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सुख-दुख

मेरे समय UPSC टॉप करने वाले एक सीनियर छात्र थे, यूपी कैडर के, उनका आखिरी समय जेल में बीता!

सुमंत भट्टाचार्य-

कल UPSC का अंतिम रिजल्ट आया। खूब हंगामा हुआ, खासकर हिंदी पट्टी में। क्योंकि दक्षिण, बंगाल, गुजरात या पूर्वोत्तर भारत के युवाओं में IAS/IPS को लेकर इतना जुनून मुझे कभी दिखाई नहीं दिया।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय और फिर जनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस, आउटलुक में रहने के बाद इन अफसरों की वास्तविक हैसियत समझ में आई। एक समय था कि भारत भर में यदि 850 अंतिम चयन होते थे तो उनमें से 250 से 300 हमारे बीच पढ़े छात्र होते थे। मेरे साथ के भी कई लोग UPSC टॉपर रहे। फिर पत्रकारिता में रहते हुए कैबिनेट सेक्रेटरी से लेकर भारत के चीफ जस्टिस और तमाम अफसरों को पावर कॉरिडोर में बहुत करीब से देखा। यकीन मानिए, उनकी हैसियत अक्सर एक व्हाइट कॉलर क्लर्क से ज्यादा नहीं होती।

मेरे समय UPSC टॉप करने वाले एक सीनियर छात्र थे, यूपी कैडर के। उनका अंत क्या हुआ? आखिरी समय जेल में बीता। जब उनका चयन हुआ था तो वे हमारे विश्वविद्यालय के नायक थे। मेरे साथ पढ़ने वाले एक छात्र ने सेकंड पोजिशन हासिल की थी। वह भी उत्तर प्रदेश कैडर का था। आज पता नहीं वह कहां गुमनामी में पड़ा होगा। मुझे खुद उसकी कोई खबर नहीं।

एक कहानी और भी रहती है—प्रतियोगी परीक्षाओं में चयन से वंचित रह जाने वाले छात्रों की अनसुनी कहानी। इनकी संख्या सफल छात्रों से कई गुना ज्यादा होती है। कहां जाते हैं ये असफल छात्र? कहां जाकर खपते हैं ये? जीवन के तीस–पैंतीस वर्ष की उम्र एक कमरे में गुजारने के बाद इनके पास क्या बचता है? क्या कभी इन अनकही कहानियों को सुना है? अगर सुना भी है तो क्या समझने या महसूस करने की कोशिश की है? शायद नहीं की होगी, क्योंकि इस दुनिया में असफल लोगों को कौन याद रखता है।

अफसरों की इबादत का हिंदी पट्टी में इतना प्रकोप कई दिशाओं की ओर संकेत करता है। एक कारण यह है कि लंबे समय से हिंदी पट्टी में बौद्धिक, साहित्यकार, रंगकर्मी, कलाधर्मी या खेल मैदान से कोई ऐसा नायक पैदा नहीं हो रहा है, जो समाज के सामने एक वैकल्पिक आदर्श बन सके। चारों ओर जैसे एक तरह का सन्नाटा पसरा हुआ है।

दूसरा कारण यह है कि सारा नायकत्व ब्यूरोक्रेसी और राजनेताओं तक सिमट कर रह गया है। स्थिति यह है कि राज्यसभा भेजे जाने वालों में सृजन क्षेत्र से एक भी चेहरा नजर नहीं आता। राज्यसभा में भेजे जाने वाले अधिकांश चेहरे या तो रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट होते हैं या फिर किसी राजनेता के रिश्तेदार।

इसका एक और आयाम दलाली की संस्कृति भी है। दलाली के धंधे को हमेशा राज्याश्रय की जरूरत होती है और इस आश्रय के लिए ब्यूरोक्रेट्स और राजनेताओं के अलावा कोई तीसरा विकल्प दिखाई नहीं देता।

यह कोई छोटा-मोटा संकट नहीं है। इसका असर सोशल मीडिया से लेकर समाज के हर क्षेत्र में साफ दिखाई देता है। ऐसा कोई स्पेस बचा ही नहीं है, जहां भावी पीढ़ी या युवा अपनी मौलिकता के साथ कोई नया नायकत्व स्थापित कर सके। सोशल मीडिया पर भी वही लोग प्रभावशाली बन रहे हैं जो राजनीतिक हंगामों में माहिर हैं। प्रकृति, खेती-किसानी, नृत्य, संगीत, भाषा या किसी अन्य रचनात्मक क्षेत्र में लिखने-बोलने वाले लोग नाममात्र के हैं और उनके अनुयायी भी बहुत कम हैं।

मेरा उद्देश्य यहां किसी की कमी या अधिकता बताना नहीं है। सवाल सिर्फ इतना है कि राजसत्ता के संघर्ष का दायरा क्या केवल राजनेताओं और ब्यूरोक्रेट्स तक सीमित है, या फिर इसमें व्यापक समाज की भी कोई भूमिका है। इसका निर्णय आपको स्वयं करना है।

UPSCResult2025 : आईएएस आईपीएस आईआरएस के लिए चयनित नौजवानों को भ्रष्ट मंत्रियों के संरक्षण में काम करना होगा। खुद भी करोड़ों अरबों बटोरेंगे। अफसरी के ज़रिए खूब कमाई का लाइसेंस मिलने की बधाई!

-यशवंत सिंह

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