संजय कुमार सिंह
आज मेरे सभी अखबारों की लीड एसआईआर के दूसरे चरण की शुरुआत की खबर है। तैयारियों की पुरानी खबरों से जाहिर था कि घोषणा होने वाली है। प्रेस कांफ्रेंस की घोषणा से ही स्पष्ट हो गया था कि यही होना है और हुआ भी। लेकिन जैसा मैंने कल लिखा था, प्रधानमंत्री पहली बार छठ में भागीदारी करने वाले थे और लगभग उसी समय या कुछ ही पहले प्रेस कांफ्रेंस का समय रखा गया था। यह सामान्य नहीं है खासकर तब जब चुनाव आयोग की पिछली प्रेस कांफ्रेंस इतवार को हुई थी। प्रेस कांफ्रेंस की घोषणा से ही जब उसका मकसद साफ था तो खबर यह थी कि इसका मकसद क्या हो सकता है। खबर को महत्वपूर्ण बनाने या सुर्खियों में रखने के लिए प्रेस कांफ्रेंस में यह जरूर कहा गया कि एसआईआर 2.0 वाले सभी 12 राज्यों में रात 12 बजे से मतदाता सूचियां फ्रीज कर दी जाएंगी। यह नोटबंदी नहीं थी और अगले महीने की एक तारीख से भी शुरू हो सकती थी। अगर उससे कोई दिक्कत हो सकती थी तो कहा जा सकता है कि इसका पता कम से कम ममता बनर्जी को था ही और उन्होंने अपनी तैयारियां 12 बजे रात से पहले कर ली थी। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर तबादले हुए हैं और करीब 270 नौकरशाह इधर-उधर किए गए हैं। इसलिए मुझे नहीं लगता है कि यह लीड लायक खबर है। इसे लीड बनाया गया है। किन लोगों ने बनाया, किनका योगदान है – मैं उस पर नहीं जाउंगा पर यह जरूर बताना है प्रधानमंत्री ने वासुदेव घाट पर छठ करने का अपना कार्यक्रम कैंसिल कर दिया। मुझे लगता है कि बड़ी खबर यह है और इससे साबित होता है कि भाजपा का इको सिस्टम वोट बटोरू कार्यक्रमों को लागू नहीं कर पा रहा है। यह एक अलग गंभीर मुद्दा और खबर है लेकिन यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि चुनाव आयोग एसआईआर 1.0 से जनहित या निष्पक्ष चुनाव कराने का लगभग कोई भी मकसद पूरा नहीं होने के बावजूद देश भर में एसआईआऱ कराने जा रहा है जो भाजपा की जरूरत हो सकता है, देश और चुनाव की जरूरत तो नहीं ही है। कम से कम संबंधित सवालों के संतोषजनक जवाब के बिना। इसलिए यह खबर लीड है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का इंट्रो है, एसआईआर असम में नहीं होगा क्योंकि वहां नागरिकता की शर्तें भिन्न हैं। एक देश एक चुनाव (और न जानें क्या-क्या) का नारा तथा नागरिकता की परिभाषा भिन्न होना भी खबर है। दि एशियन एज के फ्लैग शीर्षक के एक बुलेट प्वाइंट के अनुसार, असम में अलग से एसआईआर बाद में होगा। गौरतलब है कि असम में चुनाव अप्रैल 2026 में होने हैं और एसआईआर अभी नहीं होगा तो चुनाव एसआईआर के बिना ही चुनाव होगा। दूसरी ओर, मिन्ट में छपी पुरानी खबर के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ने पांच अक्तूबर को बिहार एसआईआर के संबंध में कहा था कि चुनाव के बाद एसआईआर करना “न्यायसंगत नहीं” है; चुनाव से पहले करना आवश्यक था। अब असम में एसआईआर नहीं हो रहा है लेकिन पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हो रहा है। वहां चुनाव होने हैं। इसलिए हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के साथ हाइलाइट किए अंशों में मुझे दिखा, कांग्रेस ने ईसी की साख पर सवाल उठाए। द हिन्दू के उपशीर्षक का हिस्सा है, तृणमूल कांग्रेस और द्रमुक ने चिन्ता जताई है। लेकिन यह खबर (प्रमुखता से) नहीं है। यह अघोषित इमरजेंसी की स्थिति है और सरकार समर्थकों को बताओ तो कहते हैं कि इमरजेंसी होती तो आप यह सब लिख पाते। ज्यादातर मामलों में मैंने देखा है कि ऐसे लोग 1975 के बाद पैदा हुए हैं और उन्हें यकीन दिला दिया गया है कि इमरजेंसी में अंधाधुंध नसबंदी हुई थी। जो भी हो, अभी मीडिया की भूमिका शर्मनाक और देश विरोधी है। इन देश विरोधी ताकतों को सरकारी विज्ञापने देना और उसकी दर बढ़ाने की खबरें अलग विषय है। खबर इसपर भी हो सकती है।
सच्चाई यह है कि बिहार में 65 लाख नाम हटाए जाने के बावजूद उंगलियों पर गिनने लायक विदेशी मिलना, मुसलमानों के नाम हटाने की भाजपाई कोशिशों पर कोई स्पष्टीकरण नहीं होने के बावजूद एसआईआर टू की घोषणा अपने आप में बड़ी खबर है। वह इसलिए भी कि चुनाव आयोग यह सब जान-बूझकर नहीं कर रहा है तो मतदाता सूची बनाने के लिहाज से बिल्कुल निकम्मा और अयोग्य है। इसके अलावा, उसपर वोट चोरी के आरोप हैं इसके परिस्थितिजन्य साक्ष्य हैं, चुनाव और नतीजों से संबंधित ढेरों सवाल तथा नए मिले सबूत हैं, तमाम अनुत्तरित सवाल हैं, कर्नाटक मामले की जांच में सहयोग नहीं करना – बहुत से आरोप हैं जो चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कर्तव्यपरायणता को संदिग्ध बनाते हैं। एसआईआर भी सवालों से मुक्त नहीं है। ऐसे में एसआईआर 2.0 की घोषणा के बाद देश की जनता को यह समझना होगा कि जो लोग लोकसभा चुनाव से पहले संविधान बदलने के लिए वोट मांग रहे थे वे अब किसके सहयोग से संविधान की कब्र खोद रहे हैं। लोकतंत्र किस स्थिति में है और इसे बचाने के लिए आप क्या कर सकते हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, एसआईआर या चुनाव आयोग पर बिहार का प्रभाव हुआ है। मतदाता सूची में नए नाम शामिल करने को चिह्नित करने के लिए प्रक्रिया में बदलाव किए गए हैं और दस्तावेज़ दूसरे चरण में मांगे जाएंगे। इसमें नागरिकता पर रुख नरम होना शामिल है। खबर के अनुसार, प्रक्रियात्मक बदलाव भी किए गए हैं । 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का दूसरा चरण कई बिंदुओं से अलग होना दर्शाता है जिन्हें चुनाव आयोग ने 24 जून को बिहार के लिए अधिसूचित किया था। लेकिन यह चुनाव आयोग की मजबूरी हो तो हो, अहसान नहीं है और एसआईआर नियमानुसार हुए ही नहीं हैं। विदेशियों या घुसपैठियों की पहचान करना चुनाव आयोग का काम नहीं है। उसे निवासियों के नाम दर्ज करने थे और वे पहचान पत्र दिखा कर वोट दे सकते हैं।
आप जानते हैं कि बिहार में एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग कहता रहा कि एसआईआर वैसे ही होगा जैसे पहले मतदाता सूची का पुनरीक्षण होता रहा है और इससे संबंधित नियम नहीं मिले या नहीं दिए गए। अंतिम समय में योगेन्द्र यादव ने कहा कि उनके पास वह दस्तावेज है और चुनाव आयोग ने एसआईआर के दौरान या उसके नाम पर जो सब किया उसका जिक्र पुराने दस्तावेज में नहीं है। जाहिर है, एसआईआर में मनमानी हुई है और इसके सबूत की जरूरत नहीं है और यह वैसे ही है जैसे दिल्ली की हवा प्रदूषित है फिर भी बहुत सारे लोग कह रहे हैं कि उन्हें कोई दिक्कत नहीं है, कोई कह रहा है कि प्रदूषण पंजाब में पराली जलाने के कारण है और कोई कह रहा है कि प्रदूषण बढ़ता है तो बढ़े, हिन्दुओं के त्यौहार पर पटाखा चलाना जरूरी है।
दूसरी ओर, दिल्ली सरकार ने न सिर्फ इसकी इजाजत दिलाने का दावा किया कल टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड और सोशल मीडिया की दूसरी खबरों से पता चला कि एक्यूआई कम दर्ज हो इसके क्या उपाय किए गए थे या किन कारणों से कम दर्ज हुआ था। जो भी हो, भाजपा की सरकारें फुल फॉर्म में हैं। इनमें हिन्दुओं को खुश करना, हेडलाइन मैनेजमेंट और चुनाव जीतते रहने के दूसरे उपाय। इनमें प्रधानमंत्री स्तर की योजनाओं की पोल खुल जा रही है चाहे वह ऑपरेशन सिन्दूर हो या गया में पिण्डदान करने की योजना। दिल्ली में बिहार और पूर्वांचल के मतदाताओं को खुश करके बिहार में वोट लेने की कोशिश में यमुना को साफ करने और दिखाने की कोशिशों के साथ-साथ प्रधानमंत्री के भी छठ करने की घोषणा हुई। आज वासुदेव घाट का सच बताने वाले आम आदमी पार्टी के सौरभ भारद्वाज ने एक्स पर लिखा है, “प्रधानमंत्री मोदी ने वासुदेव घाट पर बनी “नकली यमुना” में अपनी छठ पूजा और सूर्य अर्घ्य रद्द कर दिया। भाजपा नेतृत्व इस बात से काफी शर्मिंदा लग रहा है कि प्रदूषण पर उनकी मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सरकार की धोखाधड़ी सोशल मीडिया पर खूब उजागर हुई है। ज़रा सोचिए, बिहार चुनाव से ठीक एक हफ़्ते पहले, प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से छठ नहीं मना सके और न ही वीडियो व तस्वीरें साझा की जा सकीं। मुझे लगता है कि इसे आखिरी समय में रद्द किया गया, इसलिए पीएमओ के लिए किसी और जगह की योजना बनाने के लिहाज से बहुत देर हो चुकी थी।” कहने की जरूरत नहीं है कि प्रचारक मीडिया ने पूरी कोशिश की कि पाइप लगाकर पहुंचाए गए गंगा के पानी को यमुना का पानी सिद्ध कर दे। मगर आम आदमी पार्टी ने सोशल मीडिया के दम पर उसे सफल नहीं होने दिया। वरना एंकर वहां जाकर फर्जी यमुना के पानी को यमुना नदी का साबित कर रहे थे। पता नहीं अब अपने बच्चों को अपने घर में वे क्या मुंह दिखाएंगे। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने भी छठ करने वालों के सहयोग का पूरा प्रचार किया लेकिन बात नहीं बनी। नवोदय टाइम्स ने पहले पन्ने पर फोटो जरूर छापी है।
एसआईआर 2.0 की घोषणा तो हो गई लेकिन इसकी जरूरत, बिहार में हुए एसआईआर की वैधता, सफलता पर चर्चा नहीं हुई है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त ने खुद बिहार में हुए एसआईआर की प्रशंसा की है – देशबन्धु की लीड का उपशीर्षक है। तमाम शिकायतों और सुप्रीम कोर्ट में भी मामला नहीं निपटने के बावजूद कहा है कि यह सुनिश्चित करना कि योग्य मतदाता शामिल हों और अयोग्य व्यक्ति मतदाता सूची में न हों, उसका काम है। चुनाव आयुक्त ने यह भी दावा किया है कि आधार जन्म की तारीख का सबूत नहीं है और ना ही डोमिसाइल का। अगर इसे मान लिया जाए तो तथ्य यह है कि मतदाता सूची में नाम होने के लिए न तो डोमिसाइल की जरूरत है ना उम्र के प्रमाणपत्र की। सामान्य निवासी भी मतदाता है और 18 साल से ऊपर का व्यक्ति देखकर पहचाना जा सकता है। 19-20 वाले को आप 17 का मान कर छोड़ दीजिए या उससे सबूत मांगिए, मेडिकल करवा लीजिए, उसका आधार मत मानिए लेकिन 20 साल के व्यक्ति के जन्म प्रमाणपत्र या डोमिसाइल की क्या जरूरत है। भारत का नागरिक कहीं भी रहे, वोट तो दे ही सकता है। सबसे आसान था, आधार के अधार पर मतदाता सूची में नाम डाल दिया जाता लेकिन चुनाव आयोग जो कर और कह रहा है उसे समझना मुश्किल नहीं है। मुझे लगता है कि मोटे तौर पर चुनाव आयोग का काम योग्य मतदाताओं की मतदाता सूची बनाना है। उसमें जब दो बार नाम हैं, वयस्क आबादी से ज्यादा नाम हैं तो उसके शुद्ध होने का दावा नहीं किया जा सकता है और इसीलिए पहचान पत्र देखकर वोट डालने देने का नियम है। चुनाव आयोग का दावा है कि बिहार में मतदाता सूची 22 साल में पहले बार “शुद्ध” हुई है। लेकिन अशुद्धियों और उसके कारणों की चर्चा होती रही है और इसपर कोई स्पष्टीकरण नहीं है। आयोग का काम सभी मतदाताओं को समान अवसर देना है, राजनीति से प्रभावित नहीं होना है। लेकिन आयोग जो कर रहा है, जो दस्तावेज मांग रहा है और जिस ढंग से आधार को नहीं मानने की जिद्द करता रहा वह भाजपा की लाइन है। चुनाव आयुक्त ने एसआईआर के पारदर्शी होने का दावा किया लेकिन खबरों से ऐसा लगता नहीं है।
यही नहीं, पहले माना जा चुका है कि एसआईआर के लिए तीन महीने का समय कम है। बिहार के मामले में कहा जा चुका है कि विकल्प नहीं था और इसलिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के साथ-साथ एसआईआर चलता रहा और अब लगभग फेट अकम्पली की स्थिति है जो मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति वाले मामले में पहले से है। इसके बावजूद आज खबर है कि एसआईआर 2.0 तीन महीने में ही किया जाएगा। अखबारों की आज की खबर शीर्षक से नहीं लगता है कि वे चीजों को समझने और बताने के लिए तैयार हैं। इसलिए जिम्मेदारी राहुल गांधी या कांग्रेस की नहीं, हरेक नागरिक की है। अमर उजाला ने मूल खबर के साथ अपने पाठकों को बताया है ऐसा होगा गहन पुनरीक्षण… जानिए पूरी प्रक्रिया। इसके साथ उनका यह दावा भी लिखा या छपा है कि, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी योग्य मतदाता छूट न जाए और कोई भी अयोग्य मतदाता इस सूची में शामिल न हो। यह सब तब जब मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे आईएएस और आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र जैसे संजीव गुप्ता ने एक्स पर लिखा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का यह बयान विचित्र है कि, मतदाता सूची बनाने के लिए दोहराव पकड़ने वाला सॉफ्टवेयर अनावश्यक है क्योंकि किसी भी व्यक्ति से अपेक्षित है कि वह एक ही फॉर्म भरेगा और कोई भी दो बार तभी साइन करके जब वह आपराधिक दिमाग का होगा। चुनाव आयुक्त यह तर्क क्यों दे रहे हैं, समझना मुश्किल नहीं है फिर भी इसकी खबर नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


