यशवंत सिंह-
मीडिया की कमाई, सत्ता का कंट्रोल और 2029 की तैयारी, गोदी मीडिया के भविष्य पर गंभीर सवाल
अदाणी और अंबानी के इर्द गिर्द सिमटती मीडिया अर्थव्यवस्था, बाकी चैनलों के लिए बढ़ता संकट, आजतक भी चलता रहेगा
भारतीय मीडिया के मौजूदा हालात को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छिड़ गई है। वरिष्ठ पत्रकार शीतल सिंह के आकलन और हालिया घटनाक्रम यह संकेत दे रहे हैं कि देश की मीडिया इंडस्ट्री तेजी से दो बड़े कॉरपोरेट घरानों के इर्द गिर्द सिमटती जा रही है। सवाल यह है कि क्या आने वाले वर्षों में मीडिया की विविधता और स्वतंत्रता और अधिक सीमित होने वाली है।
वरिष्ठ पत्रकार शीतल सिंह का कहना है कि इस समय मीडिया सेक्टर में अगर किसी की कमाई अपेक्षाकृत स्थिर और मजबूत स्थिति में है तो वह केवल अदाणी समूह की NDTV और अंबानी समूह की News18 है। इसके उलट देश के कई बड़े और पुराने मीडिया संस्थान आर्थिक दबाव से जूझ रहे हैं और उनके लिए संचालन लगातार मुश्किल होता जा रहा है।
इसी कड़ी में देश के सबसे पुराने और स्थापित समाचार चैनलों में शुमार आज तक की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। चैनल के संस्थापक संपादक अरुण पुरी खुद सार्वजनिक रूप से मीडिया उद्योग की गिरती आर्थिक हालत और विज्ञापन संकट का जिक्र कर चुके हैं। यह संकेत है कि संकट केवल छोटे या मझोले चैनलों तक सीमित नहीं रहा बल्कि बड़े ब्रांड भी इसकी चपेट में हैं।
मीडिया बाजार पर नजर रखने वालों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में कॉरपोरेट विज्ञापनों का प्रवाह चुनिंदा मीडिया संस्थानों की ओर मोड़ दिया गया है। साथ ही सरकारी विज्ञापनों पर भी सख्त नियंत्रण देखने को मिल रहा है। इसका सीधा असर उन मीडिया हाउसों पर पड़ा है जो सत्ता या बड़े कॉरपोरेट हितों के पूरी तरह अनुकूल नहीं माने जाते।
इसी दबाव का असर आक्रामक एंकरिंग और सत्ता समर्थक पत्रकारिता के प्रतीक माने जाने वाले अर्नब गोस्वामी पर भी दिख रहा है। मीडिया गलियारों में चर्चा है कि आर्थिक और राजनीतिक दबाव के चलते उनकी स्थिति पहले जैसी मजबूत नहीं रही और तेवरों में भी बदलाव नजर आ रहा है।
इन तमाम संकेतों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2029 के चुनाव से पहले मीडिया के मोर्चे पर जोखिम कम करना चाहते हैं। बड़ी संख्या में मीडिया संस्थानों को मैनेज करने के बजाय सीमित लेकिन पूरी तरह भरोसेमंद मीडिया प्लेटफॉर्म पर निर्भर रहना सत्ता के लिए अधिक सुविधाजनक माना जा रहा है। इसलिए केवल आजतक, न्यूज़18 और एनडीटीवी ही बने रहेंगे। बाकियों की आर्थिक सप्लाई बंद कर दी जाएगी जिससे वो ख़ुद ब ख़ुद मरने लगेंगे।
राजनीतिक और मीडिया विश्लेषकों का मानना है कि इस साल 2026 में गोदी मीडिया की संरचना में बदलाव दिख सकता है। कुछ चेहरे विद्रोह का रास्ता चुन सकते हैं तो कुछ पूरी तरह सरेंडर करेंगे। कई पत्रकार और एंकर डिजिटल और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म का रुख कर सकते हैं लेकिन आर्थिक निर्भरता का बड़ा स्रोत अंततः सत्ता तंत्र से ही जुड़ा रहेगा।
अंततः चर्चा का केंद्र यही है कि मीडिया जगत में प्रभाव और नियंत्रण का पलड़ा किसके हाथ रहेगा। संकेत यह दे रहे हैं कि फिलहाल ताकत अदाणी समूह के पक्ष में अधिक झुकी हुई है जबकि अंबानी समूह की भूमिका और उसका राजनीतिक साथ किस हद तक बना रहेगा यह भविष्य के राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।



मो. इमरान खान
January 3, 2026 at 2:31 am
पहले मीडिया जनता की आवाज थी. बिना किसी दबाव के मिलावट और भ्रष्टाचार की खबरों को दिखाते थे.. बड़ी-बड़ी कंपनियां मीडिया को विज्ञापन देती थी.. मिलावट और भ्रष्टाचार करने से भी डरती थी.. इससे जनता और मीडिया से जुड़े दोनों लोगों का भला होता था.. फिर एंट्री हुई कॉर्पोरेट की, पत्रकारों की जगह मीडिया पर कारोबारियों का कब्जा हो गया.. मीडिया सरकार की प्रवक्ता बन गई.. बदले में व्यापारियों को बड़ा-बड़ा कारोबार मिल गया.. जो दूसरे कारोबारी थे वो भी समझ गए.. दो जगह पैसा खर्च करने का कोई मतलब नहीं है.. सिर्फ सरकार को चंदा देने से ही काम हो जाएगा तो मीडिया को विज्ञापन देने का क्या मतलब.. मीडिया अगर पहले वाली पत्रकारिता करने लगे (सिर्फ जनता की आवाज ) तो आज जो मीडिया संस्थान वेंटिलेटर पर हैं वो दौड़ने लगेंगे और आज जो मीडिया संस्थान दौड़ रहे हैं वो वेंटिलेटर पर चले जाएंगे.. पहले खादी का झोला टांगे और साइकिल से चलने वाले पत्रकार के सम्मान में बड़े से बड़ा अधिकारी और नेता खड़ा हो जाता था.. लेकिन आज बाड़े से बड़े पत्रकार को एक सिपाही बेइज्जत कर देता है.. क्योंकि सिपाही भी जानता है अब कलम नेता जी की कंट्रोल में है..यूट्यूब या सोशल मीडिया वाकई में बड़ी ताकत है.. लेकिन यूट्यूब या सोशल मीडिया से टीवी को कोई खतरा नहीं है.. क्योंकि एक यूट्यूब को चलाने वालों की टीम बहुत छोटी होती है.. पूरे देश में उनके रिपोर्टर नहीं होते हैं.. लेकिन टीवी मीडिया की बहुत बड़ी टीम होती है..हर जगह रिपोर्टर होते हैं.. जो खबर टीवी दिखा सकता है और कोई नहीं दिखा सकता.. टीवी पर प्रसारित होने वाले प्रोग्राम को भी लोग यूट्यूब और सोशल मीडिया पर डालते हैं.. मोबाइल देखने वाले लोग भी वही प्रोग्राम देखते हैं, जो टीवी पर दिखाया गया होता है… टीवी मीडिया तो सोशल मीडिया और यूट्यूब के जरिए अपने आप को और बड़ा कर रहा हैं.. टीवी वाले भी उसे आमदनी कर रहे हैं..असल में टीवी की दुर्दशा के लिए सोशल मीडिया या यूट्यूब जिम्मेदार नहीं है.. यह बात सब जानते हैं.. मीडिया की हालत को सुधारने के लिए कारोबारियों और सरकार के गठजोड़ को तोड़ना होगा और जनता को खुद से जोड़ना होगा