नई ट्रेन के नाम को लेकर सोशल मीडिया पर तलवारें खिंचीं, राजा सुहेल देव राजपूत थे या राजभर या पासी?

Anand Kumar : आने वाली 13 अप्रैल को गाजीपुर से दिल्ली के लिए एक नयी ट्रेन शुरू हो रही है, “राजा सुहेल देव राजभर एक्सप्रेस” (ट्रेन सं० 22419). तीन दिन ये शाम 5.30 पर गाज़ीपुर से रवाना होकर सुबह 8.30 आनंद विहार टर्मिनल पहुंचेगी. वहां से बुधवार, शुक्र और रविवार को ट्रेन सं 22420 शाम 6.45 बजे चलकर सुबह 9.05 गाजीपुर पहुचेगी. अब ये ट्रेन का नाम बड़ा अनोखा है. आपको वामपंथी इतिहास में पढ़ाया ही नहीं गया होगा कि राजा सुहेल देव राजभर कौन थे. तो फिर ये थे कौन जिनके नाम पर ट्रेन चलाई गई है?

राजा सुहेल देव राजभर ने इस्लामिक हमलावर महमूद गज़नी के भांजे को मारा था. गज़नी के हमले के कुछ साल बाद महमूद का भांजा भारत पर हमला करने अपने कुछ चाचा, मामा और अन्य धर्म परिवर्तन करवाने वालों के साथ आया था. तो राजा सुहेल देव को राजाओं की संयुक्त सेना का मुखिया बनाया गया. बनारस पे हमला करने पहुंची गाज़ी की फौज को बुरी तरह हराया गया. सुहेल देव राजभर बाकी बेवक़ूफ़ हिन्दू राजाओं की तरह यहीं नहीं रुके थे. इस्लामिक हमलावर गाज़ी सलार मसूद की फौज को उन्होंने खदेड़ खदेड़ के काटा था. पचास हज़ार इस्लामिक हमलावरों में से सौ पचास भी मुश्किल से वापिस भाग पाए थे.

बाद में अंग्रेजों ने राजभरों को क्रिमिनल कास्ट घोषित कर दिया था. इस क्रिमिनल कास्ट एक्ट का नाम आपको दल हित चिंतकों ने नहीं बताया होगा. कई लोगों को इसके जरिये अंग्रेजों ने जन्म के कारण ही अपराधी घोषित कर दिया. ये एक्ट आजादी के बाद नहीं, संविधान बनने और लागू होने के भी कुछ साल बाद ख़त्म हुआ था. इस एक्ट के ख़त्म होने पर क्रिमिनल कास्ट को Denotified Caste घोषित किया गया.  मीना जैसी कई जो कभी राजा थे, वो सब Criminal Caste से OBC या फिर Sceduled Caste/Tribe घोषित हुए. बाकी कई (राजभर जैसे) Denotified Caste हो गए. वो अभी भी Denotified ही हैं. बाकि ये बस याद दिलाने के लिए था कि भारत में एक Denotified Caste भी है. फॉर्म में भरे जाने वाले SC / ST / OBC / General तो आप पहले ही जानते हैं. जानते हैं ना?

आनंद कुमार के एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ प्रमुख कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Akash Gaurav पहली बार इनके बारे में मुझे संघ के प्रथम वर्ग के दौरान मिली थी। दुसाध समुदाय के लोग इनके जन्मदिन के दिन इनकी पूजा करते है और सूअर की बलि चढाते हैं। कहते है कि मुल्लों को काटने के बाद राज सुहलदेव ने ही सूअर का बलि देने की प्रथा शुरू की थी।

Sushant Jha सुहेलदेव के बारे में कहीं पढ़ा था पासी थे. क्या पासी और राजभर एक ही हैं?

Anand Kumar शादी जैसे संबंधों के लिहाज से पासी और राजभर वैसे ही अलग हो जाते हैं जैसे ब्राह्मण और भूमिहार| तय करने में थोड़ी दिक्कत होगी, दोनों बहुत सी मान्यताओं में एक होंगे, मगर बहुत छोटी छोटी सी चीज़ों में अलग| जैसे सूअर का मांस खाना दोनों के लिए परंपरागत हो सकता है, ताड़ी परंपरागत हो सकती है| लेकिन जब बात सूअर पालने की आएगी तो दोनों अलग होंगे| ताड़ी के पेड़ से ताड़ी उतारने की बात होगी तो अलग होंगे|

Singh Yogendra राजभर ओबीसी में आते हैं और पासी अनुसूचित में. दोनों बिलकुल अलग जातियां हैं और हिन्दू क्षत्रिय राजाओं, अन्य सभी हिन्दुओं के साथ मिलकर मुसलमानों से लड़ती आई हैं.

Sunil Pandey हमारे बलिया में कुछ राजभरों को ‘जय सुहेल देव’ कहते सुना था.

Brijesh Rai बांसडीह विधानसभा और फेफना में अच्छी खासी आबादी है इनकी और ये जय सुहेल देव का नारा ही लगाते हैँ. आप ने सही कहा.

Vinod Mishra गाज़ी पीर के कारण अभी इतिहास मालूम हुआ. क्रिमिनल कास्ट के बारे में अनुमान था, यहा भी एक C.T.S. की आबादी है.

Singh Yogendra सुहेलदेव बैस राजपूत थे. उन्होंने 21 राजाओं का संघ बनाकर मसूद गाजी का सामना किया था. इनके साथ भर और पासी भी कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़े थे. ब्रिटिश गजेटियर में इन्हें राजपूत ही लिखा है. पर इनका साथ भर और पासियों द्वारा दिए जाने पर संदेह में कुछ अंग्रेज इतिहासकारों द्वारा इन्हें भर अनुमानित कर लिया जो कि गलत है. ये त्रिलोकचंद प्रथम के पुत्र बिदारदेव के वंशज थे. भालों से लड़ने के कारण इनकी बैस वंशी शाखा भाले सुल्तान कहलाती है. वोट बैंक की गन्दी राजनीति के चलते संघ परिवार इन्हें कहीं भर तो दूसरे इलाके में पासी प्रचारित करता है. हिन्दू एकता होनी चाहिए पर अपने पुरखों का इतिहास लुटाकर कैसी एकता? क्षत्रिय इतिहास को पहले वामपंथियो अंग्रेजों कांग्रेसियों ने बिगाड़ा, अब वही काम संघी क्यों कर रहे हैं? अवध के इलाके में जहाँ पासी ज्यादा हैं वहां सुहेलदेव को पासी बताकर वोट लिए जाते हैं और पूर्वांचल में इन्हें भर जाति से जोड़कर वोट की फसल काटी जाती है. वोट बैंक के लिए भाजपा और संघ कितना नीचे गिर सकते हैं और क्षत्रिय इतिहास और संस्कृति का कितना अपमान कर सकते हैं, इसकी कोई सीमा नहीं. क्षत्रियों के इतिहास से छेड़छाड़ और अपमानित करने की कड़ी में एक और अध्याय भाजपा जोड़ने जा रही है. सलार मसूद गाजी को हराने वाले बैस राजपूत राजा सुहेलदेव बैस को दलित जाति पासी का बताकर उत्तर प्रदेश में कई कार्यक्रम आयोजित करेगी जिससे पासी जाति के वोट उसे मिल सके. इससे पहले अहिरों के वोट के लिए उन्हें यदुवंशी, काछियों के वोट के लिए सम्राट अशोक को बिना किसी कारण के काछी बताने का षड्यंत्र भाजपा कर चुकी है. यहा तक की दलितों को असली राजपूत और राजपूतों को डरपोक और नाकारा बताने का कृत्य संघ प्रमुख भागवत भरी सभा में कर चुके हैं. गौरतलब है कि ये वही भाजपा है जिसके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रोजाना आरक्षण को हमेशा के लिए जारी रखने की बात करते हैं. ये कैसा दोगलापन है? अगर इनकी नजर में दलित राजा महाराजा रहे हैं तो फिर उन्हें किस बात का आरक्षण? फिर क्षत्रियों को किस कारण आरक्षण से वंचित रखा गया है? भाजपा और संघ अपने फायदे के लिए क्षत्रिय राजपूतों के इतिहास और स्वाभिमान को ही निशाना क्यों बनाते है? क्षत्रिय राजपूतों के स्वाभिमान को इतना हलके में क्यों लिया जाता है?

Anand Kumar एक छोटा सा सवाल था Singh Yogendra जी, अभी तो राजभर denotified ही हैं ना? ये denotified हटने के बाद वो कहाँ गिनेंगे खुद को? आरक्षण का लाभ लेना चाहेंगे या आरक्षण छोड़कर जनरल में आना चाहेंगे? आप खुद भी राजभर हैं या राजनैतिक हैं और बसपा समर्थक हैं?

Singh Yogendra हम हिंदुत्व के प्रबल समर्थक हैं पर इसका अर्थ यह नहीं कि हमारे पुरखों को कोई अपना बताकर पेश करे. आश्चर्य है कि जिसे सदियों से पिछली सदी के मध्य तक क्षत्रिय राजा के रूप में जाना जाता रहा, उसे अचानक से बिना सबूत के भर या पासी राजा बना दिया गया.

Anand Kumar ये गंभीर परिणाम वगैरा रहने दीजिये भाई. आप राजभर हैं? आपके परिवार में राजभरों से शादी होती है?

Singh Yogendra राजभर किसे बोल रहे हो आप? हम राजपूत हैं कोई राजभर भर नहीं और आपकी मिथ्या पोस्ट का प्रतिकार किया है. राजा सुहेलदेव बैस 11वीं सदी में वर्तमान उत्तर प्रदेश में भारत नेपाल सीमा पर स्थित श्रावस्ती के राजा थे जिसे सहेत महेत भी कहा जाता है. सुहेलदेव महाराजा त्रिलोकचंद बैस के द्वित्य पुत्र विडारदेव के वंशज थे. इनके वंशज भाला चलाने में बहुत निपुण थे जिस कारण बाद में ये भाले सुल्तान के नाम से प्रसिद्ध हुए। सुल्तानपुर की स्थापना इसी वंश ने की थी। सुहेलदेव राजा मोरध्वज के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका राज्य पश्चिम में सीतापुर से लेकर पूर्व में गोरखपुर तक फैला हुआ था। उन्हें सुहेलदेव के अलावा सुखदेव, सकरदेव, सुधीरध्वज, सुहरिददेव, सहरदेव आदि अनेको नामो से जाना जाता है। माना जाता है की वो एक प्रतापी और प्रजावत्सल राजा थे। उनकी जनता खुशहाल थी और वो जनता के बीच लोकप्रिय थे। उन्होंने बहराइच के सूर्य मन्दिर और देवी पाटन मन्दिर का भी पुनरोद्धार करवाया। साथ ही राजा सुहेलदेव बहुत बड़े गौभक्त भी थे।

Pushpendra Rana भर अभी पिछड़ा वर्ग में आते हैं और कई अन्य जातियों के साथ इन्हें अनुसूचित जाति में शामिल करने का मामला अभी भी चल रहा है.

Singh Yogendra हमे किसी समाज से दिक्कत नहीं. हिंदुत्व के लिए कोई भी बलिदान देने को तैयार हैं. पर पुरखों को कोई दूसरी जाति का बताए, ये स्वीकार नहीं है.

Pushpendra Rana सुहेलदेव बैस को राजभर बताने के लिए आपके पास क्या प्रमाण है?

Anand Kumar 1950 के दशक तक कोई राजभर नाम लेने वाला नहीं था, उसे क्रिमिनल कास्ट बनाया हुआ था| आज भी राजपूतों की शादियाँ होती हों राजभरों में या बैंस में तो बताइये कि हां होती है| शर्मा क्यों रहे हैं इतना? पूर्वज चाहिए, अभी वाले को नहीं अपनाएंगे? थोड़ी हिम्मत दिखाइए… ले आइये किसी राजपूत को जिसने बैंस या राजभर परिवार में शादी की हो… उसे आप क्षत्रिय मानते हों तो ठीक… नहीं मानते तो फिर जबरन मुहर्रम क्यों मना रहे हैं?

Pushpendra Rana इसके लिए नए नए साहित्य लिखे गए सेठ बिहारी लाल की तर्ज पर. सुहेलदेव बैस के वंशज पयागपुर के राजाजी ने ही सुहेलदेव बैस का स्मारक अपनी जगह पर बनवाया और उनके मेले की शुरुआत की लेकिन बाद में वोट बैंक वालो के द्वारा उसे हाईजैक कर लिया गया

Singh Yogendra महामूर्ख न बनो यार, फेसबुकिया ही बने रहो उचित रहेगा। सुहेलदेव बैस को जबरदस्ती सुहेलदेव राजभर बना दिया और तुम मूर्खतापूर्ण सवाल पूछ रहे हो? कमीनो में ब्याह तेरे जैसे करते होंगे हम नहीं.

Prashant Singh Bains बैंसो के कोई वैवाहिक सम्बन्ध नहीं रहे हैं भर जाति में। भर जाति आदि सिर्फ़ जंगलों में रह कर गुज़र बसर करने वाली छोटी जातियाँ थी। इस्लामिक आक्रमणकारियों के विरुद्ध सिर्फ़ इन जातों ने राजा सहेलदेव का साथ दिया था. 

Pushpendra Rana बैस असली क्षत्रिय वंश है और उनमे सभी क्षत्रिय वंशो की शादी होती है. भर एक अलग जाति है जिनका क्षत्रियों से कोई सम्बन्ध नहीं. कुछ क्षत्रिय गिर कर भरों में जरूर शामिल हुए हो सकते हैं. जातियों और जाति व्यवस्था के बारे में कुछ पढ़ कर आइये, फिर ये बातें करिए. और हां denotified ट्राइब का मतलब पता है? denotified में जितनी भी जाती आती थी वो bc, sc, st में बटी हुई है. अब denotified की बात कर के यहा क्या बनना चाहते हो?

Sajan Soni जब तक क्रिमिनल कास्ट बताया जाता रहा तब तक किसी ने प्रतिक्रिया नहीं दिखाई, denotified caste पर भी न अब तक कोई पोस्ट मिला न किसी ने कोई जानकारी दी । आज सरकार के एक सराहनीय कदम पर किसी ने ऐतिहासिक तथ्यों को रखने की कोसिस की तो अपने ज्ञान की शेखी बघारने धमक गए। उनकी उपलब्धियों का विश्लेषण छोर जातिगत विश्लेषण पे मुद्दे को अटका दिया और हवाला इतिहास से छेर चार का!! मज़ारों पे मत्था टेकेंगे और खुद को हिंदुत्व का समर्थक बताएंएगे पर जब उपलब्धियों की बात होगी तो ये तेरा बाप ये मेरा बाप करेंगे।

Pushpendra Rana आश्चर्य है की जिसे सदियों से पिछली सदी के मध्य तक क्षत्रिय राजा के रूप में जाना जाता रहा उसे अचानक से बिना सबूत के भर या पासी राजा बना दिया गया.

Singh Yogendra राजा सुहेलदेव बैस के विषय में मिथ्या प्रचार. इस युद्ध में राजपूतो के साथ भर और थारू जनजाति के वीर भी बड़ी संख्या में शहीद हुए,राजपूतों के साथ इस संयुक्त मौर्चा में भर और थारू सैनिको के होने के कारण भ्रमवश कुछ इतिहासकारों ने सुहेलदेव को भर या थारू जनजाति का बता दिया जो सत्य से कोसो दूर है क्योकि स्थानीय राजपुतो की वंशावलीयो में भी उनके बैस वंश के राजपूत होने के प्रमाण है। सभी किवदन्तियो में भी उनहे राजा त्रिलोकचंद प्रथम का वंशज माना जाता है और ये सर्वविदित है की राजा त्रिलोकचंद( प्रथम)बैस राजपूत थे। पिछले कई दशको से कुछ राजनितिक संगठन अपने राजनितिक फायदे के लिये राजा सुहेलदेव बैस को राजपूत की जगह पासी जाती का बताने का प्रयत्न कर रहे है जिससे इन्हें इन जातियों में पैठ बनाने का मौका मिल सके। दुःख की बात ये है की ये काम वो संगठन कर रहे है जिनकी राजनीती राजपूतो के समर्थन के दम पर ही हो पाती है। इसी विषय में ही नही, इन संगठनो ने अपने राजनितिक फायदे के लिये राजपूत इतिहास को हमेशा से ही विकृत करने का प्रयास किया है और ये इस काम में सफल भी रहे है। राजपूत राजाओ को नाकारा बताकर इनके राजनितिक हित सधते हैं। पर हम अपना गौरवशाली इतिहास मिटने नहीं देंगे। वीर योद्धा, महान संगठक महाराजा सुहेलदेव बैस को शत शत नमन.

Pushpendra Rana ऐसे तो इस युद्ध में ब्राह्मण आदि और अन्य जातियों के लोग भी काम आए थे लेकिन इससे सुहेलदेव बैस ब्राह्मण नहीं हो जाते.

Anjni Kumar Sarswat किसी भी जाति के क्यों न हो वह एक वीर हिंदू थे यही पर्याप्त है गर्व करने के लिए। जय महाराजाधिराज राजराजेश्वर हिंदवी गौरव श्री सुहेलदेव

Anand Kumar राजाओं के खानदान से थे क्षत्रिय तो… बनाइये अपना एक ट्रस्ट पैसे इकठ्ठा कीजिये किसी इतिहासकार को तथ्य निकालने कहिये… देखें कब तक राजभर और बैंस में राजपूतों की शादियाँ होती रही हैं. ऐसे तो नहीं चलेगा भाई.. आपने छोड़ दिया सदियों डूबने के लिए आज कुम्भ के बिछड़े भाई हो गए हैं आपके? और कुछ नहीं मिलता तो प्रयाग और गया के पंडितों के पास करीब 800 साल का तो रिकॉर्ड मिल जायेगा शादियों का… निकालिए उसमें से देखें… जिस अँगरेज़ ने हर विरोध करने वाले को क्रिमिनल कास्ट बना दिया था उसके लिखे पर भी भरोसा नहीं करना… दल हित चिन्तक तो चलिए पहले ही चर्च के पैसे पर पलते हैं.. उनकी भी नहीं सुनते… शादी के रिकॉर्ड तो होते हैं पंडितों के पास… उस से निकाल लीजिये देखते हैं कब तक राजभर कौन सी जाति में थे.. अभी तो पिछड़े हैं ये तो मानियेगा ??

Singh Yogendra भर पिछड़े हों या दलित हों हमे कोई लेना देना नही. हमे उनसे कोई शिकवा नही. पर तुम सुहेलदेव बैस को सुहेलदेव भर लिख रहे हो इससे आपत्ति है. सुहेलदेव बैस का स्मारक खुद उनके वंशज पयागपुर के राजपूत राजा ने अपनी 500 बीघा जमीन दान में देकर बनवाया था.

Rajpal Singh Champawat Sarechan आनन्द जी आप की पोस्ट ग़लत है.. कोई लाँजिक नही..

Singh Yogendra बैस तो उच्चकुल के राजपूत हैं उनमें तो शादी होगी ही पर भरों में शादी ब्याह तुम्हारी हो सकता है हुई हो या उन्ही की पैदाइश हो तुम? सुहेलदेव बैस का स्मारक खुद उनके वंशज पयागपुर के राजपूत राजा ने अपनी 500 बीघा जमीन दान में देकर बनवाया था.

Anand Kumar आ गए जातिवादी रंगत में. बस थोड़ा सा उकसाना पड़ता है. नीच कुल का ही जब मानते हो उन्हें तो काहे उन्हें अपना पूर्वज घोषित करने पर तुले थे Singh Yogendra जी.  मान लो कि जातिवादी हो… एकता की बातें तुमसे ना हो पाएंगी… जाने दो…

Singh Yogendra अरे मुर्ख नीच कुल का सुहेलदेव बैस को नही कहा. वो बैस क्षत्रिय राजपूत कुल के थे जिसे तुम जैसे मुर्ख जबरदस्ती भर या पासी बना रहे हो. हिंदुत्व का पाठ सीखने की जरूरत तुम जैसे कायरो से नही है. जब हमारे पुरखे तुर्को अफगानो से लडकर सर कटवा रहे थे तो उस समय तुम्हारे पुरखे किसी बिल में दुबके हुए बैठे होंगे. आज भी हिन्दू हो तो हमारे पुरखो के बलिदान की वजह से. हिंदुत्व का पाठ तुम जैसे घोंचूओ से सीखने की जरूरत नहीं है.

Banti Kharayat ओ आनंद कुमार…..तुम लोग कभी नहीं सुधरोगे….ये फर्जी इतिहास रचने से तुम लोग राजपूत नहीं बन सकते रहोगे वही ही….जैसे वो तुम्हारा मसीहा जिस ने अपने ब्राह्मण शिक्षक(जिसने उसे अपने खर्चे पर पढ़ाया) की कास्ट अपने नाम के आगे जोड़ ली परन्तु हीन भावना से ग्रषित होने के कारण पूर्वाग्रह नहीं त्याग पाया जिनका सरनेम चुरा लिया उनके लिये….. दूसरे के बाप को बाप कहने से वो तुम्हारा बाप नही हो जायेगा…

Anand Kumar कुल के हिसाब से आल्हा उदल का कुल भी नीच होता था इसलिए उनकी लड़ाइयाँ होती रहती थी ना? अपनी मूर्खताओं का नतीजा इतने सालों में भी नहीं दिखा? smile emoticon गजब के अंधे होते हो भाई…

Singh Yogendra अरे अक्ल के अन्धो कौन तुम्हे सूतियापन्ति का इतिहास पढ़ा रहा है? आल्हा उदल बनाफर राजपूत वंश के थे. तुम्हे किस चूतिये ने कह दिया उनका कुल निचा होता था? बनाफर राजपूत आज भी बुन्देलखण्ड में मिलते हैं.

Anand Kumar पहले आपस में निपट लीजिये जातिवादी Singh Yogendra जी. एक बता रहा है बानफर राजपूत… एक किस्सा कहता है… थे की नहीं आल्हा उदल?

Prashant Singh Bains भर भर ही लिखते है, गोत्र नहीं। Anand जी, आल्हा कहानी नहीं है। वो वीर रस। तुम भर सोच वाले क्या जान सकते हो वीर रस क्या होता है।

Rajarsh Singh Bais खून को किसी सम्बोधन या प्रमाण की जरुरत नहीं, नाम के आगे हम सिंह इस लिये लिखते है की हम आपस में न लड़े। पर फिर भी हम आपस में लड़ते है । अगर राजपूत एक दुसरे के परस्पर विरोधी न हो तो तुम 1000 साल और आरक्षण लो तब भी हमारा कुछ नही बिगड़ेगा। भर में जा कर बैंस खोजोगे तो कहा मिलेगा हाँ अगर भरो में बैसो की नाजायज़ औलाद ढूँढो तो मैं sure हु मिल जाएगी।।।

Anand Kumar आहा एक और जातिवादी सूरमा आये. नाईट शिफ्ट है आज की. हा हा हा

Singh Yogendra जातिवादी सडांध तुम्हारे अंदर भरी हुई है. अगर मुल्ला होते तो अब तक ओकात बता दिए होते Anand Kumar जी. संघी हो इसलिए संयम है क्योंकि वोटर हम भी बीजेपी के ही हैं पर अपने इतिहास से छेड़छाड़ बर्दाश्त नही होगी. यहाँ दुष्ट वामपंथी नही बल्कि हमारे प्रिय संघी ही फर्जी इतिहास रच रहे हैं. अंग्रेजो ने गजेटियर में लिखा है कि कुछ लोग सुहेलदेव को थारु कुछ भर, कुछ बैस राजपूत तो कुछ कलहंस राजपूत बताते हैं. उनकी पूरी वंशावली आज के बैस राजपूतो में मिलती है फिर भी विवाद मान लिया जाए तो सरकार और आप उन्हें एकतरफा भर कैसे लिख सकते हो?

Prashant Singh Bains डे नाइट खेलने वाले है यहाँ।।।,, बेस नाजायज़ खेलने में माहिर है।।। ये तो ग़नीमत हो गई कि तुम्हारे सविधान ने १९५२ ऐक्ट ला दिया वरना जाने कितने ओर नाजायज़ etc … बैंसो के गुणगान कर रहे होते।… ओर ज़्यादा ठाकुरई पर बोलो तो आ जाऊँ अवध वाली।। तो मुँह छुपाते नहीं मिलेगा।।। इस इतिहास को अपनी में घुसा लो ओर हर बार जब झाड़े फिरने निकालोगे तो इसको बाँचना

Anand Kumar चलिए जातिवादी थोडा तो ऊपर आये… कम से कम चंदेल, तोमर, बैंस, राजभर से आगे उच्च कुल, नीच कुल छोड़कर अब पोलिटिकल संघी कम्युनिस्ट तक स्वागत है… ऐसे ही छूटेगी ये जातिवाद की आपकी बीमारी वैसे रानी झाँसी को क्या मानते हैं आप लोग ? आल्हा तो चलिए आपने कहानी घोषित कर दिया… रानी झाँसी क्या थी ? दलित, ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य कुछ होगी ना ??

Singh Yogendra तू क्या है पहले ये बता? रानी झांसी शूरवीर यौद्धा थी जन्मना ब्राह्मण थी. जातिवाद तुम फैला रहे हो सुहेलदेव को भर लिखकर.

Rajarsh Singh Bais हमे जातिवाद की जरूरत ही नही । वो कमजोरो का हथियार है

Anand Kumar अरे रे तू तड़ाक पर उतर आये जातिवादी Singh Yogendra जी को नाईट शिफ्ट की नौकरी में भी गुस्सा आया smile emoticon वाह वाह smile emoticon तलवार तो नहीं खींच ली grin emoticon घर में है भी की नहीं.

Singh Yogendra तुम जैसे tatpunjiyo के लिए तलवार की क्या जरूरत?

Anand Kumar वो किताब का लिंक ऊपर जो एक सूर्यवंशी क्षत्रिय को राजा बता रहे हैं किसी इलाके का उनके लिए है… सुहेलदेव वैसे क्या थे? चंद्रवंशी की सूर्यवंशी? नाग वंश वाले सूर्यवंशी होते हैं? शायद आपको पता होगा जातिवादी Singh Yogendra जी?

Singh Yogendra बिलकुल नागवंश खुद सूर्यवंश की शाखा है. http://rajputworld.blogspot.in/2013/07/blog-post_10.html?m=1

अत्रि अन्तर्वेदी मौर्य को प्रदेश अध्यक्ष, सुहेलदेव को भर बतलाकर रेल चलायेंगे…. चुनावों में रेल सी देखते रह जायेंगे।

Avinash Sharma भैया Anand Kumar, ये नही मानेंगे ये तो वही बात के पक्ष धर है जहां मीठा -२गप्पऔर कड़वा कड़वा थू. वाल्मीकी, व्यास, जाबाल ऋषि बन गय् तो वो ब्राह्मण हो गये, सुहेलदेव, आल्हा ने पराक्रम कर दिया तो वो क्षत्रिय हो गये. इनसे पूछो कि गोधरा मे जो जलाये थे मिंयों ने हिंदू वो जात देख कर जलाये थे क्या. उऩका बदला लेने वाला बामन ठाकुर नही बल्की इनकी नजरो मे छोटी जात का तेली था.

शुभम शर्मा आर्य discussion गलत दिशा में चला गया। कुछ लोगो को “जातिगत superiority” का मीठा सायनाइड चूसने में अब भी मजा आता ह।

Pushpendra Rana अबे चूतिये अगर इन सब से हारते तो तू आज हिन्दू हिन्दू ना कर रहा होता. और ये आर्य समाजी बकवास अपने पास रख. २३०० साल पहले खुद megasthenes लिख गया है की जाती कभी नही बदली जा सकती थी. शुंग और kanva ब्राह्मणों से क्षत्रिय हो गए क्या? सातवाहन क्षत्रिय हो गए? विश्वामित्र ब्राह्मण हो गए? और क्षत्रिय कभी किसी गैर क्षत्रिय को क्षत्रिय नही मानता दूसरी जातियों की तरह नही तो आज दो तिहाई जनता क्षत्रिय होती

Brijesh Rai इस नाम से ट्रेंन चलाकर .भासपा (भारतीय समाज पर्टी )के साथ 2017 के चुनाव मे गठबंधन को भी हरी झंडी दे दी हैँ ..इस पार्टी के मुखिया ओमंप्रकाश राजभर के साथ भाजपा नेताओ का मेल जोल काफी चरचा मे रहा था..2012 के चुनाव मे शुहेल देव वाली पार्टी ने बनारस और आजम गढ मडल की 16 सीटो पर दमदारी के साथ चुनाव लडा था और भाजपा के उम्मिदवारो से भी ज्यदा वोट मिले थे इनको ..फागु चौहान .अम्बिका चौधरी .अब्दुल समद अंसारी जैसे नेताओं को हारना पडा था इस पार्टी की वजह से ..बनारस के दो विधानसभा मे ये बसपा से ज्यदा वोट पाये थे ….राजभर बिरादरी शुहेलदेव के नाम पर ही राजनिती करती हैँ …

Madan Tiwary जब मानसिंह अकबर से शादी का रिश्ता हो सकता है और स्वीकार्य भी था राजपूत समाज को फिर राजभर से क्यों नहीं ? वैसे उस समय रजवाड़े किसी जाति के हों उनकी आपस में शादिया होती थी क्योकि शादी का मकसद राज्य विस्तार था ।

Rajpal Singh Champawat Sarechan Abet cutiye pehle itihas pad … Wo dasi thi jiske sath akbar ki Shadi hui… Aur apwad Har jagah hotey hai …

Sonu Anil हे प्रभु ये ठकुरई कब जाऐगी

Singh Yogendra ठकुराई न होती तो आप मुल्ला होते anil जी

Sonu Anil कौन सी ठकुरई जयचंद वाली vp singh वाली या दिग्विजय सिंह वाली

सुधाँशु मणि त्रिपाठी बहराइच में सब राजा सुहैलदेव राजभर ही जानते हैं।

Swati Gupta मैं भी यही जानती हूँ. राजा सुहैल देव पासी सुना था हमने.

सुधाँशु मणि त्रिपाठी उनके स्मारक या मंदिर कह लें, वहाँ के शिलापट्ट पे यही नाम लिखा है। जो चित्तौरा झील के किनारे पर है जहाँ उन्होंने सलार मसूद को मारा था।

Tarun Kumar आरे भाई, सुहेलदेव किसी जाति के थे, हिन्दू थे, दुश्मनों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, विजयी हुए, इसलिये वो हमारे गौरव गान के नायक हैं, ना की किसी जाति विशेष के होने के।

Singh Yogendra ये दुष्प्रचार सिर्फ कुछ दशक पुराना है भर और पासी लडको ने भी इस युद्ध में राजाओं का जमकर साथ दिया था न कि सुहेलदेव पासी या भर थे. ये सारा भृम एक अंग्रेज लेखक द्वारा किये साक्ष्य विहीन अनुमान से शुरू हुआ। अंग्रेज तो राम कृष्ण को काल्पनिक बताते हैं आर्यो को विदेशी तो सब पर यकीन कर लिया जाए?

Swati Gupta मैं बहराइच में रह चुकी हूँ, इसलिये बता रही हूँ कि वहाँ के लोकल सब उन्हें पासी बताते हैं

Singh Yogendra जी और पूर्वांचल के कुछ जिलो में इन्हें भर बताकर वोट की फसल काटने की तैयारी है जबकि राजा सुहेलदेव बैस राजपूत थे जिनकी पहले और बाद की पूरी वंशावली मौजूद है

Tarun Kumar इतिहास के लेखन परम्परा ना होने से निश्चय ही समस्या हैं, लेकिन सही क्या हैं, इसका निर्णय तो तथ्य के आधार पर ही कर सकते हैं। अब अशोक कौन थे, क्षत्रिय, शुद्र या कुछ और, यह विवादित हैं, हमेशा रहेगा। जिसे जो मानना हैं माने लेकिन जाति इतिहास में कोई मायने नहीं रखती।

Swati Gupta इनका पासी ही पता था, वैसे क्या फ़र्क़ पड़ता है, थे तो हिन्दू ही, पर अभी तक उपेक्षित थे। वहाँ हम तीन साल रहे पर क्षत्रिय तो किसी ने नहीं बोला

Jaipal Singh Sindarli मित्रों आजकल कुछ तथाकथित पढ़े लिखे और राजपूतो से इर्शाभाव रखने वाले लोग हमारे योगदान को नकारते हैं। जिन जातियो को राजपूतो से नफरत है वो जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, जैसलमेर, बीकानेर, हरयाणा आदि के साथ ही सैकड़ो शहरो के नाम बदल दें। ध्यान दे कि वर्तमान भारत के सीमावर्ती क्षेत्र और पूर्व रियासते जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, जम्मू, कच्छ में राजपूत शासन ना होता तो ये भी पाकिस्तान में होते और आज राजपूत विरोधी हिन्दू टोपी पहन कर कुरान पढ़ रहे होते। शायद इन राजपूतो ने गलती कर दी मुग़ल तुर्को से लड़ाई कर के अपनी संस्कृति को बनाये रखा——
बाप्पा रावल
नागभट प्रतिहार
मिहिरभोज प्रतिहार
राणा सांगा
राणा कुम्भा
वीर पृथ्वी राज चौहान
महाराणा प्रताप
रानी दुर्गावती
वीर जयमल
वीर छत्रशाल बुंदेला
दुर्गादास राठौर
मालदेव
छत्रपति शिवाजी
महाराणा राजसिंह
रानी कर्मावती
रानी पद्मनवती
विरमदेव सोनिगरा
राजा भोज
सुहेलदेव बैस
आनंदपाल तोमर
राजा हर्षवर्धन बैस
बन्दा सिंह बहादुर
ऐसे ही हजारो योद्धा जो हिंदुत्व के लिए कुर्बान हो गए।

वीर कुंवर सिंह, आऊवा ठाकुर कुशाल सिंह,राणा बेनीमाधव सिंह,चैनसिंह परमार,रामप्रसाद तोमर बिस्मिल,ठाकुर रोशन सिंह,महावीर सिंह राठौर जैसे महान क्रांतिकारी अंग्रेजो से लड़ते हुए शहीद हो गए। आजादी के बाद सबसे ज्यादा परमवीर चक्र राजपूतो ने जीते।शैतान सिंह भाटी,जदुनाथ सिंह राठौड़,पीरु सिंह शेखावत,गुरुबचन सिंह सलारिया,संजय कुमार डोगरा जैसे परमवीरो का बलिदान क्या भुला जा सकता है? आज भी राजपूत रेजिमेंट, राजपूताना रायफल्स, डोगरा रेजिमेंट, गढ़वाल रेजिमेंट, कुमायूं रेजिमेंट, जम्मू कश्मीर रायफल्स के जवान सीमा पर दुश्मन का फन कुचलने और गोली खाने के लिए सबसे आगे होते हैं। देश के एकीकरण के लिए हमने अपनी सैकडो रियासते कुर्बान कर दी,सारी जमीदारी कुर्बान कर दी,अपने खजाने खाली कर दिए! क्या इस त्याग को यूँ ही भुला दिया जाएगा?  राजपूत मतलब राजपुत्रः गीता से लेकर रामायण तक में वर्णित है यहाँ क्षत्रियो में भगवान राम, भगवान कृष्णा से लेकर महात्मा बुद्ध भगवान महावीर से लेकर सभी सभी तीर्थनकर साथ ही लोकदेवता कल्ला जी बाबा रामदेव गोगाजी कल्लाजी सहित सैकड़ो लोकदेवता, जाम्भा जी परमार(विश्नोई मत) हुएं। ये सब क्षत्रिय राजपूत थे,क्या इनको भी मानना छोड़ दोगे?

Pushpendra Rana ये ही भर, मेव, चेरो आदि इनके पूर्वजो को परेशान करते थे, इनको लूटते थे. हिन्दुओ को पूजा पाठ तक नही करने देते थे. इनको क्षत्रियो ने ही इनके आतंक से मुक्ति दिलाई. इस बारे में ग्रन्थ भरे पड़े है. आज वोट के लिए ये आतंकी ही इनके हीरो हो गए और क्षत्रिय दुश्मन. इन जैसो पे कभी भरोसा ही नही करना चाहिए.

Dheer Singh Pundir इन संघियो का अस्तित्व राजपूतो के बलिदान पर टिका हुआ है पर इन अहसानफरमाइशो को सिर्फ नकारात्मक पक्ष ही दिखाई देता है. इतिहास की जानकारी करिये.  बाप्पा रावल और नागभट परिहार की वजह से ही अरब हमलावर सिंध से आगे भारत में पुरे 500 साल तक नही घुस पाए. वो अरब जो इस्लाम की स्थापना के कुछ ही दशको में पुरे मध्य पूर्व एशिया मिस्र ईरान इराक सीरिया जीतते हुए स्पेन तक जा पहुंचे थे. वो भारत में विफल हुए क्योंकि यहाँ बाप्पा रावल और नागभट परिहार ने राजस्थान के युद्ध में उन्हें करारी मार लगाई. जितनी सूझ बूझ और वीरता से राजपूतो ने अरबो तुर्को से देश की रक्षा की ऐसा उदाहरण विश्व में दूसरा नही है.

मूल खबर….

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Comments on “नई ट्रेन के नाम को लेकर सोशल मीडिया पर तलवारें खिंचीं, राजा सुहेल देव राजपूत थे या राजभर या पासी?

  • vinod rajbhar says:

    Ghazipur se raja suhaldev ke naam par nai train chalna Rajbharo ke liye garv ki baat hai.
    Jai suhaldev.
    Jai Rajbhar itihaas

    Reply
  • Suraj rawat says:

    Rajputt Rajputt. Chillate hai.. Enke nazar me khatkne laga h Pasi…….. Sala jab desh azad ni huwa tha. Suhalldev ji ko bahraich me Pasi k nam se jana jata tha.. Aur Rajput wo hota hai jiska raj chala ho.. ….bara banki k raja ganga baksh rawat ji ji. ….. Jinko 1850 me phansi di gyi thi.. Wo ek udahran the wo jaat k pasi the…. Jinko puri izzat Ram nagar k raja udit narayan singh bhi dete the………. Jo es bat ka praman h us time jiska raj hota tha use Rajput ka darja diya jata tha. Tabhi PASI KO BAGAL MAR CHATTRIYA KAHA JATA THA…………raja suhal dev ek naag vanshi the jo baad me bharshiv kahlaye. ….DOSTO JAB GENRAL WALO KI DAGTI H NA… TO KAHTE H KI ANGREJO NE GALAT LIKHA.. SALO KO Hum… Sc. St. Obc wale khatkne lagte hai..

    Reply
    • पहली बात तो ये है कि रावत उपाधि क्षत्रियों की है
      जो कि हम है
      और आप जैसे नव स्वघोषित रावत नहीं है
      अगर हम राजपूतों से इतनी ही जलती है तुम्हारी
      तो क्यों हमारे जातिय उपनामों और इतिहास की copy paste करते हैं
      तुम जो भी हो अपनी पहचान में रहो ना भाई
      क्यो क्षत्रिय बनने की होड़ कर रहे हो
      औंधे मुंह गिर पडोगे
      भाई

      Reply
  • chandan dusadh says:

    राजा सुहलदेव पासवान दुसाध जाती के थे इसमे कोई शक नही

    Reply
  • देवेंद्र says:

    ये उच्च जाति के लोग कुछ दिन बाद मायावती के नाम के पीछे मिश्रा या तिवारी लिखकर कहेंगे मायावती चमार जाति कि नहीं बल्कि ब्राम्हण थी

    Reply
  • Amulya Rajbhar says:

    [b]Jyda bakwash mat karo bakchodo ! Maharaja Suheldev Rajbhar the . Iske aage ek word nahi.. [/b]

    [i]Jai Suheldev ![/i]

    Reply
  • Rajbhar Avanish says:

    आजकल भ्रमित करने और फेकने का दौर चल रहा है कोई कुछ फेकता है । फेकने दीजिए हम राजभरों को कोई प्रभाव नहीं पडता है। किन्तु आप फेसबुकिया फेकूओं का कमेंट यहाँ दिखाना हमें समझ नहीं आ रहा है। ईश्वर सबको सद्भावी बनाऐ। सबका कल्याण हो।।
    हम इन नये इतिहासकारों के जबाब में बस इतना कहेंगे कि अंग्रेजों के ग्रेजेटियर से ही भारत के सभी प्रमाण मिल जाते है????
    भारत देश का निर्माण कब हुआ और अंग्रेजों का ग्रेजिटियर कब बना यही पता कर लेना फिर राजभरों को चोर उचक्का नीच जो मर्जी बनाना। बिना साक्ष्य के बोलना भी कभी महगा पड सकता है।मनगढंती ज्ञानी बन जाना आसान है।। 🙁

    Reply
  • राहुल सिंह says:

    ऐतिहासिक सूत्रों के अनुसार श्रावस्ती नरेश राजा प्रसेनजित ने बहराइच राज्य की स्थापना की थीजिसका प्रारंभिक नाम भरराइच था। इसी कारण इन्हे बहराइच नरेश के नाम से भी संबोधित कियाजाता था। इन्हीं महाराजा प्रसेनजित को माघ मांह की बसंत पंचमी के दिन 18 फरवरी 1009 ई. को एक पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम सुहेलदेव रखा गया । अवध गजेटीयर के अनुसार इनका शासन काल1027 ई. से 1077 तक स्वीकार किया गया है । वे जाति के राजभर थे, राजभर अथवा जैन, इस परसभी एकमत नही हैं। महाराजा सुहेलदेव का साम्राज्य पूर्व में गोरखपुर तथा पश्चिम में सीतापुर तकफैला हुआ था। गोंडा बहराइच, लखनऊ, बाराबंकी, उन्नाव व लखीमपुर इस राज्य की सीमा केअंतर्गत समाहित थे । इन सभी जिलों में राजा सुहेल देव के सहयोगी राजभर राजा राज्य करते थे जिनकी संख्या 21 थी। ये थे -1. रायसायब 2. रायरायब 3. अर्जुन 4. भग्गन 5. गंग 6.मकरन 7. शंकर 8. करन 9. बीरबल 10. जयपाल 11. श्रीपाल 12. हरपाल 13. हरकरन 14. हरखू15. नरहर 16. भल्लर 17. जुधारी 18. नारायण 19. भल्ला 20. नरसिंह तथा 21.कल्याण येसभी वीर राजा महाराजा सुहेल देव के आदेश पर धर्म एवं राष्ट्ररक्षा हेतु सदैव आत्मबलिदान देने केलिए तत्पर रहते थे। इनके अतिरिक्त राजा सुहेल देव के दो भाई बहरदेव व मल्लदेव भी थे जो अपनेभाई के ही समान वीर थे। तथा पिता की भांति उनका सम्मान करते थे। महमूद गजनवी की मृत्य केपश्चात् पिता सैयद सालार साहू गाजी के साथ एक बड़ी जेहादी सेना लेकर सैयद सालार मसूद गाजीभारत की ओर बढ़ा। उसने दिल्ली पर आक्रमण किया। एक माह तक चले इस युद्व ने सालार मसूद केमनोबल को तोड़कर रख दिया वह हारने ही वाला था कि गजनी से बख्तियार साहू, सालारसैफुद्ीन, अमीर सैयद एजाजुद्वीन, मलिक दौलत मिया, रजव सालार और अमीर सैयद नसरूल्लाहआदि एक बड़ी धुड़सवार सेना के साथ मसूद की सहायता को आ गए। पुनः भयंकर युद्व प्रारंभ हो गयाजिसमें दोनों ही पक्षों के अनेक योद्धा हताहत हुए। इस लड़ाई के दौरान राय महीपाल व रायहरगोपाल ने अपने धोड़े दौड़ाकर मसूद पर गदे से प्रहार किया जिससे उसकी आंख पर गंभीर चोटआई तथा उसके दो दाँत टूट गए। हालांकि ये दोनों ही वीर इस युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए लेकिनउनकी वीरता व असीम साहस अद्वितीय थी। मेरठ का राजा हरिदत्त मुसलमान हो गया तथा उसनेमसूद से संधि कर ली यही स्थिति बुलंदशहर व बदायूं के शासकों की भी हुई। कन्नौज का शासक भीमसूद का साथी बन गया। अतः सालार मसूद ने कन्नौज को अपना केंद्र बनाकर हिंदुओं के तीर्थ स्थलोंको नष्ट करने हेतु अपनी सेनाएं भेजना प्रारंभ किया। इसी क्रम में मलिक फैसल को वाराणसी भेजागया तथा स्वयं सालार मसूद सप्तॠषि (सतरिख) की ओर बढ़ा। मिरआते मसूदी के विवरण के अनुसारसतरिख (बाराबंकी) हिंदुओं का एक बहुत बड़ा तीर्थ स्थल था । एक किवदंती के अनुसार इस स्थान पर भगवान राम व लक्ष्मण ने शिक्षा प्राप्त की थी। यह सात ॠषियों का स्थान था, इसीलिएइस स्थान का सप्तऋर्षि पड़ा था, जो धीरे-धीरे सतरिख हो गया। सालार मसूद विलग्राम, मल्लावा, हरदोई, संडीला, मलिहाबाद, अमेठी व लखनऊ होते हुए सतरिख पहुंचा। उसने अपने गुरू सैयदइब्राहीम बारा हजारी को धुंधगढ़ भेजा क्योंकि धुंधगढ क़े किले में उसके मित्र दोस्त मोहम्मद सरदारको राजा रायदीन दयाल व अजय पाल ने घेर रखा था। इब्राहिम बाराहजारी जिधर से गुजरते गैरमुसलमानों का बचना मुस्किल था। बचता वही था जो इस्लाम स्वीकार कर लेता था। आइनये मसूदीके अनुसार – निशान सतरिख से लहराता हुआ बाराहजारी का। चला है धुंधगढ़ को काकिलाबाराहजारी का मिला जो राह में मुनकिर उसे दे उसे दोजख में पहुचाया। बचा वह जिसने कलमा पढ़लिया बारा हजारी का। इस लड़ाई में राजा दीनदयाल व तेजसिंह बड़ी ही बीरता से लड़े लेकिनवीरगति को प्राप्त हुए। परंतु दीनदयाल के भाई राय करनपाल के हाथों इब्राहीम बाराहजारी मारागया। कडे क़े राजा देव नारायन और मानिकपुर के राजा भोजपात्र ने एक नाई को सैयद सालार मसूदके पास भेजा कि वह विष से बुझी नहन्नी से उसके नाखून काटे, ताकि सैयद सालार मसूद की इहलीला समाप्त हो जायें लेकिन इलाज से वह बच गया। इस सदमें से उसकी माँ खुतुर मुअल्ला चल बसी। इस प्रयास के असफल होने के बाद कडे मानिकपुर के राजाओं ने बहराइच के राजाओंको संदेश भेजा कि हम अपनी ओर से इस्लामी सेना पर आक्रमण करें और तुम अपनी ओर से । इसप्रकार हम इस्लामी सेना का सफाया कर देगें। परंतु संदेशवाहक सैयद सालार के गुप्तचरों द्वारा बंदीबना लिए गए। इन संदेशवाहकों में दो ब्राह्मण और एक नाई थे। ब्राह्मणों को तो छोड़ दिया गयालेकिन नाई को फांसी दे दी गई इस भेद के खुल जाने पर मसूद के पिता सालार साहु ने एक बडीसेना के साथ कड़े मानिकपुर पर धावा बोल दिया। दोनों राजा देवनारायण व भोजपत्र बडी वीरतासे लड़ें लेकिन परास्त हुए। इन राजाओं को बंदी बनाकर सतरिख भेज दिया गया। वहॉ से सैयदसालार मसूद के आदेश पर इन राजाओं को सालार सैफुद्दीन के पास बहराइच भेज दिया गया। जबबहराइज के राजाओं को इस बात का पता चला तो उन लोगो ने सैफुद्दीन को धेर लिया। इस परसालार मसूद उसकी सहायता हेतु बहराइच की ओर आगें बढे। इसी बीच अनके पिता सालार साहूका निधन हो गया।

    बहराइच के राजभर राजा भगवान सूर्य के उपासक थे। बहराइच में सूर्यकुंड पर स्थित भगवान सूर्य केमूर्ति की वे पूजा करते थे। उस स्थान पर प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ मास मे प्रथम रविवार को, जोबृहस्पतिवार के बाद पड़ता था एक बड़ा मेला लगता था यह मेला सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण तथा प्रत्येकरविवार को भी लगता था। वहां यह परंपरा काफी प्राचीन थी। बालार्क ऋषि व भगवान सूर्य के प्रतापसे इस कुंड मे स्नान करने वाले कुष्ठ रोग से मुक्त हो जाया करते थे। बहराइच को पहले ब्रह्माइच केनाम से जाना जाता था। सालार मसूद के बहराइच आने के समाचार पाते ही बहराइच के राजा गण– राजा रायब, राजा सायब, अर्जुन भीखन गंग, शंकर, करन, बीरबर, जयपाल, श्रीपाल, हरपाल,हरख्, जोधारी व नरसिंह महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में लामबंद हो गये। ये राजा गण बहराइचशहर के उत्तर की ओर लगभग आठ मील की दूरी पर भकला नदी के किनारे अपनी सेना सहितउपस्थित हुए। अभी ये युद्व की तैयारी कर ही रहे थे कि सालार मसूद ने उन पर रात्रि आक्रमण (शबखून) कर दिया। मगरिब की नमाज के बाद अपनी विशाल सेना के साथ वह भकला नदीकी ओर बढ़ा और उसने सोती हुई हिंदु सेना पर आक्रमण कर दिया। इस अप्रत्याशित आक्रमण मेंदोनों ओर के अनेक सैनिक मारे गए लेकिन बहराइच की इस पहली लड़ाई मे सालार मसूद बिजयीरहा। पहली लड़ार्ऌ मे परास्त होने के पश्चात पुनः अगली लडार्ऌ हेतु हिंदू सेना संगठित होने लगीउन्होने रात्रि आक्रमण की संभावना पर ध्यान नही दिया । उन्होने राजा सुहेलदेव के परामर्श पर आक्रमण के मार्ग में हजारो विषबुझी कीले अवश्य धरती में छिपा कर गाड़ दी । ऐसा रातों रात किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जब मसूद की धुडसवार सेना ने पुनः रात्रि आक्रमण कियातो वे इनकी चपेट मे आ गए। हालाकि हिंदू सेना इस युद्व मे भी परास्त हो गई लेकिन इस्लामी सेना केएक तिहायी सैनिक इस युक्ति प्रधान युद्व मे मारे गए । भारतीय इतिहास मे इस प्रकार युक्तिपूर्वक लड़ी गई यह एक अनूठी लड़ाई थी। दो बार धोखे का शिकार होने के बाद हिंदू सेना सचेत हो गईतथा महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में निर्णायक लड़ाई हेतु तैयार हो गई। कहते है इस युद्ध में प्रत्येक हिंदू परिवार से युवा हिंदू इस लड़ाई मे सम्मिलित हुए। महाराजा सुहेलदेव के शामिलहोने से हिंदूओं का मनोबल बढ़ा हुआ था। लड़ाई का क्षेत्र चिंतौरा झील से हठीला और अनारकलीझील तक फैला हुआ था। जुन, 1034 ई. को हुई इस लड़ाई में सालार मसूद ने दाहिने पार्श्व(मैमना) की कमान मीरनसरूल्ला को तथा बाये पार्श्व (मैसरा) की कमान सालार रज्जब को सौपातथा स्वयं केंद्र (कल्ब) की कमान संभाली तथा भारतीय सेना पर आक्रमण करने का आदेश दिया।इससे पहले इस्लामी सेना के सामने हजारो गायों व बैलो को छोड़ा गया ताकि हिंदू सेना प्रभावीआक्रमण न कर सके लेकिन महाराजा सुहेलदेव की सेना पर इसका कोई भी प्रभाव न पड़ा । वे भूखे सिंहों की भाति इस्लामी सेना पर टूट पडे मीर नसरूल्लाह बहराइच के उत्तर बारह मील की दूरीपर स्थित ग्राम दिकोली के पास मारे गए। सैयर सालार समूद के भांजे सालार मिया रज्जब बहराइचके पूर्व तीन कि. मी. की दूरी पर स्थित ग्राम शाहपुर जोत यूसुफ के पास मार दिये गए। इनकी मृत्य8 जून, 1034 ई 0 को हुई। अब भारतीय सेना ने राजा करण के नेतृत्व में इस्लामी सेना के केंद्र परआक्रमण किया जिसका नेतृत्व सालार मसूद स्वंय कर कहा था। उसने सालार मसूद को धेर लिया ।इस पर सालार सैफुद्दीन अपनी सेना के साथ उनकी सहायता को आगे बढे भयकर युद्व हुआ जिसमेंहजारों लोग मारे गए। स्वयं सालार सैफुद्दीन भी मारा गया उसकी समाधि बहराइच-नानपारा रेलवे लाइन के उत्तर बहराइच शहर के पास ही है । शाम हो जाने के कारण युद्व बंद हो गया औरसेनाएं अपने शिविरों में लौट गई। 10 जून, 1034 को महाराजा सुहेलदेव के नेतृत्व में हिंदू सेना नेसालार मसूद गाजी की फौज पर तूफानी गति से आक्रमण किया। इस युद्ध में सालार मसूद अपनीधोड़ी पर सवार होकर बड़ी वीरता के साथ लड़ा लेकिन अधिक देर तक ठहर न सका । राजा सुहेलदेव ने शीध्र ही उसे अपने बाण का निशाना बना लिया और उनके धनुष द्वारा छोड़ा गया एक विष बुझा बाण सालार मसूद के गले में आ लगा जिससे उसका प्राणांत हो गया । इसके दूसरे हींदिन शिविर की देखभाल करने वाला सालार इब्राहीम भी बचे हुए सैनिको के साथ मारा गया।सैयद सालार मसूद गाजी को उसकी डेढ़ लाख इस्लामी सेना के साथ समाप्त करने के बादमहाराजा सुहेल देव ने विजय पर्व मनाया और इस महान विजय के उपलक्ष्य में कई पोखरे भीखुदवाए। वे विशाल ”विजय स्तंभ” का भी निर्माण कराना चाहते थे लेकिन वे इसे पूरा न कर सके ।संभवतः यह वही स्थान है जिसे एक टीले के रूप मे श्रावस्ती से कुछ दूरी पर इकोना-बलरामपुरराजमार्ग पर देखा जा सकता है।

    1001 ई0 से लेकर 1025 ई0 तक महमूद गजनवी ने भारतवर्ष को लूटने की दृष्टि से 17 बार आक्रमणकिया तथा मथुरा, थानेसर, कन्नौज व सोमनाथ के अति समृद्ध मंदिरों को लूटने में सफल रहा ।सोमनाथ की लड़ाई में उसके साथ उसके भान्जे सैयद सालार मसूद गाजी ने भी …भाग लिया था।1030 ई. में महमूद गजनबी की मृत्यु के बाद उत्तर भारत में इस्लाम का विस्तार करने कीजिम्मेदारी मसूद ने अपने कंधो पर ली लेकिन 10 जून, 1034 ई0 को बहराइच की लड़ाई में वहां केशासक महाराजा सुहेलदेव के हाथों वह डेढ़ लाख जेहादी सेना के साथ मारा गया। इस्लामी सेना कीइस पराजय के बाद भारतीय शूरवीरों का ऐसा आतंक विश्व में व्याप्त हो गया कि उसके बाद आने वाले150 वर्षों तक किसी भी आक्रमणकारी को भारतवर्ष पर आक्रमण करने का साहस ही नहीं हुआ।

    सुहलदेव भर राजा बिहारिमल के पुत्र थे ! इनकी माता का नाम जयलक्ष्मी था ! सुहलदेव राजभर के तिन भाई और एक बहन थी बिहारिमल के संतानों का विवरण इस प्रकार है ! १. सुहलदेव २. रुद्र्मल ३. बागमल ४. सहारमल या भूराय्देव तथा पुत्री अंबे देवी ! ऐसा मान जाता है की सैयद सलार ने राजकुमारी अंबे देवी का अपहरण ४२३ हिजरी (१०३४ ई.) मे कर लिया था ! जिसके कारण सैयद सलार तथा राजा सुहलदेव के बिच घमासान युद्ध हुआ था ! इन बातो का उल्लेख मौला मुहम्मद गजनवी की किताब “तवारी ख ई – महमूदी” तथा अब्दुर्रहमान चिस्ती की किताब ” मिरात- ई- मसौदी” मे मिल जाति है ! अगर आप बलदेव प्रसाद गोरखा की पुस्तक “मंथनगीता” पड़ेंगे तो उसमे इस घटना का बहुत ही अच्छे से वर्णन किया है ! उसके कुछ पंक्ति मे यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ !

    बजा नगाड़ा गढ़ भराईच,
    सिगरी पल्टन भई तयार ।
    गोला-गोला तोप तमन्चा,
    सब हथियार सजे सरदार ।

    दुसरे डंका के बाजत,
    क्षत्रिय हथियार बन्द हो जाय ।
    साजि सुसज्जित भइ पल्टन
    सब गेटों में पहुँची जाय ।

    खुला गेट तिसरे डंका पर,
    पल्टन निकल पड़ी अरराय ।
    भर भर भर भर सिंगरी पल्टन,
    ओ भर भर हट दिया लगाय ।

    जाके पहुँची रण खेतों में,
    पल्टन लगी बराबर जाय ।
    सुहेलदेव नृप गर्जन करके,
    बोले नंगी तेग उठाय ।

    कौने कैद किया अंबे को,
    मेरी नजर गुजारो आय ।
    कौन गाड़े है ये तम्बुआ,
    कौने माड़ौ लिया छवाय ।

    गर गर गर गर गाजी गरजा,
    हमने धुरा दबाया आय ।
    हमने गाडे है ये तम्बुआ,
    माड़ौ हमने लिया छवाय ।

    हमने कैद किया अंबे को,
    बदला लेने को चलि आय ।
    मुहम्मद गोरी तुमने मारा,
    अल्लाउद्दीन गोरी दिया मराय ।

    उसका बदला लेने आये,
    हम गजनी के बीरजुझार ।
    पूरा बदला हो ब्याहे से,
    तब वापस गजनी सरदार ।

    सुहेलदेव नृप बोलन लागे,
    गाजी सुन लो कान लगाया ।
    जल्दी छोड़ देव अंबे को,
    मेरी नजर गुजारो लाय ।

    औ तुम भागि जाव गजनी को,
    वरना जाबे काम नसाय ।
    गाजी बोला औ ललकार,
    ओ भर्राइच के सरदार ।

    यातो बदला लूं भैंने का,
    या अंबे संग करुन विवाह ।
    दगी सलामी है सैयद की,
    गाजी हुकुम दिया करवाया ।

    भँवरि परै यहाँ अंबे की,
    सातौ भंवरि देव करवाय ।
    गुस्सा होइके सुहेलदेव ने,
    फौजों का किया निरिक्षण जाय।

    गाजी बैठा है माडो में,
    ओ अंबे को फौज घिराय ।
    उसके बाद गौओं का घेरा,
    दस हजार गौ लिया मंगाय ।

    छिटपुट लश्कर जो गाजी की,
    भर को काट रही चितलाय ।
    गाजी गौ के अन्दर बैठा,
    जिससे सुहेलदेव घबराय ।

    गोला-गोली क्यों कर छूटे,
    सन्मुख गाय बध्द हो जाय ।
    धर्म नही है भर क्षत्रिय का,
    जो गौ मां को करे प्रहार ।

    पल्टन कट रही भर्राजा की,
    राजा गये बहुत घबराय ।
    हिन्दूधर्म नाश हो जइहैं,
    जो न भगिनी लेब छुडाय ।

    हे रण-चण्डी रण खेंतो की,
    मइया मुक्ति देव बतलाया ।
    खड़ी योगिनी भइ दहिने पर,
    सूअर झुन्ड लिया मगंवान ।

    औ घुसवाय दिया गौ अन्दर,
    अब गौंओं का सुना बयान ।
    भगदड़ मच गयी गौओं की,
    खाली हुआ विकट मैदान ।

    अब तक तुर्क भिरे रजभर पर,
    काटि-काटि के दिया सुलाय ।
    आयी बारी राजभरों की,
    रण में कूदि पड़े अरराय ।

    गोला छूटै भर्राइच कैं,
    गोला दनकि-दनकि अरराय ।
    भई लड़ाई रण खेतों में,
    धुवना रहा गगन में छाय ।

    चार घरी भर गोला बरसा,
    तोपें लाल बरन ना जाय ।
    घैं-घैं तोपे लाल बरन भै,
    ज्वानन हाथ घरा ना जाय ।

    तोप-चढाय दियो पीछे का,
    सबने खींच लई तलवार ।
    खट-खट तेगा बाजन लागे,
    बाजै छपकि-छपकि तलवार ।

    तेगा चटके वर्दमान के,
    कटि-कटि गिरे सुघरवा ।
    चलै चुवब्बी औ गुजजराती,
    मीना चले विलायत क्यार ।

    क्या गति और यही समया की,
    सूरत कछू बरनि ना जाय ।
    लाश के उपर लाश पाटि गै,
    जैसे भरडीह रहा दिखलाया।

    कटि-कटि मुण्ड गिरे धरती,
    ताड़ फलों का लगी बजार ।
    झुके बांकुरे भर्राइच के,
    दोनों हाथ धरे तलवार ।

    एक को मारैं काटि गिरावें,
    गिरकर गोर सनाका खाय ।
    फौजै काटि गयी गाजी की,
    गाजी गया बहुत घबराय ।

    पहुँचि सुरमा गै गाजी पर,
    पहुँचा विसल देव सरदार ।
    सुहत्तध्वज पीछे से पहुँचा,
    समुंहे सुहेलदेव रण राय ।

    डील नगोटा भै सैयद की,
    सैयद घोड़ा दिया भगाय ।
    सुहेल देव गाजी को देखा,
    गाजी रहा भागता जाय ।

    दे ललकार सुहलेदेव ने,
    गाजी ब्याह लेव करवाय ।
    बदला लेलो तुम भैंने का,
    अब तुम भाग कहां को जाय ।

    दई रगोदा सुहेलदेव ने,
    गाजी आगे गया लुकाय ।
    सूर्यकुण्ड में गुलइची लटकी,
    उसने नीचे गया छिपाय ।

    घोड़ा कुदाया सूर्यकुण्ड में,
    मकड़ी जाल गया बिथराय ।
    सुहैलदे सैनिक संग ढूँढत,
    गिरगिट शान देखाया जाय ।

    सैनिक पहुँचि गये कुवना पर,
    लीला देखा एक अपार ।
    जहाँ से कूदा था ओ गाजी,
    मकड़ी बुन-बुन दिया बनाय ।

    थोड़ा देख पड़ा ओ गाजी,
    सुहेलदेव ने देखा जाय ।
    तीक्षण बाण संघान के मारा,
    गाजी गिरा धरनि पर जाय ।

    पुरण काम हुआ गाजी का,,
    गाजी वही गया दफनाय !
    अंबे देवी गयी महलो मे,,
    ख़ुशी मनाए मिली भर्राय!
    श्री सुहेलदेव चालीसा एवं आरती
    ( आचार्य शिवप्रसाद सिंह राजभर ” राजगुरु” विरचित )
    स्त्रोत्रम कस्य न तुष्टये
    चमचागिरी या चापलूसी की परंपरा नई नहीं है / जबसे सृष्टि का सृजन हुआ है तभी से स्वाभाविक रूप से इस परम्परा का उदय हुआ / पहले इसे स्तुति , वन्दना य प्रशंसा कहा जाता था , आज इसे चमचागिरी कहा जाता है / चमचागिरी की महिमा अपार है /
    महाकवि कालिदास ने कहा है ” स्त्रोत्रम कस्य न तुष्टये ” / विश्व में ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो स्तुति से प्रसन्न न हो जाता हो / साम, दाम , दंड ,भेद इन चार नीतियों में साम (स्तुति) को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है / सभी प्राचीन ग्रन्थ स्तुति से भरे पड़े हैं / सम्पूर्ण यजुर्वेद इसका अच्छा उदाहरण है / हिंदी साहित्य के एक काल का नाम ही चारण काल रखा गया है /
    समय समय पर ऋषियों , मुनियों , महर्षियों , साधू -संतों ने अपने आराध्यों को प्रसन्न करने के लिए स्त्रोतों की रचना की है / बंदीजन अथवा चारण तो दूसरों की प्रशंसा कर बड़ा से बड़ा एवं कठिन से कठिन कार्य करा लेने की कला में निपुण थे / चाहे देवी देवता हों य असुर हों य राजा महाराजा , सभी अपनी प्रशंसा के भूखे रहे हैं / जिनने भी इनकी प्रशंसा की उनने अपना मनोवांछित फल पाया /
    चालीसा , शतक , सहस्त्रनाम आदि स्तुति परम्परा के अंग हैं / स्तुति परम्परा में चालीसा साहित्य को अधिक मान्यता मिली है / वर्तमान में अनगिनत चालीसा उपलब्ध हैं , लेकिन शिव चालीसा एवं रुद्रावतार हनुमान चालीसा का विशेष महत्त्व है / वानर वंश में उत्पन्न होने के बाद भी हनुमान जी का पराक्रम अद्वितीय है / (हनुमान जी वानर वंशी हैं , वानर नहीं/) / वे बहुमुखी प्रतिभा के धनि हैं / यदि वे राम की सहायता न करते तो राम रावण से विजय प्राप्त कर पाते यह कह पाना अत्यंत कठिन है / तात्पर्य यह कि हनुमान की बन्दना उनके द्वारा उपार्जित पराक्रम का फल है लोगों की अंध -श्रृद्धा का सूचक नहीं /
    जहाँ एक ओर ऋषियों महर्षियों ने कपोल कल्पित पात्रों को लेकर वन्दना साहित्य द्वारा जन सामान्य को उनसे जोड़ा वहीँ महान पराक्रमी ऐतिहासिक पात्रों की उपेक्षा भी की / यह सब वर्ग वाद की भावना से प्रेरित होकर किया गया /
    ग्यारहवीं शताब्दी के अवतारी पुरुष ,राष्ट्र नायक वीर सुहेलदेव राय राजभर के सम्बन्ध में लिखे गए पूर्व साहित्य का विनष्टीकरण एक आश्चर्य का विषय है / उनकी प्रशंसा में लिखा गया थोड़ा बहुत जो भी साहित्य उपलब्ध है उनका चरित्र उजागर करने के लिए पर्याप्त है / हमारा परम कर्तव्य है कि उस महान नायक की सेवाओं से जन सामान्य को परिचित कराएं एवं श्रद्धा भक्ति की भावना जगाएं /
    उत्तर भारत में श्रावस्ती सम्राट राष्ट्रवीर सुहेलदेव के प्रति जन सामान्य की अगाध श्रद्धा है / सभी लोग राष्ट्रवीर सुहेलदेव को एक अवतारी शक्ति के रूप में पूजते हैं / जन सामान्य की उसी भावना का आदर करते हुए, उनकी श्रद्धा -भक्ति एवं विश्वास को निरंतर संपुष्ट करने के उद्देश्य से सुहेलदेव चालीसा का अवतरण हुआ है / मैं केवल माध्यम हूँ / वास्तव में इस चालीसा का अवतरण श्री बीरबल राम मास्टर वारंट आफिसर अनौनी,औड़िहार ,गाजीपुर उत्तरप्रदेश एवं श्री शिवचंद राम स्काउट कमिश्नर उत्तर टोला , सतीतर सहतवार , बलिया उत्तरप्रदेश की प्रेरणा से हुआ है / इन दोनों महानुभावों की प्रेरणा से मैं अधिक से अधिक सुहेलदेव साहित्य की रचना कर सकूँगा ऐसा विश्वास है /
    आशा है मेरी इस रचना से आप सब लाभ उठाएंगे /
    आपका शुभेक्षु
    बसंत पंचमी १९९७

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  • राहुल सिंह says:

    ग्यारवी सदी के प्रारंभिक काल मे भारत मे एक घटना घटी जिसके नायक श्रावस्ती सम्राट वीर सुहलदेव राजभर थे ! राष्ट्रवादियों पर लिखा हुआ कोई भी साहित्य तब तक पूर्ण नहीं कहलाएगा जब तक उसमे राष्ट्रवीर श्रावस्ती सम्राट वीर सुहलदेव राजभर की वीर गाथा शामिल न हो ! कहानियों के अनुसार वह सुहलदेव, सकर्देव, सुहिर्दाध्वाज राय, सुहृद देव, सुह्रिदिल, सुसज, शहर्देव, सहर्देव, सुहाह्ल्देव, सुहिल्देव और सुहेलदेव जैसे कई नामों से जाने जाते है !

    श्रावस्ती सम्राट वीर सुहलदेव राजभर का जन्म बसंत पंचमी सन् १००९ ई. मे हुआ था ! इनके पिता का नाम बिहारिमल एवं माता का नाम जयलक्ष्मी था ! सुहलदेव राजभर के तीन भाई और एक बहन थी बिहारिमल के संतानों का विवरण इस प्रकार है ! १. सुहलदेव २. रुद्र्मल ३. बागमल ४. सहारमल या भूराय्देव तथा पुत्री अंबे देवी ! सुहलदेवराजभर की शिक्षा-दीक्षा योग्य गुरुजनों के बिच संपन्न हुई ! अपने पिता बिहारिमल एवं राज्य के योग्य युद्ध कौशल विज्ञो की देखरेख मे सुहलदेवराजभर ने युद्ध कौशल, घुड़सवारी, आदि की शिक्षा ली ! सुहलदेव राजभर की बहुमुखी प्रतिभा एवं लोकप्रियता को देख कर मात्र १८ वर्ष की आयु मे सन् १०२७ ई. को राज तिलक कर दिया गया और राजकाज मे सहयोग के लिए योग्य अमात्य तथा राज्य की सुरक्षा के लिए योग्य सेनापति नियुक्त कर दिया गया !

    सुहलदेव राजभर मे राष्ट्र भक्ति का जज्बा कूट कूट कर भरा था ! इसलिए राष्ट्र मे प्रचलित भारतीय धर्म, समाज, सभ्यता एवं संस्कृति की रक्षा को अपना परम कर्तव्य माना ! राष्ट्री की अस्मिता से सुहलदेव ने कभी समझौता नहीं किया ! इनसब के वावजूद सुहलदेव ९०० वर्षो तक इतिहास के पन्नो मे तब कर रह गए ! १९ वी. शादी के अंतिम चरण मे अंग्रेज इतिहासकारों ने जब सुहलदेव पर कलम चलाई तब उसका महत्व भारतीय जानो को समझ मे आया ! महाभारत के बाद ये दूसरा उदहारण है जब राष्ट्रवादी नायक सुहलदेव राजभर ने राष्ट्र की रक्षा के लिए २१ राजाओ को एकत्र किया और उनकी फ़ौज का नेतृत्व किया ! इस धर्मयुद्ध में राजा सुहेलदेव का साथ देने वाले राजाओं में प्रमुख थे रायब, रायसायब, अर्जुन, भग्गन, गंग, मकरन, शंकर, वीरबल, अजयपाल, श्रीपाल, हरकरन, हरपाल, हर, नरहर, भाखमर, रजुन्धारी, नरायन, दल्ला, नरसिंह, कल्यान आदि।

    सुहलदेव का साम्राज्य उत्तर मे नेपाल से लेकर दक्षिण मे कौशाम्बी तक तथा पूर्व मे वैशाली से लेकर पश्चिम मे गढ़वाल तक फैला था ! भूराय्चा का सामंत सुहलदेव का छोटा भाई भुराय्देव था जिसने अपने नाम पर भूराय्चा दुर्ग इसका नाम रखा ! श्री देवकी प्रसाद अपनी पुस्तक राजा सुहलदेव राय मे लिखते है की भूराय्चा से भरराइच और भरराइच से बहराइच बन गया ! प्रो॰ के. एल. श्रीवास्तव के ग्रन्थ बहराइच जनपद का खोजपूर्ण इतिहास के पृष्ट ६१-६२ पर अंकित है – इस जिले की स्थानीय रीती रिवाजो मे सुहलदेव पाए जाते है !

    इसप्रकार अधिकतर प्रख्यात विद्वानों ने अपने अध्यन के फलस्वरूप सम्राट सुहलदेव को भर का शासक माना गया है ! कशी प्रसाद जयसवाल ने भी अपनी पुस्तक “अंधकार युगीन भारत” मे भरो को भारशिव वंश का क्षत्रिय माना है ! अर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के वोलुम १ पेज ३२९ मे लिखा है की राजा सुहलदेव भर वंश के थे ! राजा महाराजा सुहेल देव के आदेश पर धर्म एवं राष्ट्ररक्षा हेतु सदैव आत्मबलिदान देने के लिए तत्पर रहते थे। इनके अतिरिक्त राजभर महाराजा सुहेलदेव के दो भाई बहरदेव व मल्लदेव भी थे जो अपने भाई के ही समान वीर थे। तथा पिता की भांति उनका सम्मान करते थे। महमूद गजनवी की मृत्य के पश्चात् पिता सैयद सालार साहू गाजी के साथ एक बड़ी जेहादी सेना लेकर सैयद सालार मसूद गाजी भारत की ओर बढ़ा। उसने दिल्ली पर आक्रमण किया। एक माह तक चले इस युद्व ने सालार मसूद के मनोबल को तोड़कर रख दिया वह हारने ही वाला था कि गजनी से बख्तियार साहू, सालार सैफुद्ीन, अमीर सैयद एजाजुद्वीन, मलिक दौलत मिया, रजव सालार और अमीर सैयद नसरूल्लाह आदि एक बड़ी धुड़सवार सेना के साथ मसूद की सहायता को आ गए। पुनः भयंकर युद्व प्रारंभ हो गया जिसमें दोनों ही पक्षों के अनेक योद्धा हताहत हुए। इस लड़ाई के दौरान राय महीपाल व राय हरगोपाल ने अपने धोड़े दौड़ाकर मसूद पर गदे से प्रहार किया जिससे उसकी आंख पर गंभीर चोट आई तथा उसके दो दाँत टूट गए। हालांकि ये दोनों ही वीर इस युद्ध में लड़ते हुए शहीद हो गए लेकिन उनकी वीरता व असीम साहस अद्वितीय थी। मेरठ का राजा हरिदत्त मुसलमान हो गया तथा उसने मसूद से संधि कर ली यही स्थिति बुलंदशहर व बदायूं के शासकों की भी हुई। कन्नौज का शासक भी मसूद का साथी बन गया। अतः सालार मसूद ने कन्नौज को अपना केंद्र बनाकर हिंदुओं के तीर्थ स्थलों को नष्ट करने हेतु अपनी सेनाएं भेजना प्रारंभ किया। इसी क्रम में मलिक फैसल को वाराणसी भेजा गया तथा स्वयं सालार मसूद सप्तॠषि (सतरिख) की ओर बढ़ा। मिरआते मसूदी के विवरण के अनुसार सतरिख (बाराबंकी) हिंदुओं का एक बहुत बड़ा तीर्थ स्थल था। एक किवदंती के अनुसार इस स्थान पर भगवान राम व लक्ष्मण ने शिक्षा प्राप्त की थी। यह सात ॠषियों का स्थान था, इसीलिए इस स्थान का सप्तऋर्षि पड़ा था, जो धीरे-धीरे सतरिख हो गया। सालार मसूद विलग्राम, मल्लावा, हरदोई, संडीला, मलिहाबाद, अमेठी व लखनऊ होते हुए सतरिख पहुंचा। उसने अपने गुरू सैयद इब्राहीम बारा हजारी को धुंधगढ़ भेजा क्योंकि धुंधगढ क़े किले में उसके मित्र दोस्त मोहम्मद सरदार को राजा रायदीन दयाल व अजय पाल ने घेर रखा था। इब्राहिम बाराहजारी जिधर से गुजरते गैर मुसलमानों का बचना मुस्किल था। बचता वही था जो इस्लाम स्वीकार कर लेता था। आइनये मसूदी के अनुसार – निशान सतरिख से लहराता हुआ बाराहजारी का। चला है धुंधगढ़ को काकिला बाराहजारी का मिला जो राह में मुनकिर उसे दे उसे दोजख में पहुचाया। बचा वह जिसने कलमा पढ़ लिया बारा हजारी का। इस लड़ाई में राजा दीनदयाल व तेजसिंह बड़ी ही बीरता से लड़े लेकिन वीरगति को प्राप्त हुए। परंतु दीनदयाल के भाई राय करनपाल के हाथों इब्राहीम बाराहजारी मारा गया। कडे क़े राजा देव नारायन राजभर और मानिकपुर के राजा भोजपात्र राजभर ने एक नाई को सैयद सालार मसूद के पास भेजा कि वह विष से बुझी नहन्नी से उसके नाखून काटे, ताकि सैयद सालार मसूद की इहलीला समाप्त हो जायें लेकिन इलाज से वह बच गया। इस सदमें से उसकी माँ खुतुर मुअल्ला चल बसी। इस प्रयास के असफल होने के बाद कडे मानिकपुर के राजाओं ने बहराइच के राजाओं को संदेश भेजा कि हम अपनी ओर से इस्लामी सेना पर आक्रमण करें और तुम अपनी ओर से। इस प्रकार हम इस्लामी सेना का सफाया कर देगें। परंतु संदेशवाहक सैयद सालार के गुप्तचरों द्वारा बंदी बना लिए गए। इन संदेशवाहकों में दो ब्राह्मण और एक नाई थे। ब्राह्मणों को तो छोड़ दिया गया लेकिन नाई को फांसी दे दी गई इस भेद के खुल जाने पर मसूद के पिता सालार साहु ने एक बडी सेना के साथ कड़े मानिकपुर पर धावा बोल दिया। दोनों राजा देवनारायण व भोजपत्रबडी वीरता से लड़ें।

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  • राहुल सिंह says:

    भर राजा बिरजाभर पर आधारित लोकगीत “सोरठा-बिराजभरवा’

    लोग गीत और लोक नृत्य के लगातार अध्ययन और पुराने लोक कलाकारों से मिलने के दौरान आज एक महत्वपूर्ण लोकगीत ‘सोरठी-बिरजा भरवा” का पता चला। मुख्यतः पूर्वांचल के गोरखपुर और तराई के क्षेत्रों में गाया जाने वाला यह भोजपुरी लोक गीत आज तेजी से खत्म होती जा रही है। तराई क्षेत्र के महाराजा बिरजा भर के जीवन पर आधारित यह लोकगीत गोराखपंथियों के इतिहास से भी जुड़ी है । महाराजा बिरजा भर के सात जन्मों पर आधारित यह गीत उनके वैवाहिक जीवन से गोरखपंथी सन्यासी बनने की कहानी है। लोक नायक के रूप में बिरजा भर का जीवन प्रेम, तपस्या, वचनबद्धता और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में लोगों के स्मृतियों में आज भी बना हुआ है। “सोरठी बीरजा भरवा” गीत नागवंशी भर राजाओं के प्रकृति प्रेम, शौर्य, और प्रजापालक का अप्रितम नमूना है। एक जो फ़क़ीर है ! जो नाथ परंपरा अनुगामी है ! वही नाथ परंपरा जिसने मनुष्य का मनुष्य द्वारा होने वाले शोषण की परंपरा का बुद्ध के बाद मुखरता से बिरोध किया। यह वही नाथ परंपरा है जिसकी साधना से कबीर भी बहुत ग्रहण किएँ। लोकगीत “बिराजा भरवा” में जीवन कई जटिलताओं और उंझनों की दार्शनिकता को बड़े व्यवहारिक रूप में लोगों के सामने रखते है।
    आप भी इसे जरूर सुनिए।

    राजा से जोगी हुए बिरजाभर
    के पिता नाम तटतरमल भर
    इनका विवाह महाराजा हिमांचल की पुत्री हेमंती से हुआ।
    मामा का नाम राजा खेखरमल भर

    भर राजा बिरजाभर पर आधारित लोकगीत “सोरठा-बिराजभरवा’

    लोग गीत और लोक नृत्य के लगातार अध्ययन और पुराने लोक कलाकारों से मिलने के दौरान आज एक महत्वपूर्ण लोकगीत ‘सोरठी-बिरजा भरवा” का पता चला। मुख्यतः पूर्वांचल के गोरखपुर और तराई के क्षेत्रों में गाया जाने वाला यह भोजपुरी लोक गीत आज तेजी से खत्म होती जा रही है। तराई क्षेत्र के महाराजा बिरजा भर के जीवन पर आधारित यह लोकगीत गोराखपंथियों के इतिहास से भी जुड़ी है । महाराजा बिरजा भर के सात जन्मों पर आधारित यह गीत उनके वैवाहिक जीवन से गोरखपंथी सन्यासी बनने की कहानी है। लोक नायक के रूप में बिरजा भर का जीवन प्रेम, तपस्या, वचनबद्धता और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में लोगों के स्मृतियों में आज भी बना हुआ है। “सोरठी बीरजा भरवा” गीत नागवंशी भर राजाओं के प्रकृति प्रेम, शौर्य, और प्रजापालक का अप्रितम नमूना है। एक जो फ़क़ीर है ! जो नाथ परंपरा अनुगामी है ! वही नाथ परंपरा जिसने मनुष्य का मनुष्य द्वारा होने वाले शोषण की परंपरा का बुद्ध के बाद मुखरता से बिरोध किया। यह वही नाथ परंपरा है जिसकी साधना से कबीर भी बहुत ग्रहण किएँ। लोकगीत “बिराजा भरवा” में जीवन कई जटिलताओं और उंझनों की दार्शनिकता को बड़े व्यवहारिक रूप में लोगों के सामने रखते है।
    आप भी इसे जरूर सुनिए।

    राजा से जोगी हुए बिरजाभर
    के पिता नाम तटतरमल भर
    इनका विवाह महाराजा हिमांचल की पुत्री हेमंती से हुआ।
    मामा का नाम राजा खेखरमल भर

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  • राहुल सिंह says:

    भारशिव नागवंशी राजा बिम्बिसार और बौद्ध धर्म

    मौर्य , भर , कुर्मी इत्यादि लड़ाके मुलनिवाशि जातियां जो पराक्रमी और लड़ाके है। बौद्ध धर्म के मार्ग को अपनाया। इन जातियों की अपनी विशाल राजसत्ता थी । शाक्य वंश में जन्मे भगवान बुद्ध के महान उपासक नागवंशी भारशिव राजा बिम्बिसार को नमन।

    मगध के प्रतापी नागभरशिव राजा बिम्बिसार 52 वर्ष के हो चुके थे । तीनों रानियों से पुत्र प्राप्ति न होने पर ब्राह्मण के परामर्श से शक्ति यज्ञ की तैयारी सुरु हो गई। मगध के राजमार्ग से गौतम बुद्ध प्रातः काल अपने सात -आठ शिष्यों के साथ चले जा रहे थे । अपने पीछे कोलाहल सुनकर वे रुकें और देखा कि बकरे का एक झुंड गड़ेरिया हांकता चला जा रहा था । रास्ते में गड़ेरिये से बुद्ध ने पूछा भाई इतने बकरों को कहा ले जा राजे हो ? गड़ेरिये ने उत्तर दिया महात्मा ! इन बकरों को महाराजा बिम्बिसार द्वारा राजगृह में चक रही शक्ति यज्ञ में बली के लिए पहुचाना है। गड़ेरिये की बात सुनकर बुद्ध ने कहा ये घोर अनर्थ हो रहा है। ऐसा प्रतापी राजा ब्राम्हणों के वश में होकर जीव हिंसा कर रहा है। यह सर्वथा अनुचित है । अतः यज्ञ में हमे भी चलना चाहिए । अब राजगृह में पहुचकर बुद्ध सीधे यज्ञ नगर पहुचें। वहां यज्ञ की पूरी तैयारी हो चुकी थी तभी महात्मा बुद्ध के गंभीर शब्दों में कहा, ” है राजन आप एक महान यज्ञ शक्ति का अनुष्ठान कर रहे हैं । यज्ञ शक्ति के माध्यम से पुत्र प्राप्ति की इक्षा है । आप की यह इच्छा पूर्ण हो पर यज्ञ में निर्दोष बकरों की बलि मैं नही होने दूंगा। इस लिए आप से निवेदन है कि जीव हिंशा मत करिए। महात्मा के इस वचन से चारों ओर सन्नाटा छा गया। बिम्बिसार ने कहा हे ! महात्मन जीव बलि तो धर्म अनुरूप है। मैं राज्य के हित में उत्तरादिकारी के लिए यज्ञ करा रहा हूँ। पर महात्मा बुध्द ने कहा ” राजन ! आप पुत्र प्राप्ति के लिए जीव हिंसा करना चाहते है । अहिंसा परमोधर्म आप भूलिए मत। हिंसा करना पाप है। पाप से पुत्र प्राप्ति महापाप है। हे राजन ! आप महापाप मत करिए। तमाम दलीलों से जब बिम्बिसार बली का विचार नही छोड़े तब भगवान बुद्ध ने हे राजन ! आप मूक पशुओं की बली के जगह मेरी बली दे दीजिए। बिम्बिसार इस बात से आश्चर्य चकित हो गए और उन्होंने कहा हे महात्मन ! ” आप गौतम बुद्ध तो नही हैं ?” जिसकी कीर्ति पूरे भारत वर्ष में फैल रही है। बुद्ध ने हस कर कहां ” राजन ! आप ने सही अनुमान लगाया ” मैं अंधकार से जगा वही बुद्ध हूँ । महाराज ने भगवन आप के दर्शन पाकर हम धन्य हुए। मैं निरीह पासुओं को आजाद करने की घोसड़ा करता हूँ। और अब आप का संदेश प्रसारित करने में अपना शेष जीवन व्यतीत करूँगा अब आप के शरण में हूँ।
    विशुद्ध आचरण करने पर भारशिव नाग महाराज को अजातशत्रु नामक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।
    उक्त कहानी भारशिव राजाओं के बौद्ध धर्म धारण करने की पहली सीढ़ी बन गई। आजातशत्रु से लेके शिशुनाग तक बौद्ध धर्म भारशिवों के आध्यात्मिक जीवन का अभिन्न अंग बन गया।
    इसी क्रम में महाराजा सुहेलदेव भारत भूमि की सदैव रक्षा करते हुवे अपने जीवन के अंतिम दिनों को बौद्ध भिक्षु के रूप में जिये।

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  • SURESH SINGH BHARDWAJ says:

    Dear Literates , We the Like Minded Rajput Associates have analyzed the origin of the Bharshiva Kshatriyas in very critically and come to the conclusion that basically the the Bharshivas had been the Kshatriyas of Nagvansh who were ruling the BIDARBHA,making Nagpur city as their capital. Due to unavoidable circumstances they had transited towards. Madhya Pradesh and Uttar Pradesh during the Darkened Period of the Indian History.Those Bharshivas had been the great worshipers of the Lord Shiva and later several of Rajput Ruler Groups started writing them as Bharshiva Kshatriys. Those had been bravest Rajput Warriors having unique skills of combat fighting and expert administrators to manage the states and territories since 150 BC to 1600 AD. Maharaja Shri Suheldev , The king of Srawasti had been Rajput Ruler of Dev clan of Rajput community.More over these Rajbhars/ Bhars of Purvanchal of U.P. are the transited / force exiled Rajputs of Dev clan of Rajputs of Raebaraeli / Dalmahu post Raebareli Battle 1576 AD. This Rajbhar/ Bhar title has been awarded to those transtied Rajputs of Purvanchal by the Mughal Administration of Emperor Akbar in cruel suppression of the Bravest Rajput Community. JAI RAJPUTANA AND JAI BHARAT. Regards. SURESH SINGH BHARDWAJ & LIKE MINDED RAJPUT ASSOCIATES.

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    • S.D Pradeep rajbhar says:

      Present confusion due to criminal tribe act by britishersin1921 people belonging to this community hiding identity for caughten by britishers.and criminal act abolition take place after independent of 4 year 1952.
      They are deprived by his land ,home, property any their community .so their stable stallament takes place latter 1970. after green revolution .and it is clear by record of britishers and muslims writers Suhel dev is rajbhar . enemy of Britisher, they never collect wrong evidence of his enemy .it’s self true.

      Reply
  • RAMNARESH NAGVANSHI says:

    भर भारत का एक जाति समुदाय है, इन्हे राजभर भी कहते हैं,। भर भारशिव नाम से जाने जाते है।भर नागवंशी क्षत्रिय हैं। [1]

    भर भारशिवनाग

    Reply
  • RAMNARESH NAGVANSHI says:

    भर भारत का एक जाति समुदाय है, इन्हे राजभर भी कहते हैं,। भर भारशिव नाम से जाने जाते है।भर नागवंशी क्षत्रिय हैं। [1]

    भर भारशिवनाग

    Reply
  • Singh Yogendra mere ek sawal hai ye Rajput log kaha se aaye? kese paida hue pahle brahman ya kshatriya aaye? kya sabhi kshatriya rajput the to Yadav, gurjar, jaat Rajbhar, log apne ko Rajput nahi bolte the kyuki sabhi kshatriya the rajput nahi… rajput logo ne in sabhi ko rajput bataya…

    Reply
  • Bhar Kshatriyon ke bare mein janana hai to Chandel, Gaharwar, Parmar, Parihar rajputon ke bare me padho…..pata chal jayega ki Ye Rajput vansh Bhar/Rajbhar se hi nikala tha…..
    Karni Sena Rajput Sangathan ka official Blog diya hai neeche…..sime padh lo Bhar ke bare mein.
    Rajput Bhar se nikale hain…..to samajh lo Baap Baap hi hota hai. Bhar/Rajbhar was always superior than Rajputs
    We don’t need to be called Rajput…..tum apna socho ki hum tumhe Bhar manenge ya nahi.

    https://shrirajputkarnisena.blogspot.com/2017/09/chandel-rajput.html

    Reply
  • कृपया कांशी कोशल नरेश प्रसेंजीत के पुत्र का नाम virudhaka था उसे सही करें व पूर्ण इतिहास Google पर हि मिल जाएगा.
    Thanks

    Reply
  • maharaja suheldev rajbhar the sharam aani chaiye unhe jo hamare raja ko apna bataye kewal naam ke apna mat batao maharaj suheldev rajbhar the .hai.or rahenge

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