इंदौर : ‘स्वदेश’ हुआ कंगला… मैनेजर कर रहा मनमानी… श्रम अधिकारियों पर मीडिया मालिकों का पूरा असर..

‘स्वदेश’ अखबार में कुछ दिन पहले लाखों रुपए खर्च कर सीसीटीवी कैमरे लगाए गए। ये कैमरे कर्मचारी के हर वर्ष होने वाली वेतनवृद्धि में कटौती कर इसलिए लगाए कि मजीठिया मामले में कोई कार्यालय से सबूत न ले जा सके। सूत्र बताते हैं कि प्रतिदिन दी जाने वाले एक चाय पर भी मैनेजर ने प्रतिबंध लगा दिया है। स्वदेश घाटे में चल रहा है, यह कहकर एक तरफ चाय बंद कर रहे हैं दूसरी तरफ अखबार में गले-गले तक विज्ञापन भरे रहते हैं। सूत्र बताते हैं कि मैनेजर ने कर्मचारी को प्रतिदिन दिए जाने वाला अखबार भी बंद कर दिया है।

स्वदेश में नवम्बर में वेतन 500 और 1000 रुपए के नोट से कर्मचारियों को थमाया गया। दिसम्बर में पुनः 500 और 1000 रुपए के नोट खपाने की तैयारी चल रही है। 4-5 पांच तारीख को मिलने वाला वेतन अभी तक कर्मचारियों को प्राप्त नहीं हुआ है। इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा है कि लेना हो तो 500 और 1000 के नोट लें अन्यथा अगले माह वेतन दिया जाएगा। सवाल ये है कि आखिर काली कमाई का पैसा स्वदेश में कहां से आया है।

यहां के संपादक गुप्ता प्रकाशन के दिनेश गुप्ता हैं और उनके पास काफी पैसा है। संचालक महेशचंद्र शास्त्री हैं। संचालक मंडल में बैठे मठाधीश अपना-अपना घर भरने में लगे हैं। कई कर्मचारियों को भविष्यनिधि में कवर किए 4-5 वर्ष से अधिक हो गया है, लेकिन कर्मचारियों को अभी तक पीएफ नहीं मिले हैं। मांगने पर कहा जाता है कि फलां अधिकारी पीएफ नम्बर देगा और उसके पास जाएं तो कहा जाता है कि फलां अधिकारी देगा।

इधर मजीठिया वेतनमान के नियमों का पालन तो दूर मणिसाना और भाचावत के नियम भी यहां लागू नहीं किए हैं। एक तरफ अपने आपको हिन्दूवादी संगठन का अखबार बताने वाला स्वदेश स्वयं ही हिन्दुओं की जेब काटने में लगा है और दूसरी ओर भाजपा सरकारों को हिन्दू के नाम पर विज्ञापन लगाकर जमकर चूना लगा रहा है।

इधर 6 पीएम में भविष्यनिधि कटने की खबर भडास में प्रकाशित होने के बाद सभी कर्मचारियों को भविष्यनिधि में कवर कर लिया गया है। कर्मचारियों ने बताया कि भडास में खबर प्रकाशित होने के पहले तक तो ना-नकूर की गई, लेकिन जब भडास में खबर प्रकाशित हुई और सेठ के चमचों ने इसकी जानकारी दी तो सभी कर्मचारियों को भविष्यनिधि में कवर कर लिया है।

इधर मजीठिया वेतनमान मामले में इंदौर श्रमायुक्त शुभोद जैन पूरी तरह सुस्ती में है। न तो अखबार मालिकों को दस्तावेज जमा कराने के लिए पत्र व्यवहार किया जा रहा है और न ही कार्रवाई में तेजी दिखाई जा रही है। मजीठिया मामले में श्रमायुक्त से मिलने जाने वाले अधिकांश पत्रकारों का कहना है कि श्रमायुक्त से समय मांगने पर समय नहीं मिलता है और समय देते हैं तो एक-दो घंटे इंतजार करना पड़ता है और मिलने पर मजीठिया मामले की कार्रवाई पर चर्चा की जाती है तो सीधे-सीधे यह कहा जाता है कि कार्रवाई हमारे तरफ से चल रही है शीघ्र ही मालिकों के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई करेंगे।

मजीठिया मामले में आरआरसी जारी कर सबसे आगे रहने वाले लेबर अस्टिटेंट कमिश्नर प्रभात दुबे इन दिनों पूरे मामले में चुप्पी साधकर बैठे हैं। वे इस मामले में पूछने पर कुछ नहीं कहना चाहते हैं।  अगर उसने कोई सवाल-जवाब करो तो सीधे-सीधे यह कहा जाता है कि श्रमायुक्तजी से आप बात करें। इस मामले में प्रभात दुबे का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया मामले में तीखा रुख अख्तियार नहीं होने के कारण हमारे हाथ बंध गए हैं। हम तो अदने से कर्मचारी है अगर सुप्रीम कोर्ट खुलकर अखबार मालिकों के खिलाफ कोई निर्णय दे तो हम कार्रवाई करें, अन्यथा अखबार मालिकों के खिलाफ कार्रवाई का क्या औचित्य क्योंकि जुर्माने के मात्र 500 और 250 रुपए अखबार मालिकों को क्या फर्क पड़ता है।

इधर श्रमायुक्त इंदौर में मजीठिया मामले में 17-1 की जो कार्रवाई सहायक श्रमायुक्त श्री पाठक की न्यायालय में चल रही है, वह पूरी तरह से मालिकों के इशार पर चल रही है। मजीठिया की लड़ाई लड़ रहे कर्मचारियों का कहना है कि 17-1 की कार्रवाई के दौरान श्री पाठक केवल अपने काम में लगे रहते हैं न तो प्रेस प्रबंधन की ओर से अधिकृत व्यक्ति से कोई सवाल जवाब किया जाता है और न कर्मचारियों की आपत्ति पर गौर। यहां श्री यादव नाम कर्मचारी ही पूरी कार्रवाई को अंजाम दे रहा है। वह प्रेस प्रबंधन की ओर से अधिकृत व्यक्ति के कहने पर तारीख आगे बढ़ाता है और उनके कहने पर ही प्रोसेडिंग की जाती है। यानी सीधे-सीधे 17-1 की कार्रवाई श्री यादव के भरोसे पर पी.एल. पाठक सहायक श्रमायुक्त की अदालत में चल रही है।

इंदौर से एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.



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