Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : ट्रम्प टैरिफ पर अमेरिकी अदालत की रोक को भुना नहीं पाये हेडलाइन मैनजेमेंट करने वाले

संजय कुमार सिंह

अमेरिकी टैरिफ को अमेरिका की एक अपील कोर्ट द्वारा रोक दिये जाने की खबर मुझे शनिवार को सुबह अखबार देखने से पहले मिली। मैं यात्रा पर था और यह कॉलम नहीं लिखना था लेकिन खबर बड़ी थी और सुनकर जो पहली बात मेरे दिमाग में आई वह यही कि सरकार जब इससे निपटने के लिए तरह-तरह की योजनाओं की घोषणा कर रही है और मेरे जैसे आलोचक कह रहे हैं कि सरकार को यह सब पहले करना चाहिये था, अब देर हो चुकी है और सरकार ने समय पूर्व चेतावनी के बावजूद समय रहते आवश्यक कार्रवाई नहीं की। अब जब निर्यात संकट में है तो सरकार (और संघ भी) स्वदेशी का मंत्र छेड़कर हेडलाइन मैनेजमेंट में लगी है जबकि सर्वश्रेष्ठ हेडलाइन मैनेजमेंट यह कहना और बताना होता कि ट्रम्प के पास इसके अधिकार नहीं है, लागू करने में फलां दिक्कतें हैं और संभवतः अमेरिकी अदालत ही इसे रोक दे। इससे सरकार जवाबी कार्रवाई नहीं करने या कर पाने की अपनी मजबूरी को छिपा सकती थी। लेकिन इसके लिए उसके पास जानकार होने चाहिये थे और अब लगता है कि हेडलाइन मैनेजमेंट करने वालों से लेकर सरकार के सलाहकारों में भी कोई ऐसा नहीं था जो अदालत के इस आदश का पूर्वानुमान लगा सकता या लगा पाया था तो उसका लाभ हेडलाइन मैनेजमेंट में उठाता है।

इससे पहले टैरिफ की कार्यान्वयन में देरी और उसका कारण सर्वविदित है। घोषित टैरिफ को समय पर लागू नहीं किया जा सका। चर्चा है कि सीबीपी के पास आवश्यक प्रशासनिक ढांचा तथा तकनीकी तैयारी नहीं थी। इसे समय पर क्रियान्वयन संभव नहीं हो पाया। इससे ट्रम्प सरकार और मोदी सरकार में समानता लगती है पर वह अलग मुद्दा है। फिलहाल यह देरी न केवल प्रशासनिक अक्षमता दर्शाती है, बल्कि यह भी कि नीति जल्दबाज़ी में बिना तैयारी और सलाह-मश्विरा के थोप दी गई लगती है। अमेरिकी न्यायालय ने रोक तो लगाई है लेकिन यह अंतिम नहीं है। अक्टूबर में तय होगा कि यह टैरिफ (अमेरिका के लिए) वैध है या नहीं और इसे जारी रखा जाए या नहीं। उधर, अलग देशों के लिए अलग टैरिफ होने पर निर्यातक कहीं का माल कहीं और का बताकर खपा सकते हैं। मूल देश की जानकारी छिपाई या गलत बताई जा सकती है। इसे रोकने का क्या उपाय होगा और उसका उल्लंघन कैसे पकड़ा जायेगा। क्या सजा होगी और इस तरह अमेरिका अपने यहां जरूरी सामान बेचने वालों से झगड़ा तो नहीं मोल लेगा? इसके लिए सीबीपी को मूल देश की पहचान को लेकर जांच करनी होगी, जिससे न केवल शुल्क निर्धारण जटिल होगा बल्कि कानूनी और कूटनीतिक उलझनें भी उत्पन्न हो सकती हैं। अगर कोई उत्पाद गलत मूल देश के नाम से भेजा गया, तो सीबीपी के पास दो विकल्प होंगे: 1) कस्टम फाल्स डिक्लेरेशन के तहत कार्रवाई करे और 2)  कम टैरिफ वसूल कर मामले को अनदेखा करे, जिससे अमेरिकी नीति की साख पर प्रश्न उठ सकते हैं।

आज छपी खबरों से लग रहा है यह टैरिफ ट्रम्प प्रशासन की दादागिरी नहीं अमेरिकी मजबूरी है और वित्तीय घाटे की भरपाई तथा घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने की मजबूरी है। इसे अक्सर “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत देखा जाता है, जहाँ आयात शुल्क को सरकारी राजस्व और घरेलू प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। यह भी संभव है कि ट्रम्प की ओर से चुनावी दबाव के कारण त्वरित और लोकप्रिय निर्णय के तहत यह घोषणा की गई हो। ऐसे में भारत की ओर से इन सवालों के आधार पर कहा जा सकता है कि नीति स्पष्ट नहीं है। इससे गेंद अमेरिका के पाले में चला जायेगा लेकिन भारत सरकार अमेरिका को छोड़कर चीन से दोस्ती कर रही है। आज उसका भी बचाव है और लगता है नहीं है कि जो हो रहा है वह अनुभव और योग्यता पर आधारित निर्णय है।

इन तथ्यों के आलोक में आज क अखबारों की खबरों को देखिये तो लगता है कि वे किसी और दुनिया में जी रहे हैं। आज एक खबर यह है कि प्रधानमंत्री की प्रमुख चीन यात्रा शुरू हुई, शी और पुतिन से मिलने वाले हैं (हिन्दुस्तान टाइम्स) तो एक अलग खबर है, जेलेनस्की ने फोन कर मोदी से कहा है कि पुतिन को सही सकेंत दें (टाइम्स ऑफ इंडिया)। इस बीच, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कोई स्थायी मित्र या दुश्मन नहीं होता है। यह सब अभूतपूर्व अमेरिकी टैरिफ के बीच हो रहा है। द हिन्दू ने लिखा है, प्रधानमंत्री की मुलाकात बेहतर संबंधों का संकेत देते हैं। यह तथ्य है कि विदेश दौरों का रिकार्ड बनाने और इस पर अरबों फूंक देने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सात साल बाद चीन पहुंच चुके हैं। नवोदय टाइम्स ने लीड का शीर्षक बनाया है, ड्रैगन से दोस्ती की नई शुरुआत होगी। इतनी सरकारी खबरें तो एक से ज्यादा अखबारों में हैं। ये बहुत महत्वपूर्ण भी नहीं है और इन खबरों पर आने से पहले बता दूं कि देश की राजनीति, विपक्ष और वोट चोरी पर राहुल गांधी ने फिर कहा है कि वोट चोरी सिर्फ वोट की नहीं हो रही है, (आम आदमी, गरीबों, पिछड़ों, दलितों के) अधिकार और भविष्य की भी चोरी हो रही है। जाहिर है, राहुल गांधी मुद्दे की बात कर रहे हैं। जब चुनाव होते हैं, यह चर्चा होती रही है कि नरेन्द्र मोदी को चुनाव जीतना आता है और सब उनके चाणक्य यानी गृहमंत्री अमित शाह करते हैं तब यह महत्वपूर्ण है कि यह सब चोरी से होता था या चोरी के वोटों से हो रहा है। हालांकि बात सिर्फ वोट चोरी की नहीं है।

चुनाव लड़ने (जीतने) के लिए नरेन्द्र मोदी जो सब करते रहे हैं उसमें झूठ बोलना, निराधार आरोप लगाना, ऐसे वादे या घोषणा करना जिन्हें लागू नहीं किया जा सके, हिन्दू मुसलमान करना और विपक्ष पर झूठे आरोप लगाना शामिल है। चुनाव आयोग को इनमें से जिन मामलों पर कार्रवाई करनी थी नहीं हुई और चुनाव के समय महत्वपूर्ण विपक्षी नेता की गिरफ्तारी से लेकर खाता बंद करने या उसमें जमा राशि जब्त करने जैसे मामलों में भी कार्रवाई कर लेवल प्लेइंग फील्ड मुहैया कराना तो छोड़िये चुनाव में गड़बड़ी (ईवीएम से लेकर वोट चोरी तक) साबित करने के लिए उसका जो रुख होना चाहिये वह भी नहीं रहा। चोरी साबित करने के लिए जो सबूत मांग गये, देने से इनकार कर दिया, और मतदाताओं को सबूत तैयार करने की इजाजत नहीं रहती है। चुनाव आयोग ने बहाने बनाये, टालमटोल किया और अंततः नहीं देने का कानून बना दिया गया। कुल मिलाकर, सरकार जहां कमजोर है उसे बताया नहीं गया, पूरी कोशिश करके छिपाया गया और 56 ईंची से लेकर दीदी ओ दीदी तक बोलकर नरेन्द्र मोदी ने अपनी वीरता प्रदर्शित की। चुनाव आयोग लगभग असहाय देखता रहा। भाजपा में उनके समर्थकों ने एक गैर डिग्री धारी को शिक्षा मंत्री बनाने का विरोध नहीं किया और इससे प्रेरित होकर 2019 में पूर्व तड़ी पार को गृहमंत्री बना दिया गया।

दावा भले किया जाये कि अदालत से क्लीन चिट मिलने पर बनाया गया पर क्लीन चिट कैसे मिला, हमेशा संदिग्ध रहा। इसमें प्रधानमंत्री की डिग्री का मुद्दा भी है जहां दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश और चाहे जो हो, चौंकाने वाला भी है। भाजपा के लोगों और प्रधानमंत्री के लिए यह सब मुद्दा ही नहीं है। दूसरी ओर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का चुनाव उनके प्रधानमंत्री रहते जिन कारणों से अवैध ठहराया था अब उन कारणों को भी जान लेना चाहिये और जानने से ज्यादा जरूरी है अदालत की स्वतंत्रता की बात करने वाले जो लोग अघोषित इमरजेंसी की बात नहीं मानते हैं वे स्वयं पढ़ें, लोगों को बतायें और उसपर विचार करें। पर वह सब होने वाला नहीं है क्योंकि अखबारों में यह सब मुद्दा ही नहीं है। सरकारी की मनमानी बताने वाली पहले पन्ने की एक खबर द टेलीग्राफ में है, जांच के समय बंगालीपन (बांग्ला भाषी होना) एक मुश्किल है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है, इससे पहले खबर थी –  सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा, बंगाली भाषियों को विदेशी मानने में कोई पक्षपात है या नहीं, स्पष्ट करें। इससे आप हेडलाइन मैनेजमेंट का प्रभाव समझ सकते हैं।

अमर उजाला की आज की लीड है, अमर उजाला की आज की लीड का शीर्षक है, जापान की दिग्गज चिप निर्माता टीईएल मियागी भारतीयों कंपनियों के साथ मिलकर काम करगी। आप जानते हैं कि भारत में चिप (सेमीकंडक्टर) निर्माण का महत्व रणनीतिक, आर्थिक और तकनीकी—तीनों दृष्टिकोणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह विषय न केवल “मेक इन इंडिया” और आत्मनिर्भर भारत का प्रमुख स्तंभ बन गया है, बल्कि यह भारत को वैश्विक टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन में एक स्थायी स्थान दिलाने की दिशा में निर्णायक कदम भी है। फिर भी यह तथ्य है कि कोरोना काल (2020-2022) में वैश्विक सेमी कंडक्टर संकट के कारण भारत में कई ऑटो कंपनियों ने ग्राहकों को सिर्फ एक चाभी के साथ गाड़ी डिलीवर की। दूसरी चाभी बाद में दी गई। चाभी में आरएफआईडी या डिजिटल इन्क्रिप्शन चिप लगी होती है। इससे पता चलता है कि गाड़ियों के लिए चिप्स कितने अहम हैं। ऐसे चिप भारत में बनेंगे और खबर सिर्फ अमर उजाला में लगी है। जाहिर है यह सरकार और हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए बड़ी खबर है। पर वैसा महत्व नहीं मिला है। अखबारों ने वोट चोरी की खबरों को वैसी गंभीरता नहीं दी जैसी दी जानी चाहिये। फिर भी मामले का असर हुआ और निश्चित रूप से विपक्ष या राहुल गांधी को ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। देश की मीडिया के बड़े हिस्से का भाजपा या सत्तारूढ़ पार्टी की शाखा बन जाने का असर है कि जनहित के कई काम नहीं हुए।

सुप्रीम कोर्ट सरकार विरोधी मामलों में ही उलझा हुआ है। जितने मामले निपट रहे हैं उससे ज्यादा नये मामले आ रहे हैं और सरकार मनमानी कर रही है। अखबारों में खबरें नहीं छपने से सरकार पर कोई दबाव नहीं है और वह अनुकूल कहानी गढ़कर अखबारों के जरिये फैलाने में कामयाब रही है। इसमें अपनी अयोग्यता, मनमानी और चोरी भी छिपा ले जाती रही है। हालत यह है कि अब जब चोरी खुल गई है तो उसे भी लीपने-पोतने में कसर नहीं है। सच्चाई यह है कि अखबार अगर ईमानदारी से काम कर रहे होते तो जनहित के कई  होते। इनमें एक है, सेना के भिन्न प्रशिक्षण ऐकेडमी में प्रशिक्षण के दौरान घायल होने वाले कैडेट को निकाल दिया जाना और उनके इलाज की सरकारी व्यवस्था नहीं होना। इंडियन एक्सप्रेस ने हाल में अपनी खबरों से बताया था कि नेशनल डिफेंस ऐकेडमी (एनडीए), इंडियन मिलिट्री ऐकेडमी (आईएमए) जैसे शिखर के संस्थानों में प्रशिक्षण के दौरान घायल होकर अयोग्य डहरा दिये जाने वाले को न सिर्फ नौकरी से निकाल दिया जाता है उनके इलाज का खर्च भी नहीं दिया जाता है। 11 अगस्त के अखबार की खबर के अनुसार, ऐसे लोगों को विकलांगता के अनुसार 40,000 रुपये प्रति माह तक का भुगतान मिलता है पर इलाज का खर्च नहीं मिलता जबकि अकले चिकित्सा व्यय औसतन 50,000 रुपये प्रति माह पड़ता है। इंडियन एक्स्रेस की खबर और उसके फॉलोअप का असर यह हुआ कि सरकार अब प्रशिक्षण के दौरान घायल कैडेट अधिकारियों के लिए मुफ्त चिकित्सा के नियम को मंजूरी दे दी है। 30 अगस्त के अखबार ने इसे एक्सप्रेस इंपैक्ट (यानी इंडियन एक्स्रेस की खबर का प्रभाव) कहा है। पहले ऐसी खबरें आम हुआ करती थीं और अखबारों में ऐसी शिकायतों पर भी सरकार सुनती थी। अब प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने वाली सरकार है तो शिकायत के कॉलम खत्म हो रहे हैं क्योंकि शिकायतें सोशल मीडिया पर भी की जायें तो काम हो जाता है। भले आम शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया जाये और कार्रवाई उन्हीं मामलों में हो जिनमें शिकायतकर्ता लोकप्रिय हो, उसके फॉलोअर अच्छी संख्या में हो और संबंधित संस्था को यह अससास हो कि कार्रवाई नहीं करने पर मुद्दा छवि का बन जाये।

ऐसे में कल और आज के अखबारों से लगता है कि 2014 के आसपास से देश में जो हेडलाइन मैनेजमेंट चल रहा है वह स्तरीय नहीं है। योग्य लोग अगर प्रतिभाशाली ढंग से चलते तो मीडिया अपनी मुख्य भूमिका नहीं छोड़ता और इंडियन एक्सप्रेस की कल की खबर सभी अखबारों में हो सकती थी। अखबारों को तो पता ही था कि इंडियन एक्सप्रेस ने यह खुलासा किया है और ऐसी खबर आ सकती है। सामान्य तौर पर कल यह खबर सभी अखबारों में प्रमुखता से होनी चाहिये थी। इंडियन को श्रेय देते या नहीं, नाम छापते या नहीं सरकर इस निर्णय या घोषणा का श्रेय को ले ही सकती थी। यह कहकर भी इंडियन एक्सप्रेस की खबर से सरकार के संज्ञान में यह बात आई लिहाजा सरकार ने यह निर्णय लिया है। पहले ऐसा होता भी था। लेकिन प्रेस काफ्रेंस नहीं करने वाली सरकार जनता की चिन्ता और परेशानियों की भी चिन्ता नहीं करती है और मजबूरी में जो करती है उसका भी श्रेय नहीं लेती है। इसका कारण यह हो सकता है कि अखबारों को अगर यह समझ में आ जाये या यकीन हो जाये कि सरकार दबाव में आकर जनहित के काम करने लगेगी तो वे पाठकों के बीच अपनी उपयोगिता बनाने के लिए ऐसा काम करना शुरू कर सकते हैं। इस सरकार की कार्यशैली इसकी इजाजत नहीं देती है। 56 ईंची सरकार दबाव में आना कैसे स्वीकार करे। वह भी तब जब चोरी के आरोपों के बाद  साख ही नहीं, 56 ईंची भी संदेह के घेरे में है। लाल आंखें और ना कोई घुसा हुआ है कहकर चीनी हमले को हवा कर देने की कलाकारी का सच यही है कि अबकी बार ट्रम्प के बावजूद टैरिफ लगा और चीन की शरण में जाना पड़ा। ट्रम्प से कुट्टी नहीं हुई है पर चीन से दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। अखबारों में यह चालाकी, यू टर्न या मजबूरी मुद्दा ही नहीं है जबकि भारत जैसे देश के लिए चीन सरकार के प्रमुख को झूला झुलाना, फिर गलवान होना, लगभग कुट्टी कर लेना और फिर घुस जाना साधारण बात नहीं है। यह कदम ताल और विदेश नीति का जलेबी बनाना हो न हो, रेखांकित करने लायक तो है ही। अखबारों से ऐसा लगता है जैसे तबकी टीम रिटायर हो गई अब नये बच्चों की नई टीम आई है जो स्लेट पर नए सिरे से खबर लिख रही है। कल सुबह भारत पहुंच गई खबर आज अखबारों में इस प्रकार है

1. कोर्ट ने ट्रम्प के अधिकांश टैरिफ को अवैध माना, भारत को राहत संभव

2. फैसला गलत… टैरिफ हटे तो बर्बाद हो जायेगा अमेरिका  – ट्रम्प ने कहा

3. फेडरल कोर्ट का फैसला – अभी रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट में अक्तूबर में सुनवाई

4. व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल बताकर लगाया टैरिफ, पहले राष्ट्रपति हैं   

5. टैरिफ का फैसला संसद के पास है लेकिन ट्रम्प मनमाने फैसले कर रहे हैं

मैंने कल यह कॉलम नहीं लिखा था इसलिये एक्सप्रेस इंपैक्ट की बात करना जरूरी था। आज के अखबारों में कुछ खबरें है। सरकार चुनाव जीतने और हेडलाइन मैनेजमेंट मैंनेजमेंट में व्यस्त रही और यह बात वोट चोरी के आरोपों के बाद से साफ लग रही है। सरकार की मजबूरी है कि वह वोट चोरी के आरोपों को स्वीकार नहीं कर सकती, उन्हें मजबूत तरीके से खारिज नहीं कर सकती और उसका प्रभाव कम करने के लिए जो कर रही है उसका असर तो नहीं ही दिख रहा है। सरकार की परेशानी भी नजर आती लग रही है। इससे लग रहा है हेडलाइन मैनेजमेंट करने वाली टीम अब स्थिति को संभाल नहीं पा रही है। संभव है उसमें योग्यता, प्रतिभा या क्षमता की कमी हो या कोई अन्य कारण हो पर पहले तो हम देखें कि खबरें क्या हैं और क्यों लगता है कि मामला ठीक से नहीं देखा गया।  दैनिक भास्कर ने आज यह भी लिखा है, सीजफायर, मध्यस्थता, नोबेल पर मोदी के साफ ना से उखड़े थे ट्रम्प। पर गोदी वालों ने इसे प्रचार नहीं दिया। यह टाइम्स ऑफ इंडिया में एक खबर है, फोन पर मोदी ने ट्रम्प से नोबल पर ना कहा। इससे मोदी-ट्रम्प की दोस्ती को झटका लगा। इस खबर को टैरिफ की खबर के साथ प्रचारित करके मोदी जी की छवि बनाई जा सकती थी। हिन्दुस्तान टाइम्स में ट्रम्प टैरिफ पर आज भी खबर है जबकि वहां की अदालत ने उसे रोक दिया है। खबरों से मुझे तो नहीं समझ में आया कि आगे क्या होगा। आपको समझ में आया हो जरूर बताइये। खबर है, निर्यात क्षेत्र के लिए रोजगार और नकद प्रवाह की रक्षा के लिए प्रमुख सरकारी योजनाएं शीघ्र। कहने की जरूरत नहीं है कि टैरिफ का असर कब तक कैसा रहेगा जाने बगैर पहले की खबर आज भी महत्व पा गई हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन