ऋषिकेश रजोरिया-
ऐसी पनौतियों के कारण हिंदी पत्रकारिता बर्बाद………..
हिंदी में अच्छा लिखने वाले लेकिन निजी व्यवहार में अत्यंत निकृष्ट व्यक्तियों में से एक श्रवण गर्ग इन दिनों सोशल मीडिया पर प्रवचन देने और किसी की नहीं सुनने वाली केंद्र सरकार को सलाह देने की भूमिका निभा रहे हैं। कई वर्षों तक एक अमेरिका पलट व्यक्ति के आज्ञाकारी चपरासी रहे और जनता के सामने दैनिक भास्कर के संपादक कहलाए।
अमेरिका से व्यवसाय बढ़ाने और पूरी तरह कर्मचारियों का तेल निकाल लेने का प्रशिक्षण लेकर आए अखबार मालिक का यह पालतू व्यक्ति अच्छे लेखकों और पत्रकारों के साथ जबरन की खुन्नस पालता था और उनका करियर बर्बाद कर देता था।
इंदौर में संपादकीय विभाग के कार्यालय में प्रवेश करते ही बाईं तरफ दिखने वाला केबिन इसका था। और यह कुर्सी पर बैठा मालिक की तरफ से खबरों की निगरानी करने के लिए तैनात अलसेशियन टाइप ख़तरनाक कुत्ते जैसा दिखता था। ऐसा भौंकता था कि कई पत्रकारों की पैंट गीली हो जाती थी।
अब बुढ़ापे में इनको भली भांति स्मरण है कि असंख्य पत्रकार इनके कमीनेपन के शिकार हो चुके हैं और वे सोशल मीडिया पर कभी भी उनकी बज्जी ले सकते हैं, इसलिए महानुभाव ने अपने फेसबुक अकाउंट से कमेंट का विकल्प हटा दिया है। मतलब हमारी बकवास सुनो। हमने संपादक के रूप मैं जीवन खपाया है तो हमें भी प्रभाष जोशी, राजेन्द्र माथुर जैसा पत्रकार मानो।
मैं श्रवण गर्ग के कमीनेपन का भुक्तभोगी हूं। दैनिक भास्कर वालों ने मुझे मुंगेरीलाल जैसे हसीन सपने दिखाकर जयपुर लाकर पटक दिया, और इन्होंने मेरे साथ तीन बार बदतमीजी की। एक बार मैंने बहुत कम वेतन का जिक्र किया तो बाबूलाल शर्मा के सामने कहा – तुमसे बात कर ले रहे हैं तो क्या सिर पर चढ़ोगे… एक बार किसी ने मेरी शिकायत कर दी थी, तब कहा.. मेरे रहते तुम यहां से रिटायर नहीं हो पाओगे।
अच्छे भले हिंदी अखबार को पूरी तरह रद्दी में तब्दील करने और इसके पन्नों से पत्रकारिता के मूल्यों को निर्ममता से नष्ट करने में इस दुष्ट व्यक्ति का बहुत बड़ा योगदान है। अब यह सोशल मीडिया पर लिख रहा है, प्रवचन दे रहा है। मैं कुछ कमेंट करने वाला था लेकिन इन्होंने उसे ब्लॉक कर रखा है, इसलिए यह पोस्ट लिखने की इच्छा हो गई।
श्रवण गर्ग ने दैनिक भास्कर ही नहीं, नईदुनिया का सत्यानाश करने में भी भूमिका निभाई है। अब वह महान पत्रकार की उपाधि हासिल करने के किए लालायित हैं। उनकी ही तरह के कुछ और भी बिल्ली के गू जैसे लोग हैं, जिन्होंने अखबार मालिकों की दलाली और केंद्रीय मंत्रियों, नेताओं से निकटता के कारण जमकर माल कूटा, बच्चों को अमेरिका, कनाडा भेज दिया, हर तरह का ऐश कर रहे हैं और बुढ़ापे में महान हिंदी पत्रकार कहलाने के लिए लाइन में लगे हैं। उनके बारे में फिर कभी….




arun Srivastava
September 20, 2025 at 3:41 pm
यह आपका निजी अनुभव है। वक्ता और विश्लेशक अच्छे हैं इसमें कोई दोराय हो तो बताने का कष्ट करें।