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टीवी9 वाले तो विदेश में समिट कर नया रिकॉर्ड बना गए!

मैं जब भी भारत की सांस्कृतिक प्राचीर से बाहरी दुनिया को देखता हूँ तो सांस्कृतिक लिहाज से जर्मनी हमें अपने सबसे करीब दिखता है. ऐसा बोध इंग्लैंड या किसी और फिरंगी देश को देखकर नहीं होता है. इसलिए जर्मनी अपना सहज बंधु दिखता है…

हेमंत शर्मा-

र्मनी से लौटते हुए…

तीन रोज तक सांस लेने में तकलीफ़ रही. पांच सौ एक्यूआई लेवल से महज तीन एक्यूआई लेवल वाली आबोहवा में चला गया था. फेफड़ों को आदत विषैली हवा की हो गयी है इसलिए जर्मनी की तीन एक्यूआई लेवल की हवा असहज लग रही थी. साफ़ हवा के कारण फेफड़े परेशान थे. अब पता लगा कि सिगरेट पीने वाले बिना सिगरेट के तड़फड़ाने क्यों लगते हैं. चाणक्य की विष कन्याएं बिना विष के छटपटाने क्यों लगती थी.

यूरोपीय देशों में जर्मनी में सबसे ज़्यादा खिंचाव है. यह महान उपन्यासकार थॉमस मान, अप्रतिम दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे (जिसने ईश्वर के मरने का एलान किया था), भाषाविद् और प्राच्यविद् फ़्रीड्रिश मैक्समूलर, चिकित्साविज्ञानी होमियोपैथी के जनक सैमुअल हैनीमैन, महान साहित्यकार वुल्फगांग गेटे, नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त अद्भुत मेधा के वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन, और भाषा विज्ञानी वॉन हम्बोल्ट की धरती रही है. फिर हिटलर के वक्त समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया की अकबरपुर से बर्लिन की यात्रा भी रोमांचित करती थी.

जर्मनी सांस्कृतिक, सामाजिक और बौद्धिक लिहाज से हमारे सबसे क़रीब है. वेदों को दुनियाभर में पहुँचाने वाले मैक्समूलर, कालिदास का पश्चिम से मेलजोल कराने वाले गेटे. संस्कृत और जर्मन भाषा की जड़ें खोजने वाले विलियम जॉंस. महान नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त और आयुर्वेद के अर्क को होमियोपैथी का मदर टिंचर बनाने वाले सैमुएल हैनिमैन… सब यहीं के तो थे.

जर्मनी के औद्योगिक शहर स्टटगार्ट (Stuttgart) जाना हुआ. मौक़ा था टीवी9 के चैनल न्यूज़9 द्वारा आयोजित भारत और जर्मनी के बीच सस्टेनेबल ग्रोथ के अवसर ढूंढना. भारत के किसी मीडिया संस्थान की यह पहली और अकेली पहल थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने वीडियो संदेश के ज़रिए इस सम्मिट को संबोधित किया. रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव और संचारमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ने इस सम्मिट में हिस्सा लिया. जर्मन सरकार के मंत्री और Baden-Württembergराज्य के मुख्यमंत्री भी इस सम्मेलन के प्रतिभागियों में थे.

स्टटगार्ट दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी के बाडेन-वुर्टेमबर्ग (Baden-Württemberg) राज्य की राजधानी है. नेकर नदी (Neckar river) पर एक उपजाऊ घाटी में बसा शहर जो चारों ओर पहाड़ियों से घिरा कटोरेनुमा शहर है. दुनिया में इस शहर को ऑटोमोबाइल का पालना/जन्मस्थान के रूप में जाना जाता है. स्टटगार्ट ऑटो उद्योग, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा, रोबोटिक्स, ईंधन सेल और लेजर प्रौद्योगिकी की कंपनियों का भी केंद्र है. स्टटगार्ट wine production का प्रमुख केंद्र भी है. नेकर घाटी में बसे होने के कारण अंगूर के बागों के लिए यह सबसे बेहतरीन स्थान है. पश्चिम में ब्लैक फ़ॉरेस्ट और पूर्व में स्वाबियन जुरा (Alps की पहाड़ियाँ) से घिरा हुआ यह इलाक़ा अंगूर की खेती के लिए एक अद्वितीय माइक्रोक्लाइमेट बनाता है. औसत अधिकतम तापमान 25°C के आसपास होता है. आजकल शून्य से नीचे था. दुनिया के बेहतरीन अंगूर यहाँ उगाए जाते हैं.

छह लाख की आबादी वाला यह जर्मनी का छठा सबसे बड़ा शहर है. दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी में सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र का केंद्र है और यहाँ विभिन्न व्यापार मेले और सम्मेलन आयोजित होते रहते हैं. मर्सिडीज, पोर्शे, वॉक्सवैगन, ऑडी और मशीनरी की कम्पनी बॉस का मुख्यालय यहीं है. फुटबॉल यहां का धर्म है और स्टेडियम मंदिर. इसलिए समाज के केंद्र में खेल भावना है.

ज्ञान, साहित्य, भाषा, संस्कृति और दर्शन में भारत और जर्मनी में गजब की समानता है. यह सच है कि दुनिया को वेदों के रूप में पहली किताब भारत ने दी. पर उस वैदिक ज्ञान और उसकी भाषा ‘संस्कृत’ को वैश्विक पहचान देने वाले पहले विद्वान मैक्समूलर ही थे. जो जर्मन थे. यानी भारत की वैदिक ज्ञान परम्परा से दुनिया की पहले पहल पहचान मैक्समूलर ने कराई. ऐसा कर प्रो. मैक्समूलर ने यूरोपीय चिंतन में भारतीय दर्शन को स्थापित किया. मैं मानता हूँ कि स्वामी विवेकानंद बाहरी दुनिया के लिए हिन्दुत्व के पहले ब्रांड एंबेसडर थे. इस लिहाज़ से मैक्समूलर और विवेकानंद में एक समानता है. विवेकानंद ने भारतीयता और हिन्दुत्व के दर्शन को दुनिया में फैलाया और मैक्समूलर ने वैदिक ज्ञान परम्परा को. उन्हीं विवेकानंद ने मैक्समूलर के बारे में कहा था कि “अगर पश्चिमी दुनिया में किसी एक ने वेदांत के मर्म को समझा तो वे ‘मैक्समूलर’ थे. उनके पास जाना मैं तीर्थयात्रा के समान मानता हूँ”. जर्मन भारत के संस्कृतिक रिश्तों पर इससे बड़ी गवाही और क्या हो सकती है.

मैं जब भी भारत की सांस्कृतिक प्राचीर से बाहरी दुनिया को देखता हूँ तो सांस्कृतिक लिहाज से जर्मनी हमें अपने सबसे करीब दिखता है. ऐसा बोध इंग्लैंड या किसी और फिरंगी देश को देखकर नहीं होता है. इसलिए जर्मनी अपना सहज बंधु दिखता है. जर्मनी के साथ हमारा इतिहास गुलामी, भेदभाव, दबाव, हिंसा का नहीं है. जर्मनी से हमारा रिश्ता राजनैतिक, सांस्कृतिक सहयोग, साहित्यिक और भाषाई जड़ों की एकरूपता का रहा है. इसलिए हमारे लिए संवाद का इससे अनुकूल आंगन कुछ और नहीं हो सकता था. इसलिए हमने जर्मनी से टीवी9 के संवाद कार्यक्रम की शुरुआत की.

भारत और जर्मन सम्बन्धों की गहराई समझने के लिए एक छोटी कहानी सुनाता हूँ. 19वीं सदी में ‘ग्रामोफोन’ का आविष्कार थॉमस अल्वा एडिसन ने किया… बल्ब आदि कई और आविष्कार वे पहले कर चुके थे. ग्रामोफ़ोन के ज़रिए उन्होंने एक ऐसा यंत्र बनाया जो भावी पीढ़ी के लिए मनुष्य की आवाज को रिकॉर्ड कर सकता था. जब आविष्कार सम्पन्न हुआ तो सवाल उठा कि कौन-सी आवाज वह पहले रिकॉर्ड करें? इसके लिए एडिसन ने प्रो. मैक्समूलर को चुना. एडिसन ने मैक्समूलर को चिट्ठी लिखी कि आपसे मिलना चाहता हूँ. आपकी आवाज रिकॉर्ड करना चाहता हूँ. एडिसन इस काम के लिए इंग्लैंड गए. एडिसन ने सार्वजनिक मंच पर एक यंत्र रख मैक्समूलर की रिकॉर्डिंग की. कुछ देर बाद वह एक रिकार्डेड डिस्क लेकर आए. उन्होंने ग्रामोफोन पर वह डिस्क बजाई. दर्शक मैक्समूलर की आवाज सुन रोमांचित हो गए. पर किसी को कुछ समझ नहीं आया. क्योंकि जो कुछ रिकार्ड हुआ था वह न अंग्रेजी थी, न ग्रीक, न ही लैटिन. न ही जर्मन.

यह ऐसी भाषा थी जिसे यूरोपीय़ विद्वानों ने पहले कभी सुना नहीं था. प्रो. मैक्समूलर ने ऋग्वेद की पहली ऋचा यानी श्लोक “अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्” पढ़ा था. यह ग्रामोफोन प्लेट पर रिकॉर्ड की गयी दुनिया की पहली सार्वजनिक आवाज थी. जब मैक्समूलर से पूछा गया कि आपने इसे क्यों चुना तो उन्होंने कहा, “वेद मानव जाति का सबसे पुराना ग्रंथ है और “अग्निमीले पुरोहितं “उसकी पहली ऋचा”. एक जर्मन विद्वान का भारतीय संस्कृति के प्रति इससे बड़ा सम्मान और क्या हो सकता है. उन्होंने भारत की आध्यात्मिक चेतना को यूरोप के नवजागरण से जोड़ा.

भारत और जर्मन सम्बन्धों का जुड़ाव भी कैसा है? भारत के वैदिक काल की भाषा संस्कृत है. उसके शब्दों को आप जर्मन भाषा में देख सकते हैं. दोनों भाषाओं में कमाल की समानता है। दोनों की ध्वनि प्रणाली साझा है. दोनों भाषाएँ एक से स्वरों और व्यंजनों के व्याकरण में रची-बंधी हैं. दोनों ही भाषाओं में लिखे वाक्यों में शब्दों को स्वतंत्र रूप से रखने की गुंजाइश है. वाक्यों में रखे गए शब्द संस्कृत में एकदम स्वतंत्र और जर्मन में लगभग स्वतंत्र रहते हैं. शायद यही वजह है कि आज जर्मनी के 14 से ज्यादा विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई और सिखाई जा रही है. इन दोनों भाषाओं के परस्पर सम्बन्धों पर लगातार रिसर्च जारी हैं.

भारतीय दर्शन बहुलतावादी है. गंगा बहुत सी धाराओं से बनती है. हिंदू धर्म भी बहुत सी धाराओं का संगम है जो सतत प्रवाहमान है. संस्कृत हमारा अस्तित्व भी है, पहचान भी और इतिहास भी. आज भी बर्लिन की सड़कों पर, दुकानों में संस्कृत-जर्मन शब्दकोश आसानी से मिल जाते हैं. उतनी ही आसानी से मिल जाती है ‘गीता’ जो भारतीय धर्म और दर्शन का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है. 18वीं सदी के जर्मन भाषा विज्ञानी वॉन हम्बोल्ट ने पहली बार गीता का जर्मन में अनुवाद किया था. वे कहते थे “गीता किसी भी भाषा में लिखा सबसे मौलिक और प्रामाणिक ग्रन्थ है”.

महान जर्मन साहित्यकार गोएथे की रचनाओं में कालिदास की प्रेरणा देखने को मिलती है. जर्मन में क्लासिक पीरियड के प्रख्यात लेखक थे वोलगेंग गेटे. उनका प्रसिद्ध नाटक- फास्ट था. कालिदास की महान रचना- ‘अभिज्ञानशाकुंतलम’ से यह प्रभावित है. यह महान लेखक अभिज्ञानशाकुन्तलम् पर इतना मोहित हो गया कि गेटे ने एक कविता लिखी जिसमें कहा गया कि “अगर स्वर्ग और पृथ्वी को मिलाकर एक संसार बने तो उनका नाम ‘शकुंतला’ रखूंगा”.

होम्योपैथी का भारत में खासा प्रयोग होता है. इसकी जमीन भी जर्मनी है. सैमुअल हैनीमैन इसके जनक थे. इस चिकित्सा पद्धति की मूल अवधारणा भी आयुर्वेद से प्रभावित है. होम्योपैथी का ‘मदर टिंचर’ आयुर्वेद का अर्क ही तो है. सिन्ड्रेला और स्नो व्हाइट की जो कहानियाँ पढ़कर भारत के बच्चे बड़े होते हैं उनकी रचना भी जर्मन में ही हुई.

जर्मनी और भारत के सम्बन्धों की जड़ें दो अलग-अलग महाद्वीपों पर रहते हुए भी गहरे जुड़ी हैं. सभ्यताओं के विकास के क्रम में जब हम भारत के सांस्कृतिक फलक के आसपास देखते हैं तो जर्मनी हमें अपने बगल में दिखता है, अपना सा लगता है. इसलिए जर्मनी जाना दरअसल अपने ही किसी पुराने मंदिर में जाना था, जर्मनी में होना अपनी सहजताओं के बीच होना था. जर्मनी को देखना, अपने किसी पुराने परिचित को देखने जैसा था.

एक बात और थी. पढ़ते वक्त मैं डॉ लोहिया से बहुत प्रभावित था. डॉ साहब ने अपनी अकादमिक यात्रा अकबरपुर से जर्मनी तक की थी. डॉ. लोहिया की प्रारंभिक शिक्षा अपने गांव अकबरपुर (फैजाबाद) से हुई. अकबरपुर, बंबई, बनारस और फिर कोलकाता में पढ़ने के बाद डॉ राममनोहर लोहिया उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी गए. हालाकि जर्मनी से पहले वे 1929 में इंग्लैंड भी गए. वहां भारतीयों के साथ अंग्रेजों का दुर्व्यवहार लोहिया जी को रास नहीं आया और वह एक अंग्रेज मित्र की सलाह पर अर्थशास्त्र में डॉक्ट्रेट के लिए जर्मनी गए. डॉ. लोहिया ने जर्मनी के हंबोल्ट विश्वविद्यालय (जिसका नाम 1945 में बदलाकर Royal Friedrich Wilhelm University, Berlin हुआ. यहां डॉ साहब ने अर्थशास्त्र में पीएचडी के लिए नामांकन कराया. तब इस विश्वविद्यालय में विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टीन और जर्मन चिंतक शूमाकर भी प्राध्यापक हुआ करते थे.

उन दिनों बर्लिन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सोम्बर्ट की पहचान दुनिया के महान अर्थशास्त्री में होती थी. लोहिया जी उन्हीं के निर्देशन में पीएचडी करना चाहते थे. उन्होंने प्रोफेसर से मुलाकात की और अंग्रेजी में उनके सामने अपनी इच्छा व्यक्त की. लेकिन प्रोफेसर तो अपनी राष्ट्रीयता पर कट्टर थे. वे अपनी मातृभाषा जर्मन के अलावा किसी दूसरी भाषा में शिक्षा नहीं देते थे. लोहिया जी को जर्मन भाषा नहीं आती थी. जब प्रोफेसर को यह बात मालूम हुई तो वह बोले, ‘मैं आपको शिक्षा नहीं दे सकता क्योंकि मैं केवल जर्मन माध्यम में ही पढ़ाता हूं’. प्रोफेसर की बात सुनकर लोहिया जी उदास हो भारत लौट आए.

लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. भारत लौटने के बाद उन्होंने पूरी लगन से जर्मन भाषा सीखनी शुरू कर दी. कुछ समय बाद उनकी मेहनत और लगन रंग लाई. वह फर्राटेदार जर्मन भाषा बोलने लगे. जर्मन पढ़ना और लिखना भी वह सीख चुके थे. इसके बाद वह प्रोफेसर सोम्बर्ट के पास पहुंचे. वहां उन्होंने उनसे जर्मन भाषा में बात की. यह देखकर प्रोफेसर सोम्बर्ट भी दंग रह गए और उनकी पीएचडी उन्हीं की देखरेख में हुई. लोहिया का टॉपिक था- ‘नमक-कर, कानून और सत्याग्रह’.

तब जर्मन राजनीति में तानाशाह हिटलर के उत्थान का दौर था. जर्मनी की सोशल डेमोक्रेट और कम्युनिस्ट पार्टियां मिलकर भी हिटलर को नहीं रोक पा रही थीं. लोहिया का झुकाव सोशल डेमोक्रेट की ओर था. हालांकि कम्युनिस्ट भी उनके अच्छे मित्र थे. वहां रहकर लोहिया कभी-कभार हिटलर की सभाओं में भी चले जाते थे. एक नाजी ने उन्हें एक बार भारत में नाजी विचारों का प्रचार करने की सलाह दी थी. इसपर लोहिया ने जवाब दिया था कि जर्मनी के अलावा दूसरे किसी भी देश में वंश और जाति की श्रेष्ठता को मानने वाला दर्शन शायद ही स्वीकृत होगा”.

एक और दिलचस्प कथा. सन् 1933 में डॉक्टरेट की उपाधि पाने के बाद जब लोहिया अपनी किताबें बटोरकर जर्मनी से लौट रहे थे तो रास्ते में उनका सारा सामान चोरी हो गया. ऐसे में जब लोहिया मद्रास पहुंचे तो उनके पास एक भी पैसा नहीं था. तब वे ‘द हिंदू’ (अखबार) के कार्यालय पहुंचे और दो घंटे वहीं बैठकर ‘फ्यूचर ऑफ हिटलरिज्म’ शीर्षक से एक लेख लिखा, जिसके लिए उन्हें 25 रुपए मिले. इस तरह वे वहां से कलकता रवाना हुए.

मैं कथाओं का पिटारा खोलकर बैठा तो लेख लंबा हो जायगा शायद. वास्तव में कितना कुछ है बताने के लिए जो भारत और जर्मनी के बीच साझा है. इस साझेदारी का संदेश बड़ा है. ये संदेश है मानव विकास के क्रम की जड़ों के जुड़े होने का. ये संदेश है दूसरे में भी अपने को खोजने की, समानताओं को पा लेने की सामुदायिक जिज्ञासा का, ये संदेश है परस्पर सहयोग और साथ चलने की परंपरा का. जर्मनी से ढेर सारी अच्छी हवा और संदेश लेकर अब मैं वापस भारत आ गया हूं. मैं अकबरपुर नहीं, दिल्ली से चला था, लेकिन जर्मनी जाना ज़रूरी था. ऐतिहासिक रूप से जरूरी.

जय जय।

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