गोविंद सिंह-
अभी अभी सूचना मिली है कि पत्रकारिता में हमारे अग्रज और भारत-भारतीयता के उद्भट विद्वान डॉ सूर्य कांत बाली नहीं रहे। वे कुछ अरसे से बीमार थे।

बाली जी आरंभ में संस्कृत के प्राध्यापक थे। प्राध्यापक रहते हुए ही वे काफी लिखने लगे थे। उनकी लेखनी की धार को देखते हुए ही राजेन्द्र माथुर उन्हें नवभारत टाईम्स में ले आए। एक झटके में ही उन्होंने अपनी दिल्ली विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी।
चूंकि उनकी दृष्टि स्पष्ट थी, इसलिए उनके पास विषयों और विचारों की कभी कमी नहीं रही। राष्ट्रीय विषयों पर उनकी कलम जबरदस्त चलती थी। भारतीय पौराणिक आख्यानों पर आधारित उनका स्तंभ ‘भारत गाथा’ बहुत चर्चित हुआ।
वे कुछ अरसा टीवी में भी गए। जो उन्हें रास नहीं आया। इसलिए पिछले १५ साल वे स्वतंत्र लेखन में ही रत रहे। उनकी अनेक पुस्तकें आई हैं। नवभारत टाईम्स में वे मेरे बॉस रहे और उन्होंने मुझे पर्याप्त स्वायत्तता दी। इसलिए भी उनके न रहने का मुझे बहुत दुःख है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।
राणा यशवंत-
साल 1997-98 का समय. चैनल, ज़ी न्यूज़ और मॉर्निंग बुलेटिन के संपादक सूर्यकांत बाली. करियर की शुरुआत में संपादक ऐसा मिल जाए जो सहज और हौसला देनेवाला हो तो आत्मविश्वास और साहस दोनों बढ़ जाते हैं. बाली जी, मेरे लिए ऐसे ही संपादक थे. लहीम शहीम. आधी बाजू की खुली शर्ट और घुंघराले बाल. बुलेटिन में एक टुकड़ा संपादकीय जाता था.
टीवी में यह अखबारी प्रयोग था. नाम था फोर्थ स्टेट. बाली जी करंट इशू पर धड़ाधड़ लिखते जाते और पूरा हो जाए तो कुर्सी से उठ जाते. लो हो गया. आम तौर पर मैं ही उनका वीओ करवाता और फिर एडिट भी. अक्सर कहते – राणा एक बार पढ़ लेना. कुछ ज़रूरी लगे तो ठीक कर लेना.
जुमा जुमा चार दिन टीवी न्यूज़ में आए हुए हुआ था और संपादक जिसकी अपनी हस्ती थी उन दिनों, वह ऐसा कहे तो उसकी सहजता का अंदाज़ा होता है. वैसे मैंने कई बार उनके एडिटोरियल में कुछ बदलाव किए. हर बार जाकर पढ़वाया. पढ़ते और कहते क्या दिखा रहे हो, जानता हूँ बेहतर ही होगा. चलो चलो वीओ कर लेते हैं. ज़ी से साथ छूटा और बाली जी से मुलाक़ातें बंद हुईं. आम दावतों में भी नहीं आते जाते. इसलिए वह गुंजाइश भी जाती रही.
बाली जी का जाना, मेरे करियर के पौधे को कायदे से खाद पानी देनेवाले उस माली का जाना है, जो मेरा संपादक था. ॐ शांति


