रेप केस प्रकरण में मथुरा के पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के घर फरारी नोटिस चस्‍पा

मथुरा के पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु पर एमबीए की एक छात्रा के साथ बलात्‍कार किये जाने के आरोप में कल पुलिस ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कोर्ट से सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही करा ली है। पुलिस ने कल ही उपमन्‍यु के घर पर उसकी फरारी संबंधी सूचना का नोटिस भी चस्‍पा कर दिया है। पीड़िता के अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार रेप के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के फरार हो जाने तथा पुलिस की गिरफ्त में न आने पर कल इस मामले की आई. ओ. महिला सब इंस्‍पेक्‍टर रीना ने संबंधित न्‍यायालय से सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही किये जाने की अनुमति लेकर आरोपी के घर उसका नोटिस चस्‍पा कर दिया।

इस प्रक्रिया के बाद भी यदि उपमन्‍यु पुलिस अथवा कोर्ट के समक्ष हाजिर नहीं होता है तो पुलिस उसे फरार मानते हुए सीआरपीसी की धारा 83 के तहत उसकी चल-अचल संपत्‍ति कुर्क करने का आदेश ले सकती है। सामान्‍य तौर पर 82 के बाद 83 की कार्यवाही करने के लिए पुलिस 30 दिन का समय लेती है किंतु यह समय निर्धारित नहीं है। यदि पुलिस को ऐसा लगता है कि आरोपी इस बीच में अपनी चल-अचल संपत्‍ति बेच सकता है तो वह 83 की कार्यवाही करने का आदेश कभी भी लेकर उसकी चल-अचल संपत्‍ति कुर्क कर सकती है। उल्‍लेखनीय है कि उपमन्‍यु के खिलाफ न्‍यायालय ने गैर जमानती वारंट (NBW) पहले से जारी किया हुआ है।

चूंकि यह मामला यूपी जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष, मथुरा की छावनी परिषद् के पूर्व उपाध्‍यक्ष का तमगा प्राप्‍त तथा अधिवक्‍ता सहित बसपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके एक प्रभावशाली पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से ताल्‍लुक रहता है लिहाजा तरह-तरह की अफवाहों का बाजार भी इस बीच गर्म है। पहले इस आशय की अफवाह उड़ी की भारी-भरकम रकम देकर उपमन्‍यु ने पीड़िता के परिवार से समझौता कर लिया है, और अब कल से एक नई अफवाह यह उड़ी कि इस मामले की तफ्तीश (जांच) को डीजीपी ने गैर जनपद (फिरोजाबाद) स्‍थानांतरित कर दिया है। हद तो तब हो गई जब तफ्तीश चेंज होने के संबंध में पुलिस महानिदेशक उत्‍तर प्रदेश के कार्यालय से जारी दर्शाया हुआ डीजीपी आनंद लाल बनर्जी के तथाकथित हस्‍ताक्षरयुक्‍त वाला एक पत्र भी सोशल मीडिया पर तैरने लगा।

आगरा परिक्षेत्र की पुलिस उपमहानिरीक्षक श्रीमती लक्ष्‍मी सिंह के नाम से संबोधित इस पत्र में लिखा है कि हनुमान नगर निवासी सेना के पूर्व सूबेदार त्रिभुवन उपमन्‍यु के संलग्‍न पत्र का अवलोकन करें जो माननीय मुख्‍यमंत्री के कार्यालय से मुकद्दमा अपराध संख्‍या 944/2014 धारा 376 व 506 के संबंध में प्रेषित है और निष्‍पक्ष विवेचना गुण-दोष के आधार पर जनपद फिरोजाबाद से कराये जाने के संबंध में है। पत्र में यह भी लिखा है कि उपरोक्‍त प्रकरण वादी के बताये गये तथ्‍यों के अनुसार संदिग्‍ध प्रतीत हो रहा है।

जांच स्‍थानांतरित करने के लिए जिन सज्‍जन पूर्व सूबेदार त्रिभुवन उपमन्‍यु के नाम का उल्‍लेख उक्‍त पत्र में किया गया है, बताया जाता है कि वह आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के सगे भाई हैं।
इस संबंध में जानकारी की गई तो पता लगा कि प्रथम तो प्रतिवादी पक्ष के किसी प्रार्थना पत्र पर जांच स्‍थानांतरित करने का कोई प्रावधान नहीं है और दूसरे इसी पत्र में यह भी लिखा है कि उपरोक्‍त प्रकरण वादी के बताये गये तथ्‍यों के अनुसार संदिग्‍ध प्रतीत हो रहा है जोकि पूरी तरह विरोधाभासी है क्‍योंकि इस मामले में पीड़िता खुद ‘वादी’ है। इस सबके अलावा पत्र में डीआईजी को उनके व्‍यक्‍तिगत नाम से संबोधित किया जाना, बिना जांच के ही एक संगीन अपराध को संदिग्‍ध बताया जाना तथा पत्र की तारीख 22 को काटकर हाथ से 18 किया जाना आदि तमाम ऐसे कारण हैं जो पत्र को किसी सुनियोजित साजिश का हिस्‍सा साबित करते हैं।

हालांकि इस पत्र के आधार पर कल पूरे दिन अफवाहों का बाजार तो गर्म रहा ही, साथ ही यह दावा करने वालों की भी खासी संख्‍या सामने आती रही जिन्‍होंने कहा कि उनकी डीआईजी से बात हो चुकी है और उन्‍होंने जांच फिरोजाबाद स्‍थानांतरित किये जाने की पुष्‍टि कर दी है। इतना सब-कुछ हो जाने तथा सोशल मीडिया पर भी प्रसारित होने के बावजूद आश्‍चर्यजनक रूप से पुलिस इस मामले में चुप्‍पी साधे रही जबकि यह एक संगीन साइबर क्राइम की श्रेणी में आता है।

इस तरह पुलिस विभाग के गोपनीय पत्र का मजमून तैयार करके उसे प्रसारित करना तथा उसके लिए प्रदेश के डीजीपी कार्यालय तथा डीजीपी के नाम व हस्‍ताक्षरों का इस्‍तेमाल करना अपने आप में बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है परंतु पुलिस ने ऐसा करने वाले का पता तक लगाना जरूरी नहीं समझा। यहां एक सवाल यह है कि यदि इस पत्र में किसी प्रकार की कोई सत्‍यता है तो भी पुलिस का एक विभागीय गोपनीय पत्र आखिर कैसे सार्वजनिक हुआ और कैसे वह सोशल मीडिया का हिस्‍सा बन गया।

यूं तो इस रेप केस को लेकर पुलिस के कुछ आला अधिकारियों का रवैया शुरू से काफी लचीला रहा है परंतु अब ऐसे किसी पत्र को प्रसारित करने के मामले में भी पूरी तरह उदासीन बने रहना साइबर क्राइम को बढ़ावा देने से कम नहीं माना जा सकता। जो भी हो, अब देखना यह है कि पुलिस इस मामले में आरोपी पत्रकार को गिरफ्त में ले पाती है अथवा ऐसी तरह-तरह की अफवाहों के बीच उसे कोर्ट में सरेंडर करने का मौका देती है ताकि सांप मर जाए और लाठी भी सही सलामत रहे।

(साभार- लीजेण्‍ड न्‍यूज़)

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