गई है. न तो अधिकतर चैनल प्रदेश में सभी जगह दिखाई देते हैं न ही चैनल में कार्य करने वाले जिला रिपोर्टरों एवं ब्लॉक के स्ट्रिंगरों को मानदेय मिलता है. ये रिपोर्टर और स्ट्रिंगर प्रदेश की पल-पल की घटनाओं को ब्रेकिंग, स्क्रॉल, एंकर विसुसल, बाइट के माध्यम से भेजते हैं. विभिन्न ब्रेकिंग न्यूज के ग्रुपों एवं एफटीपी के माध्यम से चैनल के इनपुट तक पहुंचाते हैं. मेल से खबरों को भेजते हैं. लेकिन क्या वो सभी खबरे चलती हैं? नहीं. आखिर क्यों नहीं चलती हैं?

ब्लॉक एवं जिला स्तर पर कार्य करने वाले रिपोर्टरों एवं स्ट्रिंगरों को चैनल दुर्घटना बीमा का लाभ तक नहीं देते हैं. स्ट्रिंगरों और रिपोर्टरों को खबरों के बदले कोई पारिश्रमिक सैलरी नहीं दिया जाता है. एक-दो चैनलों को छोड़ दें तो बाकी सभी चैनल शोषण, उत्पीड़न और उगाही का अड्डा हैं. ये लोग न रिपोर्टरों को मोबाईल एलाउंस देते हैं न ही पेट्रोल एलाउंस, न ही वीडियो कैमरा, न ही किसी प्रकार की कोई सैलरी. लेकिन जब उन रिपोर्टरों से कोई खबर चूक जाये या किसी कारण से कोई फोन अटेंड नही कर पाए तो तुरंत चैनल हेड / एडिटरों का फोन आते ही रिपोर्टरों एवं स्ट्रिंगरों से ऐसे बात किया करते हैं जैसे वो उनके बंधुआ मजदूर हों। यदि कोई खबर किसी बड़े नेता / मंत्री या उद्योगपतियों से जुडी हो तो फिर पूछिए मत. आपसे फोनों के लिए सम्बंधित व्यक्ति अथवा नेता / अधिकारी का नम्बर मंगाया जायेगा. फिर आप टीवी के स्क्रीन पर समाचार का इंतिजार करते हुए बैठे रहिये. आपका समाचार चलेगा ही नहीं. लेकिन दिनभर मेहनत करके आपके द्वारा भेजे गई खबर को नहीं चलने का कारण आप पूछ भी नहीं सकते. यदि आपने पूछ भी लिया तो आपको कोई सन्तुष्टिजनक जवाब नहीं मिलेगा.

स्टेट हेड एवं एडिटर रायपुर में बैठ के लगा रहे आईडी की बोली… हालाँकि सुनने में ये बात थोड़ी अजीबो गरीब लगेगी लेकिन रायपुर में बैठे चैनल के ठेकेदार आपके जिला में स्थित उद्योगों एवं आर्थिक स्थिति के अनुसार आपसे आईडी का सौदा करेंगे. जिला रिपोर्टर बनना है तो 50 हजार… ब्लॉक रिपोर्टर बनना है तो 20 से 30 हजार रुपया… ये पैसे बाकायदा आपसे डोनेशन के तौर पर लिया जायेगा… पहले तो आपको यह राशि कार्य छोड़ने के वक्त वापसी की बात की जायेगी… लेकिन भला अख़बार या चैनल से किसी को पैसा वापस मिला है किसी को… इतना ही नहीं, आई डी एवं पीआरओ लेटर जारी करते ही आपका शोषण प्रारम्भ हो जाता है.. फिर शुरू होता है टारगेट का खेल…. 26 जनवरी, 15 अगस्त, दीपावली, नेताओं की जयंती, पुण्य तिथि, मंन्त्री मिनिस्टरों के आगमन… इन सभी अवसर पर उन्हें चाहिए विज्ञापन. भले ही आपका समाचार चले न चले, चैनल दिखे न दिखे, लेकिन आपको विज्ञापन देना ही पड़ेगा.

रायपुर से बैठ के होता है खबरों का सौदा… जी हां सुनने में थोड़ा अजीब लगे लेकिन रायपुर में बैठे चैनल हेड/ एडिटर खबरों के ठेकेदार अपने नफा नुकसान के आधार पर खबरों का चयन एवं सौदेबाजी करते हैं… यदि खबर मंत्री जी से जुडी कुनकुनी 300 एकड़ आदिवासी भूमि घोटाले की हो, खनन माफियाओं से जुडी खबर हो, भ्रष्ट अधिकारियो से जुडी खबर हो या फिर देश के सबसे बड़े प्रिंट मीडिया ग्रुप डी बी पॉवर से जुडी आदिवासी भूमि घोटाला की खबर जिस पर प्रधानमंत्री कार्यलय से कार्यवाही का आदेश हो… इसे रोक करके उल्टे दलाली की जाती है… ऐसे ही मामले में एक जिले की महिला रिपोर्टर आरती वैष्णव को धमकी देते हुए चैनल से निकाले जाने एवं आईडी जमा करने की बात कहता है साधना चैनल का स्टेट हेड आरके गांधी. साधना न्यूज छत्तीसगढ़ के स्टेट एडिटर आरके गांधी की पोल जब महिला पत्रकार ने खोल दी तो महिला पत्रकार को बदनाम करने के लिए खनिज माफियाओं से कर लिया सांठगांठ.

श्री माँ प्रकाशन की आड़ में पूरे छत्तीसगढ़ को लूटा… जी हां अपने आपको स्टेट हेड बताने वाले दलाल श्री आर के गांधी ने श्री माँ प्रकाशन के नाम से मुझसे लिया विज्ञापन… 25 हजार नगद एवं 25 हजार का स्टेट बैंक खरसिया का चेक लिया… अंबिकापुर, बिलासपुर, भिलाई, दुर्ग, जाजंगिर, कोरिया सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों से जिला रिपोर्टर के लिए 50 हजार से 1 लाख रुपये लिए. संभाग हेड के लिए 1 लाख से 5 लाख तक लिए… ब्लॉक स्तर के लिए 30 हजार की राशि स्ट्रिंगरों से वसूल किया गया… बदले में श्री माँ प्रकाशन का आईडी एवँ पीआरओ जारी किया गया… अब जबकि श्री माँ प्रकाशन का अनुबंध साधना न्यूज से समाप्त हो गया है तो लोगों को उनका डिपॉजिट वापस करने में आनाकानी किया जा रहा है…

डीबी पावर प्रिंट मीडिया समूह द्वारा खरसिया तहसील जिला रायगढ के विभिन्न ग्रामों में गरीब आदिवासियों की जमीन कब्जाने की खबर का प्रसारण करने के बजाय उल्टे डीबी पॉवर के जीएम धनंजय सिंह के साथ सांठ गांठ करके मुझे मोबाईल में तत्काल चैनल छोड़ने एवं आईडी जमा करने की धमकी आर के गांधी द्वारा दी गई. मेरे द्वारा जमा डिपॉजिट वापस मांगने पर बदनाम करने एवं कैरियर खराब करने की धमकी दिया गया है. आर के गांधी द्वारा आज भी श्री माँ प्रकाशन के नाम से आईडी एवं पीआरओ को बेचा जा रहा है.

विज्ञापन प्रसारित किये बिना बिल की मांग एवं प्रत्येक महीना वसूली करके कभी 30 हजार कभी 50 हजार देने का दबाव बनाया जाता है. ऐसे में भला कोई व्यक्ति कैसे कार्य करेगा… आर के गांधी के इस अपमान जनक बातों एवं अवैध उगाही के कारण छत्तीसगढ़ में साधना न्यूज अपनी पहचान खो चुका है…

अब एक बार फिर से नई नियुक्ति के नाम से रिपोर्टरों से वसूली की तैयारी आर के गांधी द्वारा की जा रही है. किसी भी रिपोर्टर को सैलरी तो दूर, साल भर कार्य करने के बाद भी प्रेस कार्ड तक जारी नहीं किया गया है… आज छत्तीसगढ़ में साधना न्यूज के पतन का मुख्य जिम्मेदार आर के गांधी ही है… ऐसा दलाल जो रायपुर में बैठकर आई डी बेच रहा है और रिपोर्टरों को धमकाता है… हर माह पैसे देने को कहता है…. रिपोर्टर को बंधुवा मजदूर की तरह समझता है…  ऐसा व्यक्ति है ये दलाल आर के गांधी… कई प्रताड़ित पत्रकार उक्त मामले में जल्द ही छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की शरण में जाने को तैयार हैं…

सुनिए दलाल आरके गांधी से मेरी बातचीत… इस टेप से समझ में आ जाएगा कि जो मैंने आरोप लगाए हैं वो निराधार नहीं हैं…

आरती वैष्णव
जिला रिपोर्टर
साधना न्यूज
रायगढ़

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छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की आड़ में कैसा खेल, बिना वेतन जिलों में काम कर रहे पत्रकार

चैनल की माइक आईडी की लग रही बोली, वसूली और धमकी का चल रहा खेल, अनशन-शिकायतों का लगा अंबार, सोशल नेटवर्क का बेजोड़ इस्तेमाल, पीएमओ तक हो रही शिकायत

2016 का साल बीत चला। अगर आपका यह साल खराब बीता हो। तो आप नए साल की बेहतरी के लिए कई तरीकों का इजाद करेंगे। इन तरीकों में चैनल की माइक आईडी सबसे बेहतर और कारगर उपाय है। आप माइक आईडी लीजिए और आप हो गए पावरफुल। चाहे आपको पत्रकारिता के मापदंड मालूम हो या नहीं। इस माइक आईडी के साथ वाट्सग्रुप, फेसबुक, ट्वीटर जैसे सोशल नेटवर्क आपके पास हथियार हैं। इन सबके बावजूद आपको और पावरफुल होना है तो आप सामाजिक कार्यकर्ता, भ्रस्टाचार उन्मूलन संगठन, मानवाधिकार संगठन से अपना नाता जोड़ लें। समाज के लिए आप कुछ करें या ना करें। लेकिन आप अपने एशो-आराम के लिए तमाम वो उपाय करेंगे जिससे आपकी जिंदगी लग्जरी हो जाए। कुछ इसी तरह का रास्ता इन दिनों छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता की आर में चल रहा है। कोई आवाज उठाता है। तो उसको मिलती है धमकी। रूसवाई। अपमान। मानसिक प्रताड़ना। शिकायतों का अंबार। ऊँची पहुँच की धौंस। और क्या न क्या।

ऐसे बहुत सारे मामलों का अंबार है। नक्सल प्रभावित इस राज्य में। ठीक है। आप मुद्दों को उठाओ, उसकी गहराई तक पहुँचो। जो माध्यम है। उन माध्यमों के जरिए पीड़ितों को हक दिलाओ न कि अपनी रोटी सेंको। पैसा बनाओ। लग्जरी जीवन-यापन करो। कुल मिलाकर आप जिस पर दलाली का आरोप लगाते नजर आते हो। वो खुद अपना गिरबां देख लें। वो क्या कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला का खरसिया का क्षेत्र। जहां 2015 में एक वैष्णव परिवार काफी सुर्खियों में रहा। एफआईआर हुआ। जेल की सलाखों के बीच पहुँचा परिवार। कई सारी अफवाहें भी आई। इन अफवाहों में जून 2015 में एक रायगढ़ जिला जेल में खरसिया के वैष्णव दंपत्ति के अनशन की खबर भी थी। जो सिर्फ और सिर्फ अफवाह निकली थी। अजाक पुलिस ने एक पुराने मामले मेंं खरसिया निवासी भूपेंद्र किशोर वैष्णव एवं उसकी पत्नी आरती वैष्णव को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के पूर्व वैष्णव दंपत्ति खरसिया एसडीएम आफिस के बाहर आमरण अनशन पर बैठे हुए थे। ऐसे में, उनकी गिरफ्तार व जेल दाखिले की पुलिसिया कार्रवाई के बाद भी जेल अंदर उनके अनशन की खबर फैलाई जा रही थी। जिसे जेल प्रशासन ने खारिज किया था।

2015 का साल जैसे-तैसे इस परिवार के लिए बीता। 2016 की शुरूआत में श्री मां प्रकाशन कंपनी के तहत साधना न्यूज के लिए आरती वैष्णव ने 25 हजार रूपए चेक एवं 25 हजार चेक के जरिए अपनी नियुक्ति पत्र ले ली। जिस व्यक्ति ने इस नियुक्ति की मध्यस्थता की। उसने 10 हजार रूपए का कमीशन भी लिया। आरती वैष्णव ने साल में चैनल के लिए विज्ञापन भी किया। एक स्कूल में धमकी-चमकी का मामला भी आया। ऐसी शिकायतों की अंबार लग गई। लेकिन चूंकि चैनल दो कंपनियों की आपसी द्वंद में फंसा था। ऐसे में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले पर किसी की नजर नहीं गई। श्री मां प्रकाशन से साधना न्यूज का एग्रीमेंट खत्म हुआ। लेकिन संस्थान ने पिछली कंपनी द्वारा नियुक्त किसी भी व्यक्ति को बाहर का रास्ता नहीं दिखाया।

आरती वैष्णव साधना न्यूज रायगढ़ के लिए नियुक्त थी। लेकिन वो अपने पति को संस्थान से जुड़ने के लिए दबाव बनाती रही। जिस पर प्रबंधन ने कोई ध्यान नहीं दिया। इसी बीच खरसिया के कुनकुनी जमीन घोटाला सुर्खियों में आया। इसको लेकर आरती वैष्णव ने संस्थान प्रमुख को खबरों को हो रही अपडेट में कोई जानकारी नहीं दी। इसके अलावाा आरती वैष्णव तो संस्थान के लिए नियुक्त थी। लेकिन काम करते नजर आते थे भूपेन्द्र वैष्णव। कुनकुनी जमीन घोटाला में शिकायतों का दौर शुरू हो चुका। जो गलत है। वो गलत है। पीएमओ तक यह मामला पहुँचा है। आरती वैष्णव से बात करने की कोशिश की तो पहले उन्होंने फोन नहीं उठाया। और बाद में जिस फोन से रिकार्डिंग होती है, उससे फोन कर स्टेट हेड पर ही उलटा आरोप जड़ दिया गया। फिलहाल इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। पुलिस में शिकायत हो चुकी है। आरती वैष्णव सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मानवाधिकार एवं भ्रष्टाचार उन्मूलन संगठन में छत्तीसगढ़ प्रदेश महासचिव नियुक्त हैं। राष्ट्रीय नागरिक सुरक्षा मंच मानवाधिकार की जन सूचना अधिकारी भी है। इस लेख के साथ ऑडियो भी है। कुछ वॉटसअप क्लिप भी हैं। इस लेख की अगली किस्त का इंतजार कीजिए जिसमें कुछ अहम कड़ियां और भी सामने आने वाली हैं।

लेखक आरके गाँधी साधना न्यूज में बतौर स्टेट हेड नियुक्त हैं। संपर्क : gandhirajeevrohan@gmail.com

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अमर उजाला में हो रहा शोषण, 5 दिन की सेलरी देकर 6 दिन काम ले रहे नए संपादक

प्रिय भड़ास,

यह सिर्फ शिकायती पत्र नहीं है। न ही किसी एक व्यक्ति की ओर से है। यह अमर उजाला के पीड़ित और शोषित कर्मचारियों की ओर से है। इस पत्र के जरिए नव नियुक्त संपादक महोदय की तानाशाही को उजागर किया जा रहा है। AUW यानि अमर उजाला वेबसाइट में इन दिनों कर्मचारियों का जमकर शोषण हो रहा है। इस पत्र के जरिए श्रम विभाग से गुहार है कि वह कर्मचारियों के साथ हो रहे अन्याय की पड़ताल करे।

आने वाले दिनों अमर उजाला की वेबसाइट नई ‘ऊंचाइयों’ को छूने वाली है, ठीक वैसे ही जैसे की हिंदुस्तान की छू रही है। इसका कारण भी वही होंगे जो हिंदुस्तान से अब अमर उजाला पहुंच गए हैं। यूं तो जनाब खुद को बड़ा लो प्रोफाइल एडिटर बताते हैं, पर अब पता लग रहा है कि वाकई कितनी ‘निम्न श्रेणी और निम्न सोच’ के आदमी हैं। हालांकि उम्मीद करते हैं कि वे अमर उजाला की रोशनी बनाए रखेंगे,  हालांकि ये मुश्किल नजर आ रहा है। जिस तरह का माहौल वे बना रहे हैं और जिस तरह से कंटेंट टीम का शोषण कर रहे हैं,  निश्चित ही अमर उजाला को भविष्य में इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। शोषण और निकृष्टता का वातावरण तैयार करने की कुछ बानगी देखिए…

– सबसे पहले 5 दिन से 6 दिन का काम कर दिया गया वो भी सिर्फ कंटेंट टीम के लिए। हैरानी तब होती है जब HR और मैनेजमेंट इस बारे में सूचित नहीं करते, महाशय करते हैं तो इसे किसका निर्णय समझा जाए। जबकि महाशय जी ठीकरा फोड़ते हैं मैनेजमेंट के सिर पर।

– एक और बात समझ नहीं आई, अगर एचआर पॉलिसी में ही बदलाव किया है तो फिर ये कैसी पॉलिसी है जो कंटेंट के लिए 6 दिन औऱ बाकी सबके (प्रोडक्ट, मैनेजमेंट, मार्केटिंग, आईटी) के लिए 5 दिन की है।

– एचआर पोलिसी में साफ-साफ 5 दिन काम करवाने का प्रावधान है, उसी हिसाब से सबकी सैलरी और छुट्टियां तय हुई हैं। पर अब 6 दिन के हिसाब से न तो किसी की सैलरी बढ़ाई गई जा रही है और ना ही सालभर में मिलने वाले छुट्टियों जैसे अन्य लाभ।  सबूत के तौर पर HR Policy का ये स्नैपशॉट देखिए….

– 6 दिन काम का फरमान सुनाते वक्त कहा गया कि ‘उत्पादकता’ घटी है, ‘बुद्ध पुरुष’ ने यह नहीं पूछा कि किस सेक्शन में कितने काम कर रहे हैं। फीचर में तो एक-एक आदमी के हवाले पूरा का पूरा सेक्शन है। तो छुट्टी वाले दिन भी लोग घर से जुटे रहते, कर्मठता का सिला ये मिला कि अब न घर से काम कर सकते हैं और ज्यादा दिन ऑफिस भी आना है। जबकि तनख्वाह तो बढ़ेगी ही नहीं। न्यूज टीम का हाल तो उससे भी बुरा है। यहां अब चमचों की भर्ती के लिए पुराने कर्मठ लोगों को ‘चाटुकार’ के जरिए परेशान किया जाने लगा है।

– चाटुकारों की मौज… जब से नए महाशय ने कार्यभार संभाला है ऑफिस वालों को एक नया चाटुकार देखने को मिला है… चाटुकार आजकल जी-हुजूरी में ही लगे रहते हैं। सब कंटेंट वाले जब एक स्वर में 6 दिन के लिए बात करने वाले थे तो इन्हीं चाटुकार महोदय ने आकर सबको मीठी गोली दी और अपनी चाल चल कर दोनों ओर से भले बने रहे।

– एचआर में AUW को नया आदमी दिया गया है, पर ये HR का कम और महाशय का ‘झंडू’ ज्यादा नजर आता है।

– वर्क फ्रॉम होम खत्म…. डिजिटल में काम करने वाले इस बात से वाकिफ हैं कि वर्क फ्रॉम होम की अहमियत और जरूरत क्या है… पर लगता है जनाब अभी तक प्रिंट की आदतें ही नहीं छोड़ पा रहे। तभी तो जरुरतमंदों के लिए भी इसे खत्म कर दिया गया।

– छुट्टियां अधिकार है पर ले के तो दिखाओ…. एक बैठक में कहा गया छुट्टियां कर्मचारी का अधिकार है जरुर लें, पर कोई दे तो।

– एक साथी कर्मचारी पिछले दिनों दुर्घटना का शिकार हुए उन्हें छुट्टियां मिलने में जो मुश्किल आ रही है सो तो अलग है उन्हें घर से भी काम नहीं करने का विकल्प नहीं दिया जा रहा। इससे ज्यादा शोषण और अमानवीय व्यवहार और क्या होगा।

–  चाय तक पर रोक लगी है… एक वक्त था जब चार लोग साथ चाय पी सकते थे पर अब तो अकेले चाय पीने के लिए भी सोचना पड़ता है। जबकि चाटुकार खुद पर 5 मिनट में ऑफिस के बार दिखते है। तर्क है कि इससे समय बर्बाद होता है, पर हम पूछते हैं कि हे बुद्ध पुरुष जरा बताओ चार लोग जाएं या एक 10-15 मिनट में लौट आएंगे। जबकि एक-एक जाएगा तो 6 आदमी औसत में 60 मिनट बिता आए। पता नहीं किस बुद्धिमान ने महाशय को यह सलाह दी या उनकी खुद की बुद्धिमानी है। 

– कर्मचारियों पर बेवजह की तांकाझांकी…. अधिकारियों का काम मैनेज करना होता है न कि जासूसी करना, पर जनाब को काम तो करना नहीं जासूसी जरूर करनी है। ऑफिस के कोनों से यूं झांकते रहते हैं मानो सारे कामचोर बैठे हों। इससे आप की ही इज्जत कम होती है महाशय जी।

– इसी माहौल को देखते हुए इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है और नहीं मैनेजमेंट को चेतावनी है कि अगर माहौल नहीं बदला तो जल्द ही हड़ताल भी हो सकती है।

नए महाशय का कहना है कि यहां बडे़ नाम वाले संपादक आए और गए पर ‘कुछ नहीं’ कर गए। शायद उनका इशारा कर्मचारियों के शोषण की ओर था जिसकी कलई अब धीरे-धीरे खुल रही है। इस पत्र के जरिए हम सब मैनेजमेंट और मालिकों से कहना चाहते हैं कि इस महाशय के निर्णयों से अमर उजाला की साफ सुथरी और कर्मचारी हितैषी छवि को निश्चित ही अपूरणीय नुकसान हो रहा है और आगे भी होगा।

मैनेजमेंट और मालिकों को चाहिए कि वे पुनर्विचार करें कि कही ‘बंदर के हाथ में बंदूक’ तो नहीं दे दी गई है। अभी तो हिटलरशाही का वातावरण तैयार हो रहा है, धीरे-धीरे वो वक्त आएगा जब कर्मचारी के गुस्से का फल गिरती विजिटर संख्या के रूप में दिखेगा। महाशय से भी यही प्रार्थना है कि ‘जड़ता’ को छोड़ दें औऱ डिजिटल बनें। हो सकता है आप अनुशासन के नाम पर डर पैदा कर रहे हों और संभवतः यही आपके लिए आत्मघाती साबित हो। रही बात नजरों की तो वो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि गिरे हैं कि नहीं।

सादर

अमर उजाला कंटेंट के सभी डिजिटल मजदूरों की ओर से

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मोदी राज में सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीन कार्यरत सैकड़ों मीडियाकर्मियों का जमकर किया जा रहा शोषण

सेवा में,

यशवंत सिंह
संपादक
भड़ास4मीडिया डॉट कॉम

विषयः- सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनिटरिंग सेन्टर के कर्मचारियों की दयनीय स्थिति से अवगत कराने के संबंध में प्रार्थना पत्र

मान्यवर,

हम इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनिटरिंग सेन्टर में, अनुबंधित कर्मचारी है। गत कई वर्षों से हमारी स्थिति काफी दयनीय बनी हुई है जिसकी ओर हम आपका ध्यान निम्न बिन्दुओं के माध्यम से आकर्षित कराना चाहते है। हमारे कार्यालय में कार्यरत सभी कर्मियों को तीन माह के अनुबंध पर रखा जाता है जबकि अन्य समतुल्य मीडिया संस्थानों (दूरदर्शन, राज्यसभा टी.वी. लोकसभा टी.वी. पीआईबी, डीएवीपी, आकाशवाणी) में, सभी अनुबंधित कर्मियों को कम से कम एक वर्ष से दो वर्ष के अनुबंध पर रखा जाता है। इसी तीन माह के छद्म अनुबंध की आड़ में, नियोक्ता की ओर से मिलने वाली अधिकांश आधारभूत सुविधाओं से हमें दूर रखा जाता है। 

संस्थान में कार्यरत अधिकांश मॉनिटर पहले पेशेवर पत्रकार, मीडिया शोधार्थी और पत्रकारिता में परास्नातक छात्र रह चुके है। हमारा वेतन अन्य समतुल्य मीडिया संस्थानों (दूरदर्शन, राज्यसभा टी.वी. लोकसभा टी.वी. पीआईबी, डीएवीपी, आकाशवाणी) की तुलना में बेहद कम है। हमारे वेतन में आखिरी बार वृद्धि फरवरी 2014 में हुई थी। इस कारण हमें बहुत सी आर्थिक समस्यायों से रोज दो-चार होना पड़ता है। दैनिक मदों पर बढ़ती मंहगाई के कारण जीवनयापन करने में दिक्कत आती है। कार्यालय के अधिकांश कर्मी दिल्ली से बाहर के है। जिस कारण दैनिक मदों के साथ मकान का किराया भी देना पड़ता है। हम चाहकर भी साधारण जीवनशैली जीने में अक्षम है। संस्थान द्वारा प्रदत्त वेतन हमारी योग्यता कुशलता अनुभव और दक्षता की अपेक्षाकृत बेहद कम है।  

कार्यालय के कर्मियों को बहुत सी स्वास्थ्य समस्यायों का सामना करना पड़ता है। कार्यालय से हमें किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सुविधा (Health Benefit) उपलब्ध नहीं है। संस्थान के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सदैव तीन माह के अनुबंध का हवाला देते हुए, इस तरह की सुविधा देने से बचते है। जबकि वास्तविकता ये है कि, इस कार्यालय में बहुत से अनुबंधित कर्मी आठ वर्ष से अधिक पुराने है। कार्यालय द्वारा स्वास्थ्य सुविधा ना देने के अभाव में, हमें तरह तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

नियोक्ता बेसिल ने हमारे वेतनभोगी खाते का परिचालन करने वाले कॉर्पोरेशन बैंक (सी.जी.ओ. परिसर, लोधी रोड़) को स्षष्ट निर्देश दे रखे हैं जिस कारण हमें बैंकिग की आधारभूत सुविधायें (होम लोन, पसर्नल लोन, क्रेडिट कार्ड) आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाती है। इन सुविधाओं के अभाव में हमें काफी मानसिक तनाव का सामना करना पड़ता है। लोन सुविधा ना उपलब्ध हो पाने के कारण हम किसी भी प्रकार का ठोस कार्य करने में असमक्ष होते हैं।

संस्थान में कार्यरत महिला कर्मियों को सवैतानिक मातृत्व अवकाश लाभ की सुविधा उपलब्ध नहीं है जिस कारण वे इस लाभ से वंचित रह जाती है। आत्मनिर्भर प्रसूता महिलाओं को अपने बच्चों के लालन-पालन में बाधाओं का सामना करना पड़ता है जबकि ये मानवीय आधार पर बहुत गलत है।

राजपत्रित अवकाश पर कार्य करने पर, हमें किसी भी प्रकार का अतिरिक्त भुगतान नहीं होता है जबकि अन्य समतुल्य मीडिया संस्थानों (दूरदर्शन, राज्यसभा टी.वी. लोकसभा टी.वी. पीआईबी, डीएवीपी, आकाशवाणी) में ये सुविधा उपलब्ध है। इस मुद्दें पर संस्थान के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सदैव तीन माह के छद्म अनुबंध का हवाला देते हुए स्वयं को असक्षम बताते है।

आशा है कि आप उपयुक्त समस्यायों का निराकरण शीघ्र ही करवायेगें।

आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में,

समस्त अनुबंधित कर्मचारी

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मॉनिटरिंग सेन्टर, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (भारत सरकार)

10 फ्लोर, सूचना भवन, सी.जी,ओ, कॉम्प्लेक्स

लोधी रोड, नई दिल्ली-110003

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‘ओके इंडिया’ न्यूज चैनल नहीं दे रहा अपने पत्रकारों को पैसा

‘ओके इण्डिया’ नामक न्यूज चैनल कर रहा पत्रकारों का शोषण. आठ महीनों से नहीं दिए न्यूज का पेमेंट. अपने आपको नेशनल न्यूज चैनल बताने वाला ओके इण्डिया न्यूज चैनल फरवरी से आनएयर   हो गया था और तभी से न्यूज पत्रकारों से ली जा रही थी. पहली मीटिंग में जोगिन्द्र दलाल जो मालिक हैं, ने 200 रूपये पर न्यूज की बात की थी परन्तु आज आठ महीनों से हरियाणा के स्ट्रिंगरों को एक भी पैसा नहीं दिया.

दिवाली भी काली मनाई गई! सिर्फ असाइनमेंट वाले खबर मांगते हैं. पेमेंट की बात की जाये तो पता नहीं होता, कहते हैं मालिक जानें. अब हालात ये है कि हरियाणा का एक और नया ब्यूरो चंडीगढ़ में  बिठा दिया है जो न्यूज माँगता है. शिव शर्मा हरियाणा बुलेटिन के लिए रखा गया है परन्तु पेमेंट की बात नहीं करता है. चैनल की तरफ से कोई बात नहीं की जा रही है कि कब पेमेंट दी जाएगी.

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कई चैनलों के स्ट्रिंगर के घर नही जलेंगे दीपावली पर चूल्हे!

मीडिया की रीढ़ कहे जाने वाले स्ट्रिंगरों के घर दीपावली का जश्न फीका होने की आशंका है। मिली जानकारी अनुसार कई चैनल पहले से ही घाटे में हैं। उनके पास स्ट्रिंगर्स को देने लिए आश्वासन  के सिवाय कुछ नहीं है। इसमें कुछ चैनल ऐसे हैं जो मीडिया इंडस्ट्री में कई सालों से स्थापित है और कुछ हाल हीमें उभरे हैं। लेकिन सबसे खास बात यह कि सभी चैनल जनता के सामने अपने को सबसे आगे बताने काम करते हैं। कुछ चैनल उस कतार में शामिल हैं जो आज भी 90 रुपए से 150 रुपए ही भुगतान करते हैं। ऐसे में स्ट्रिंगर बड़ी मुश्किल से 3000 रुपए प्रति माह ही कमा पाता है।

आप खुद अंदाज़ लगाए कि इस दौर में स्ट्रिंगर अपने परिवार को कैसे पालेगा और क्या बचायेगा? चैनल के संपादकों को आप ने बड़े बड़े हुनरमंद लोगों को पछाड़ते हुए छोटे पर्दे पर देखा होगा लेकिन यह कभी अपने स्ट्रिंगरों की बातों से पार नहीं पा सके हैं। ऐसे में इन चैनलों की पब्लिक के बीच क्या छवि होगी, आप समझ सकते हैं। सरकार भी चैनल के मालिकों के डर से कुछ भी बोलने से परहेज करती है। यदि सरकार चाहे तो दो मिनट में पता चल सकता है कौन कौन से चैनल भुगतान कर रहे हैं और कितना कर रहे हैं। सावधान हो जाओ स्ट्रिंगर भाईयों… वरना जिंदगी भर चैनलों के मालिकों के शोषण का शिकार होते रहोगे… लड़ना सीखो… एक बार एकजुट होकर दुनिया को सच बताओ… तभी ये सब सभ्य भेड़िये एक दम ठीक हो सकेंगे.

आपका स्ट्रिंगर भाई

बलवीर
बरेली
webnewzindia@gmail.com

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मजीठिया मांगने पर ‘हिंदुस्तान’ अखबार ने दो और पत्रकारों को किया प्रताड़ित

लगता है खुद को देश के कानून और न्याय व्यवस्था से ऊपर समझ रहा है हिंदुस्तान अखबार प्रबंधन। शुक्रवार को एक साथ उत्तर प्रदेश और झारखण्ड से तीन कर्मचारियों को प्रताड़ना भरा लेटर भेज दिए गए। इन कर्मचारियों की गलती सिर्फ इतनी थी की बिड़ला खानदान की नवाबजादी शोभना भरतिया के स्वामित्व वाले हिन्दुस्तान मैनेजमेंट से उन्होंने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और अपना बकाया मांग लिया था।

गोरखपुर के हिंदुस्तान संस्करण में सीनियर कॉपी एडिटर के पोस्ट पर कार्यरत सुरेंद्र बहादुर सिंह और इसी पोस्ट पर कार्यरत आशीष बिंदलकर को कंपनी ने शुक्रवार को ट्रांसफर और टर्मिनेशान की तरफ कदम बढ़ाते हुए एक पत्र भेजा है। इन दोनों साथियों ने 17 (1) के तहत लेबर विभाग में अपने बकाये की रिकवरी के लिए कलेम लगा रखा था। इस पत्र से इन दोनों साथियों को ज़रा भी अचरज नहीं है। आशीष कहते हैं मुझे लेटर अभी नहीं मिला लेकिन कंपनी ने शुक्रवार को मुझे ऑफिस में काम नहीं करने दिया और बताया कि आपको एक पत्र घर पर भेजा गया है। उधर सुरेन्द्र बहादुर सिंह का ट्रांसफर देहरादून कर दिया गया है।

यही नहीं, झारखण्ड में हिन्दुस्तान समाचार पत्र में कार्यरत उमेश कुमार मल्लिक को हिंदुस्तान प्रबंधन के निर्देश पर एचआर डिपार्टमेंट की तरफ से शुक्रवार को एक मेल  भेजा गया है। उमेश का अपराध बस ये है कि उन्होंने कानून और न्याय के निर्देश का पालन करते हुए मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से एरियर व सेलरी देने की मांग अखबार प्रबंधन से कर दी थी। कंपनी टर्मिनेशन के पीछे बहाना खराब परफारमेंस को बना रही है। उमेश दैनिक हिंदुस्तान, रांची के मीडिया मार्केटिंग यानि सेल्स डिपार्टमेंट में कार्यरत हैं।

इन तीनों साथियों के उत्पीड़न से देश भर में हिंदुस्तान में कार्यरत समाचार पत्र कर्मियों में प्रबंधन के खिलाफ जमकर आक्रोश है। सुरेन्द्र बहादुर सिंह ने अपने प्रबंधन और संपादक के खिलाफ ना सिर्फ लोकल पुलिस को बल्कि मानवाधिकार आयोग में भी शिकायत कर रखा है। आप तीनों साथियों से निवेदन है कि आप खुद को अकेले मत समझिये। आपको आपका अधिकार मिलेगा। ये अखबार मालिक सुप्रीम कोर्ट से कतई बड़े नहीं है। आप के साथ आज देश भर के समाचारपत्र कर्मचारी हैं। जल्द ही हिंदुस्तान अखबार की भी चूल हिलेगी।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्टिवेस्ट
मुंबई
9322411335

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मेरे पर आरोप लगाने वाले हमीरपुर के पत्रकार दोहरे और उन्हें समर्थन दे रहे पत्रकारों की असलियत जानिए : राजेश सोनी

आदरणीय भाई यशवंत जी,

विषय : मेरे खिलाफ साजिश रचकर भड़ास में खबर प्रकाशित करवाने के सम्बन्ध में

मैं आपके भड़ास4मीडिया का नियमित पाठक हूँ। आप बहुत अच्छा लिखते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है लेकिन भाई ये जो खबर आपने लगाई है, उसकी सत्यता को आपको जरूर जांचना चाहिए था। मैं आपकी कार्यशैली पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगा रहा हूँ लेकिन ऐसा लेख और किसी का आरोप प्रकाशित करने से पहले आपको एक बार इसकी सत्यता जरूर मालूम करना चाहिए था। इस लिंक https://www.bhadas4media.com/tv/10873-hindi-khabar-ke-reporter-ki-kahani की खबर मेरे बारे में प्रकाशित की गयी है।

भाई, ये जो हमीरपुर के बड़े पत्रकार हैं दोहरे साहब, इनसे मैं खुद प्रताड़ित हूँ, ये और इनके कुछ साथीगण मेरे खिलाफ खुद साजिश रच रहे हैं और जब कोई रास्ता नहीं बचा तो आपका सहारा ले रहे हैं। भाई यशवंत जी, मेरी पत्रकारिता न्यूज़ 24 से 2007 से शुरू हुई है और आज भी मैं न्यूज़ 24 में अपनी सेवाएं दे रहा हूँ। मतलब एक लंबा वक्त मैंने न्यूज़ 24 के साथ बिताया है लेकिन आज तक मेरे दामन में दाग नहीं है। मैंने 2005 से पत्रकारिता के क्षेत्र में आया था जब हमीरपुर जनपद में तीन चार पत्रकार ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के थे। दो साल तक मैंने पूरे लगन और मेहनत से अपने पिता तुल्य नाहिद अंसारी जी (आजतक हमीरपुर) के साथ रहकर पत्रकारिता के क्षेत्र में आया उसके बाद विकास मिश्रा जी से बात हुई तब वो न्यूज़ 24 में थे। न्यूज़ 24 लांच होने वाला था तो उन्होंने मुझे मौका दिया। तब से आजतक मैं चैनल को अपनी सेवाएं दे रहा हूँ।

मेरे खिलाफ आजतक किसी थाने में कहीं एनसीआर तक दर्ज नहीं है। बड़े भाई इस समय मैं एक साजिश का शिकार हूँ। हमीरपुर में एक दलाल पत्रकार थे नरेंद्र यादव जो मूलरूप से फ़ैजाबाद के रहने वाले हैं जो पहले अम्बेडकर नगर etv में थे वहां से उनको 4 साल पहले हमीरपुर भेजा गया लेकिन etv में दलाली के चक्कर में etv द्वारा निकाल दिया गया। तब ये परेशान थे और IBN7 में चले गए। मैंने इनकी बाहरी होने पर इतनी मदद की जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 4 साल तक इस बन्दे ने मुझे सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया लेकिन बच्चों की पढाई के चलते ये लखनऊ सिफ्ट हुए तो इन्होंने एक गेम खेला और मेरी मध्यस्थता में एक दुकान से लखनऊ के लिए बेड खरीदकर ले गए वो भी एक चाल चलकर।

जब मैं आउट ऑफ स्टेशन था तो इसने दूकानदार से बात करवाकर मेरी गारंटी पर साढ़े 8 हजार रूपये उधार कर गए, जिसको इसने आजतक नहीं दिया। 4 महीने से भी ज्यादा एक वक्त गुजर गया लेकिन इसने साढ़े 8 हजार रूपये नहीं दिए। इस सम्बन्ध में इससे मेरी पैसे न पहुँचाने को लेकर बहस हुई और अंततः मुझे पैसे देने पड़े। केवल इतनी सी बात को लेकर ये भाई साहब मेरे खिलाफ साजिश रचने लगे और मौका तलासने लगे। इनसे थोड़ी सी बहस क्या हुई इन्होंने मुझे जान से मारने की धमकी लिखित रूप में दे डाली। जरूरत पड़ने पर वो भी उपलब्ध करवा दूंगा।

इनको मौका कैसे मिला इसकी कहानी भी जान लीजिए…हिंदी खबर चैनल लांच होना था स्वाभाविक है कि मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाना चाहता हूँ तो मैंने अतुल सर से बुंदेलखंड ब्यूरो के लिए बात की क्योंकि मैं न्यूज़ 24 में पहले बुंदेलखंड के 4 जिले से अपनी सेवाएं देता था। हिंदी खबर यूपी उत्तराखंड और बुंदेलखंड का चैनल है लिहाजा मेरे पत्रकारिता और अनुभव को देखते हुए उन्होंने मुझे बुंदेलखंड की जिम्मेदारी सौंपी और सभी बुंदेलखंड के रिपोर्टर्स से खबरों में सक्रियता बनाये रखने के लिए बोला। अब हमीरपुर में ओपी दोहरे को हमसे हिंदी खबर में काम करने के लिए आग्रह किया।

इन्होंने कहा कि ये दो साल से पैदल हैं जिनके पास कोई चैनल नहीं है। इन्होंने मुझे आश्वश्त किया कि खबरों में सक्रियता रहेगी। मैंने इनको दो महीने के लिए रखा कि अगर अच्छा काम करेंगे तो आगे भी इन्हीं से काम लिया जायेगा। ओपी दोहरे हमीरपुर  जनपद मुख्यालय में कलेक्ट्रेट में दो या चार लोग धरने पर बैठ गए तो केवल उनके विजुअल बनाकर भेज देते और हिंदी खबर की माइक आईडी का दुरूपयोग करते हुए स्कूलों सहित अन्य विभागों में दबंगई करने लगे। इस बात की जानकारी होने पर मेरे द्वारा इनको कई बार ऐसी हरकत करने से आगाह किया गया और हटा देने की बात कही गयी लेकिन रवैया नहीं बदला।

दूसरी बात ये ओपी दोहरे जाति से अनिसूचित जाति में आते हैं तो अन्य पत्रकारों से बोलने लगे कि अगर राजेश सोनी मुझे हटायेगा तो मैं हरिजन एक्ट का मुकदमा कर दूंगा। अब ऐसी दशा में कौन इनको अपने साथ काम पर रखना चाहेगा जिसको पहले से ही धमकी दी जाने लगे। एक दिन मेरे द्वारा इनको हमीरपुर में किसी खबर को लेकर फोन किया गया तो इन्होंने खबर देंव से मना कर दिया। मैंने  बोला कि भाई आपको पत्रकारिता करनी है तो फील्ड में निकलिए केवल कलेक्ट्रेट के धरना प्रदर्शन से काम नहीं चलेगा तो इनका जवाब (तेज स्वर में) आया कि क्या पेट्रोल का पैसा तुम्हारे घर लेने आऊं।

अब यशवंत जी इनको पहले बोला गया था कि आप काम करेंगे और हमारे साथ रहेंगे तो आपको पेमेंट दिया जायेगा। अब आप ही बताइये कोई चैनल एडवांस में तो पेमेंट नहीं देता न कि आपके पास पेट्रोल के पैसे नहीं हैं तो आप हमसे ले लीजिए। मैंने दोहरे साहब को अब इन कंडीशन्स में कौन अपने साथ ऐसे काम करने वाले को रखेगा जो उसको धमकी दे और काम भी न करे और दलाली की शिकायतें अलग झेले।

अतः मैंने इनको काम करने से मना कर दिया। साथ ही मैंने ओपी दोहरे को अपनी मेल चेक करके स्टोरी गिनने के लिए बोला गया और 150 रूपये पर स्टोरी के हिसाब से मैंने अपने पास से देने के लिए बोला क्योंकि मैंने दोहरे को रखा था लिहाजा मेरी जिम्मेदारी थी, चैनल के वरिष्ठों से पैसे के सम्बन्ध में बात हुई थी तो उन्होंने पैसे देने की बात कही थी। बड़े भाई यशवंत जी मैं ये सब बातें हवा में नहीं कह रहा हूँ इस पूरे घटनाक्रम की मेरे पास कॉल रिकॉर्डिंग है जो मेरी दोहरे से बात हुई थी।

अब दोहरे साहब ने काम बंद कर दिया और आईडी वापस कर दी। इसके बाद हमीरपुर में जैसे ये पता चला कि दोहरे को हटा दिया गया तो वही खुराफाती लोग जो मेरे लिए पहले से साजिश रच रहे थे मौका पाकर आगे आ गए और ओपी दोहरे का स्टिंग कर लिया। आपने जो वीडियो दुखभरी कहानी का डाला है उस वीडियो में जो व्यक्ति सवाल कर रहा है और जबर्दस्ती डिमांड की बात कबूलवाने की कोशिश कर रहा है वो नरेंद्र यादव ही है।

नरेंद्र द्वारा इस वीडियो को पहले हमीरपुर के व्हाट्सअप ग्रुपों में वायरल किया गया लेकिन जब कहीं से मेरा अहित नही कर पाए तो बड़े भाई आपका सहारा ले रहे हैं। इस वीडियो के आने के बाद जब मैंने फिर ओपी दोहरे से फोन पर बात की और पूंछा कि भाई मैंने आपसे कौन से डिमांड की है तो वो अपनी जुबानी खुद खबरों के डिमांड की बात कर रहा है। मैंने ये भी पूंछा की मैंने कभी आपसे पैसे की कोई डिमांड की है क्या? तो उसने खुद इस बात से इंकार किया। ऐसे में आप समझ सकते हैं कि एक पत्रकार से ख़बरों की डिमांड करना क्या गलत है? इन सबकी मेरे पास कॉल रिकॉर्डिंग है जो आपको उपलब्ध करवा रहा हूँ।

अब पूरे खेल में तीसरे मोहरे ने भी अपना दिखा दिया, वो है हमीरपुर का रहने वाला दलाल पत्रकार उमाशंकर मिश्रा जो रहने वाला तो हमीरपुर का है और जालौन में समाचार प्लस का रिपोर्टर है। जालौन से समाचार प्लस में प्रवीण साहनी जी से व्यक्तिगत कहकर मैंने ही रखवाया था। ये भाईसाहब रिपोर्टिंग जालौन की करते हैं और दलाली हमीरपुर में। ये जालौन में कभी नहीं रहते लेकिन जालौन में एक रिपोर्टर का सहयोग लेकर खबरें डलवाते रहते हैं और खुद हमीरपुर में रहकर दलाली करते हैं। अब इनका मेरे मामले से क्या सम्बन्ध है वो बता हूँ।

उमाशंकर का हमीरपुर में कोई वजूद नहीं है लिहाजा जब इनको पता चला की राजेश सोनी हिंदी खबर के ब्यूरो बन गए तो इनको सब हरा हरा दिखने लगा, ये सोचने लगे की न्यूज़ 24 जैसा ब्रांड चैनल मिल जायेगा तो इनकी दलाली में चार चांद लग जायेंगे, जबकि इनको ये नहीं मालूम की विजुअल कैसे बनाये जाते हैं और स्क्रिप्ट कैसे लिखी जाती है और न्यूज़ 24 को दलाल नहीं रिपोर्टर चाहिए होते हैं।

ये अपने मंसूबों को लेकर न्यूज़ 24 के ऑफिस तक पहुँच गये और वहां पर लाखों रुपयों का प्रपोजल भी रख दिया, इनकी बेहूदी हरकतों की वजह से इनको वहां से लात मारकर बाहर किया गया। फिर भी ये नाकाम कोशिश करते रहे इन्होंने मेरी हिंदी खबर के मेरी खबर के वीडियो यूट्यूब लिंक और फोटो भेजे। इसके बाद भी जब इनका काम नहीं बना तो मौका पाकर ओपी दोहरे के मामले में शामिल होकर नरेंद्र यादव और उमाशंकर मिश्रा मेरे खिलाफ चैनल में होने के लिए रूपये मांगने से लेकर हरिजन एक्ट की कार्यवाई के लिए हमीरपुर कोतवाली में एप्लिकेशन दे दी लेकिन मेरे पत्रकारिता के पेशे को भली भांति जानने वाले कोतवाल साहब सुभाष यादव ने कोतवाली में ही इनके द्वारा मेरे से बदतमीजी और कोतवाली के अंदर ही मारने की धमकी पर मुकदमा लिखने से मना कर दिया।

किसी पत्रकार ने इनका साथ नहीं दिया, अगर मैं गलत था तो मेरे ऊपर कार्यवाई होनी चकहिए थी, मेरे पास इस पूरे मैटर से सम्बंधित पूरे प्रूफ हैं जहाँ भी जरूरत पड़ेगी पेश करूँगा और मेरे कैरेक्टर पर ऊँगली उठाने वालों पर मानहानि का मुकदमा जरूर करूँगा वरना ये साबित करें कि मैंने इनसे एक रूपये भी लिया हो। मैं डंके की चोट पर कहता हूँ।

रही बात मेरे कार से घूमने और कोई व्यवसाय न होने की तो मैं आपको मैं बता दूं कि मेरा खुद का एक बिजनेस है फोटो स्टूडियो और वीडियो मिक्सिंग लैब है और न्यूज़ 24 भी मुझे हर महीने पैसे देता है जिससे मैं अपना और अपने परिवार का भरण पोषण करता हूँ। कार से चलता हूँ तो अपनी मेहनत और खून पसीने की कमाई से किसी की तरह दलाली नहीं करता और न ही इन सब दलालों के सामने हाँथ फैलाता।

आप साईकिल से चलते हो तो ये आपकी प्रॉब्लम है न भाई, कुछ काम करिये और आप भी कार से चलिए और अपने ठाठ बाठ दिखाइए। मेरी छोटी सी फैमिली है मैं जितना कमाता हूँ उतने में पेट भर लेता हूँ। पत्रकारिता में जूनून है, मेरा स्वाभिमान है, मुझे अपनी पत्रकारिता पर कोई शिकवा शिकायत नहीं है। जो लोग इस पेशे से जुड़ते हैं वो अपना अपना उद्देश्य लेकर जुड़ते हैं और वो पूरा कर रहे हैं मुझे ये बात बताने की जरूरत नहीं है ये आप बेहतर जानते हैं।

मुझे हिंदी खबर में एक बड़ी जिम्मेदारी के साथ मौका मिल रहा है तो इन लोगों को ये बात हजम नहीं हो रही है और इनका हाजमा ख़राब हो गया है। हालाँकि अभी मेरा हिंदी खबर में किसी तरह का कोई एग्रीमेंट साइन नहीं हुआ है। आगे मौका मिला तो मैं भी जाना चाहता हूँ लेकिन दलाली करके नहीं पत्रकारिता करके। जल्द ही इन लोगों के कारनामों के आडियो टेप आपके पास भेज रहा हूं। अनुरोध करूंगा कि सारे टेप को एक एक कर चलाएं ताकि इनकी असलियत सामने आ जाए।

धन्यवाद

आपका

राजेश सोनी

rajeshsoni.hmr@gmail.com

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‘हिंदी खबर’ के रिपोर्टर की दुःख भरी कहानी…

सेवा में
श्रीमान यशवंत सिंह जी
संपादक, भड़ास4 मीडिया।

विषय- हिंदी खबर के रिपोर्टर की दुःख भरी कहानी।

कई चैनलों में काम करने के बाद अतुल अग्रवाल ने अब हिंदी खबर में काम शुरू किया है। इस चैनल में पहली बार कई ब्यूरो बनाने की प्रथा की शुरुवात की गई है। चैनल अभी यूट्यूब पर ही चल रहा है, लेकिन यूपी के अधिकारियों पर दबाव बनाकर अपनी जरूरतों को पूरा करने का खेल शुरू कर दिया गया है। कभी यह बताया जाता है कि मुख्यमंत्री ने खबर चलने के बाद संज्ञान लिया और कार्यवाही कर दी मगर कहीं भी यह चैनल दिखाई नहीं दे रहा है।

बुंदेलखंड यूपी का हिस्सा है। हिंदी खबर के डायरेक्टर अतुल जी ने बुंदेलखंड ब्यूरो चीफ राजेश सोनी को  बना दिया। सोनी जी झोला भर कर दिल्ली से माइक आईडी लेकर आ गए हैं और अपनी गाड़ी में डालकर घूमने लगे हैं। बुंदेलखंड में ख़ाक छानते और माइक आईडी बांटते। जिसको चाहते हैं रिपोर्टर रखकर काम शुरू करवा देते हैं। अपनी मांगों की शर्तें रखकर रिपोर्टर को परेशान करना उनके लिए आम बात है। अभी हाल में हमीरपुर में 2 माह में 2 रिपोर्टर बदल दिए। अब हिंदी खबर का खेल कई कारनामों को लेकर शुरू हो गया है। रिपोर्टर को एक तो तनखाह नहीं दूसरी तरफ दबाव बनाकर काम लेना, हिंदी खबर के लिए यह सब आम बात है। जब चाहें रिपोर्टर रखें, जब चाहें निकाल दें। मजाक बना कर रख दिया है। ऐसे में हिंदी खबर का भविष्य नहीं रह गया है।

एक तरफ मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट प्रिंट मीडिया घरानों पर दबाव बनाये हुए है वहीं कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे न्यूज़ चैनलों में पत्रकार ही पत्रकारों के शोषण पर आमादा हैं। ताजा मामला बुंदेलखंड के हमीरपुर का है जहां हिंदी खबर चैनल अस्तित्व में आने के लिए छटपटा रहा। यह चैनल यूट्यूब और व्हाट्सअप पर खबरें घुसेड़-घुसेड़ कर अपने को बड़ा न्यूज चैनल होने का दावा कर रहा लेकिन हमीरपुर में 2 महीने में जाने क्यों 3 रिपोर्टर बदल दिये गए। इन सभी से खबरें तो ली गयीं लेकिन पेमेंट एक पैसा भी नही दिया गया। पेमेंट की बात तो दूर, उलटे बुंदेलखंड ब्यूरो बताने वाले राजेश सोनी इनसे चैनल में बने रहने के लिए लगातार तरह तरह के डिमांड करते रहे। इसे पूरा नहीं करने पर रिपोर्टर को निकाल दिया जाता है।

राजेश सोनी ने ओमप्रकाश दोहरे को हमीरपुर का रिपोर्टर बनाया और फिर शुरू किया अपना खेल। मानसिक दबाव बनाकर लगातार डिमांड करने लगे। इसकी पूर्ति जब ओमप्रकाश द्वारा नहीं की गई तो ओपी दोहरे से आईडी छीन ली गयी। उन्होंने दुःखी होकर अपने पत्रकार साथियों को बताया कि डिमांड नहीं पूरी होने पर निकाल दिया गया। हमीरपुर के पत्रकार इस घटनाक्रम से दुखी हैं। हिंदी खबर का ब्यूरो राजेश सोनी है जो कि न्यूज़24 का भी स्टिंगर है।

राजेश सोनी के बारे में बताया जाता है कि पुलिस, डाक्टरों, टीचरों का स्टिंग करके रौब जमाना इनका मूल काम है। जबसे अतुल अग्रवाल का साथ पाया है और हिंदी खबर का ब्यूरो बन गया, इसने दर्जनों चैनल की आईडी लेकर महोबा झांसी, बाँदा, ललितपुर जालौन, हमीरपुर आदि में घूम घूम कर आईडी बेच रहा है। राजेश सोनी न्यूज़ 24 में है और इसकी शिकायत समय समय पर चैनल में भी होती रही है लेकिन दंद फंद में माहिर राजेश सोनी अब भी दोनों चैनल में बना हुआ है। यह अब पत्रकारों का ही शोषण करने लगा है।

पत्रकार होने के चलते पुलिस कोई कर्रवाई करने से बचती रही है। इसने एक ट्रैफिक इंस्पेक्टर और एक सिपाही का स्टिंग कर एसपी को दे दिया जिसके कारण दोनों निलम्बित हो गए। एसपी हमीरपुर ने यह कार्रवाई चैनल पर खबर नहीं चलाने की शर्त पर किया। इस मामले में एसआई राकेश यादव तत्कालीन ट्रैफिक इंस्पेक्टर के साथ एक सिपाही भी निलंबित हुआ था। इस मामले में राजेश सोनी पुलिस का रजिस्टर्ड गवाह है। राजेश सोनी के पास अपना कोई बिजनेस नहीं है लेकिन यह कार से घूमता है और ठाट बाट से रहता है।

हिंदी खबर, हमीरपुर से निष्काषित रिपोर्टर ओपी दोहरे की जुबान से सुनिए कहानी… क्लिक करें इस यूट्यूब लिंक पर : https://youtu.be/DyjIkMI_EAg

प्रेषक
ओपी दोहरे
हमीरपुर
यूपी
09415859946
opdnews@gmail.com

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सब कुछ ठीक नहीं चल रहा ‘हिंदी खबर’ चैनल में! पढ़िए, अंदर से आई एक चिट्ठी

आज से पाँच महीने पहले ‘हिंदी खबर’ चैनल की शुरुवात हुई. चैनल के असली मालिक संगम लाल बांग्लादेश की किसी कंपनी के कर्मचारी हैं और हिंदी खबर के फाइनेंसर थे. दूसरे असली मालिक मनीष अग्रवाल हैं जो कि ग़ज़िआबाद में एक व्यपारी हैं. तीसरे मालिक एंकर अतुल अग्रवाल हैं जिनने हिंदी खबर के सभी कर्मचारियों को बड़े बड़े सपने दिखाए. सभी लोगों ने दिलो जान से मेहनत करना शुरू कर दिया. चैनल तीन से चार महीने मे लांच हो गया. लेकिन अंदरखाने झूठ, फरेब और छल का राज बद से बदतर होता गया. गलत दबावों के आगे न झुकने वाली कई लड़कियों को हिंदी खबर से निकाल दिया गया. इस तरह की घटनाएं हिंदी खबर में रोज होने लगी. ऐसी ही एक घटना के कारण एक एफ.आई.आर. भी दर्ज हुई है.

बताया जा रहा है कि चैनल का मालिक संगम लाल अपने चैनल के लोगों को अधर में छोड़ कर बांग्लादेश भाग गए हैं. इसके बाद मनीष अगवाल जिन्हें हिंदी खबर में परदे के पीछे बैठे प्रेम चोपड़ा के नाम से जाना जाता है और जो हर गलत चीज़ को बढ़ावा दे रहे हैं आजकल सी.ई.ओ. होने के नाते व्यावसायिक उथल पुथल मचा रहे हैं. हिंदी खबर से अभी तक चालीस लोग जा चुके हैं. पूरा का पूरा डिपार्टमेंट तक खाली हो गया है. आगे क्या होगा, यह सोच कर कर्मचारी बहुत परेशान हैं. चैनल के चौथे मालिक प्रणीत दीक्षित हैं. इन्होंने सब गतिविधियों को देखते हुए अपनी समस्त टेक्निकल टीम और सेल्स हेड संजय कौशिक की टीम समेत इस्तीफा दे दिया है. इस हिंदी खबर में कोई आना नहीं चाहता है. सवाल है कि सभी सत्तर अस्सी लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने का हक़ इनको किसने दिया. मैं मीडिया जगत के वरिष्ठ लोगों, भारत सरकार, पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम अखिलेश यादव जी से प्रार्थना करता हूं कि  छुटपुटिया व्यापारियों को मीडिया जगत में आने से रोका जाये और इसके लिए सख्त कानून बनाया जाए.

किसी शख्स ने उपरोक्त कहानी chotachetan006@gmail.com मेल आईडी के माध्यम से भड़ास के पास छपने के लिए भेजा है. अगर इस मामले पर दूसरे पक्ष यानि हिंदी खबर प्रबंधन के लोगों को कुछ कहना हो तो अपनी बात bhadas4media@gmail.com पर मेल कर सकते हैं.

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भास्कर, जागरण, पत्रिका जैसे बड़े मीडिया समूहों की समग्र ‘नीच’ कथा पढ़िए

अब मैं उन बातों की भी जानकारी देने की कोशिश करूंगा जो अखबार के पन्नों तक नहीं पहुंचती हैं या जिन खबरों के कत्ल के कई कारण होते हैं। जैसे आपने कभी किसी अखबार में नहीं पढ़ा होगा कि एक वेज बोर्ड की अनुशंसाएं संसद स्वीकृत कर चुकी है, सुप्रीम कोर्ट लागू करने का आदेश दे चुका है लेकिन 11 नवंबर 2011 से वे ही अखबार इसे मानने से इंकार कर रहे हैं जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा करते थकते नहीं हैं। भास्कर से लेकर जागरण और पत्रिका समूह तक सभी दिग्गजों के यही हाल हैं। वेज बोर्ड की अनुशंसानुसार कर्मचारियों को पैसा न देना पड़े इसके लिए अखबार किस हद तक नीच हरकतों पर उतर आए हैं, नीच शब्द पर शुरुआती आपत्ति हो सकती है लेकिन यदि तथ्य निकाले जाएं तो शायद आप इससे भी बुरे शब्द इन अखबारों की शान में कहें।

सुप्रीम कोर्ट न सिर्फ आदेश दे चुका है बल्कि आदेश न मानने पर अवमानना के मामलों की सुनवाई में भी कड़ा रुख अपना चुका है लेकिन अखबार मालिक अपने रसूख के चलते बेफिक्र हैं। चलिए शुरु से ही शुरु करें…अखबारों में आपके हक की खबरें जुटाने वाले पत्रकार सालों से अपना शोषण करा रहे हैं और कुछ मामलों में तो शायद न्यूनतम मजदूरी से भी कम पर काम कर रहे हैं। पहले भी पत्रकारों का वेतन तय करने के लिए वेज बोर्ड बने, उनकी सिफारिशें आईं और अखबारों पर इनका कोई असर नहीं दिखा।

इस बार मजीठिया वेज बोर्ड की अनुशंसाओं को संसद ने नियम की तरह मान लिया और इसे लागू न करने पर सुप्रीम कोर्ट ने अखबारों को फटकार भी लगाई। अखबार मालिक अपने रसूख के दम पर ठेंगा दिखाते रहे तो कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का केस दर्ज कराया। इसकी सुनवाई में जमकर फटकार पड़ी और तय हुआ कि यह वेतनमान लागू हुआ या नहीं इस बात की पूरी रिपोर्ट पांच पांच राज्य पेश करेंगे ताकि यह साफ हो सके कि इस वेतन के हिसाब से पत्रकारों (और गैर पत्रकार भी) को पैसा मिल रहा है।

11 नवंबर 2011 से अब तक का बकाया भी दिया जाना है। जाहिर है पत्रकारों की लेनदारी का आंकड़ा करोड़ों में है और यही वजह है कि इस रकम का हिसाब लगाते ही सारे अखबार मालिक या कह लें लालाजी गश खा रहे हैं। जब तलवार गर्दन के करीब आने लगी कि सुप्रीम कोर्ट सुब्रत राय सहारा जैसा हाल न कर दे तो सभी लालाजी मिले और अपने वकील अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसे वकीलों से कहा कि आप करोड़ों की फीस भले ले लो लेकिन कुछ ऐसा कर दो कि कर्मचारियों को पैसा न देना पड़े। वकीलों ने सुझाव देने शुरु किए और अखबार वाले उन पर आंख बंद करके अमल करते गए।

पहला सुझाव था कि सभी कर्मचारियों  से एक फॉर्म भरवाया जाए जिसमें कहा गया हो कि हम बढ़ा हुआ वेतन नहीं चाहते यानी हमें कम पैसे पर ही काम करना है। सारे अखबारों के सारे कर्मचारियों से डरा धमकाकर साइन लिए गए और जो सीना चौडा़कर खुद को दबंग पत्रकार बताते हैं उन्होंने भी बिना नानुकुर ऐसा पत्र दे दिया। जिन चंद लोगों ने नानुकुर की उन्हें धड़ाधड़ उन जगहों पर ट्रांसफर कर दिया गया जहां वे बेचारे कभी जा ही नहीं सकते थे। जिन्हें बआसानी हटाया जा सकता था उन्हें तो खैर तुरंत और तत्काल प्रभाव से निकाल दिया गया।

तरह तरह के बहाने सामने ला लाकर लोगों को हटाया गया। इसके बावजूद कर्मचारी बचे रहे क्योंकि अखबार मालिक सभी को एकदम तो हटा नहीं सकते वरना अरबों खरबों का बजट गड़बड़ा जाता। इसलिए एक और सुझाव पर अमल किया गया कि अखबार ने खुद ही एक प्लेसमेंट एजेंसी बना ली। सारे कर्मचारियों से इस्तीफा ले लिया गया और उन्हें पुराने वेतनमान पर ही नई कंपनी का कर्मचारी बता दिया गया।

बड़ी बड़ी बातें करने वाले नेशनल एडिटर तक से उस फॉर्म पर साइन कराया गया है जिसमें कहा गया है कि मुझे बढ़ी हुई तनख्वाह नहीं चाहिए और बड़े बड़े संपादक भी अब भास्कर या नईदुनिया या पत्रिका के कर्मचारी न होकर इन्हीं की डमी प्लेसमेंट संस्थाओं के दिहाड़ी मजदूर हैं जिनके पास पत्रकार जैसा कोई हक नहीं है। मैं इन चंद अखबारों के नाम इसलिए ले रहा हूं कि इनकी आज की हकीकत मुझे पता है लेकिन सच यह है कि देशभर में सभी अखबारों  (दो चार अंग्रेजी अखबार छोड़कर) की यही हालत है। ऊपर से एक दूसरे से लड़ते दिखने वाले सारे अखबार एकजुट होकर कर्मचारियों पर ज्यादतियां कर रहे हैं। सबसे ज्यादा बुरा हाल तो उन पत्रकारों का किया जा रहा है जिन्होंने श्रम विभाग के माध्यम से यह आवेदन दे रखा है कि उन्हें मजीठिया के हिसाब से वेतन और बकाया चाहिए। संस्थानों ने उनके गेट पर निर्देश दे दिए हैं कि ऐसे किसी कर्मचारी को अंदर न आने दिया जाए ताकि अनुपस्थिति का बहाना बनाकर उसे निकाला जा सके। यहां तक कि जिन पर दूसरे साथियों को हक के लिए ‘भड़काने’ की शंका है उनके पीछे गुंडे तक लगे हुए हैं।

अब जरा इस तथ्य पर भी नजर करें

ये अखबार जो न सुप्रीम कोर्ट की सुन रहे हैं और न सरकार की, यहां तक कि संसद और संविधान को भी जो कुछ नहीं समझ रहे हैं उनका गणित भी समझ लें। अखबार वालों को अखबार चलाने की जमीन तो लगभग मुफ्त ही मिलती है या दो चार पांच रुपए की लीज पर। इनकी मशीनें लोन पर होती हैं जो इन्हें चुकाने को कहा तक नहीं जाता। इन्हें दिया जाने वाला कागज इतनी सस्ती दरों पर मिलता है कि यदि इन्हें एक साल ही अखबार का कागज पूरी कीमत पर खरीदना पड़ जाए तो देश में चार छह अखबार ही बच पाएं। इन्हें सरकारी विज्ञापन मिलते हैं जो काफी ज्यादा कीमत देकर छपाए जाते हैं ताकि इन्हें फायदा मिल सके। इतना सब अखबार के नाम पर लेकर ये अखबार वाले खुश हो जाते हों ऐसा भी नहीं है।

इसके बाद शुरू होती है अतिरिक्त की मांग, दूसरे दूसरे प्रोजेक्ट्स बनाकर या किसी न किसी नाम पर इन्हें ज्यादा से ज्यादा जमीन चाहिए होती है। अधिकांश बड़े अखबार वाले ग्रुप 20 से ज्यादा अलग अलग धंधों में हैं और सभी में अखबार के नाम पर दादागिरी से सरकारी पैसा हजम किया जाता है। खुद को सबसे बड़ा ग्रुप बताने वाला एक अखबार तो बिल्डर के तौर पर इतनी सरकार जमीन हथिया चुका है कि यदि सिर्फ उससे सरकारी जमीन ही छीन ली जाए तो करोड़ों का हिसाब हो जाए।

भास्कर की रायपुर में बनाई गई बिल्डिंग यदि एनजीटी की जमीन पर है तो जबलपुर में भी इसकी जमीन विवादित है। राजधानी भोपाल में ही डीबी मॉल की जमीन पर इतने वाद विवाद रहे हैं कि अखबार का दबाव नहीं होता तो न जाने कब से इसे तोड़ा जा चुका होता। सरकार पैसे की इस अंधी लूट के बाद भ्ज्ञ ीइनका पेट नहीं भरता तो ये विज्ञापनों के लिए दादागिरी करते हैं और यकीन मानिए बड़ी बड़ी कंपनियां इनसे डरकर इन्हें मुंहमांगी कीमत देकर पिंड छुड़ाती हैं। जो इस दादागिरी के खिलाफ खड़ा होता है उसे बदनाम करने के लिए बाकायदा सुपारी ली और दी जाती हैं।

पिछले दिनों तो एक संपादक महोदय ने सरकारी कागजों में खुद ही हेरफेर कर लिया और इस फर्जीवाड़े से पांच करोड़ का मकान भी तान लिया। पकड़े जाने पर पूरा अखबार प्रबंधन उनके पक्ष में दबाव बनाने लगा क्योंकि ये संपादक जी लिखने पढ़ने का भले क ख ग भी न जानते हों लेकिन मार्केट से वसूलीबाजी में माहिर हैं। प्रबंधन के सामने सवाल यह था कि यदि इन्हें हटाया तो न सिर्फ नेशनल एडिटर महोदय के पन्ने खुलेंगे बल्कि अखबार की भी दो नंबरी कमाई के खुलासे होने की संभावना बन जाएगी। यह एक उदाहरण सिर्फ समझने समझाने के लिहाज से है वरना भांग पूरे कुएं में घुली है।       

… पिक्चर अभी बाकी है

आदित्य पांडेय

adityanaditya@gmail.com

9424539609

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कुमार अशोक की मौत और जिले की पत्रकारिता : अब भी न चेते तो बहुत देर हो जाएगी….

(स्वर्गीय कुमार अशोक : अब यादें ही शेष….)

कुमार अशोक का यूं चले जाना एक सबक है…. आज यह सूचना आई… ”चन्दौली मुगलसराय जनपद के वरिष्ठ पत्रकार हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के पूर्व प्रभारी व मुगलसराय मेल के प्रधान संपादक श्री कुमार अशोक जी का आज (बुधवार) भोर में वाराणसी स्थित चितईपुर के आदित्य अस्पताल में निधन हो गया। उनका पार्थिव शरीर प्रातः साढे सात बजे तक उनके रविनगर स्थित आवास पर पहुँच जायेगा। बताते चलें कि वे काफ़ी दिनों से किडनी के रोग से ग्रसित थे।” इन लाइनों पर पढ़ने के बाद मैं सन्न रह गया। की-बोर्ड पर उंगलियां नहीं चलीं।

उनके साथ इतने साझे पल इतनी यादें जुड़ी हैं कि कैसे क्या कहूं, समझ में नहीं आया। उनके जीवन के बारे में आज अभी कुछ नहीं लिखा-कहा तो आगे कहने बताने का मतलब नहीं होगा. एक पत्रकार साथी का असमय यूं चला जाना बहुतों के लिए एक सामान्य सी घटना होगी. मीडिया संस्थानों के लिए शायद एक पत्रकार का चले जाना कोई बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन जिलों में बिना पारिश्रमिक या नाम मात्र के मेहनताने पर जूझते रहने वाले अखबारों-चैनलों के पत्रकारों के लिए यह सबक है. बड़ा सबक. एक पत्रकार का आर्थिक दिक्कतों के बीच यूं मर जाना बड़ी बात है. निराशाजनक भी. दर्दनाक और खौफनाक भी. अब भी नहीं चेते तो शायद बहुत देर हो जाएगी. यह हमारा भविष्य भी हो सकता है. रोज ऐसी मौतें आती रहेंगी, आज उनकी तो कल हमारी. यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

आलसी तो नहीं हूं, पर अंतर्मुखी होने के चलते ज्यादातर मसलों पर पोस्ट लिखने से बचता हूं. चाहकर भी नहीं लिखता, पर आज नहीं. क्योंकि एक पत्रकार कुमार अशोक का यूं चले जाना केवल सामान्य मौत का मामला नहीं है. एक ऐसी मौत का मामला है, जो सबके लिए लड़ता रहा, लेकिन अपने लिए नहीं लड़ पाया. उनकी मौत को भुला पाना बहुत मुश्किल है. और तकलीफदेय भी. जीवन भर अभावग्रस्त रहने के बाद भी चेहरे पर हंसी का भाव कभी नहीं मिटने देना ही कुमार अशोक की खासियत थी. इसी खासियत के साथ आखिर तक जिए और मर भी गए. बिना किसी शिकवा-शिकायत के. हर व्यक्ति में कुछ अच्छाई होती है तो थोड़ी बुराई भी. कुमार अशोक में भी रही होंगी, लेकिन उस शख्स के चेहरे पर शायद ही कभी किसी ने परेशानी के भाव देखे होंगे, जब उनकी जेब में दस रुपए भी नहीं होते थे, तब भी. जब वह पूरी तरह से ठन-ठन गोपाल होते थे, तब भी. 

कुमार अशोक से हमारी अच्छी जान-पहचान तो पत्रकारिता का ‘धंधा’ अपना लेने के बाद हुई, लेकिन उन्हें जानने का सिलसिला तब शुरू हुआ, जब हम बनारस में नया-नया कंम्यूटर सीखने जाया करते थे. मुगलसराय-बनारस आने-जाने के दौरान अपनी बातों-कविता-कहानियों-मुहावरों-चुटकुलों से भीड़ को अपनी ओर आकर्षित करने की कला ने कुमार अशोक को एक पहचान दी थी. खिलंदड़ शख्स होने की पहचान. मस्तक-मौला होने की पहचान. इससे इतर भी पहचान थी रोज यात्रा करने वाले मुगलसराइयों के बीच, एक पत्रकार होने की पहचान. वह हिंदुस्तान अखबार के संवाददाता थे. पत्रकार थे. यह शायद 1996-97 का दौर था. तब पत्रकारिता इज्‍जत  की निगाह में शामिल हुआ करती थी. उस समय हिंदुस्तान अखबार लखनऊ से छपता था. बनारस में इसके कदम नहीं पड़े थे. वह हिंदुस्तान अखबार के चंदौली के प्रभारी थे, उसी साल शायद चंदौली को बनारस से काटकर नया जिला बनाया गया था. खूब आंदोलन-प्रदर्शन होते थे, इसको लेकर खूब कहानियां थीं कुमार अशोक के पास. खैर. 

कुमार अशोक रोज तो नहीं, पर अक्सर बनारस से मुगलसराय आते समय टकरा जाते थे. डूप्लीपकेट पंजाब मेल की एसी बोगी में. 3050 डाउन ऐसी ट्रेन थी, जो दून-पंजाब मेल के बाद ज्यादातर बनारस में काम करने वालों के मुगलसराय लौटने की पसंदीदा ट्रेन थी. 10 डाउन दून और 06 डाउन पंजाब मेल तो छात्रों को बनारस से मुगलसराय लौटाकर ले जाने वाली ट्रेन थी. 3050 के बाद केवल 3308 डाउन ही बचती थी, जिसे कोई मुगलसराई मजबूरी में ही पकड़ना चाहता था. लिहाजा 3050 में ही अक्सर कुमार अशोक हम जैसे कई लोगों से टकरा जाते थे, और हमारे जैसों की भीड़ उनके आसपास ही बैठना पसंद करती थी. इसलिए कि मुगलसराय तक का रास्ता आनंद से कट जाए. इस ट्रेन से यात्रा करने वाले यात्री लोकल भीड़ देखकर अंदर से जल-भुन जाते थे, लेकिन मुगलसराय आते-आते कुमार अशोक की बातें उन पर भी असर कर चुकी होती थीं. वो भी काशी स्टेशन पर ही अपना टेंशन छोड़कर आनंद के साथ मुगलसराय तक आते थे. पूरा हंसते-मजा लेते.

यह समय काल बीत चुका था. वर्ष 2000 के आसपास हिंदुस्तान अखबार बनारस से लांच हो चुका था. फ्री में अखबार की सेवा करने वाले कुमार अशोक को उनका संस्थान कुछ सौ रुपए देने लगा था. गौर कीजिए, कुछ सौ. हिंदुस्तान के बनारस में आने के बाद कुमार अशोक का रुतबा तो बढ़ गया, लेकिन आमदनी नहीं बढ़ी. कुछ सौ रुपए पारिश्रमिक और विज्ञापनों के जरिए मिलने वाला कुछ परसेंट कमीशन ही उनकी अर्जित आय थी. कोई गाहे-बगाहे मदद कर दे तो अलग बात थी. संस्थान को विज्ञापन दिलाने के लिए भी जी-जान से मेहनत करते थे. शायद इसलिए भी कि उनकी अभाव ग्रस्त जिंदगी में कुछ मदद मिले. पहले संस्थात में अकेले थे, जब जिले में अखबार बढ़ने लगा तो अखबारी परिवार भी बढ़ा. सामंजस्य. बैठाने में कई तरह की कठिनाइयां भी उनके सामने आईं. कई तरह की समस्‍याएं भी हुईं. अमूमन वो सारी समस्याएं कुमार अशोक के सामने आईं, जो अखबारी संस्थानों में आती हैं. या जानबूझकर लादी जाती हैं. 

कुमार अशोक खबरों के संकलन के अलावा हिंदुस्तान संस्थान के बड़े अधिकारियों का मुगलसराय से टिकट कराने से लेकर उसे कन्फर्म कराने तक का सारा काम लगातार करते रहे, दिन-रात करते रहे, लेकिन संस्थान ने उन्हें कभी परमानेंट होने लायक नहीं माना. किसी को उन पर रहम नहीं आया. उन्हें केवल मुगलसराय का प्रभारी बनाकर लॉलीपाप थमा दिया गया. पर, कागजों में वह थे संवाद सूत्र ही. यही मुझे एक मात्र सूत्र लगता है, जिसे मैं कभी सुलझा नहीं पाया. खैर, सैलरी उनकी तब भी नहीं बढ़ाई गई. इधर, जब मैं दैनिक जागरण छोड़ने को मजबूर हुआ तो तत्कालीन जिला प्रभारी आनंद सिंह की कृपा से कुछ समय हिंदुस्तान के साथ भी जुड़ा. कंटेंट के आदमी को विज्ञापन पकड़ा दिया गया. यह पारी लंबी नहीं चली. काम रास नहीं आया. दो महीनों में अंदरूनी राजनीति से तंग आकर मैंने दिल्ली का रूख कर लिया. खैर, इसके बाद कई बदलाव हिंदुस्तान अखबार, चंदौली में हुए. बाद में जो भी हुआ हो, पता चला कि कुमार अशोक को हिंदुस्तान से हटा दिया गया है. 18 साल जुड़े रहने के बावजूद कुमार अशोक को अखबार से वनवास दे दिया गया. एक पल भी उनके संस्थान ने उनके समर्पण और मेहनत को याद नहीं किया.

हिंदुस्तान से हटने के बाद तो कुमार अशोक अंदर से टूट गए. पूरी तरह टूट गए. पहली बार तब टूटे थे, जब उनका जवान बेटा दुर्घटना में असमय काल का शिकार हो गया. उस दुख को तो सहन कर लिया, लेकिन यह दुख भारी पड़ा. इस घटना के बाद से ही उनकी शारीरिक परेशानियां शुरू हो गईं. शायद उन्होंने अपने को कभी हिंदुस्तान से अलग माना ही नहीं था. देखा ही नहीं था. शायद सोचा भी नहीं था. कुमार अशोक ने एक कोशिश अपने घर पर प्ले  स्कूल खोलने का भी किया, लेकिन बड़े संसाधन वाले स्कूलों के आगे यह प्रयोग टिक नहीं पाया. इसे बंद करना पड़ गया. हिंदुस्तान से हटने के बाद उन्होंने कहीं और नौकरी नहीं की. खुद का अखबार ‘मुगलसराय मेल’ निकलाना शुरू किया, लेकिन जैसी इंसानी फितरत होती है, बड़े बैनर से हटते ही लोगों ने उन्हें नोटिस करना बंद कर दिया. कुमार अशोक को जो लोग खबर छपवाने के नाम पर हाथों-हाथ लिया करते थे, वो किनारा करने लगे. कुछ पर्सनल संबंधों के बल पर विज्ञापन जुटाकर कुमार अशोक ने ‘मुगलसराय मेल’ को पटरी पर लाने का प्रयास किया, लेकिन उनकी यह कोशिश प्लेटफार्म के बाहर नहीं निकल पाई. 

‘मुगलसराय मेल’ शुरू करने के बाद कुमार अशोक से हुई आखिरी मुलाकात में उन्हों ने कहा था कि किसी अखबार की नौकरी से अच्छा है कि अपना अखबार निकाला जाए. मैंने भी कहा कि आपने अब सही निर्णय लिया है. बड़े संस्थानों की फोबिया से बाहर निकलना जरूरी है. किसी अखबार या चैनल की नौकरी से बढि़या है कि कुछ अपना किया जाए. मैंने भड़ास का उदाहरण भी दिया, क्यों कि उन दिनों भड़ास के जरिए ही पत्रकारिता का हाल-चाल लेता रहता था. खर्चा-पानी भी इसी से चल रहा था. खैर, उसके बाद केवल एक बार फोन पर बात हुई, फिर ना तो कुमार अशोक से मिल पाया और ना ही बात हो पाई. अब जब आज पता चला कि कुमार अशोक चले गए तो मन अंदर तक व्याकुल हो गया. बेचैन हो गया. अपना भविष्य सा नजर आने लगा. बौखलाहट भी होने लगी पत्रकारिता को लेकर. पैसे के अभाव में ही कुमार अशोक समय से पहले चले गए. अगर पैसे होते तो किडनी का खराब हो जाना कोई बड़ी बीमारी नहीं है. ट्रांसप्लांमट भी होती हैं किडनियां. बड़े लोगों की. सांसद अमर सिंह एक भी उदाहरण हैं. कई और उदाहरण बिखरे पड़े होंगे.

दरअसल, कुमार अशोक का यूं ही चले जाना, सबक है उन पत्रका‍रों को लिए, जो बिना पैसे या मामूली पैसे में अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं. जवानी. परिवार. सामाजिकता. दोस्ती. यारी. एकता. खैर, बुढ़ापा तो शायद कुछ को ही नसीब हो पाता होगा. ऐसे पत्रकारों के समक्ष आर्थिक दिक्कत हर वक्त बनी रहती है. बच्चों का फीस भरना तक पहाड़ जैसा लगता है. मां-बाप की जरूरतों की कौन कहे, पत्नी की जरूरतें ही भारी लगने लगती हैं. अब इस स्थिति में दो ही रास्ते हैं कि या तो भ्रष्ट  हो जाया जाए. दलाली में जुट जाया जाए या फिर गरीब-बेचारगी की मौत मरने की तैयारी कर ली जाए. पर, एक अन्य उपाय यह भी है कि पत्रकारिता करते हुए कुछ नए रास्ते तलाशें जाएं. कुछ नया इनवेंट किया जाए. कोई अलग-काम धंधा किया जाए. पूंजीवादी हो चुके संस्थानों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने फ्री में या नाम मात्र की धनराशि पर उनके लिए कितना खून-पसीना बहाया है. उनकी जरूरत जिस दिन खत्म हो गई आपको लात मारकर बाहर निकाल देंगी. बिना एक पल गंवाए. हिंदुस्तान, दैनिक जागरण जैसे संस्थानों को तो लगता है कि उन्होंने जिलों में पत्रकार बनाकर एहसान कर दिया है, उनके संवाद सूत्र जमकर खाने-पीने का सूत्र लगा रहे हैं. इसी सूत्र से धनवान बनते जा रहे हैं. संस्थान को इनके काम के बदले पारिश्रमिक देने की को‍ई आवश्यकता नहीं है. खैर, इसमें बहुत दोष हम पत्रकारों का भी है. फ्री में काम करने को उतावले हुए रहते हैं. मरे जाते हैं.   

पत्रकार, जो भ्रष्ट हैं, उन्हें कोई दिक्कत नहीं. जो दलाल हैं मस्त हैं. जो यह काम नहीं कर सकते अब उनके लिए जरूरी है कि अब अपने भीतर एकता पैदा करें. बिना एक हुए अब कोई सुनने वाला नहीं. सरकार और ब्यूरोक्रेसी तो पत्रकारों को आपस में लड़ाकर अपना उल्लू  सीधा कर रही है. फ्री की नौकरी करने वाले पत्रकार को खुद को जिले का डीएम-कलक्टर समझने वाले तेवर और मानसिकता से बाहर निकालना पड़ेगा. जब तक खुद को तोप समझने की मानसिकता से जिले या कहीं के भी पत्रकार बाहर नहीं निकलते, अपने आपसी इगो को किनारे नहीं रखते तब तक कई कुमार अशोक ऐसे ही मरते रहेंगे और हम बस की-बोर्ड दबाकर उन्हें श्रद्धाजंलि देते रहेंगे. थोड़ा लालच और इगो छोड़ देने से सबका भला होता है, तो छोड़ देने में कोई बुराई नहीं है. यह मेरे लिए भी लागू होता है और बहुतों के लिए भी.

लेखक अनिल सिंह लखनऊ के सरोकारी और प्रतिभाशाली पत्रकार हैं. वे दिल्ली में कई न्यूज चैनलों में काम कर चुके हैं. भड़ास4मीडिया के कंटेंट एडिटर भी रहे हैं. उनसे संपर्क 9984920990 या anil anilhamar@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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भुखमरी के कगार पर कैनविज टाइम्स के पत्रकार

दुनिया की नंबर वन एमएलएम कंपनी बनने का दावा करने वाले ‘कैनविज समूह’ के अखबार ‘कैनविज टाइम्स’ के कर्मचारी भुखमरी के कगार पर आ खड़े हुए हैं। पत्रकारों के हालात ऐसे हो गए हैं कि किसी पास दफ्तर पहुंचने का किराया नहीं है तो कोई अपने घर का किराया देने में असमर्थ है। कैनविज प्रबंधन कान में तेल डाले बैठा है। उसका पत्रकारों के दयनीय हालातों से कोई वास्ता नहीं। चर्चा है सैलरी लटकाने का ‘खेल’ प्रबंधन छंटनी को अंजाम देने के लिए खेल रहा है।

कैनविज समूह के दूसरे सभी विभागों के कर्मचारियों को समय से सैलरी वितरित कर दी गई है लेकिन पत्रकारों को ‘गोली’ दी जा रही है। जिनके कंधों पर सवार होकर गुलाटी ने इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा किया, उन्हीं की जड़ें खोदने की तैयारी चल रही है। प्रबंधन की तरफ से किसी भी प्रकार का जवाब न मिलने से कैनविज के कर्मचारियों की हालत घर का सारा काम करने वाली उस छोटी बहू की तरह हो गई है जिसे हर कोई दुत्कारता है, लेकिन फिर भी वो घर के सभी लोगों की तरफ बड़ी उम्मीद से देखती है।

नोट : कैनविज के पत्रकारों से इंडस्ट्रीयल एरिया में काम करने वाले मजदूर फिर भले हैं, उनका मालिक कम से कम इतना तो बता देता है कि शाम तक इतना काम करने पर इतना पारिश्रमिक मिलेगा, कैनविज प्रबंधन तो अपना काम भी करा लेता है और कोई समुचित जवाब देना भी मुनासिब नहीं समझता।

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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भईया, इससे अच्छा तो मजदूरी कर लेते, कहाँ से फंस गए मीडिया में!

आज कुछ काम से प्रेस क्लब गया हुआ था, हमेशा की तरह प्रेस क्लब के बाहर और भीतर चहल पहल थी, गेट के ठीक सामने एक कथित संस्थापित टीवी चैनल का कैमरामैन उदास मुद्रा में था, आदत से लाचार होकर पहले तो मैंने उनसे अभिवादन कर कुशलक्षेप पूछा, फिर जो जवाब आया, उसे सुन सुन्न रह गया, और ऐसा पिछले कई महीनों से लगातार जारी है, एक लम्बा मई मीडिया में गुजर चुका वो शख्स बड़ी ईमानदारी के साथ मुझसे कह रहा था, कि, “योगेश जी, ऐसा है, अगर हमको पता रहता कि मीडिया में इतनी ऐसी तैसी करने के बाद भी पगार कि चिंता रहती है, परिवार और पेट कि चिंता रहती है, तो कभी-भी मीडिया में तो नहीं आता, भले हो गाँव में खेतीबाड़ी कर लेता, पर सच में मीडिया में आने कि गलती नहीं करता.”

मैं जैसे उनके लिए उनके दर्द को बांटने वाला, उनकी पीड़ा समझने वाला साथी था, वो बिना रुके, उदासपूर्ण भावभंगिमा के साथ मुझसे अपना घाव साझा करते रहे. आगे वो वरिष्ठ कैमरामैन कहते रहे, “जब मैं स्कूली जीवन में था, तब पेपर पढ़कर, टीवी देखकर सपना पालता था, कि मैं भी इसी लाइन में जाऊँगा, घरवाले कहते थे, बीटा या पुलिस बनना, या पत्रकार, दौड़ में कमजोर हूँ, पुलिस तो नहीं बना, न उतने पैसे थे, पर हाँ, सोचा पत्रकार तो बन ही सकता हूँ, तब से अब तक, किसी भी मज़बूर को देखता हूँ, तो अपने रिपोर्टर से कहता हूँ, सर ये स्टोरी बना दीजिये, डेस्क वालों से काम के अलावा कुछ और बात करना सूझता नहीं, साला, खुदपर भी गुस्सा आता है, जिन विचारों को यहाँ डीपीआर और पीआर का पर्दा बनाए रोज़ नंगा कर दिया जाता है, भला वैसे ‘उचित’ विचार मेरे मन से खत्म क्यों नहीं होते?

कभी सोचता हूँ मीडिया लाइन ही छोड़ दूँ, फिर सोचता हूँ, इसमें सम्मान मिलता है, बस इसी लत ने कमज़ोर करके रख दिया है, देखते हैं, कब तक जीवन चलता है, वर्ण गाँव लौटकर, पिताजी का खेती में हाथ बताऊंगा.” इतना कहकर वो तो चले गए, पर इस चर्चा में, इन बातों में जो सवाल था, वो यकीनन, कहने और न कहने वाले हर पत्रकार के भीतर रोज़ ज्वारभाटा कि तरह फूटता है, मैंने जब अपनी पत्रकारिता कि पढाई शुरू कि थी, तब ‘उस’ पीड़ित कैमरामैन की तरह मेरे भी एक अच्छे, सशक्त मीडियाकर्मी बनने का अरमान था, किस्मत से वो अभी भी ज़िंदा है, पर पत्रकारिता क्षेत्र में अच्छे अच्छे विचाारों को जिस तरह रोज़ मरते देखना पड़ता है, वो यकीनन हैरान कर देने वाला रहता है, विधानसभा सत्र के दौरान कई तथाकथित ‘वरिष्ठ’ पत्रकरों को जब किसी मंत्री, अधिकारी के बाल, गाल, जूते, दाढ़ी की तारीफ करते, हाथ की ऊँगली में ऊँगली फंसाए देखने पर ‘बाल’ मन सोचता है, क्या यही सब पत्रकारिता है? क्या यही पत्रकारिता का धर्म है? क्या यही वरिष्ठता है?

जहाँ कोई गरीब जब अपना दर्द साझा करने आये, तो हम आईडी हटा लेते हैं, जल्दी जाना है, खबर भेजने की बात का बहाना बना, खिसक लेते हैं, पर जब कोई पॉवरफुल नेता, मंत्री, अधिकारी बाइट दे, उससे पहले, उन्हें पूरा मसला, सवाल समझा देते हैं, उसमे क्या पूछा जाए, क्या नहीं पूछा जाये, वो भी मंत्री, अधिकारी, नेता तय करता है, और हम पूछते हैं, क्या यही कलमवीर होने की पहचान है कि हम आईडी, कलम थामे चापलूसी कि हर सीमा रेखा अपने कपड़े निकालकर लांघ दें? अगर यही पत्रकारिता कि परम्परा है, तो क्या आनेवाली पत्रकारों की पीढ़ी को इसी घटिया परम्परा का निर्वहन करना होगा? सवाल काफी सारे हैं, और ये सवाल ज़हन में, इस फील्ड में शायद हर प्रदेश में, हर जिलों में, हर तहसील, हर गाँव की पत्रकारिता में होंगे ही, पर इसका मतलब कतई ये नहीं है कि इनके चरण वंदन कि परम्परा का निर्वहन किया जाये, पत्रकार हैं, जो मन में है, पूछेंगे, माध्यम कोई भी हो, प्रिंट मीडिया में हों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हों, साप्ताहिक, मासिक पत्रिकाओं में काम करें, या स्वतंत्र रहें, पर सवाल तो पूछेंगे, सीधा सवाल पूछेंगे, ना की, मंत्री जी फलां बारे में बोलेंगे क्या? कहकर ‘वफादारी’ निभाएंगे, पत्रकारिता की आनेवाली पीढ़ी को ये तय करना होगा कि वो डिग्री हाथ में लेने के बाद किस तरह की पत्रकारिता करना चाहेंगे?

पीत पत्रकारिता का जन्म तो बरसों पहले हो गया था, पर आज की पत्रकारिता प्रणाम, शरण में हाथ जोड़ने, रसूखदारों के हाथों में ऊँगली फंसाने, नेताओं की कुर्सियों में प्रवक्ता के तौर पर बैठ भैया, चाचा का रिश्ता बनाने के नए पत्रकारिता से युवा पीढ़ी को जूझना होगा, ये भी देखने होगा, कि किस तरह ‘रेप’ कि शिकार किसी पीड़िता के बारे में संबंधित अधिकारी से बाइट लेने के बाद किस तरह से कथित ‘रिपोर्टर’ हंसी ठिठोली कर अपना ‘धर्म’ निभाते हैं, ये भी देखना होगा, कि किस तरह दुआ, सलाम, खबरिया सूत्र बनाने के बहाने चापलूसी का चोला पहना जाता है, ये भी देखना होगा कि किस तरह से जनसपंर्क के अधिकारीयों के चरण वंदन से ‘कइयों’ को बिना किसी नियम, धरम के ‘अधिमान्यता’ कि रेवड़ी मिलती है, और शायद ये भी, कि जो पीता है, वही पत्रकार होता है, की बात सुन, कभी कोई ‘पत्रकार’ किसी रसूखदार के साथ बार में जाम भी टकराते दिख जाए, ये विचार, प्रेस क्लब में मिले उस कैमरापर्सन साथी से बातचीत के बाद आये, ऐसा बिलकुल नहीं है, और ना ही ये मेरे बस विचार हैं, बल्कि ये विचार हम सब ऐसे पत्रकारों के हैं, जो फील्ड में शायद रोज़ सफेद, खाकीपोशों के सामने रोज़ कई ‘पत्रकारों’ की भावभंगिमा, उनके आदत व्यवहार से देखते, परखते हैं.

योगेश मिश्रा
पत्रकार
छात्र, केटीयू
रायपुर
9329905333
8827103000

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दैनिक जागरण के मालिक और मैनेजर भगवान से नहीं डरते लेकिन जनता को भगवान के नाम पर डराते हैं, देखें तस्वीरें

ये तस्वीरें दैनिक जागरण लखनऊ कार्यालय के बाहर की हैं. इसे कहते हैं- ”पर उपदेश कुशल बहुतेरे” यानि जो लोग भगवान से ना डरते हुए अपने कर्मियों को उनका मजीठिया वेज बोर्ड वाला कानूनी, न्यायिक और संवैधानिक हक नहीं दे रहे हैं, वे ही लोग जनता को ईश्वर की नजर में होने का भय दिखाकर पेशाब न करने, कूड़ा न फेंकने की अघोषित हिदायत दे रहे हैं.

नोएडा और आसपास की कई यूनिटों में कुल मिलाकर 300 लोगों को जागरण प्रबंधन ने इसलिए बर्खास्त कर रखा है क्योंकि ये लोग अपना कानूनी हक मांग रहे थे, ये लोग मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से अपना एरियर व सेलरी की मांग कर रहे थे. इसी तरह दैनिक जागरण लखनऊ में भी उपर से नीचे तक किसी को मजीठिया वेज बोर्ड का हक दिए बिना उनसे जबरन लिखवा लिया गया कि उन्हें यह वेज बोर्ड नहीं चाहिए और वे अपनी सेलरी से संतुष्ट हैं. ऐसे धतकरम करने वाला जागरण प्रबंधन अगर खुद ईश्वर से नहीं डर रहा तो फिर जनता को ईश्वर के नाम से क्यों डरा रहा. वो कहते हैं न कि असल में ईश्वर और धर्म अमीरों के लिए हथियार है जिसका इस्तेमाल गरीबों को डराने और बांटने के लिए किया जाता है. जागरण के मामले में तो यह बिलकुल सही जान पड़ता है.

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नेशनल दुनिया जयपुर में जनवरी से किसी को वेतन नहीं, मीडियाकर्मी परेशान

नेशनल दुनिया जयपुर से सूचना है कि यहां इस साल जनवरी से किसी को भी वेतन नहीं मिला है. खासकर मशीन विभाग के लोग बहुत परेशान हैं. पिछले माह की 26 तारीख को ही प्लांट को बन्द कर दिया गया. सभी कर्मचारी वेतन के लिये परेशान हो रहे हैं. प्रबन्धन की तरफ से कोई आश्वासन नहीं दिया जा रहा है. ऐसे में कर्मचारी क्या करें और कहां जायें, कुछ समझ नहीं आ रहा है. प्रोडक्शन डिपार्मटमेंट की टीम में सभी सदस्य बड़े परेशान हैं.

इस टीम के सीनियर लोग भी कोी जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं कि सेलरी कब मिलेगी. जयपुर में किसी भदोरिया के किसी आशीष नामक रिश्तेदार को यूनिट हेड बना कर भेजा गया है. इसको फोन करने पर कोई जवाब नहीं मिलता. प्लांट मालिक भी जमीन खाली करवा रहा है. नये प्लांट के लिये जमीन देखी जा रही है. मशीन विभाग के कर्मचारी क्या करेंगे, ये कोई नहीं बता पा रहा है. ना ही उनको वेतन दिया गया है. सभी बड़ी परेशानी में हैं.

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मीडियाकर्मियों का वेतन देखेंगे तो शर्म आ जाएगी सांसद महोदय

गिने चुने संपादकों से तुलना मत कीजिए, खुद को सेवक कब मानेंगे प्रभु!

गरीब सांसदों को वेतन में बढो़त्तरी चाहिए. लाखों रुपए जो बतौर वेतन भत्ते मिलते हैं, वे कम हैं. राज्य सभा में सपा सांसद नरेश अग्रवाल ने बुधवार को कहा कि मीडिया ट्रायल की वजह से संसद डरती है. उन्होंने  हवाला यह दिया कि संपादकों के वेतन का चौथाई भी मिल जाए, वही बहुत है. सही कहा नरेशजी ने. टीवी चैनल के गिने चुने पांच-सात संपादकों का पैकेज जरूर करोड़ों में है. परंतु जिस मीडिया से वह डरते हैं वहां के पत्रकारों का वेतन पांच-सात हजार मासिक तक का है. पत्रकार इस कदर जीवन यापन कर रहा है कि विपन्नता उसे गलत कामों की ओर मोड़ देती है, सांसदों को यह पता नहीं है क्या कि प्रिंट मीडिया के पत्रकारों की स्थिति कितनी शोचनीय है?

संसद और सरकार बस उनके लिए वेतन आयोग भर बना देती रही हैं याद नहीं आता कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का कभी संपूर्ण अनुपालन हुआ हो. होता भी कैसे सरकारों और मीडिया घरानों के बीच दुरभि संधि जो है. सरकार कागज के कोटे से लगायत औने पौने में भूखंड देने और विज्ञापनों के अलावा तमाम सुविधाएं प्रदान कर उन्हें उपकृत करती रही है. एवज में मीडिया एक सीमा से आगे नहीं बढती. यानी एक अघोषित लक्ष्मण रेखा दोनों ओर से खिंची हुई है. यह सिलसिला आजादी बाद से ही बदस्तूर चल रहा है.

मैं पूछता हूं सांसदों से ही कि पिछले साठ सालों के दौरान पंचवर्षीय योजनाओं की घोषणाएं मीडिया में सुर्खियां बनती रही हैं. लंबे चौड़े इश्तिहारों की रेवड़ी बांटी जाती रही शायद इसीलिए न कि इन योजनाओं के कार्यान्वयन के मामले में मीडिया आंखें बंद रखे. चौकेदार को सुला देंगे तो चोरी और भ्रष्टाचार की गंगा बहनी ही थी. पूर्व प्रधान मंत्री स्व. राजीव गांधी ने जो कहा कि विकास का 85 पैसा बिचौलियों की जेब में गया, वह शायद न जाता यदि सरकार और मीडिया दोनों की जवाबदेही भी फिक्स रहती. देश में लूट के लिए हम सिर्फ नेता और नौकरशाही को ही दोषी नहीं कह सकते, मीडिया भी उतनी ही जिम्मेदार है. इस गठजोड़ को तोड़ेगा कौन, फिलहाल यह यक्ष प्रश्न है ?

जहां तक सांसदों की गरीबी और वेतन वृद्धि का सवाल है तो पहले यह तय हो कि वे सेवक हैं या कोई कारपोरेट हाउस के अधिकारी. जिनको हर सुविधा चाहिए ही, उन पर आयकर भी न लगे. तरह तरह के भत्तों के अलावा कैंटीन में लजीज भोजन बाहर सड़क पर रेहड़ी और खोमचा लगाने वाले से भी सस्ता हो. शर्म करों जनता से चुन कर आए सांसदों. बहुत पा रहे हो. समय आ गया है कि पहले मीडिया घरानों को कसो और यह देखो कि मीडिया की आड़ में वे कितने बहुधंधी हो गए हैं, और हुए तो कैसे ? किन स्रोतों से वे आगे बढ़े ? उनके पब्लिशिंग हाउस में पत्रकारों और गैर पत्रकारों की कैसी स्थिति है, क्या श्रम कानूनों को वहां पूर्णता के साथ लागू किया गया है ? मीडिया को सही मायने में स्वतंत्र कैसे बनाया जाए, देश की कार्यपालिका इस पर गंभीरता से सोचे ही नहीं उसको अमल में भी लाए.

जहां तक सांसदों की खुद की माली हैसियत का सवाल है तो नामांकन में अधिकांश ने जो संपत्तियां घोषित की हैं, वे उन्हें गरीब कहीं से नहीं बतातीं. अरे, आप आम आदमी बनिए, अंग्रेजों के समय से चली आ रही वीआईपी परिपाटी को तोड़िए. आडंबरहीन जीवन शैली सादगी की ओर ले जाती है. वर्तमान सरकार में है न रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर, उनको आदर्श बनाइए. तभी आप सच्चे अर्थों में सेवक माने जाएंगे. हो सके तो सांसदों का प्रतिनिधिमंडल त्रिपुरा भेजिए जो वहां के मुख्यमंत्री माणिक सरकार के रहन सहन का अध्ययन करे और देखे कि पत्नी के साथ वह कैसे 482 वर्ग फुट के छोटे से घर में सारे घरेलू काम अपनी सचिव पद से रिटायर पत्नी के साथ मिल कर खुद करते हैं. जिस देश में प्रशासनिक अधिकारियों के यहां सेवकों और सहायकों की लंबी चौड़ी फौज तैनात हो, उसी के एक राज्य के मुख्यमंत्री आवास में कोई एक नौकर तक नहीं है. क्या यह भी शोध का विषय नहीं कि माणिक सरकार सिर्फ पांच हजार रुपए वेतन लेते हैं.! नरेश अग्रवालजी सुन रहे हैं न…..!!

लेखक पदमपति शर्मा वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं और खांटी बनारसी हैं. पदमपति शर्मा अपनी बेबाकबयानी के लिए चर्चित हैं.

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साधना न्यूज (एमपी-सीजी) के ठग संचालकों से बच कर रहिए, पढ़िए एक पीड़ित स्ट्रिंगर की दास्तान

संपादक
भड़ास4मीडिया
महोदय

मुझसे साधना न्यूज (मध्यप्रदेश छत्तीसगढ) के नाम पर 8 माह पूर्व विनोद राय के निजी खाते में 20 हजार रुपये ट्रांसफर कराए गए थे. इस रकम को खुद मैंने अपने खाते से भेजा था. परन्तु साधना न्यूज ने एक माह बाद ही किसी दूसरे को नियुक्त कर दिया. विनोद राय (इन्दौर, डायरेक्टर, साधना न्यूज) से रुपये वापस मांगने पर वे नये नये तरीके से टालते रहते हैं और आज कल करके कई प्रकार के बहाने से मुझे राशि लौटने से इनकार कर रहे हैं. मैं इसके लिए कई बार इन्दौर का चक्कर काट चुका हूं.

इस विषय में आदित्य तिवारी और एमके तिवारी को सूचित कर चुका हूं जो कि लोकायत पत्रिका एवं साधना न्यूज़ मध्य प्रदेश छत्तीसग़ढ के संचालक हैं. परन्तु मुझे राशि नहीं लौटाई जा रही है. मेरे द्वारा मोबाइल से फोन किए जाने पर फोन नहीं उठाया जाता और अब मेरा नंबर ब्लैक लिस्ट में डाल दिया गया है. इसके पहले शिवराज सिंह के भोपाल कार्यक्रम के लिए मैंने 80 हजार रुपये साधना न्यूज में दिया था, वह भी मैंने विज्ञापनदाता को वापस किया था, उसका भी कुछ निर्णय नहीं हो रहा.

विनोद राय के कहे अनुसार मैंने किसी को चेक दे दिया था परन्तु अब मेरे उपर वह व्यापारी चेक बाउन्स का केस कर देगा. बडी मुश्किल से शुक्रवार को विनोद राय से मेरी बात हुई थी  जिसमें उन्होंने सोमवार को राशि डालने का वादा किया था परन्तु आज भी समय निकल गया है. फोन नम्बर रिजेक्शन लिस्ट में डाल दिया है. मेरे पास तमाम सबूत हैं जिसके सहारे मैं इन सभी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने जा रहा हू. साथ ही पूरे मामले की जानकारी मीडिया जगत को भड़ास4मीडिया के माध्यम से देने जा रहा हूं.

धन्यवाद
आपका
राजेंद्र अग्रवाल
छिन्दवाडा, मध्य प्रदेश
मोबाइल नंबर : 9479906598, 810972555 , मेल : raj.agrawal011@gmail.com


ठगी का सुबूत यह आडियो है जिसमें विनोद राय पैसे लौटाने की बात तो करता है लेकिन लौटाता नहीं है… इस यूट्यूब लिंक पर क्लिक करके सुनिए… https://www.youtube.com/watch?v=BoTbx28diNg

ये हैं कुछ चैट जिससे साफ पता चलता है कि विनोद राय पैसे हड़पने का आरोपी है और पैसे लौटाने से इनकार कर रहा है….

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अमर उजाला वाले पत्रकार को न्यूज एजेंसी बना खूब कर रहे शोषण, सुनिए एक पीड़ित कर्मी की दास्तान

मीडिया संस्थान अमर उजाला में फुल टाइम कर्मचारियों को जबरन न्यूज़ एजेंसी का कर्मी बना कर उन्हें न्यूनतम वेतन लेने के दबाव बनाया जाता है. इसके लिए एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत समय-सीमा निर्धारित करके दबावपूर्वक लिखवाया जाता है कि वे (कर्मचारी) संस्थान के स्थाई कर्मचारी न होकर एक न्यूज़ एजेंसी कर्मी के तौर पर कार्य करेंगे. लेकिन असलियत ये है कि न्यूज़ एजेंसी संचालक से एक स्थाई कर्मचारी वाला काम लिया जा रहा है. उसे न्यूनतम वेतन पर सुबह 10 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक यानि 12 घंटे संस्थान के लिए कार्य करने को बाध्य किया जाता है.

अमर उजाला में जो फुल टाइम वर्कर हैं यानि पक्के कर्मचारी हैं, वे भी केवल 8 घंटे ही सेवाएं देते हैं. न्यूज़ एजेंसी संचालकों के लिए गाइडलाइन है कि वह किसी संस्थान के लिए बाध्य न होकर स्वतंत्र रूप से कार्य करेंगे. आज कई न्यूज एजेंसियों को अमर उजाला ब्यूरो ऑफिस में गुलामी की नौकरी करने को मजबूर किया जा रहा है. न तो उन्हें आईकार्ड दिया जाता है, न पूरी सैलरी दी जाती और न ही उनको समय पर अवकाश दिया जाता है. उन्हें एक बंधुआ मजदूर बना दिया गया है. यदि कोई कर्मचारी इसका विरोध करता है तो उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है. मीडिया संस्थान अमर उजाला के अधिकारियों और ब्यूरो प्रमुख द्वारा धमकी दी जाती है कि यदि किसी कर्मचारी ने इसके विरोध में आवाज़ उठाई तो उसे नौकरी से हटा दिया जाएगा. रोज़गार छिनने का भय दिखाकर अमर उजाला संस्थान लगातार कर्मचारियों का शोषण कर रहा है. इस कुव्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाने पर मुझे (अमर उजाला के कुरुक्षेत्र कार्यालय में सेवारत दीपक शर्मा) तानाशाहीपूर्ण रवैया दिखाते हुए ज़बरदस्ती नौकरी से हटाया जा रहा है.

मेरा अपराध ये रहा कि कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन द्वारा कही गई मौखिक बात को लिखित में मांग लिया था. टंडन ने कहा था कि हेमंत राणा ज्योतिसर, विशेष नाथ गौड़, राकेश रोहिल्ला और दीपक शर्मा को न्यूज एजेंसी संचालक होने के बावजूद सुबह 10 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक काम करना होगा. इसी बात को मैंने लिखित में हेड आफिस से मांग लिया. इसके बाद ब्यूरो प्रमुख ने हेड ऑफिस रोहतक में किसी संपादक से बात करके मुझे सर्विस से हटाने की रणनीति बना ली. न्यूज एजेंसी के कॉन्ट्रैक्ट में साफ़-साफ़ लिखा है कि अमर उजाला ने दीपक शर्मा न्यूज एजेंसी से तीन वर्षों के लिए अनुबंध किया है, जबकि अमर उजाला के जिला कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन और हेड ऑफिस रोहतक के अधिकारियों ने तानाशाही दिखाते हुए लगभग आठ माह के अंतराल में ही मेरी सेवाओं को समाप्त कर दिया.

ब्यूरो चीफ ने दूसरों की खबरें की अपने नाम से प्रकाशित

अमर उजाला के कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख मुकेश टंडन ने ऐसा भी किया कि न्यूज के लिए भागदौड़ तो की मैंने या किसी अन्य ने और न्यूज प्रकाशित कराई मुकेश टंडन ने अपने नाम से। उदाहरण के तौर पर…. ‘कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में बिना चेकिंग के एंट्री कर रहे वाहन’ शीर्षक के तहत खबर छपी थी जो कि मैंने बायलाइन भेजी थी, लेकिन ब्यूरो प्रमुख ने डेस्क पर बात करके इस पर से मेरा नाम हटवा दिया. दो दिन बाद जब इस खबर का इम्पेक्ट आया तो कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन ने यह इम्पेक्ट अपने नाम से प्रकाशित करा दिया, जिसका शीर्षक कुछ ऐसा था कि… ‘अब स्टिकर लगे वाहनों की होगी यूनिवर्सिटी में एंट्री’. जब इस न्यूज को लेकर मैंने मुकेश टंडन से बात की तो वे ताव में आ गए और बोले कि टंडन ब्यूरो चीफ है कुरुक्षेत्र का, जो मर्जी आए करूंगा, जो मेरे अंडर काम करता है वो मुझसे कुछ पूछ नहीं सकता.

ब्यूरो चीफ ने कई बड़े मामले दबा दिए गए

मैंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में नियमों को ताक पर रख आनन-फानन में एक असिस्टेंट प्रोफेसर को प्रोफेसर के पद पर प्रमोट करने का मामला कवर किया था. इस खबर को खंगालते वक़्त सामने आया था कि ये प्रमोशन की फ़ाइल कई बार रिजेक्ट हो चुकी थी. लेकिन अमर उजाला संस्थान के कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन ने इस खबर को दबा दिया. इसके पीछे मुकेश टंडन की क्या मंशा थी या हेड ऑफिस रोहतक से किसी प्रकार के निर्देश आए थे, ये तो मुकेश टंडन और हेड ऑफिस रोहतक वाले ही बेहतर जानते होंगे. लेकिन, कुछ भी बात रही हो, मेहनत करने के बावजूद इतनी बड़ी खबर न छापना कुछ और ही इशारा कर रहा था.

मैंने जब खबर न छपने बारे कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ मुकेश टंडन से बात की तो वे बोले कि हेड ऑफिस वाले नहीं छाप रहे, उनकी मर्जी. इसके दो दिन बाद जब दोबारा यह न्यूज भेजने की रिक्वेस्ट की तो मुकेश टंडन बोले कि ऑनलाइन सॉफ्टवेयर पर खबर नहीं है. फिर जब कंप्यूटर के फोल्डर में सेव की गई यही न्यूज भेजनी चाही तो वहां से भी गायब थी. ये क्या ड्रामा चल रहा है, कुछ समझ नहीं आ रहा. मीडिया संस्थान अमर उजाला के कुरुक्षेत्र ब्यूरो चीफ और हेड ऑफिस रोहतक के अधिकारी क्यों संस्थान को बट्टा लगवाने पर तुले हुए हैं? पर कभी तो आवाज उठेगी और मीडिया संस्थान अमर उजाला की असलियत सबके सामने आएगी.

सवाल उठने लगे हैं-

-क्या तानाशाही का विरोध करने की ये सजा हो सकती है कि एक कर्मचारी को नौकरी से हटा दिया जाए?
-क्या सुबह 10 से रात 10 बजे तक काम करवाकर बंधुआ मजदूर बनाना ही अमर उजाला संस्थान का उद्देश्य है?
-क्या एजेंसी संचालक द्वारा कुरुक्षेत्र ब्यूरो प्रमुख से 10 am to 10 pm कुरुक्षेत्र ब्यूरो में काम करने को लेकर हेड ऑफिस से लिखित में आदेश  मंगवाने की गुज़ारिश करना भी किसी अपराध की श्रेणी में आता है?
-क्या मीडियापर्सन या एक कर्मचारी का शोषण करने के लिए ही अमर उजाला संस्थान ने न्यूज एजेंसी की पॉलिसी अपनाई हुई है?
-एक कर्मचारी को जबरन एजेंसी बनाकर उसे बेहद कम वेतन पर मजबूर करना, क्या यही नियम, कायदा और न्याय है अमर उजाला का?

कीजिए सच का सामना, दीजिए जवाब.

कहते हैं जब किसी जानवर को खून मुंह लग जाता है तो उसकी मजबूरी हो जाती है बार-बार खून पीना. ऐसी ही स्थिति यहां भी दिखाई दे रही है. न जाने कितने ही कर्मचारियों को इस कुव्यवस्था का शिकार बनाया होगा आपने अभी तक और न जाने कितनों को बनाओगे. कुछ भी हो, एक दिन पोल खुलती ज़रूर है. अब वक़्त आ गया है अमर उजाला संस्थान की पोल खोलने का. आखिर में दो लाइनें कहना चाहूंगा…

आपकी भी कुछ मजबूरी रही, अब मेरी भी कुछ मजबूरी है,
जल्दी अब तैयारी करो, कोर्ट की कितनी दूरी है।
अच्छा किया या बुरा किया, तुम खूब जानो अमर उजाला के नुमाइंदों,
न्याय नहीं है तुम्हारी शरण में, अब कोर्ट की शरण जरूरी है।।

जय हिन्द…. जय भारत….

एक पीड़ित प्रताड़ित कर्मचारी

दीपक शर्मा

रिपोर्टर

कुरुक्षेत्र, हरियाणा

संपर्क: फोन 098132 88085 मोबाइल sdeepaknews@gmail.com

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‘दक्षिण मुंबई’ नामक अखबार की नीचता के खिलाफ युवा पत्रकार पहुंचा लेबर आफिस और पुलिस स्टेशन, पढ़ें शिकायती पत्र

मुंबई से एक अखबार निकलता है ‘दक्षिण मुंबई’ नाम से. इस अखबार में एक युवा पत्रकार ने पांच महीने तक काम किया. जब उसने सेलरी मांगी तो उसे बेइज्जत करके भगा दिया गया. इस अपमान से नाराज युवा पत्रकार ने लेबर आफिस में पूरे मामले की शिकायत की और भड़ास के पास पत्र भेजा. जब प्रबंधन को यह सब बात पता चली तो युवा पत्रकार को बुरी तरह धमकाया गया. इससे डरे युवा पत्रकार ने पुलिस स्टेशन जाकर शिकायत दर्ज कराई है.

युवा पत्रकार का नाम श्याम दांगी है. मुंबई का कोई वरिष्ठ पत्रकार साथी मदद करने और सेलरी दिलाने के लिए प्रबंधन पर दबाव बनाने हेतु श्याम दांगी से संपर्क उनके मोबाइल नंबर 7506530401 या मेल shyamdangi22@gmail.com के जरिए कर सकता है.

नीचे लेबर आफिस और पुलिस स्टेशन में दी गई शिकायतों की कापी है…

मूल खबर पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें>

पांच महीने बिना सेलरी काम कराया और बेइज्जत करके निकाल दिया

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धंधेबाज ‘समाचार प्लस’ चैनल : रिपोर्टरों को उगाही का टारगेट, पूरा न करने पर कइयों को हटाया

समाचार प्लस राजस्थान में सभी स्टिंगरों को दिया गया एक लाख से 2 लाख रुपये उगाही का लक्ष्य. नहीं देने वाले रिपोर्टरों को निकाला. 26 जनवरी यानि गणतंत्र दिवस के नाम पर उगाहने हैं लाखों रुपये. समाचार प्लस में मैं कई सालों से कार्य कर रहा था.  5 हजार रुपये मुझे मेरी मेहनत के मिलते थे. काम ज्यादा था, पैसे कम. लेकिन चैनल को कुछ और ही प्यारा था. समाचार प्लस राजस्थान टीम ने मुझे फ़ोन कर कहा-

”आप ब्यूरो हैं, आपको हम 1 लाख से 2 लाख रुपये का लक्ष्य दे रहे हैं. हमे जल्दी विज्ञापन दे दो. नहीं दे सकते हो तो टीवी में दिखना कम हो जाओगे और हमें कई स्टिंगरों को इस वजह से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा. आप पर भी गाज गिर सकती है, इसलिए आप भी खबरें कम कर दो और विज्ञापन दो. नहीं दे सकते तो मैनेजमेंट आपको हटा देगा.”

उन लोगों ने फोन पर ही बताया कि अजमेर के ब्यूरो चीफ संतोष सोनी और उदयपुर के अब्बास रिजवी को बाहर का रास्ता टारगेट पूरा न करने के कारण दिखा दिया गया है. इनको हटाने की वजह यह कि इन्होंने पैसे देने से मना कर दिया. उसी दिन हटाकर नए स्टिंगरों को लगा दिया गया. राजस्थान के सारे स्टिंगरों को मेल पर 1 से 2 लाख रुपये देने का आदेश दे दिया गया है. आखिरकार मैनेजमेंट ने हमें बाहर क्यों निकाला. हम उन्हें हर ओकेजन पर विज्ञापन देते थे. लेकिन जब बार-बार विज्ञापन समाचार प्लस राजस्थान टीम मांग रही है तो हम कहां से दें.

अभी दीपावली पर ही लाखों रुपये के विज्ञापन दे चुके हैं. उनका ही पेमंट नहीं हुआ. लेकिन अब फिर से 1-2 लाख रुपये विज्ञापन के नाम पर मांग लिए. धंधेबाजी और उगाही की हद होती है. आप से गुजारिश है कि आप इस दुःखद मेल को अच्छे से लगायें और मीडिया कर्मियों का साथ देवें. यह सबको जानना जरूरी है कि रिपोर्टर अब चैनल के लिए कमाई करेगा. यही कारण है कि अब समाचार प्लस ग्रुप के दावे फेल होने लगे हैं. यह साबित होने लगा है कि इसका मालिक उमेश कुमार पहले से ही धंधेबाज रहा है और फिर से अपने ओरीजनल रूप में आ गया है. इसकी धंधेबाजी के चर्चे उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत पूरे राजस्थान में होने लगे हैं. इसकी नेताओं अफसरों सरकारों की दल्लागिरी के कारण एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया.

ग्रुप ने जिला स्तर पर राजस्थान में जो संवाददाता रखे थे, रिटेनर, उन पर मार्केटिंग का भारी दबाव बनाया जा रहा है. अब रिपोर्टर खबरें करे या विज्ञापन मांगता फिरे, समझ ही नहीं आ रहा. चैनल ने कमाई न करके देने पर बीकानेर, अजमेर समेत कई जिलों के रिपोर्टरों को हटा कर वहां स्ट्रिंगर रख दिए हैं. अब 26 जनवरी के लिए 1 लाख का टार्गेट दिया है. समझ नहीं आ रहा है कि इस चैनल के मार्केटिंग विभाग वाले क्या कर रहे हैं. बड़ी तनख्वाह पर काम कर रहे हैं और दबाव रिपोर्टर पर बना रहे हैं. सरकार के खिलाफ खबर नहीं चलाते, भले ही कुछ भी हो जाए. धमकी दी जा रही है कि रुपए नहीं उगाहे तो हटा दिया जाएगा. नीचे वो मेल है जो चैनल की तरफ से सभी को भेजा गया है>

Dear All,

this is a reminder regarding spot/scroll advt on 26 jan-2016 (Republic day ) as per instructions of Channel Head- Mr. Ajay Jha
District head quarter – advt Amount should be Rs. 1 lakh
Tahsil and others advt Amount should be Rs. 50,000 /-

Plz make sure for this target.

Thanks
Manoj Gotherwal
Manager Marketing
Samachar Plus Channel- Raj.
08233229289

भड़ास के पास राजस्थान के कई टीवी जर्नलिस्टों द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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पांच महीने बिना सेलरी काम कराया और बेइज्जत करके निकाल दिया

माननीय संपादक जी
भड़ास4मीडिया

सर

मेरा नाम श्याम दांगी  है और मैं मुंबई में पत्रकारिता से जुड़ा हूँ। सर नौकरी के दौरान मैं कुछ कठिनाईयों का सामना कर रहा हूँ जिसके लिए आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता है। मैं पिछले पांच महीने से मुंबई से प्रकशित होने वाले  दैनिक अखबार दक्षिण मुंबई में बतौर सब एडिटर कार्यरत था। लेकिन मुझे इस दौरान कभी सैलरी नहीं मिली।

फिर मुझे किसी काम से गाँव जाना पड़ा। लौटने के बाद जब मैंने अपनी सैलेरी की मांग की तो मुझे बेइज्जत करके बाहर निकाल दिया गया। अब मेरे लिए क्या रास्ता बचता है इस विषय में मुझे आपके मार्गदर्शन की जरूरत है। कृपया मेरा मार्गदर्शन करें ताकि इस अखबार से जुड़े कई और पीड़ितों को न्याय मिल सके।

श्याम दांगी
7506530401
shyamdangi22@gmail.com

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क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है!

आकाशवाणी के दोहरे मापदंड एवं हठधर्मिता के चलते लंबे समय से काम रहे आकस्मिक उद्घोषकों का नियमितिकरण नहीं किया जा रहा है। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट भी संविधान पीठ भी दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश दे चुकी है। आकाशवाणी में आकस्मिक कलाकार/ कर्मचारी सन 1980 से अर्थात प्रसार भारती के लागू होने के वर्षों पहले से स्वीकृत एवं रिक्त पड़े पदों के स्थान पर आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर के रूप में काम कर रहे हैं।

विज्ञापन निकलने के बाद ही आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर नियुक्त किए जाते हैं, विज्ञापन में पात्रता की शर्तों के अनुसार आवेदन देने वाला किसी भी केंद्रीय सरकार, राज्य सरकार एवं पब्लिक सेक्टर का कर्मचारी नहीं होना चाहिए।  आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति की प्रक्रिया भी स्थाई उद्घोषक / कम्पीयर की नियुक्ति के समान ही है। आकस्मिक उद्घोषकों / कम्पीयर की भी काम करने की अवधि 7 घंटे 20 के ही समान है।

वर्तमान में एक आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को 3 से 4 असाइनमेंट को पूर्ण करने में पूरा महीना काम करना पड़ता है। वेज़ेज़ एक्ट के हिसाब से व्यावहारिक एवं वास्तविक विधि द्वारा असाइनमेंट से कार्य दिवस की गणना का नया विधान सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय नई दिल्ली की सहमति से निर्धारित किया गया है, लेकिन इसका लाभ आकस्मिक उद्घोषक / कम्पीयर को नहीं दिया जा रहा है।

आकाशवाणी महानिदेशालय भारत सरकार नई दिल्ली ने आदेश संख्या – 102(14)/78-SVII , दिनांक 8 सितंबर 1978 के तहत कैज़ुअल कलाकारों/ कर्मचारियों के नियमितिकरण के लिए एक नियमितिकरण योजना/ स्कीम दिनांक 08/09/ 1978 को बनाई गई थी जिसमें आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट, आकस्मिक जनरल असिस्टेंट/ कॉपिस्ट, आकस्मिक संगीतकार के साथ आकस्मिक उद्घोषकों को भी नियमित किया गया है।

6 मार्च 1982 के पहले आकाशवाणी के सभी पद अनुबंध यानी कॉन्ट्रैक्ट पर आधारित थे, वर्तमान में उद्घोषक/ कम्पीयर के सभी पद स्थाई पद हैं। इसी स्वीकृत एवं नियमित पदों की जगह आकस्मिक उद्घोषक/ कम्पीयर वर्षों से सेवाकार्य कर रहे हैं। O.A./563/1986 के मामले में ऑनरेवल CAT, प्रधान शाखा नई दिल्ली द्वारा पारित आदेश पर दूरदर्शन के सभी आकस्मिक कलाकारों का नियमितिकरण किया गया है और किया जा रहा है। O.A./563/1986 के मामले में 14 फरवरी 1992 को बनाई गई नियमितिकरण योजना को ही सादर दुहराने की बात ऑनरेवल CAT ने ही आकाशवाणी के आकस्मिक कलाकार सुरेश शर्मा एवं अन्य के मामले में O.A. 822/1991 में उल्लिखित की।

आकाशवाणी महानिदेशालय, नई दिल्ली ने दोहरे मापदंड के संग सिर्फ आवेदकों के संवर्गों के नियमितिकरण के लिए ही नियमितिकरण योजना बनाई और वर्ष में 72 असाइनमेंट्स पूरा करने वाले आकस्मिक कलाकारों, आकस्मिक प्रोडक्शन असिस्टेंट एवं आकस्मिक जनरल असिस्टेंट को नियमित कर नियमितिकरण का लाभ दिया जा चुका है, इतना ही नहीं O.A. 601/2006 कंचन कपूर एवं अन्य के मामले में ऑनरेवल CAT द्वारा 6 जुलाई 1998 एवं पुनः 20 मार्च 2007 को पारित आदेश में वर्ष में 72 से भी कम दिन कार्य करने वाले आकस्मिक कलाकारों की सेवाओं का नियमितिकरण किया जा चुका है।

आकाशवाणी त्रिवेंद्रम के कैज़ुअल कम्पीयर पी. रामेन्द्र कुमार की सेवाओं का नियमितिकरण O.A. 743/ 2000 में पारित आदेश के अनुपालन में प्रोडक्शन असिस्टेंट/ ट्रांसमिशन एग्जीक्यूटिव के पद पर किया जा चुका है। इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा उमा देवी के मामले में 10 अप्रैल 2006 में पारित आदेश में दस वर्षों या अधिक समय से कार्यरत संविदा कर्मियों की सेवाओं का नियमितिकरण एक मुश्त उपाय के तहत करने के निर्देश के बावजूद तथा समान रूप से समान सेवा शर्तों पर सेवारत हम आकस्मिक उद्घोषकों/ कम्पीयर का नियमितिकरण आज तक नहीं किया गया है।

आकस्मिक उद्घोषकों के अधिकार को हाशिये पर डाल दिया गया है। अवैध अंडरटेकिंग के सहारे आकाशवाणी पहले ही देश के अधिकांश आकस्मिक उद्घोषक और कम्पीयर से एफिडेविट पर हस्ताक्षर ले चुकी हैं और अब स्क्रीनिंग में उन्हें फेल करके हमेशा के लिए आकाशवाणी से बाहर करना शुरू भी कर दिया है, ये सब महज़ इसलिए कि अपना जायज़ अधिकार मांगने लायक भी कोई न रहे कोई न बचे।

पंद्रहवी लोक सभा में संसद की संयुक्त संसदीय समिति ने भी प्रसार भारती और आकाशवाणी को ये निर्देश दिया था कि आकस्मिक उद्घोषकों और कम्पीयर के साथ भेद भाव और शोषण को तत्काल ख़तम किया जाए। देश की दो सर्वोच्च संस्था एक माननीय सर्वोच्च न्यायालय और दूसरी हमारी संसद, हैरानी होती है जब इनका आदेश और निर्देश प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय नहीं मानती है और वही काम करती है, जो इनके मन में आता है और जब कभी प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय को ये याद दिलाया जाता है, कि आप माननीय सर्वोच्च न्यायालय और संसद के निर्देश को न मान कर उनकी अवमानना कर रहे हैं, तब ये अपना बदला आवाज़ उठाने वाले की ड्यूटी बंद करके निकालते हैं।

क्या प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय माननीय सर्वोच्च न्यायालय व संसद से भी बड़ी हो गई है जो इनके आदेश और निर्देश का अनुपालन नहीं करती ? अगर ऐसा है तो ये ग़लत है, इसके लिए प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय से मैंने सवाल किया था और परिणाम ये रहा कि मेरी बुकिंग (ड्यूटी) बंद कर दी गई है। सच बोलने पर सुना था इनाम मिलता है लेकिन मुझे तो सज़ा मिली है और पूछने पर आज तक मेरा क़ुसूर नहीं बताया गया है,अगर प्रसार भारती सही है और उसके दावे सच्चे हैं तो Honourable Supreme Court of India,  Central Administrative Tribunal  और संसद की संयुक्त समिति की रिपोर्ट प्रसार भारती और आकाशवाणी महानिदेशालय के ख़िलाफ़ क्यों है? आशा करता हूँ सच का साथ आप देंगे वरना संभव है आज सच बोलने की मुझे सज़ा मिली है कल आपका कोई अपना भी मेरी तरह फ़रियाद कर रहा होगा, आप ऐसा होने देंगे?

Ashok Anurag 
casual hindi announcer
AIR Delhi

जाने माने आकाशवाणी उदघोषक अशोक अनुराग का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं>

जहां सच्चाई दम तोड़ देती है उसे आकाशवाणी कहते हैं…

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