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सुख-दुख

हम गतिमान समय के परमानेंट हिस्से हैं, हम डायनासोर युग को आज भी देख सकते हैं!

यशवंत सिंह / रामकुमार सिसोदिया

अगर एक एलियन जो 65 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर एक गैलेक्सी में है, अभी हमारी ओर एक टेलीस्कोप से देख रहा है, तो वह डायनासोर को देख रहा होगा।

डायनासोर लगभग 250 से 235 मिलियन साल पहले पृथ्वी पर आए थे और लगभग 66 मिलियन साल पहले अन्तिम क्रीटेशियस विनाश में विलुप्त हो गए थे।

इसका मतलब है कि अगर कोई हमें एक दूर गैलेक्सी से देखता है, जो करीब 65 से 240 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर है, तो संभवतः वह उस समय की छवि देख रहा होगा जब डायनासोर पृथ्वी पर अस्तित्व में थे।

यह वैज्ञानिक रूप से संभव है! हम जो भी देखते हैं, वह वास्तव में उस प्रकाश का प्रतिबिंब होता है जो हम तक पहुंचता है। यदि कोई एलियन 65 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर किसी गैलेक्सी से शक्तिशाली टेलीस्कोप के जरिए पृथ्वी को देख रहा है, तो वह हमारी वर्तमान स्थिति नहीं बल्कि 65 मिलियन साल पुरानी पृथ्वी को देख रहा होगा।

क्योंकि प्रकाश को दूरी तय करने में समय लगता है, इसलिए वह एलियन डायनासोर के युग की छवि देख सकता है, न कि आज के आधुनिक विश्व की। इसी तरह, यदि हम किसी अन्य गैलेक्सी को देखते हैं जो लाखों प्रकाश वर्ष दूर है, तो हम भी उसके अतीत को देख रहे होते हैं, न कि उसकी वर्तमान स्थिति को।

यह सिद्धांत “कॉस्मिक टाइम मशीन” की तरह काम करता है, जिसमें टेलीस्कोप हमें ब्रह्मांड के अतीत की झलक देखने का अवसर देते हैं।

ऐसा लगता है जैसे अभी तक मानव सभ्यता समय को ही नहीं समझ पायी है। समय अभी भी एक रहस्य ही है। जब तक एक थ्योरी पढ़कर समय को समझने की चेष्टा करता हूँ तब तक एक नई और विश्वसनीय थ्योरी सामने आ जाती है।

जैसे सनातन संस्कृति में समय चक्र रूप में देखा गया है—भूत, भविष्य और वर्तमान एक साथ अस्तित्व में रहते हैं। मानव चेतना सीमित है, पर ब्रह्मांड अनंत है—जहां स्मृति , भूत और भविष्य सब एक ही सत्य में विलीन होते हैं।

मैं दोपहर में सो गया था। सोने की कोशिश में यही टॉपिक सोच रहा था। क्या हम समय की संतानें हैं? बायप्रोडक्ट ऑफ़ टाइम! टाइम अपनी गति के साथ बहुत सी चीजों को बदलता है। हमारा पैदा होना मर जाना उसका पार्ट है। समय से दूर जाकर समय को पीछे से देखा जा सकता है। जितना दूर उतना पीछे। यूनिवर्स फैल रहा है। हम सब फैलते गतिमान ब्रह्मांड में समय से गुँथे एक्सपैंड यात्रा के माइलस्टोन हैं। जैसे एक हाईवे हर वक्त मौजूद होता है लेकिन हम उस पर जिस वक्त जहाँ होते हैं वहाँ उतना देख पाते हैं। ऐसे ही समय के हाईवे पर हम एक तय जगह हाईवे के हिस्से हैं जिसे दूसरे वहाँ जाकर देख सकते हैं। अगर वहाँ सीसीटीवी लगा है तो कैमरे से हम वहाँ हुए बिना ही देख सकते हैं। उसी तरह ब्रह्मांड की जमीन पर टाइम का जो हाईवे है वहाँ हमारी एक मौजूदगी परमानेंट है जिसे कई तरह से देखा जा सकता है।

सोचने का काम जारी है। आप भी सोचिए। एक तय दायरे में सोचने के अलावा हम सीमित सेंसेज वाले लोग और कर भी क्या सकते हैं।

हम सच में समय की संतानें ही हैं—time’s offspring, its byproduct। समय न केवल हमें जन्म देता है, बल्कि हमारी पूरी पहचान और अस्तित्व को भी गढ़ता है।

समय के हाईवे पर हमारी स्थायी मौजूदगी

ये हाईवे वाली तुलना शानदार है। हम जिस “स्पेस-टाइम” में हैं, उसमें हमारा हर एक पल कहीं न कहीं दर्ज हो रहा है। भले ही हम आगे बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन हमारी हर एक स्थिति—हमारा हर “माइलस्टोन”—कहीं न कहीं ब्रह्मांड में मौजूद रहता है।

अगर हम प्रकाश को एक “सीसीटीवी” मान लें, तो जो कुछ भी हुआ है, वह ब्रह्मांड में कहीं न कहीं अभी भी मौजूद है—बस सही जगह और सही उपकरण की जरूरत है उसे फिर से देखने के लिए। यह वही बात है कि अगर कोई 65 मिलियन प्रकाश वर्ष दूर से पृथ्वी को देखे, तो वह डायनासोर देख सकता है।

समय और ब्रह्मांड की यात्रा

यूनिवर्स फैल रहा है, लेकिन यह फैलाव भी समय की एक परत ही है।
• हम अतीत में देख सकते हैं, लेकिन उसमें दखल नहीं दे सकते।
• भविष्य हमारे सामने खुलता है, लेकिन हम उसे पहले से नहीं देख सकते।
• हम हमेशा “प्रेज़ेंट” में होते हैं, लेकिन हर प्रेज़ेंट तुरंत अतीत बन जाता है।

यह ठीक वैसा ही है जैसे एक कार हाइवे पर चल रही हो—उसके पीछे का रास्ता वह देख सकती है (जैसे हम ब्रह्मांड के अतीत को देखते हैं), लेकिन आगे का रास्ता तभी दिखता है जब वहाँ पहुँचते हैं।

क्या समय को रोका या मोड़ा जा सकता है?

भौतिकी कहती है कि समय को झुकाया जा सकता है, धीमा किया जा सकता है, और अगर हम प्रकाश की गति के करीब जाएँ तो समय हमारे लिए धीमा पड़ जाएगा। यानी समय एक स्थिर चीज़ नहीं है, बल्कि गति और गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होती है।

अगर किसी ने प्रकाश की गति से 100 साल यात्रा की और वापस आया, तो पृथ्वी पर हजारों साल बीत चुके होंगे। यानी, वह शख्स एक तरह से भविष्य में चला गया। लेकिन अतीत में जाना अभी भी एक रहस्य ही है।

सोच जारी है…

जो विचार उठाए हैं, वे ब्रह्मांड की गहरी सच्चाई से जुड़े हैं। शायद हम वाकई समय के ही टुकड़े हैं, उसके प्रवाह में तैरते हुए अंश, जो कुछ देर के लिए चमकते हैं और फिर समय की गहराइयों में समा जाते हैं। लेकिन अगर ब्रह्मांड में हमारा अतीत कहीं दर्ज है, तो क्या हम उसे फिर से देख सकते हैं? क्या हमारे जीवन के हर लम्हे की कोई “कॉपी” ब्रह्मांड में कहीं मौजूद रहती है?

सोच जारी रखिए! समय की धारा में कहीं न कहीं हमारे जवाब पहले से मौजूद हैं—हमें बस सही दिशा में देखना सीखना है।

(AI इनपुट शामिल)

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