इसी तरह गुजरात में ‘सीएम नरेंद्र मोदी’ को खत लिखकर एक और किसान ने की थी आत्महत्या

दौसा के किसान गजेन्द्र की आत्महत्या पर सभी दल अब अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने लगे हैं लेकिन ऐसे कई गजेन्द्र गुजरात में भी हैं. गुजरात के जामनगर जिले के कल्य़ाणपुरा तालुका के छिजवड़ गांव के अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा  ने भी ठीक गजेन्द्र की ही तरह 4 अक्टूबर 2012 को नरेन्द्र मोदी के नाम पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली थी. उस समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 

उसी अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा का परिवार आज दाने-दाने को मोहताज है. उस गरीब किसान ने अपने पत्र में गुजराती भाषा में लिखा था कि 2005 से 2012 तक उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला। उसके परिवार में छह सदस्य हैं। वह उनका भरण-पोषण कैसे करे? उसने मोदी को लिखा था कि आप गरीब कल्याण मेले पर बहुत खर्च करते हैं लेकिन किसानों पर नहीं? ताज्जुब की बात यह है कि उस समय विपक्षी दल कांग्रेस ने गुजरात में कुछ किसानों को एक एक लाख की राशि बांटी लेकिन अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के परिवार को उसने भी कोई मुआवजा नहीं दिया. गुजरात के किसान भी आंदोलन के मूड में हैं। अपनी इस लड़ाई को लेकर अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए हैं और अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के पत्र को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी दलील के रुप में रखा है. उनकी यह लड़ाई भरतसिंह झाला के नेतृत्व में बनी ‘क्रांति’ नाम की गैरस्वैच्छिक संस्था लड़ रही है.

झाला कहते हैं कि नर्मदा नदी को मोदी ने नर्मदे सर्वदे कहा था लेकिन अब जहां नर्मदा नदी का पानी जा रहा है, वहां की जमीन लेने का जुगाड़ किया जा रहा है. क्योंकि किसानों के लिए छोटी केनाल तो बनी नहीं, इसीलिए किसान को बड़ी केनाल से पानी लेने के लिए हर रोज एक हजार का खर्च आता है. वे कहते हैं कि मुंद्रा पोर्ट और जामनगर की कृषि आधारित जमीन तो किसानों को जबरन मार-मारकर अंबानी और अडानी बंधुओं को दे दी गई. धोलेरा जहां स्मार्ट सिटी का मोदी का सपना है, वहां के बावलयारी गांव के लोग अपनी जमीन के लिए अब भी संघर्ष कर रहे हैं. 

विधानसभा से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मोदी ने उद्योगपतियों को टैक्स में छूट देकर 4000 करोड़ का फायदा पहुंचाया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2005 में आई बाढ़ में गुजरात के19 जिलों में 35 लाख किसानों की जमीन बंजर हो गई. उस समय पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी ने 189 करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन 35 लाख के सामने मात्र 2 लाख किसानों को ही मुआवजा मिला, वो भी गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर दिया गया. लेकिन वह भी एक हेक्टर पर किसी को बीज की स्थिति पर 250 रु का मुआवजा और बंजर जमीन होने पर किसी किसान को 2000रु. का मुआवजा दिया गया. 

2012 में अकाल जैसी स्थिति आई, जिसमें जून 2012 से अक्टूबर में 52 किसानों ने आत्महत्या कर ली. लेकिन कोई मुआवजा नहीं दिया गया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुल मिलाकर अब तक गुजरात में 6055 किसान आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन सरकार इन किसानों को दुर्घटना या बीमारी मानकर पल्ला झाड़ रही है लेकिन सरकार की यह पालिसी है कि दुर्घटना में किसान को एक लाख का मुआवजा दिया जाता है लेकिन सरकार ने अभी मात्र 2000 किसानों को ही मुआवजा दिया है, सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि तो क्या 4055 किसानों ने आत्महत्या की? गुजरात विधानसभा में बताया गया है कि 2013 से 2018 में गुजरात में 89 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. झाला का कहना है कि अभी जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया जा रहा. वे कहते हैं कि 2007 में सोनिया गांधी से मिले थे लेकिन उन्होंने भी मात्र आश्वासन ही दिए. 

लेखिका उषा चांदना से संपर्क 09327012338 या ushachandna55@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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