संजय शर्मा का ‘वीकएंड टाइम्स’ पहुंचा उत्तराखंड, सीएम ने अपने आवास पर किया विमोचन

लखनऊ के चर्चित पत्रकार संजय शर्मा का नया पड़ाव देहरादून है. यूपी के लखनऊ से वीकएंड टाइम्स का प्रकाशन करने और इसे सफलता पूर्वक स्थापित करने के बाद उन्होंने अखबार का उत्तराखंड एडिशन लांच कर दिया है. वीकएंड टाइम्स उत्तराखंड एडिशन की लांचिंग देहरादून में मुख्यमंत्री निवास पर आयोजित एक भव्य समारोह में हुआ. इस समारोह में खुद सीएम हरीश रावत ने अखबार को अपने हाथों लांच किया.

इस मौके पर कई वरिष्ठ पत्रकार, नेता, मंत्री, अफसर आदि मौजूद थे. इस कार्यक्रम का पूरा विवरण संजय शर्मा के एक अन्य अखबार 4पीएम, जो कि लखनऊ से प्रकाशित प्रतिष्ठित सांध्य दैनिक है, में विस्तार से प्रकाशित किया गया है. नीचे दिए गए दो लिंक पर क्लिक करके आप वीकएंड टाइम्स के उत्तराखंड संस्करण की लांचिंग समारोह से संबंधित पूरी विस्तृत खबर पढ़ सकते हैं :

UK Edition Launch News One

UK Edition Launch News Two

कार्यक्रम का प्रसारण ईटीवी पर भी किया गया. संबंधित वीडियो देखने के लिए नीचे क्लिक करें :

ETV par Prasaran

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कौन होगा यूपी भाजपा में सीएम पद का चेहरा, कई नाम खारिज तो कई नाम चर्चा में

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश फिर से चुनावी मुहाने पर खड़ा है। राजनीति के गलियारों से लेकर गॉव की चौपालों , शहरों के नुक्कड़ों तक पर हर कोई यही सवाल  पूछ रहा है कि कौन होगा यूपी का अगला सीएम। सीएम की दौड़ में कुछ पुराने चेहरे हैं तो कुछ नये चेहरों को भी सीएम पद का संभावित दावेदार समझा जा रहा है। सपा की तरफ से अखिलेश यादव और बसपा की ओर से मायावती की दावेदारी तो पक्की है ही। इसलिये सपा और बसपा में कहीं कोई उतावलापन नहीं है। चुनौती है तो भाजपा और कांग्रेस के सामने। इसमें भी बीजेपी की स्थिति काफी सोचनीय है। सीएम की कुर्सी के लिये भाजपा के संभावित दावेदारों में कई नाम शामिल हैं। दोंनो ही दलों ने अभी तक सीएम उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।

कांग्रेस तो शायद ही सीएम उम्मीदवार के नाम की घोषणा करे, लेकिन भाजपा के बारे में कयास लगाया जा रहा है कि असम के नतीजों से उत्साहित बीजेपी आलाकमान इलाहाबाद में 12-13 जून को होने वाली कार्यसमिति की बैठक में यूपी के लिये सीएम का चेहरा सामने ला सकती है। बीजेपी की तरफ से करीब आधा दर्जन नेताओं के नाम बतौर सीएम उम्मीदवार चर्चा में हैं,लेकिन अंतिम फैसला पीएम मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को ही लेना है। इतना तय है कि भाजपा किसी विवादित छवि वाले नेता को सीएम के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करेगी। इस बात का भी ध्यान रखा जायेगा कि सीएम की दौड़ में कोई ऐसा नेता भी आगे न किया जाये जिसके चलते एक वर्ग विशेष के वोटर बीजेपी के खिलाफ लामबंद हो जायें। हॉ, दिल्ली से सबक लेकर आलाकमान पार्टी से बाहर का कोई चेहरा सामने नहीं लायेगी।

भाजपा 14 वर्षो के अम्बे अंतराल के बाद पहली बार यूपी के विधान सभा चुनावों को लेकर उत्साहित दिखाई दे रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले तक गुटबाजी और टांग खिंचाई में जुटे प्रदेश नेताओं पर जब से दिल्ली आलाकमान की मजबूत पकड़ हुई है तब से हालात काफी बदल गये है। बीजेपी के प्रदेश नेताओं की हठधर्मी पर लगाम लगा दी गई है। सारे फैसले अब दिल्ली से लिये जा रहे हैं। बात-बात पर लड़ने वाले यूपी के नेतागण दिल्ली के फैसलों के खिलाफ चूं भी नहीं कर पाते हैं। आलाकमान प्रदेश स्तर के नेताओं की एक-एक गतिविधि पर नजर जमाये रहता है। कौन क्या कर रहा है। पल-पल की जानकारी दिल्ली पहुंच जाती है।असम क तरह यूपी में भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) विधान सभा चुनाव के लिये सियासी जमीन तैयार करने में जुटा है। बीजेपी नेताओं को इसी जमीन पर चुनावी फसल उगानी और काटनी होगी।

बात 2012 के विधान सभा चुनाव की कि जाये तो उस समय समाजवादी पार्टी को 29.13, बीएसपी को 25.91,बीजेपी को 15 और कांग्रेस को 11.65 प्रतिशत वोट मिले थे। इन वोटों के सहारे समाजवादी पार्टी 224, बसपा 80, भाजपा 47 और कांग्रेस 28 सीटों पर जीतने में सफल रही थी। दो वर्ष बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में स्थिति काफी बदल गई। मोदी लहर में सपा-बसपा और कांग्रेस सब उड़ गये। विधान सभा चुनाव के मुकाबले बीजेपी के वोट प्रतिशत में 27 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ और उसको 42.63 प्रतिशत वोट मिले। वहीं सपा के वोटों में करीब 07 प्रतिशत और बीएसपी के वोटों में 06 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। कांग्रेस की स्थिति तो और भी बदत्तर रही। उसे 2012 के विधान सभा में मिले 11.65 प्रतिशत वोटों के मुकाबले मात्र 7.58 प्रतिशत वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। वोट प्रतिशत में आये बदलाव  के कारण बसपा का खाता नहीं खुला वहीं समाजवादी पार्टी 05 और कांग्रेस 02 सीटों पर सिमट गई थी। बीजेपी गठबंबधन के खाते में 73 सींटे आईं जिसमें 71 बीजेपी की थीं और 02 सीटें उसकी सहयोगी अपना दल की थीं। इसी के बाद से बीजेपी के हौसले बुलंद हैं और वह यूपी में सत्ता हासिल करने का सपना देखने लगी है।

पहले तो बीजेपी आलाकमान मोदी के चेहरे को आगे करके यूपी फतह करने का मन बना रहे थे,परंतु बिहार के जख्मों ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया और असम की जीत ने बीजेपी को आगे का रास्ता दिखाया। यह तय माना जा रहा है कि यूपी चुनाव में मोदी का उपयोग जरूरत से अधिक नहीं किया जायेगा। इसकी जगह स्थानीय नेताओं को महत्व दिया जायेगा। असम में सीएम का चेहरा प्रोजक्ट करके मैदान मारने और यूपी में भी इसी तर्ज पर आगे बढ़ने की बीजेपी आलाकमान की मंशा को भांप कर यूपी बीजेपी नेताओं के बीच यह चर्चा शुरू हों गई कि पार्टी किसे मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करेगी। कई नाम सामने भी आयेे हैं। मगर आलाकमान फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। उसे डर भी सता रहा है कि जिसको सीएम प्रत्याशी घोषित नहीं किया जायेगा वह विजय अभियान में रोड़ा बन सकता है। पार्टी के भीतर मौजूद तमाम तरह के सियासी समीकरण भाजपा नेतृत्व को इस मामले में आगे बढ़ने से रोक रहे हैं तो आलाकमान की बाहरी चिंता यह है कि वह चाहता है कि सीएम उम्मीदवार का चेहरा ऐसा होना चाहिए जो बसपा सुप्रीमो मायावती,सपा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से 19 न हो,लेकिन यूपी की सियासत में ऐसा कोई चेहरा दिख नहीं रहा है। यूपी में जो दमदार चेहरे से उसमे से कुछ उम्र दराज हो गये हैं तो कुछ दिल्ली की सियासत छोड़कर यूपी के दंगल में कूदने को तैयार नहीं हैं। बीजेपी की तरफ से जब सीएम का चेहरा आगे करने की बात सोची जाती है तो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह का नाम सबसे पहले दिमाग में आता है। परंतु कल्याण सिंह के सक्रिय राजनीति से कट जाने और राजनाथ के मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत पर होने के कारण यूपी वापस आने की संभावनाएं बिल्कुल खत्म हो जाती हैं। मोदी सरकार के और और मंत्री कलराज मिश्र भी दिल्ली छोड़कर यूपी नहीं आना चाह रहे हैं। इसके बाद जो नाम बचते हैं उनको लेकर नेतृत्व के भीतर ही असमंजस है।

अतीत में भाजपा के यह नेता किस तरह से सिरफुटव्वल करते रहे हैं किसी से छिपा नहीं है। भाजपा के दिग्गज नेता और मोदी सरकार में मंत्री कलराज मिश्र तो 2002 में सार्वजिनक रूप से कह चुके हैं कि भाजपा के कुछ बड़े नेताओं में अब दूसरे की टांग खींचने की प्रवृत्ति काफी बढ़ गई है। ऐसी सोच रखने वाले कलराज अकेले नहीं हैं।  कौन होगा बीजेपी का मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार के  सवाल पर भाजपा के कई प्रमुख नेता कहते हैं कि यूपी के चुनावी समर में भाजपा का मुकाबला बसपा नेत्री मायावती व सपा प्रमुख मुलायम सिंह और उनके पुत्र तथा मौजूदा सीएम अखिलेश यादव जैसे चेहरों से होगा, जिनका अपना जातीय वोट आधार है। भाजपा के पास इन चेहरों का जवाब यूपी में कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह कलराज मिश्र जैसे चेहरे ही हो सकते थे पर, तीनों इस समय दूसरी भूमिका छोड़कर उत्तर प्रदेश की चुनौती स्वीकर करने के लिये तब तक राजी नहीं होंगे जब तक कि आलाकमान उन पर दबाव नहीं बनायेगा (जो मुश्किल लगता है।)

बाकी जो नाम चर्चा में है उनमें उत्तर प्रदेश से संबंधित नामों में कोई ऐसा नहीं है जो अपनी छवि और पकड़ की बदौलत भाजपा की नैया पार लगा सके। स्मृति ईरानी जैसे बाहर के नेताओं का नाम भी सीएम के लिये चर्चा में है, लेकिन उन्हें आगे लाने के लिये भाजपा नेतृत्व को पहले यूपी के प्रमुख नेताओं के बीच उनके नाम पर सहमति बनानी होगी। आज की तारीख में भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में जो नाम चर्चा में हैं उसके साथ न तो मोदी जैसी उपलब्धियां जुड़ी हैं और न उसकी कोई पहचान ही हैं। ऐसे किसी नाम पर आलाकमान सहमति की मोहर लगा देता है तो संभावना इस बात की भी है कि यूपी के अन्य प्रमुख नेता कहीं हाथ पर हाथ रखकर बैठ न जाये। शायद यही वजह है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को कहना पड़ रहा है कि असम के प्रयोग को यूपी में दोहरानें के बारे में  उन्होनें अभी कुछ तय नहीं किया है। फिर भी जिन नामों की चर्चा चल रही है उनके बारे में जान लेना भी जरूरी है।

सबसे पहला नाम मौजूदा केन्द्रीय गृह मंत्री और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह का आता है। कार्यकर्ताओं के लिए हमेशा घर के दरवाजें खुले रखने और लगातार संपर्क व संवाद रखने के कारण प्रदेश के कार्यकर्ताओं में राजनाथ सिंह की स्वीकार्यता है। उनमें प्रशासनिक क्षमता भी है। उनकें चेहरे को आगे करके चुनाव लड़ने से भाजपा को लाभ भी हो सकता हैं। राजनाथ के सहारे भाजपा सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट का हवाला देकर अगड़ों, अति पिछड़ों व अति दलितो को भी अपने पक्ष में मोड़ सकती है। अल्पसंख्यकों के बीच भी उनकी अ़च्छी छवि है। पर यह तभी संभव है जब राजनाथ खुद इस भूमिका के लिए तैयार हों।

केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी का भी नाम चर्चा में है,लेकिन उनका यूपी से बस इतना ही नाता है कि वह 2014 में अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ी थीं और इसके बाद स वह अमेठी में लगातार सक्रिय हैं। स्मृति पर पीएम मोदी को काफी भरोसा है। लोकसभा व राज्यसभा में कई मुद्द्ों पर उन्होंने विपक्ष पर ंजिस तरह तर्कों के साथ हमला बोला और इसके अलावा अमेठी में लोकसभा चुनाव हारने के बावजूद उन्होनें जिस प्रकार से अपने निर्वाचन क्षेत्र से नाता जोड़कर रखा उससे यूपी में स्मृति ईरानी की लोकप्रियता बढ़ी हैै। लोग मान रहे हैं कि प्रदेश में मायावती जैसी नेत्री से मुकाबला करने के लिए ईरानी का प्रयोग ठीक रहेगा। इससे भाजपा महिलाओं के बीच पकड़ व पैठ बना सकेगी।

भाजपा का एक वर्ग वरूण गांधी में मुख्यमंत्री बनने की संभावना और क्षमता तलाश रहा है। एक तो गांधी परिवार की पृष्ठभूमि और दूसरे हिंदुत्व पर आक्रामक भाषा, लोगों को लगता है कि वरूण को आगे लाने से पार्टी कोे चुनाव में लाभ हो सकता है। वरूण को आगे करने से भाजपा को उस वोट का लाभ मिल सकता है जो चेहरा और माहौल देखकर वोट डालने का आदि है। पर वरूण को लेकर पार्टी के भीतर हिचकिचाहट भी है कि वह  पार्टी के साथ तालमेल बैठाकर कितना काम करेंगे। लोकसभा चुनाव के समय वरूण गांधी अन्य नेताओं से इत्तर मोदी से दूरी बनाकर चले थे,जिस पर काफी चर्चा भी हुई थी। आज भी वरूण गांधी पीएम मोदी की गुड लिस्ट में नहीं हैं।

भाजपा अगर वोंटों के ध्रवीकरण के सहारे चुनाव मैदान में उतरना चाहेगी तो मंहत आदित्यनाथ भी एक चेहरा हो सकते हैं। आदित्यनाथ की एक तो हिंदुत्ववादी छवि है। साथ ही उन्होनें पिछले कुछ वर्षो से पूर्वांचल में मल्लाह, निषाद, कोछी, कुर्मी, कुम्हार, तेली जैसी अति पिछड़ी जातियों और धानुक,पासी, वाल्मीकी जैसी तमाम अति दलित जातियों में पकड़ मजबूत की है। पर भाजपा में इस बात को लेकर असमंजस है कि उन्हें सीएम का चेहरा घोषित करने से मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण न हो जाए। यही समस्या वरूण गांधी के साथ भी है। 2009 के लोकसभा चुनाव के समय पीलीभीत में दिया गया उनका विवादित भाषण आज भी मुस्लिमों की जुबान पर रहता है।

अगर भाजपा किसी अगड़े और उसमें भी किसी ब्राहमण चेहरे को सीएम का प्रत्याशी घोषित करना चाहेगी तो डा0 दिनेश शर्मा और कलराज मिश्र का नाम सबसे आगे हो सकता है। दिनेश शर्मा दो कार्यकाल से राजंधानी के महापौर है। भाजपा के सांगठनिक ढांचे में भी कई पदों पर काम कर चुके है। इस समय पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है। आम लोगों के बीच उनकी छवि व साख ठीक-ठाक है। सरल हैं और लोगों को आसानी से उपलब्ध भी है। प्रदेश भर के कार्यकर्ताओं से भी उनका संपर्क व संवाद है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रिय लोगों में शुमार होते हैं। डॉ. दिनेश शर्मा का नाम भी बतौर भावी मुख्यमंत्री उम्मीदवार चर्चा में शमिल रहा हैं। पर, सूबे का जातीय गणित उनके लिये पूरी तरह से अनुकूल नहीं बैठ रहा है। बात कलराज मिश्र की कि जाये तो वह प्रदेश में लंबे समय तक संगठन का नेतृत्व कर चुके है। लखनऊ के विधायक रह चुके हैं। सरलता और कार्यकर्ताओं से सतत संवाद व संपर्क के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं में लोकप्रिय भी है। उनका चेहरा आगे करके चुनाव लड़ने से भी भाजपा को फायदा हो सकता है।

लब्बोलुआब यह है कि भाजपा आलाकमान को यूपी का सीएम प्रत्यााशी घोषित करने में पहाड़ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। उसके हाथ बंधे होंगे,लेकिन दिमाग खुला रखना होगा। प्रदेश भाजपा में ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो चुनाव जीतने की कूबत भले न रखते हों लेकिन किसी को चुनाव हराने में इन्हें महारथ हासिल है। यह नजारा अतीत में कई बार देखने को मिल भी चुका है।

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उनसे संपर्क उनके मोबाइल नंबर 9335566111 के जरिए किया जा सकता है.

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स्टिंग की सीडी से दलालों ने कमाए करोड़ों, सबक सिखाएंगे सीएम रावत

उत्तरांचल : चर्चाओं के अनुसार मुख्यमंत्री  हरीश रावत के तख्ता पलट के लिए करोड़ों के नोट बिछाये गए. कथित सीडी का करोड़ों में सौदा किया गया, सौदा करने वाला एक पुराना भूमाफिया और  दलाल है। ये दलाल अब ब्लैकमेलिंग करके बिल्डर बन गया है। इस दलाल ने कई नेताओं और अधिकारियों का भी स्टिंग किया हुआ है। ये विवादास्पद दलाल कई अनैतिक धंधों में भी शामिल है। इस दलाल ने ही पत्रकार अशोक पाण्डेय की बेरोजगारी का फायदा उठाया और भाजपा तक पहुँचाने में पाण्डेय को मोहरा बनाया।

चर्चाओं के अनुसार इस प्रकरण में स्टिंगबाजों ने दिल्ली में एक राजनैतिक दल से करोड़ों में इस लिए सौदा किया कि वह उत्तराखण्ड सरकार को अस्थिर कर सके। इस मामले में राज्य पुलिस व इंटेलिजेन्स विभाग को टेलीफोन काल की जो डिटेल मिली है वह बेहद चौंकाने वाली बतायी गयी है।

चर्चाएं आम हैं कि राज्य में स्टिंगबाजों को यह पता नहीं था कि यह स्टिंग आपरेशन उनके लिए छप्पर फाड़ कमाई दे सकता है। मामला जब स्टिंगबाज से अब से पूर्व किये गये कई और स्टिंग के सरगने तक पहुंचा तो इस स्टिंग की कीमत हजारों से करोड़ों में जा पहुंची। स्टिंग के हाथ में आ जाने के बाद स्टिंगबाज ने इस स्टिंग के पीछे उसने राज्य सरकार में फंसी अपनी व अपने कुछ और सथियों की फाईलों (जिसमें कई जमीन से जुड़े मामले सहित कई लाइसेंस व परमिट) को क्लीयर करवाने के लिए भी दबाव बनाया लेकिन राज्य सरकार में शामिल लोगों ने जब स्टिंगबाजों की असलियत भांपी तो उन्होने हाथ पीछे खींच लिए।

चर्चाओं के अनुसार ये दलाल जमीन कब्जाने  में शामिल रहता है, और कुछ  नेताओ और अधिकारियों को सभी प्रकार की सुविधा भी देता है, चर्चाओं के अनुसार सौदा न बनता देख स्टिंगबाजों ने दिल्ली में एक राजनीतिक दल के कुछ लोगों से सम्पर्क साधा और उत्तराखण्ड की सरकार को अस्थिर करने के हथियार के रूप में इस स्टिंग को बेचने का सौदा कर डाला। चर्चाओं के अनुसार यह सौदा करोड़ों में किया गया जिसके एवज में कुछ रूपये स्टिंग को सार्वजनिक करने वाले को दिये गये जबकि जिसने स्टिंग किया उसे मात्र कुछ ही रूपये देकर टरका दिया गया। चर्चाओं के अनुसार जबकि इस सौदे की 80 फीसदी रकम स्टिंगबाज ने अपने पास रख ली।

ख़ुफ़िया विभाग के सूत्रों ने भी मुख्यमंत्री को कई खास सुराग़ दिए है,सरकार के एक विभीषण  का भी पता चल गया है पता चला है की सरकार का एक मंत्री भी उन दिनों दिल्ली गया हुआ था और स्टिंग बाजों  की पूरी मदद कर रहा था,  ये मंत्री लम्बे समय से हरीश रावत का तख्ता पलट करना चाहता है, इस मंत्री ने ही पत्रकार पाण्डेय की प्रेस कांफ्रेंस का जाल बुना,चर्चाओं के अनुसार  दलालों ने भाजपा के बड़े नेताओं को समझाया की स्टिंग के बाद सरकार गिर जाएगी, लेकिन अब भाजपा की भी समझ में आ गया की उनका दांव  उल्टा हो गया , दलाल भाजपा को भी मोहरा बनाने में सफल रहे , भाजपा  के कई नेता दबी जुबान से मान रहे हैं कि वो भी दलालों की साजिस में फंस गयी है,

चर्चाओं के अनुसार गत दिवस पत्रकार पाण्डेय के शौपिंग काम्प्लेक्स तोड़े जाने से दलाल व भूमाफिया डरे हुए हैं, कुछ दलाल मुख्यमंत्री से माफ़ी भी मांगना चाहते हैं, लेकिन रावत किसी को भी माफ़ करने के मूड में नहीं है, मुख्यमंत्री का कहना है की वो दलालों को सबक सीखा कर रहेंगे, पत्रकार बिरादरी भी दलालों  की  साजिश  को पहचान गयी है, और सोशल मीडिया में भी दलालों के खिलाफ जमकर भड़ास निकाल  रहे हैं, ईमानदारी से काम करने वाली 100 प्रतिशत पत्रकार स्टिंगबाजो के विरोध में है, और ऐसे दलालों  को उत्तराखंड से खदेड़ने पर जोर दे रहे हैं, पत्रकार पाण्डेय कैसे इन दलालों के चंगुल में फंस गए ये भी चर्चा का मुद्दा  बना हुआ है

लेखक एवं पत्रकार राजेंद्र जोशी से संपर्क : rajendrajoshi.uk@gmail.com

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मुख्यमंत्री के पीए का स्टिंग करने वाले अशोक पांडेय को भी तो जानिए

मैं यह नहीं कहता कि अशोक पांडेय ने जो स्टिंग किया वह फर्जी है, लेकिन लोगों को यह जानना भी बेहद जरूरी है कि आखिर अशोक पांडेय हैं कौन। मूलतः उत्तर प्रदेश उन्नाव के रहने वाले अशोक पांडेय ने कुछ साल पहले ही उन्नाव में नया प्राइवेट डिग्री कालेज खोला था। तब पांडेय जी समाचार पत्र दैनिक हिन्दुस्तान की कानपुर यूनिट में स्थानीय सम्पादक थे। मुझे नहीं मालूम कि एक डिग्री कालेज खोलने में कितनी लागत लगती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या एक पत्रकार अपनी पत्रकारिता की कमाई से डिग्री कालेज खोल सकता है…। खैर आगे बढ़ते हैं। 

उत्तरांचल पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़े हुए पत्रकार अशोक पांडेय

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में अशोक पांडेय का रामादेवी चौराहे के पास पुश्तैनी मकान है। एक अन्य मकान भी छावनी इलाके में है। इसके साथ ही उनका खुद का बनवाया मकान देहरादून में है। यहां की जमीन इत्यादि तब उन्होंने हासिल की, जब वे दैनिक जागरण अखबार में सम्पादक थे। आपको एक बात और बता दूं  कि सन 2009 में जब अशोक पांडेय दैनिक हिंदुस्तान कानपुर के सम्पादक थे, तब उन्हीं के कारखास ने मुझे बताया था कि पांडेय जी बहुत चलते-पुर्जे हैं। वो आम  सम्पादक नहीं है। और उनका देहरादून वाला मकान ही करीब एक करोड़ रुपये की लागत से बना है। 

हालांकि आपको यह भी बता दूं  कि दैनिक हिन्दुस्तान कानपुर आने से पहले अशोक पांडेय अमर उजाला की लखनऊ यूनिट में स्थानीय सम्पादक थे। उस वक्त अमर उजाला में ग्रुप एडिटर शशिशेखर का बोलबाला था और अशोक पांडेय शशिशेखर के बहुत खास लोगों में से थे। क्योंकि शशि जी को ऐसे ही आदमी बहुत पसंद आते हैं।  इस पसंद एक बड़ी वजह यह भी थी कि 2007 में अमर उजाला की लखनऊ इकाई की लांचिंग हुई थी और पहले स्थानीय सम्पादक अशोक पांडेय ही बनाये गये थे। इस लांचिंग की सारी बाधाओं को  अशोक पांडेय ने मुख्यमंत्री कार्यालय तक अपनी पहुंच के बूते दूर करा दी थीं। ऐसे में अमर उजाला के मालिक की निगाहों में ग्रुप एडिटर शशिशेखर के नंबर बढ़ गये थे। तो लाजिमी है कि शशिशेखर की निगाहों में अशोक पांडेय के नंबर भी बढ़ने थे। 

यहां एक चीज का जिक्र करना और जरूरी है। अशोक पांडेय ने सन 2011 में कानपुर के शास्त्री नगर इलाके में लाखों रुपये का एक फ्लैट भी खरीदा था। यह फ्लैट उन्होंने अपनी करीबी अमर उजाला की एक महिला पत्रकार के लिये खरीदा था। फ्लैट जिसने बेचा वो भी इस समय दैनिक जागरण की कानपुर यूनिट में पत्रकार है। बाद में उस महिला पत्रकार ने देहरादून में ही अपना तबादला करवा लिया और फ्लैट पुनः उन्ही दैनिक जागरण वाले पत्रकार को पांडेय जी बेच गये। 

पांडेय जी का दैनिक हिन्दुस्तान कानपुर आना भी शशिशेखर की बदौलत हुआ। शशिशेखर तब तक दैनिक हिन्दुस्तान के प्रधान सम्पादक हो चुके थे और अपने चंपुओं को अमर उजाला अखबार से हिन्दुस्तान में लाने के लिये शिद्दत से जुटे थे। शशिशेखर अशोक पांडेय को हिन्दुस्तान लखनऊ का सम्पादक बनाना चाहते थे, लेकिन राह में बाधा यह थी कि लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी इस पद की कई वर्षों से शोभा बढ़ा रहे थे, और हिन्दुस्तान की मालकिन तक पहुंच रखने वाले सम्पादक थे। हिन्दुस्तान अखबार में नई-नई कुर्सी संभालने वाले शशिशेखर नवीन जोशी को छेड़कर ऐसा कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे। ऐसे में अशोक पांडेय को शशिशेखर ने झारखंड का स्टेट एडिटर बनवाया। 

अपनी इस पदोन्नति से इतराये अशोक पांडेय कुछ गलतियां कर बैठे उन्होंने किसी से चर्चा के दौरान बातों ही बातों में शशिशेखर का नाम आने पर  गालियां दे दीं। और अशोक पांडेय के विरोधियां ने गाली देते हुए वह वीडियो क्लिप बना ली और उस वीडियो क्लिप को शशिशेखर को भेज दी।  इस धृष्टता पर वही हुआ जो होना था, अशोक पांडेय को हिन्दुस्तान से शशिशेखर ने किक आउट कर दिया। लेकिन बाहरी तौर पर थोड़ा सम्मान बरकरार रखते हुए इसे अशोक पांडेय का किन्ही कारणों से इस्तीफा बताया गया। 

अशोक पांडेय उसके बाद अपना डिग्री कालेज चलाने लगे, और साथ में बसपा से उन्नाव क्षेत्र से विधायकी का टिकट हथियाने के लिये जुगत भिड़ाने लगे। बसपा के प्रति अपनी निष्ठा जताने के लखनऊ से उन्होंने एक बसपाई मैगजीन निकालने की भी कोशिश की। मायावती के बाद नंबर दो माने जाने वाले बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा की चौखट के भी खूब चक्कर लगाये, लेकिन नाकाम रहे। 

इसी बीच देहरादून में कुछ चिटफंडियों की ओर से एक रीजनल न्यूज चैनल चलाने की कोशिश की, लेकिन कुछ महीनों में उसका बंटाधार हो गया। हाल यह हुआ कि उस चैनल के कर्मचारियों को कई महीनों की सैलरी नहीं मिली। आक्रोशित इन कर्मियों ने एक दिन अशोक पांडेय को इस कदर घेरा कि पांडेय जी चैनल के दफ्तर में ही बेहोश हो गये थे, यह खबर भड़ास में भी प्रकाशित की गई थी।  

पिछले साल उन्होंने दैनिक हिन्दुस्तान में वापसी के लिये फिर एक बार जोर लगाया। शशिशेखर के करीबियों के जरिये उनसे मीटिंग फिक्स की, लेकिन नौकरी के बजाय बड़े मायूस होकर उन्हें हिन्दुस्तान के नोएडा आफिस से बाहर निकलना पड़ा। दरअसल जब अशोक पांडेय शशिशेखर से मिलने नोएडा दफ्तर पहुंचे तो शशिशेखर ने उन्हें वही क्लिप दिखा दी जिसमें अशोक पांडेय शशिशेखर को गरियाते नजर आ रहे थे। 

अब बात सीडी प्रकरण की तो एक जानकारी और कि अपना डिग्री कालेज चलाने वाले अशोक पांडेय कुछ महीने पहले निजी डिग्री कालेज के मालिकों के साथ धरना देने कानपुर यूनिवर्सिटी पहुंचे थे। यहां भी उन्होंने एक सीडी प्रकरण खोलने का प्रयास किया था। अशोक पांडेय ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके आरोप लगाया था कि यूनिवर्सिटी के अधिकारी खुले आम निजी डिग्री कालेजों के संचालकों से घूस मांग रहे हैं। अधिकारी के घूस मांगते हुए की एक सीडी उनके पास है। इसे वह राज्यपाल को भेजेंगे। 

कानपुर के पत्रकार महबूब अली से संपर्क – k.mehboob@rediffmail.com

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यूपी में लोकायुक्त नियुक्ति पर फिर झटका, राज्यपाल ने सीएम को फाइल बैरंग लौटाई

लखनऊ : लोकायुक्त नियुक्ति पर उत्तर प्रदेश सरकार को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है। सुप्रीम कोर्ट की फटकार सुनने के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लोकायुक्त नियुक्ति के लिए कैबिनेट से जो प्रस्ताव पारित करा लिया था, गवर्नर राम नाईक ने उसे मंजूरी देने से इनकार करते हुए फाइल सीएम को वापस कर दी है, जबकि सरकार किसी भी कीमत पर जस्टिस रवींद्र सिंह को ही लोकायुक्त नियुक्त कराने पर आमादा है।

राज्यपाल राम नाइक ने सरकार से हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के साथ लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए किए गए सभी पत्राचारों की फाइल भी तलब कर ली है। जस्टिस रविन्द्र सिंह की लोकायुक्त पद पर नियुक्ति के लिए अखिलेश सरकार ने कैबिनेट से प्रस्ताव पास कराया था। उसके बाद कार्यवाही के लिए उस फाइल को राज्यपाल के पास भेजा गया। 

फ़रवरी में सरकार ने नेता प्रतिपक्ष की सलाह से जस्टिस रवींद्र सिंह का नाम तय करके इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के पास परामर्श के लिए भेजा था। चीफ जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ ने जस्टिस रवींद्र के नाम पर आपत्ति जताते हुए राज्यपाल और मुख्यमंत्री को पत्र से अवगत करा दिया था। इसके बाद सरकार ने लोकायुक्त की चयन प्रक्रिया से चीफ जस्टिस की भूमिका ही समाप्त कर दी थी। 

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उत्तराखंड : सीएम ने झूठ बोला, आरोपी आईएएस पर कोई कार्रवाई नहीं, दूसरे दागदार आइएएस को सौंप दी जांच

वाह रे उत्तराखंड सरकार और यहां के मुख्यमंत्री हरीश रावत! शराब और खनन माफिया के साथ सीएम रावत व उनकी चंडाल चौकड़ी के मायाजाल के स्टिंग में शर्मनाक आचरण के आरोपी, उनके निजी सचिव मोहम्मद शाहिद (आईएएस) का अब तक बाल भी बांका नहीं हुआ। मात्र 10 दिन पहले कांग्रेस आलाकमान को रावत ने आश्वस्त किया था कि स्टिंग आपरेशन के कुछ ही घंटों में उन्होंने अपने निजी सचिव को सस्पेंड कर दिया है लेकिन उनका यह ऐलान झूठा निकला। शाहिद का सिर्फ विभाग बदला है। अब सीएम रावत स्टिंग की जांच के नाम पर उत्तराखंड की जनता को ही नहीं, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी व उपाध्यक्ष राहुल गांधी की आंखों में धूल झोंकने की शर्मनाक कोशिशों में जुट गए हैं। 

यहां के मीडिया ही नहीं, आम लोग मानते हैं कि जांच सीबीआई जैसी सर्वोच्च एजेंसी के नीचे कराने से सच सामने नहीं आने वाला। हैरत यह है कि मुख्यमंत्री ने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए यह सनसनीखेज जांच एक दूसरे दागदार आइएएस अधिकारी ओमप्रकाश को सौंप दी है। मजेदार बात है कि ये सज्जन खुद ही मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव हैं। सवाल यह है कि स्टिंग की जांच के लपेटे में जब खुद मुख्यमंत्री हरीश रावत हैं तो उनके सामने सुबह- सुबह घर जाकर नत मस्तक होने वाला कोई नौकरशाह कैसे मुख्यमंत्री और उनके निजी सचिव के विरुद्ध लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच कर सकेगा। 

राज्य बनने के बाद 12 वर्ष से ज्यादा वक्त तक मुख्यमंत्री का प्रमुख सचिव ओमप्रकाश एग्रीकल्चर सेक्रेटरी रहा। इस दौरान जो दर्जनों घोटाले हुए, उसमें राज्य के खजाने की लूट से जुड़ा करोड़ों रुपए का हरी खाद का ढैंचा बीज  घोटाला भी एक है। यह घोटाला बिहार के चारा घोटाले की तर्ज पर हुआ, जिसमें कई करोड़ के हरी खाद के बीजों से भरे वाहन उत्तराखंड आए ही नहीं। टेंडर कागजों पर हो गए। बीजों का करोड़ों का भुगतान दिखा कर मंत्री से संत्री तक ने अपनी संपत्ति चौगुनी कर डाली।

गौरतलब है कि हाल में 20 जुलाई 2015 को ढैंचा घोटाले पर पेश याचिका पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीष न्यायमूर्ति के एम जोसफ की सयुंक्त बैंच ने हरीश रावत सरकार को तीन सप्ताह के भीतर कृत कार्यवाही का शपथ पत्र  तलब किया था। 

लोगों को हैरत है कि त्रिपाठी आयोग ने जांच एक साल पहले राज्य सरकार को सौंप दी थी।  ढैंचा बीज घोटाले में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव ओमप्रकाश, उत्तराखंड की पूर्व भाजपा सरकार के मंत्री रहे व भाजपा के झारखंड के प्रभारी त्रिवेंद्र सिंह रावत पर नैनीताल हाईकोर्ट कोर्ट का शिकंजा कसा हुआ है। राज्य की जनता को हैरत इस बात से भी है कि जिस घोटाले के तार पूर्व भाजपा सरकार व उसके मंत्री, नौकरशाहों से सीधे जुड़े हुए हैं, उन पर सीएम हरीश रावत साल भर से मौन क्यों हैं? 

देहरादून से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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सीएम शिवराज ने किया ‘सुबह सवेरे’ के नव-कलेवर अंक का विमोचन

भोपाल : मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुधवार को भोपाल में दैनिक ‘सुबह सवेरे’ के नव-कलेवर अंक का विमोचन किया। मुख्‍यमंत्री ने कहा कि कुछ सनसनीखेज बनाने की होड़ में रचनात्मक और सकारात्मक पत्रकारिता कहीं पीछे छूट गई है। जबकि रचनात्‍मक और सकारात्‍मक पत्रकारिता के माध्यम से ही देश, प्रदेश और समाज की सेवा की जा सकती है।

‘सुबह सवेरे’ के नव-कलेवर अंक का विमोचन करते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह एवं अन्य

उन्‍होंने कहा कि पत्रकारिता रहस्‍य, रोमांच, सस्‍पेंस इससे थोड़ा हटकर हो और जो वास्‍तव में खबर है, वो लोगों तक पहुंचे। खबर के साथ साथ यह सोच भी हो कि हम पत्रकारिता के माध्‍यम से अपने प्रदेश, देश और जनता की भलाई में क्‍या योगदान कर सकते हैं। मीडिया ओपीनियन मेकर है। लोग खबरें पढ़कर अपना दिमाग भी बनाते हैं, अगर एक धारा ऐसी पैदा हो, जो समाज को रचनात्‍मक दिशा में ले जाए तो मैं समझता हूं कि देश और समाज के लिए यह सबसे बड़ी सेवा, बड़ा योगदान होगा। मुझे पूरा विश्‍वास है कि उमेश त्रिवेदी और उनकी पूरी टीम मिलकर इस अखबार को उस दिशा में ले जाएगी, जो दिशा केवल अखबार के लिए नहीं होगी, जनता के लिए भी होगी, प्रदेश के लिए भी होगी, मानवता के लिए भी होगी। खबरें देना तो अखबार का काम है, लेकिन जो खबर है, वह तथ्‍यों के साथ दी जानी चाहिए। 

सुबह सवेरे में हम खबरों के साथ जाने माने लेखकों के विचारों से भी अवगत होंगे और एक विचार मंथन का प्रवाह भी ये अखबार प्रारंभ करेगा। विचारधाराओं का अंतर हो सकता है। लेकिन अपने विचार प्रामाणिकता के साथ अगर कोई लिखता है और उस दिशा में तथ्‍यों और प्रामाणिकता के साथ यदि कोई लिखता है तो वो विचार सच में क्रांति ला सकता है। आप सर्कुलेशन की दौड़ में मत पड़िए। आप तो गुणवत्‍ता की दौड़ में सबसे आगे निकलिए। उसमें यदि आगे निकले तो समाज की बेहतरी का रास्‍ता खोल सकते हैं। मैं अखबर को अपनी शुभकामनाएं देता हूं।

मुख्‍यमंत्री ने अखबार की वेबसाइट subahsaverenews.com को भी लांच किया। इस अवसर पर जनसंपर्क एवं खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल और आयुक्त जनंसपर्क अनुपम राजन भी उपस्थित थे। कार्यक्रम में सुबह सवेरे के प्रधान सम्पादक उमेश त्रिवेदी ने समाचार-पत्र के बारे में जानकारी दी। इस अवसर पर समाचार-पत्र के राज्‍य संपादक गिरीश उपाध्‍याय, वरिष्‍ठ संपादक अजय बोकिल, स्थानीय संपादक पंकज शुक्ला, इंदौर के प्रभारी हेमंत पाल एवं सुबह सवेरे परिवार के सदस्‍य मौजूद थे। 

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हरीश रावत निजी सचिव स्टिंग प्रकरण : बेशर्म ‘हिंदुस्तान’ की पत्रकारिता तो देखिए….

आज का हिंदुस्तान 23 जुलाई 2015, दिल्ली व देहरादून अंक, जिस किसी ने पढ़ा, उसे देखकर कोई अंधा भी बता सकता है कि कांग्रेस को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत की जरा भी चिंता नहीं। साथ ही, पूरे देश के अखबारों ने रावत के निजी सचिव की संटिग लीड खबर को जमकर छापा। हिंदुस्तान भारत का अकेला अखबार है जिसे इतनी महत्वपूर्ण खबर नहीं दिखाई दी। दिल्ली में अखबार ने लीड खबर में संसद के हंगामे की चर्चा के साथ चलते- चलते सीएम रावत के निजी सचिव के स्टिंग का हल्का जिक्र करके इतिश्री कर ली।

जहां तक कांग्रेस सवाल है, रावत की इस बात पर पूरी पार्टी अडिग रहती कि जब तक जांच में कोई जुर्म साबित नहीं होता तो किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी लेकिन मुख्यमंत्री की नाक, आंख और कान के अलावा शराब, खनन  और जमीनों के अवैध कारोबार से मिलने वाली करोड़ों की कमाई में उनके निजी सचिव मोहम्मद शाहिद समेत दर्जनों लोग लिप्त हैं। कांग्रेस के लोग ही बता रहे हैं कि मोहम्मद शाहिद तो छोटी सी मछली हैं। 

हिंदुस्तान अखबार की बेशर्मी की हद तो यहां तक हो गई कि उसने अपने देहरादून एडिशन में पेज वन पर स्टिंग आपरेशन की खबर के साथ बराबर में रावत के पक्ष में खबर लगाई कि कांग्रेस आलाकमान व पूरी पार्टी हरीश रावत के साथ खड़ी है। सच्चाई इसके विपरीत है। रावत ने निजी सचिव को सस्पेंड तब किया, जब दिल्ली से सोनिया व राहुल की हिदायद के बाद उन्हें जांच का इंतजार किए बिना ही तत्काल एक्शन का हुक्म मिला। रावत के लिए अपने आंख के तारे मोहम्मद शाहिद से किनारा कर पाना आसान नहीं है क्योंकि रावत की संपत्ति की पूरी सूचनाएं और दूसरे दर्जनों राज निजी सचिव शाहिद के पास हैं। अगर सीआई जांच होती है तो रावत और दिल्ली से देहरादून तक उनकी पूरी टोली और मीडिया में उनके एजेंट बेनकाब हो जाएंगे। 

हिंदुस्तान अखबार क्यों रावत को बचाने में जुटा है, इस पर भी गंभीरता से जांच की आवश्यकता है। हिंदुस्तान के शशि शेखर नाम के संपादक की करोड़ों की पापर्टी व रिसार्ट उत्तराखंड में जोशीमठ के निकट औली से लेकर गढ़वाल व भीमताल तक बताई जाती है। इसमें काफी संपत्ति बेनामी है, जिसे कोई अतुल शर्मा नाम का अरबपति व्यवसायी चलाता है। उसका करोबार बचाने के लिए शशि शेखर पूर्व मुख्यमंत्री नारायण तिवारी से लेकर भाजपायी मुख्यमंत्रियों व हरीश रावत के दरबार में हाजिरी लगाता है। उत्तराखंड में अपने सभी नंबर दो के कामों को बचाने की एवज में हरीश रावत का कर्ज उतारने के लिए हिंदुस्तान नतमस्तक है। हिंदुस्तान की मालकिन और उसके मैनेजरों को सब पता है लेकिन उनको पाप का घड़ा फोड़ने के लिए वक्त का इंतजार है। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सीएम रावत अपने ही जाल में फंसे, आपदा राहत घोटाले पर मुख्य सचिव की लीपापोती

देहरादून (उत्तराखण्ड) : आपदा राहत घोटाले में मुख्य सचिव से क्लीन चिट लेकर प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत खुद अपने ही  जाल में फंस गये हैं। भाजपा प्रवक्‍ता बलराज पासी ने  आपदा घोटाले की जांच पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मुख्‍य सचिव ने अधिकारियों और सरकार को बचाने के लिए लीपापोती की है। हम विधानसभा सत्र के दौरान इस मामले की सीबीआई जांच की मांग उठाएंगे। 

भाजपा की आगामी रणनीति को भांपते हुए उत्तराखण्ड शासन के मुख्य सचिव एन. रविशंकर ने 19 जुलाई 15 को राजभवन में राज्यपाल डा. कृष्ण कांत पाल से भेंट कर उन्हें 2013 की आपदा राहत में अनियमितताओं से सम्बंधित शिकायत की जांच रिपोर्ट सौंपी थी। सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत शिकायतों के आधार पर सूचना आयुक्त की संस्तुतियों सम्बंधी पत्र पर मुख्यमंत्री द्वारा एक जून को मुख्य सचिव को जांच सौंपी गई थी। उसी जांच रिपोर्ट और संस्तुतियों की प्रति मुख्य सचिव द्वारा राज्यपाल को सौंपी गई।

आपदा रहत घोटाले का खुलासा होने पर हरीश रावत की पहली प्रतिक्रिया एक राजनेता के अनुरूप थी कि दोषियों को कड़ी सजा दिलायेंगे परन्तु न जाने किसने कान में फूँक मार दी, उन्होंने यू टर्न लिया और दोषियों को बचाने के लिये मुख्य सचिव की जाँच बैठा दी। मुख्य सचिव से क्लीन चिट पाकर मुख्य मंत्री सहित कांग्रेस पार्टी भले ही अपना गाल बजा रही हो, उसे उत्तराखंड की जनता को जवाब तो देना ही होगा कि यदि आपदा राहत में कोई घोटाला नहीं हुआ तो तीन साल गुजर जाने के बाद भी आपदा पीड़ितों का अभी तक पुनर्वास क्यों नहीं हुआघ। क्या मुख्य मंत्री हरीश रावत मानते हैं कि आपदा राहत के कार्यों में राज्य की नौकरशाही ने पूर्ण कर्तव्य निष्ठा व ईमानदारी बरती। क्या इसी राजनीतिक चातुर्य के बल पर वो उत्तराखंड की जनता के दिलों पर राज करना चाहते हैं।

नेता प्रतिपक्ष अजय भटृ ने आपदा घोटाले में सूचना आयुक्त द्वारा मामले को अत्यधिक गम्भीर व बड़ा घोटाला बताते हुए इसकी सीबीआई जांच की मांग की थी। उन्होंने कहा कि सरकार ने सीबीआई जांच न कराकर मुख्य सचिव को इसकी जांच सौंप दी और हमने उसी दिन कह दिया था कि सरकार इस जांच में सभी को क्लीन चिट दे देगी। मुख्य सचिव वही जांच करेंगे, जो सरकार चाहेगी और इस घोटाले में पूरी सरकार संलिप्त है तो भला मुख्य सचिव की देख-रेख वाली कमेटी कैसे इसमें घोटाला साबित कर सकती थी।

जांच रिपोर्ट सामने आई तो घोटाला गायब हो गया। राज्य सरकार की जांच के अनुसार असल में घोटाला हुआ ही नहीं। जांच रिपोर्ट में सामने आया कि आपदा राहत में हुई गड़बड़ी कोई घोटाला नहीं बल्कि लिपिकीय त्रुटि है। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करते हुए मुख्य सचिव ने बता दिया कि भुगतान में किसी तरह की कोई अनियमितता नहीं पाई गई। साथ ही उन्होंने सूचना के अधिकार कानून के तहत उजागर हुए आपदा राहत घोटाले के मामले में राज्य सरकार को क्लीन चिट दे दी। उन्होंने कहा कि इस त्रुटि की जिम्मेदारी तय करने और प्रशासनिक कार्यवाही करने का अधिकार मंडलायुक्त गढ़वाल और कुमाऊं को दिया गया है। सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष से आग्रह किया है कि आपदा प्रबंधन के मामलों को लेकर सर्वदलीय समिति का गठन किया जाए जो स्थलीय निरीक्षण करे और सरकार को सुझाव भी दे। 

आरोप क्या थे

राहत अभियान के दौरान मांस खाया गया। आपदा के समय पिकनिक मनाई गई। ’आधा किलो दूध की कीमत 194 रुपये बताई गई। मोटरसाइकिल में डीजल भरवाने का बिल पाया गया। हेलीकाप्टर से फंसे यात्रियों को निकालने का बिल 98 लाख, रुद्रप्रयाग में अधिकारियों के रहने और खाने पर 25 लाख का भुगतान, पर्यटक आवास गृह कुमाऊं मंडल के लाखों रुपये के बिल मानवता को शर्मसार करने वाले रहे। दरअसल आरटीआई के तहत देहरादून निवासी भूपेंद्र कुमार ने प्रशासन से आपदा राहत का पूर्ण विवरण मांगा था। जब यह जानकारी पूरी नहीं मिली तो मामला राज्य सूचना आयुक्त तक पहुंचा। राज्य सूचना आयुक्त अनिल कुमार शर्मा ने आपदा राहत के मामले में आपदा प्रबंधन पर तल्ख टिप्पणी की। आयुक्त ने मामले की सुनवाई करते हुए यह साफ कहा कि आपदा राहत कार्य में मिली जानकारी किसी बड़े घोटाले की तरफ इशारा कर रही है। आयुक्त ने सरकार से सीबीआई जांच कराने को कहा था। इस पर विपक्ष ने भी खूब हो-हल्ला मचाया तो मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुख्य सचिव को आरटीआई में उठे बिंदुओं पर जांच करने के निर्देश दिए। 

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गुजरात की सीएम आनंदीबेन ने भ्रष्टाचार से जुटाई 5000 करोड़ की संपत्ति, भास्कर ने खबर छापकर हटाई !

गुजरात की मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल और उसके बेटे और बेटी ने भ्रष्टाचार से 5 हजार करोड़ की संपत्ति एकत्रित की. ऐसे चौंकाने वाले आरोप के साथ राज्य के दूसरे नंबर के मंत्री नितिन पटेल का ह्स्ताक्षरित पत्र इन दिनों गुजरात के लोगों के लिए कौतूहल का प्रश्न बना हुआ है। इस पत्र की कॉपी दिव्य भास्कर डॉट काम के पास है और तीन दिन पहले ही यह पत्र रिपोर्ट के साथ दिव्य़ भास्कर डॉट काम ने अपनी वेबसाइट पर लगाया था लेकिन कुछ घंटों में ही इसे दबाववश या किसी कारणवश साइट से हटा लिया।

देश के पीएम नरेंद्र मोदी के साथ गुजरात की सीएम आनंदीबेन पटेल

अहमदाबाद के एक सूचना कार्यकर्ता ने जिला आयुक्त को इस पत्र को हटाने के मुद्दे को लेकर जानकारी मांगी है. उसका कहना है कि अगर यह जानकारी सही है तो इस बारे में प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए और अगर यह पत्र गलत है तो उसके खिलाफ कार्यवाही होनी चाहिए. उनका कहना है कि मीडिया बिना कोई जांच किए बगैर तो कुछ नहीं प्रकाशित करता. बिना जांच किए प्रकाशित करने से उन्हें नोटिस दिया जाता है. इस पूरे एपीसोड में गुजरात सरकार खामोश बैठी है. 

यह पत्र वॉटस अप में मीडिया को भी गुजराती में जारी किया गया था। छह पृष्ठ के इस पत्र में नितिन पटेल ने आनंदी बेन पटेल के भ्रष्टाचार की जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को संबोधित करते हुए आरोप लगाया है कि राजस्व और शहरी विभाग पिछले दरवाजे से उनके पुत्र और पुत्री संभाल रहे हैं. उनकी रोज की आय 50 करोड़ है. बिल्डर लॉबी को धमकी देकर उनके पुत्र और पुत्री को भागीदार बनाने का आरोप भी लगाया गया है. आनंदी बेन पटेल के पास वडोदरा में 700 एकड़ जमीन उसकी बेटी अनार पटेल के पास, राजकोट में 1600 एकड़ जमीन और जूनागढ़ गिर सेंचुरी के पास 1200 एकड़ जमीन है और उनके बच्चों के पास अहमदाबाद और गांधीनगर में 2500 एकड़, अमरेली जिले में 1200 एकड़, सुरेन्द्र नगर में 1400 एकड़, सूरत में 560 एकड़ जमीन को मिलाकर अरबों रुपए की जमीन है. 

पत्र में आरोप लगाया है कि आनंदी बेन के बेटे-बेटी और दामाद के विदेश यात्रा की जांच भी होनी चाहिए. इतना ही नहीं राज्य की प्रथम महिला मुख्यमंत्री होने के नाते सूरत की वीआईपी क्षेत्र में स्थित कृषि विश्वविद्यालय की जमीन आबंटित करने के नाम पर बिल्डर से एडवांस के तौर पर 500 करोड़ रुपए ले लिए. लेकिन अभी तक बिल्डरों को जमीन नहीं दी गई. सूरत के कार्यकर्ताओं और बिल्डर लॉबी में इस बात की चर्चा है. स्कूल में बरामदे बनाने के ठेके में भी आनंदीबेन पटेल की बेटी अनार पटेल पर आरोप लगाए गए हैं. उस समय आनंदी बेन पटेल शिक्षण मंत्री थीं. उस समय गुजरात की प्राथमिक शालाओं में बरामदे बनाने का काम सिंटेक्स कंपनी के साथ किया था। पत्र में आरोप लगाया है कि यह ठेका अनार पटेल को दिया गया था और इसमें करोड़ों का भ्रष्टाचार हुआ था. पत्र में खुलेआम आरोप लगाया है कि अगर कोई बिल्डर कोई भी फाइल ले जाता है तो उसमें मुख्यमंत्री अपने बच्चों की भागीदारी करवाती है. 

गुजरात में स्थानीय चुनाव होने वाले हैं। इसीलिए ऐसा समझा जा रहा है कि तमाम आरोपों प्रत्यारोपों का अनविरत सिलसिला चल रहा है लेकिन अगर तमाम आरोप झूठे हैं तो सरकार इसका जवाब क्यों नहीं दे रही। यह रहस्य़ गहराता जा रहा है.  

लेखिका उषा चांदना से संपर्क : ushachandna55@gmail.com

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अमनमणि और उसके गुंडे दोस्तों का मीडिया पर हमला, उपजा ने की सीएम से कार्रवाई की फरियाद

लखनऊ : मीडिया द्वारा फोटो खींचने पर अमनमणि त्रिपाठी व उनके समर्थकों द्वारा लखनऊ मीडिया पर हमले की उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन ने कड़ी निंदा की है। एसोसिएशन की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला ने प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मांग की है कि घटना में शामिल सभी आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाय।

उल्लेखनीय है कि सिरसागंज के निकट संदेहास्पद स्थिति में अमनमणि की पत्नी सारा की मौत हो गई थी। सारा की मां ने आरोप लगाया है कि अमनमणि ने उनकी बेटी की हत्या की है। अमनमणि ने खुद को बीमार बताकर अस्पताल में भर्ती होने की कोशिश की। मीडियाकर्मियों ने जब अमनमणि की फोटो लेनी चाही तो गुंडे दोस्तों ने पत्रकारों और पुलिसकर्मियों से हाथापाई शुरू कर दी। यह भी उल्लेखनीय है कि फिरोजाबाद जनपद में उसकी कार पलट गयी, जिसमें उसकी पत्नी सारा की मौत हो गयी। हैरानी की बात यह है कि कार भयंकर रूप से टूट-फूट गयी मगर अमनमणि को खरोच तक नहीं आई। 

अमनमणि लखनऊ में एक ठेकेदार के अपहरण और लूट के मामले में वांछित चल रहा था।। इस घटना की सूचना के बाद पुलिस ने हिरासत में लेने की कोशिश की मगर अमनमणि खुद को बीमार बताकर अस्पताल में भर्ती होने की जुगत में लग गया। इस बीच अमनमणि के अस्पताल में पहुंचने की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में उसके दोस्त व समर्थक भी वहां इकट्ठे हो गये। इन लोगों ने पुलिसकर्मियों से भी बदसुलूकी शुरू कर दी। इस बीच जब मीडियाकर्मी अमनमणि का फोटो लेने लगे तो उनके दोस्तों ने इन पत्रकारों पर हमला बोल दिया। कुछ पत्रकारों के कैमरे टूट गये और कुछ के चोट भी आयी। अमनमणि के पिता अमरमणि अपनी पत्नी सहित कवियत्री मधुमिता शुक्ला की हत्या में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं।

उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन की लखनऊ इकाई के अध्यक्ष अरविन्द शुक्ला के साथ वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार, भाषा के ब्यूरो प्रमुख प्रमोद गोस्वामी, वरिष्ठ पत्रकार वीर विक्रम बहादुर मिश्र, सर्वेश कुमार सिंह, वीरेन्द्र कुमार सक्सेना, सुनील त्रिवेदी, लखनऊ इकाई के कोषाध्यक्ष मंगल सिंह, उपाध्यक्ष सुशील सहाय, मंत्री अनुराग त्रिपाठी सहित अनेक पत्रकारों ने मीडिया पर हमले की निंदा की है। 

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सीएम शिवराज और ‘आजतक’ संवाददाता राहुल करैया में गोपनीय मुलाक़ात, अक्षय की मौत पर संदेह गहराया

भोपाल : व्यापम की स्टोरी कवर करने दिल्ली से आए ‘आजतक’ चैनल के विशेष संवाददाता अक्षय सिंह की झाबुआ में संदिग्ध परिस्थिति में हुई मौत के वक़्त इंदौर के ‘आजतक’ संवाददाता राहुल करैया भी उनके साथ थे। वे ही इस घटना के एकमात्र चश्मदीद गवाह भी हैं। आज (बुधवार) भोपाल में राहुल को मुख्यमंत्री हॉउस बुलाया गया, जहाँ उनके और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बीच गोपनीय मुलाक़ात हुई! 

इस मुलाकात को संदेह की नजरों से देखा जा रहा है। जानकारी के मुताबिक राहुल को मुख्यमंत्री हॉउस में पदस्थ एक वरिष्ठ अधिकारी ने गुपचुप भोपाल बुलाया था! मुख्यमंत्री और राहुल करैया के बीच सुबह 10 से 12 बजे के बीच बंद कमरे में बातचीत हुई! माना जा रहा है कि अक्षय सिंह की कथित संदिग्ध मौत की कहानी में कोई नया मोड़ आने वाला है! 

ये भी कहा जा सकता है कि अक्षय ने डायबिटीज़ और ब्लड प्रेशर की दवा लेने के बाद ताड़ी का सेवन किया, जिससे संक्रमण हो गया! वही अक्षय की मौत का कारण भी बना!  यदि इस मौत के पीछे सरकार कोई खेल नहीं कर रही तो राहुल करैया को गोपनीय तरीके से भोपाल बुलाकर मुख्यमंत्री ने क्या बात की है, ये सवाल कई गंभीर इशारे करता है!

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घमंड में चूर बीजेपी महासचिव का शर्मनाक बयान, ‘पत्रकार-वत्रकार छोड़ो यार, अक्षय हमसे बड़ा पत्रकार था क्या!’

मध्यप्रदेश में पत्रकार अक्षय सिंह की रहस्यमय हालात में मौत संबंधी एक सवाल के जवाब में बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने बेहूदगी भरा जवाब देते हुए कहा- ‘पत्रकार-वत्रकार छोड़ो यार। वो कोई हमसे भी बड़ा पत्रकार था क्या?’ इस हरकत भरी टिप्पणी पर इसलिए मीडिया में रोष है कि जिस समय विजयवर्गीय जब पत्रकार की मौत का मजाक बना रहे थे, प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी उनके साथ वहीं पर उपस्थित थे। बयान देने के बाद विजयवर्गीय पत्रकारों की हंसी उड़ाते हुए भी दिखे। जोर से ठहाका भी लगाया। 

इससे उस व्यापमं घोटाले को लेकर प्रदेश सरकार की मनोवृत्ति का पता चलता है, जिसमें अब तक तीन दर्जन से अधिक हत्याएं हो चुकी हैं। बीजेपी महासचिव के इस बयान की मीडिया में जब तीखी आलोचना होने लगी तो बाद में विजयवर्गीय ने माफी मांग ली। साथ ही उल्टे मीडिया पर ही ये आरोप भी जड़ दिया कि उनके ‘बयान को तोड़मरोड़कर पेश किया गया, किसी को ठेस पहुंची हो तो माफी।’

इस बयान से एक बार फिर भाजपा व्यापमं जैसे मुद्दे पर लापरवाह नजर आ रही है। इसके पूर्व भी कैलाश बिना सोचे-समझे अपने बयानों से पार्टी को कटघरे में खड़ा कर चुके हैं। इस बयान से एक बार फिर कांग्रेस उग्र नजर आ रही है। इसके पूर्व कैलाश ने शनिवार को ही भोपाल में शक्ति प्रदर्शन कर कहा था कि मैं पूरे देश में रंगबाजी करूंगा, लेकिन मप्र में केवल कार्यकर्ता की भूमिका में रहूंगा। 

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पत्रकार जगेन्द्र की मौत की जांच रिपोर्ट जल्द, दोषी के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी : अखिलेश

समाजवादी पार्टी का युवा चेहरा अखिलेश यादव दोहरी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वर्ष 2017 के विधान सभा चुनाव पार्टी अखिलेश को आगे करके ही लड़ने का मन बना रही है। प्रदेश में कानून व्यवस्था का बुरा हाल है। उनके मंत्रियों पर भी भ्रष्टाचार-दबंगई के आरोप लग रहे हैं। इन मुद्दों पर वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार की मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बातचीत- 

उत्तर प्रदेश में पत्रकार त्रस्त हैं, आरोप आपके मंत्री पर हैं ?

मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। इसे कमजोर या फिर दबाया नहीं जा सकता है। अगर आपका इशारा शाहजहांपुर में जल कर मरे पत्रकार के मामले की तरफ है तो पीड़ित परिवार के साथ मेरी पूरी सहानुभूति है। जगेन्द्र के परिवार को तीस लाख की आर्थिक मदद, दो बच्चों को सरकारी नौकरी, पत्नी को समाजवादी पेंशन और उसकी जमीन को बाहुबलियों से कब्जा मुक्त कराने का आदेश दे दिया है। पत्रकारों का उत्पीड़न किसी भी दशा में बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। राजनीति में इस तरह के आरोप लगते रहते हैं। जांच निष्पक्ष रूप से चल रही है। जांच से पहले केवल आरोप के आधार पर किसी को दंडित या गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। पूर्व में भी आरोपों के चलते हमने अपने मंत्रियों राजा भैय्या और पंडित सिंह से इस्तीफा लिया था, लेकिन जांच में वह बेकसूर निकले। बदांयू कांड में भी ऐसा ही हुआ था। आरोप कुछ लगे थे और जांच में कुछ और खुलासा हुआ था। पत्रकार जगेन्द्र की मौत की जांच रिपोर्ट जल्द ही आयेगी, जो भी दोषी होगा, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी।

क्या सरकार सही दिशा में जा रही है ?

यह मैं कैसे बताऊं। मेरे संतुष्ट होने न होने से कोई बड़ा फर्क नहीं पड़ता है। वैसे सरकार की सफलता का पैमाना यही होता है कि जिस योजना का वह उदघाटन करे, उसे समय रहते पूरा कर ले।आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ,लेकिन अब ऐसा हो रहा है।सरकार से अधिक जनता को सतुष्ट होना चाहिए। मैं मुख्यमंत्री बना था तब मेरे पास शासन-प्रशासन का कोई अनुभव नहीं था,सिवाय इसके की मैंने एक राजनैतिक परिवार में जन्म लिया था,लेकिन मैंने इस बात की परवाह नहीं की।मैं राजनीति में पाने के लिये नहीं, कुछ करने के लिये आया था।काम के प्रति मेरी निष्ठा में न तो तब कमी थी, न आज है।मैं अपना काम पूरी ईमानदारी से करता हूं। इसी लिये आधी बाधाएं तो वैसे ही दूर हो जाती हैं। मेरी नियत साफ है।मैं इसे ऊपर वाले का आशीर्वाद मानता हूं। जनता से किये गये वायदे पूरा करना मेरा कर्तव्य ही नहीं राजनैतिक धर्म भी है, जिसे मैं निभा रहा हूं।

जनता सतुष्ट है ?

इसका कोई पैमाना नहीं है। सर्वे सरकार के पक्ष में आ रहे हैं। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि विरोधी भी सरकार के कामकाज की तारीफ कर रहे हैं।

आपका इशारा मोदी जी की तरफ?

मेरी कोई प्रशंसा नहीं कर रहा है। प्रशंसा मेरे काम की हो रही है। विरोधियों को मुझमें कोई कमी नहीं दिख रही है इसलिये उन्हें प्रशंसा तो करनी ही पड़ेगी। इसे अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। केन्द्रीय उर्जा और स्वास्थ्य मंत्री ने भी प्रदेश में हो रहे विकास के काम की सराहना की है।

मोदी विदेश बहुत घूम रहे हैं ?

कुछ सोचते हुए,जब मैं कहता हॅू कि देश में निवेश को बढ़ावा देने के लिये इस तरह को विदेशी दौरे आवश्यक हैं तो हमारे विरोधी कहने लगते हैं कि वह(अखिलेश यादव)खुद विदेश में घूमते रहते हैं तो पीएम पर कैसे उंगली उठायेंगे। ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हम अपने तक सिमट कर नहीं रह सकते हैं।दौरों के चलते ही देश और प्रदेश में विदेशी निवेश आ रहा है।बसपा राज में उद्योगपतियों ने यूपी से किनारा कर लिया था,अब ऐसा नहीं है।प्रदेश में आद्योगिक विकास का माहौल बन रहा है।मोदी जी भले ही मेरी तारीफ करते हों,लेकिन मै प्रधानमंत्री से संतुष्ट नही हॅू।

कारण ?

बहुत क्लीयर है। प्रधानमंत्री बनने के समय उन्होंने कहा था कि मैं न तो खाऊंगा,न खाने दूंगा। उनकी चार-चार ‘देवियों’ पर उंगली उठ रही है। जरा-जरा सी बात पर ट्वीट करने वाले मोदी से इस मुद्दे पर भी मैं ट्वीट की उम्मीद तो कर ही सकता हूं।

विधान सभा चुनाव का समय करीब आ रहा है ?

हमारे लिये चुनाव चिंता का विषय नहीं हैं। हमने काम करके दिखाया है। लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी की हालत खस्ता है। कई उप-चुनाव हार चुकी है।उसके पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिसे वह सीएम के रूप में आगे कर सके,इसलिये मोदी के नाम पर राज्य में चुनाव लड़ने की बात हो रही है।

आपका मुकाबला किससे है ?

मुकाबले में कोई नजर नहीं आ रहा है। बसपा-भाजपा अपने नेताओं की तानाशाही के कारण रसातल में जा रही हैं। कांग्रेस का मनोबल टूटा हुआ है।

मिशन 2017 पर जल्दी काम शुरू हो गया ? 

इसमें बुराई क्या है। पिछले तीन-साढ़े तीन वर्षो में हम जनता के विश्वास पर खरे उतरे हैं।सरकार ने पढ़ाई, दवाई और सिंचाई मुफ्त की है। वूमेन पवर लाइन 1090, यमुना एक्सप्रेस वे, जन कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिये यूपीन्यूज.इन का पोर्टल, लखनऊ में मेट्रो, प्रतिभाशाली छात्र-छात्राओं को लैपटाप योजना, बेटियों की शिक्षा और विवाह लिये योजनाएं, गरीबों के लिये लोहिया आवास, समाजवादी पेंशन योजना, विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों का सम्मान, प्रदेश के बुजुर्गो के लिये समाजवादी श्रवण यात्रा,बेरोजगारों के लिये स्किल डेवलेपमेंट प्रोग्राम, नये मेडिकल कालेज, महिला सुरक्षा कोष का निर्माण, बिना केन्द्र की मदद के आपदाग्रस्त किसानों को चार हजार करोड़ रूपये बांटना जैसी तमाम कल्याणकारी और विकासपरक योजनाएं ही हमें पुनः सत्ता में वापस लायेंगी। शुरू में जो लोग हमारी लैपटाप योनना को झुनझुना बता रहे थे, वह ही लोग अब वाई-फाई की बात कर रहे हैं।

सीएम के ऊपर चार-साढ़े चार सीएम और सुपर सीएम की चर्चा…..?

मुस्कुराते हुए। शुरूआती दौर में विरोधियों ने राजनैतिक फायदे के लिये ऐसा प्रचार किया था। उन्हें लगता था जरा सा लड़का क्या प्रदेश चलायेगा। इसी वजह से उन्हें यह कहने का मौका मिल गया कि मैं तो मुखौटा मात्र हॅूं, लेकिन अब क्या इस तरह की चर्चा होती है ? जो भी निर्णय लेता हॅू उस पर कठोरता से अमल करवाता हॅू। मैं मुख्यमंत्री हूं, इसका मतलब यह नहीं है कि मैं भी अन्य नेताओं की तरह अहंकारी हो जाऊं। मेरी विनम्रता को लोग कमजोरी समझते हैं तो समझते रहें।

सरकार पर आरोप लगते हैं कि वह गुंडे-माफिया को संरक्षण देती है? विरोधियों का नारा है,‘जिस गाड़ी पर सपा का झंडा, समझो बैठा उसमें…..?

यह सही नहीं है। विरोधी भ्रामक प्रचार कर रहे हैं। मैंने या मेरी सरकार ने कभी  अपराधियों को संरक्षण दिया, न कभी दूंगा। इस दौरान जितने अपराधी जेल की सलाखों के पीछे गये, वह एक रिकार्ड है। ऐसे आरोपों में सच्चाई कम, राजनीति ज्यादा होती है, जिनके दामन खुद दागदार हैं, वह ही दूसरों पर उंगली उठाते हैं। पिछले शासनकाल में एक आईएएस ने आत्महत्या की। चिकित्साधिकारियों की हत्याएं हुईं। उस समय के तमाम भ्रष्टाचारी आज जेल में हैं। इनके खिलाफ जांच चल रही है। तमाम अपराधिक किस्म के लोगों के पुलिस से बचने के लिये पार्टी के झंडे का दुरूपयोग करने की मुझ तक शिकायतें आई हैं। ऐसे लोगों के विरूद्ध कार्रवाई का आदेश जारी किये जा रहे हैं। अब केवल अधिकृत पदाधिकारियों के अलावा कोई नेता या कार्यकर्ता सपा का झंडा लगाकर गाड़ी में नहीं घूमेगा। अनधिकृत रूप से पार्टी का झंडा लगाकर घूमने वालों के खिलाफ अभियान चलाया जायेगा।

विरोधियों का कहना है कि प्रदेश में जंगलराज जैसे हालात हैं ?

हां, पहली नजर में ऐसा लगता है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था कुछ खराब है। हमने पुलिस के आला अफसरों को सख्त हिदायत दी है कि किसी भी मामले में एफआईआर लिखने में जरा भी हीलाहवाली न की जाये। बसपा राज में क्या होता था, सब जानते हैं। भुक्तभोगी को रिपोर्ट लिखाने के लिये अदालत के चक्कर लगाने पड़ते थे। फिर भी हम निश्चिंत होकर नहीं बैठे हैं। अपराध कहां नहीं हो रहे हैं, लेकिन यूपी को लेकर ज्यादा ही चर्चा की जाती है। गुंडों-माफिया की पार्टी में कोई जगह नहीं है। ऐसी शिकायतें मिलने पर कई लोगों के खिलाफ कारवाई तो हो ही रही है, उन्हें पार्टी से बाहर का भी रास्ता दिखा दिया गया है।

कुछ दार्शनिक अंदाज में मुख्यमंत्री एक संत की कथा सुनाते हैं। संत महात्मा प्रवचन दे रहे थे। इसी बीच एक भक्त के सवाल का समाधान करने के लिये वह तेजी से खड़े हुए और मंच पर लगी सफेद चादर पर पेंसिल से एक छोटा सा गोला बिना दिया। इसके बाद उन्होंने बारी-बारी से कई भक्तों से प्रश्न किया,‘ उन्हें क्या दिखाई दे रहा है, ‘सब ने एक ही उत्तर दिया, चादर पर दाग लगा हैं। संत बोले, बस यही फर्क है। पूरी चादर सफेद है, यह किसी को नहीं दिखाई दे रहा है। ऐसा ही मेरे और मेरी सरकार के साथ हो रहा है। विकास के जो काम तेजी से हो रहे हैं वह सफेदी किसी को नहीं दिखाई दे रही है। टपुट घटनाओं की कालिख लगाई जा रही है। र भी हमारा प्रयास है कि इन घटनाओं पर अंकुश लगे। भियान चलाकर अपराधियों और माफिया के विरूद्ध जल्द ही कार्रवाई शुरू की जायेगी।

भ्रष्टाचार से सरकार की छवि पर बट्टा लगा है ?

जब भी कोई पार्टी सत्ता में आती है तो तमाम मौकापरस्त लोग उसी पार्टी का लबादा ओढ़ लेते हैं।ऐसा कमोवेश सभी सरकार के साथ होता रहा है।अपराधियों और भ्रष्टाचारियों का कोई दल या सिद्धांत नहीं होता है।भ्रष्टाचार के मामले में सामने आने वाले शैलेन्द्र अग्रवाल का मामला भी इसी तरह का है।सरकार की तत्परता के कारण ही वह जेल पहुंचा है,जिसने जो भी गुनाह किया है,उसे उसकी सजा जरूर मिलेगी।नोयडा अथार्रिटी के भ्रष्ट इंजीरियर यादव सिंह के खिलाफ भी कठोर कारवाई हुई है।

नेताजी आपकी सरकार की कई बार खिंचाई कर चुके हैं ? 

यही तो समस्या है।अगर नेताजी(मुलायम सिंह)चुप रहते हैं तो लोग कहते हैं पुत्र मोह में उन्होंने सरकार की तरफ से आंखे मूंद रखी हैं और जब वह हमें दिशा-निर्देश देते हैं तो कहा जाता है कि वे अपनी ही सरकार के कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं।नेताजी,मेरे पिता के साथ-साथ पार्टी के मुखिया भी हैं।वे मन से मुलायम हैं,निर्णय लेने में कठोर।उनके(मुलायम) कट्टर विरोधी भी यह बात जानते हैं।पार्टी या सरकार में कहीं कोई मतभेद नहीं है।अब आप ही सोचिए,नेता जी अगर सार्वजनिक रूप से हमें नहीं डांटे तो लोग कहते हैं कि वो सुपर सीएम हैं और जब डांटते हैं तो साफ हो जाता है कि सरकार मैं ही चला रहा हूं। अब चार,साढ़े चार या सुपर सीएम की बात कहीं चर्चा में है।

कुछ मोदी सरकार का काम संतोषजनक है ?

मोदी सरकार को दिखावा करने की ज्यादा रूचि है।जो काम यूपी करता है,वह काम बाद में केन्द्र करता है। यह एक चालू पार्टी की सरकार है जिसका मुखिया भी चालू है।अच्छे दिन की बात करते थे, कहां गये अच्छे दिन।सब जानते हैं क्या हो रहा है।यूपी में भाजपा के 73 सांसद हैं,लेकिन इसमें से एक-दो को छोड़कर सब के सब सत्ता के नशे में चूर हैं।उमा भारती की मैं प्रशंसा करता हॅू।उनकी वजह से मध्य प्रदेश से पानी सहजता से मिल गया।बाकी सभी सांसद भी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यदि प्रदेश की 20 प्रतिशत भी मदद कर दें तो यूपी की तस्वीर बदल जायेगी।

योग के कारण मोदी चर्चा में हैं ?

मोदी की तरह चर्चा में रहने का गुण सबको नहीं आता है।योग पर विवाद गलत है।जब किसी काम को करते समय नियत में खोट होती है तो विवाद पैदा हो ही जाता है। योग का अभियान चलाने वाले लोग  हैवी वेटेड हैं। इसे धर्म से जोड़ने का काम भगवा खेमें ने किया, वर्ना तो कई सदियों से लोग शांतिपूर्वक योग कर रह  थे।

भाजपाई साम्प्रदाकिता का आरोप लगाते हैं। आजम खां के बयानों से खासकर उनको शिकायत है ?

हम लोहिया-जेपी के दिखाये समाजवाद के रास्ते पर चलते हैं।जहां सबका विकास तय होता है।भाजपा वाले जातिवादी,समाजघाती और साम्प्रदायिकता की राजनीति करते हैं।आजम खां पार्टी और सरकार के जिम्मेदार नेता हैं।वह बिना सोचे-समझे नहीं बोलते।वह अल्पसख्यकों का दुख-दर्द समझते हैं।अगर वह यह दर्द सार्वजनिक करते हैं तो इसमें बुराई क्या है।अल्पसंख्यकों का दिल जीतने का काम हमारी पार्टी और सरकार कर रही है।

आपके मन की बात ?

मैं न तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी आदि तमाम नेताओं की तरह अपने नाम और काम की मार्केंटिग कर पाया और न ही मीडिया मैनेजमेंट की कला मुझे आई।जिस वजह से प्रदेश के दूरदराज इलाकों की बात छोड़ भी दी जाये तो लखनऊ के ग्रामीण इलाको की भी बड़ी आबादी मेरे चेहरे और नाम से परिचित नहीं है।कुछ दिनों पहले की बात है।मैं लखनऊ के ग्रामीण इलाकों का दौरा करने गया था।दौरे के दौरान प्राथमिक और जूनियर स्कूलों का भी निरीक्षण किया।जूनियर स्कूल के निरीक्षण के दौरान मेरे साथ गये एक मंत्री ने आठवीं क्लास के बच्चे से मेरी तरफ इशारा करते हुए पूछा,‘जानते हो कौन है ?मंत्री का सवाल सुनते ही बच्चा तुरंत बोला,‘राहुल गांधी हैं।’यह जवाब सुनकर बच्चे के साथ खड़े टीचरों के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं।मगर मैं समझ गया था कि यह बच्चे की नहीं मेरी गलती है।अगर मैं भी नरेन्द्र मोदी,राहुल गांधी,अरविंद केजरीवाल आदि की तरह अपने चेहरे और नाम का प्रचार करता तो यह स्थिति नहीं आती।इसी के साथ अखिलेश जोड़ देते हैं,’वैसे तो नाम में कुछ नहीं रखा है,लेकिन चुनावी राजनीति में चेहरे और नाम की महत्ता से इंकार भी नहीं किया जा सकता है। 

पत्रकार अजय कुमार से संपर्क : 9335566111, ajaimayanews@gmail.com

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उत्तर प्रदेश में सुरक्षित नहीं हैं पत्रकार

ये उत्तर प्रदेश है। यहाँ कानून नहीं, बल्कि राजनेताओं, मंत्रियों, किस्म-किस्म के माफिया, अपरााधियों, भाड़े के हत्यारों का राज  चलता है। आजकल इस राज्य में गुण्डागर्दी अपने चरम पर है और पूरी तरह ‘जंगलराज’ कायम है।

चोरी, लूट-खसोट, डकैती, चौथ वसूली, सरकारी-गैर सरकारी जमीनों पर कब्जे अपहरण, हत्याएँ आम बात हो गयी हैं। बिना रिश्वत किसी भी सरकारी कार्यालय में कोई काम नहीं होता। अब जो भी इन गुण्डों और माफियों का विरोध करता है या सच्चाई का साथ देता है उसे या तो झूठे मुकदमों में फँसा दिया जाता है या फिर मारपीट कर हाथ-पाँव तोड़ कर उसे खामोश कर दिया जाता है। आखिर में  उसे हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया जाता है। पुलिस-प्रशासन भी इन्हीं राजनेताओं, माफियों के इशारे पर काम करता है जिससे ये लोग हर तरह से जनता का शोषण और उत्पीड़न कर रहे हैं। यहाँ पत्रकार ही क्या? इनके काले कारनामों की मुखाफत करने वाले हर शख्स की जान खतरे में है इनमें ईमानदार कर्त्तव्यनिष्ठ पुलिस-प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हैं। कई बार अधिकारी और पुलिसकर्मी भी इस सरकार के मंत्रियों से अपमानित ही नहीं, उनके पाले पोसे खनन तथा भू-माफियों से पिट भी चुके हैं। 

हाल ही में शाहजहाँपुर के पत्रकार जगेन्द्र सिंह को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है। वह ‘शाहजहाँपुर समाचार’ के नाम से एक ई-अखबार पत्र चला रहे थे। इसमें वे अपने शहर की विभिन्न समाचार प्रकाशित करते थे। मुश्किल तब आयी ,जब अपने क्षेत्र के विधायक और पिछड़ा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा के खिलाफ खबरें दिखाना शुरू किया। इस मंत्री और उसके गुर्गों पर एक आँगनवाड़ी कार्यकर्ती ने अपने साथ सामूहिक दुष्कर्म का आरोप लगाया था। हालाँकि ये खबर प्रदेश के सभी प्रमुख अखबारों में छपी थी, इसी खबर को जगेन्द्र सिंह ने भी अपने ‘शाहजहाँपुर समाचार’ में विस्तार से छापा। इससे पहले भी जगेन्द्र सिंह राममूर्ति वर्मा के अवैध कारोबार ,जमीनों पर अवैध कब्जों और भ्रष्टाचार के बारे में लगातार लिखते आये थे। इससे मंत्री राममूर्ति वर्मा उनसे बेहद खफा थे। इसी सिलसिले में 28 अप्रैल को जगेन्द्र सिंह के साथ मारपीट की गई ,जिसमें उनके पैर की हडडी टूट गयी। इस घटना की शिकायत उन्होंने जिले के सभी उच्च पुलिस-प्रशासनिक  अधिकारियों से की और उनसे अपनी जान की सुरक्षा की गुहार लगायी। इस पर पुलिस ने उन्हीं के खिलाफ अपहरण और हत्या की साजिश का रचने का झूठा मुकदमा लिख लिया। 22मई को सांय 5बजे जगेन्द्र ने अपनी फेसबुक पेज पर पोस्ट किया कि मंत्री राममूर्ति वर्मा मेरी हत्या करा सकते हैं। इस समय नेता, गुण्डे और पुलिस मेरे पीछे पड़े हैं। ‘सच लिखना भारी पड़ रहा है जिन्दगी पर …….. विश्वस्त सूत्रों से सूचना मिल रही है कि मंत्री राममूर्ति वर्मा मेरी हत्या का षडयंत्र रच रहे हैं और जल्दी ही कुछ गलत घटने वाला है…….

फिर 31 मई को जगेन्द्र सिंह की कई खबरांे से दो पोस्ट वर्मा के खिलाफ थी जिनका शीर्षक ‘राज्यमंत्री राममूर्ति वर्मा के पास कहाँ से आयी अरबों की  सम्पत्ति?’ दूसरा ‘बलात्कारियों को बचाने में जुटे सपा नेता’। अगले दिन ही पुलिस उनके घर आ धमकी। यह देख कर जगेन्द्र ने घर का दरवाजा बन्द करते हुए कहा,‘‘चले जाओ, नहीं तो मैं आत्महत्या कर लूँगा।’’ उनकी इस बात का अनसुना कर दिया गया। पुलिस वाले दरवाजा तोड़ कर अन्दर घुस जाते हैं। पेट्रोल से सराबोर जगेन्द्र परिवार के सामने जल जाते हैं। अब पुलिस कह रही है कि आग उन्होंने खुद लगायी, जबकि जगेन्द्र के परिजनों का कहना है कि आग पुलिस वालों ने लगायी थी। यही बात 9जून को मरने से  पहले अपने मृत्युपूर्व बयान में मजिस्टेªट के समक्ष जगेन्द्र सिंह ने की थी।इसमें उन्होंने कोतवाल श्रीप्रकाशराय समेत अन्य पुलिसकर्मियों पर राज्यमंत्री वर्मा के इशारे पर जलाने का आरोप लगाया था। असलियत क्या है? इसका पता  जाँच के बाद ही चलेगा। अब सवाल यह है कि जिस पुलिस पर पत्रकार जगेन्द्र को जलाने का आरोप है, वह क्या सही जाँच कर पायेगी?

दूसरा मामला 11जून कानपुर है। कुछ अज्ञात लोगों ने वरिष्ठ पत्रकार दीपक मिश्रा को ताबड़तोड़ गोलियाँ मारीं, जब वे कहीं अपनी बाइक से कहीं जा रहे थे। उन्होंने जुआ, सट्टे  के कारोबारियों के खिलाफ कई खबरें लिखीं थीं। इस कारण रंजिश मानकर उनके साथ यह वारदात करायी गयी है।

इसके बाद 12जून को बस्ती में दैनिक ‘अमर उजाला’ के पत्रकार धीरज पाण्डेय को सपा के पूर्व विधायक ने अपनी सफारी कार से कुचल दिया। गम्भीर रूप से घायल पत्रकार मेडिकल कॉलेज के ट्रोमा सेण्टर में इलाज चल रहा है और उनकी हालत नाजुक बनी हुई है।

इसी तरह पीलीभीत में 13जून को न्यूज चैनल के टी.वी.पत्रकार और शेरपुर कलां निवासी हैदर खान को जान से मारने की कोशिश की गयी। वह जमीन पर जबरन कब्जे की रिपोर्टिंग कर रहे थे। खान के अनुसार उन्हें जानकारी मिली थी कि एक फरार डकैत बलिहारी गाँव में एक दुर्घटना में घायल हो गयाहै। लेकिन घटना स्थल पर पहुँचने पर अरविन्द प्रकाश को अपने अन्धे भाई के हिस्से की छह एकड़ जमीन पर कथित कब्जा करते देख वे उसकी रिपोर्टिंग करने लगे। कुछ दिन पहले अरविन्द प्रकाश ने जमीन जबरन अपने नाम कराने को पिता से मारपीट की थी। इस घटना का समाचार भी हैदर खान प्रसारित किया था। इससे नाराज  दबंगों ने उनके साथ मारपीट की तथा बाइक से रस्सी से बाँध कर घसीटा। उन्हें मरा हुआ जान कर छोड़ गए। किसी व्यक्ति की सूचना पर पुलिस पूरनपुर कोतवाली लायी तथा उपचार के लिए सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया।

इसके बाद 14जून को बहराइच में आर.टी.आई.कार्यकर्ता गुरुप्रसाद को जान से मार दिया गया।वह भी ग्राम प्रधान के भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश कर रहे थे। इसी दौरान शामली के काँधला में पत्रकार विनय बालियान पर जानलेवा हमला हुआ है। अब 23जून को मऊ सलोनी में पत्रकार राजेश जायसवाल पर जानलेवा हमला किया गया। उल्टे स्थानीय विधायक के दबाव में पत्रकार जायसवाल के खिलाफ ही रिपोर्ट दर्ज करायी गयी है। प्रदेश में ये कैसा समाजवाद है कि जो पत्रकारों को ही नहीं, जो इनके काले कारनामों को बाधक बनता है उसी को खत्म करने में लगे हैं। यद्यपि जनता के दबाव में पुलिस ने पत्रकार जगेन्द्र सिंह की हत्या के मामले में कोतवाल श्रीप्रकाश तथा दूसरे पुलिसकर्मियों के साथ-साथ पिछड़ावर्ग कल्याण राज्यमंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा के खिलाफ रिपोर्ट जरूर दर्ज कर ली है, पत्रकार जगेन्द्र सिंह के ‘मृत्युपूर्व बयान’ (डाइंगडिक्लेरेशन) के बावजूद  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव वोट का जातीय सन्तुलन बिगड़ने के डर से इस मंत्री की गिरफ्तारी तो दूर, उसे अपने मंत्रिमण्डल से हटाने से भी बच रहे हैं, जबकि राज्यभर में पत्रकार अपने साथी की इस नृशंस हत्या से व्यथित हो आन्दोलित होकर उसे हटाने की माँग कर रहे हैं। अखिलेश यादव की सरकार की इस जातिवादी सोच से भविष्य में उनकी पार्टी को कितना नफा-नुकसान होगा? यह अब सन् 2017 के विधानसभा के चुनाव के नतीजे बताएँगे।  उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात पर यह शेर मौजू है-

‘‘कभी शेर की तरह दहड़ता था, आज आवाज खतरे में है। चन्द गद्दारों के कारण, सारा समाज खतरे में है। लहू भर के कलम में देश सींचा जिसने, अरे देखो! आज वही पत्रकार खतरे में है।”

लेखक धर्मेन्द्र कुमार चौधरी से संपर्क : 9412813583

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पत्रकार आधी जंग जीते, जगेंद्र के परिजनों को 30 लाख मुआवजा, दो को नौकरी का भरोसा दिया सीएम अखिलेश यादव ने

नई दिल्ली: पत्रकार जगेंद्र हत्याकांड के आरोपी मंत्री पर तो अभी तक कार्रवाई नहीं हुई लेकिन परिवार से मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तीस लाख रुपए के मुआवजे और घर के दो लोगों को नौकरी का भरोसा दे दिया है. इसके बाद परिवार ने धरना खत्म कर दिया है.

पत्रकार जगेंद्र के परिवार ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से लखनऊ में मुलाकात की. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने परिवार को इंसाफ का भरोसा दिलाया है. अखिलेश के कहने पर परिवार ने धरना खत्म कर दिया है. पत्रकार जगेंद्र सिंह की जलाकर हत्या कर दी गई थी. यूपी के मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा पर हत्या का आरोप है. घरवालों ने आरोप लगाया है कि कि मंत्री की तरफ से पैसे लेकर समझौते का दबाव बनाया जा रहा है.

शाहजहांपुर में इंसाफ के लिए परिवार धरने पर बैठा था. जगेंद्र सिंह के परिवार का आरोप है कि हत्या के आरोपी मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा की ओर से उन्हें समझौते के लिए धमकी दी जा रही है. परिवार ने इसकी शिकायत पुलिस से भी कर दी है और केस दर्ज हो गया है. मामले की जानकारी मिलते ही डीआईजी आर.के.एस राठौर खुद परिवार वालों से मिलने पहुंचे.

पत्रकार जगेंद्र सिंह के घरवालों के मुताबिक आरोपी मंत्री राममूर्ति सिंह वर्मा के 2 लोग आ कर उन्हें समझौते के लिए धमकी दे रहे हैं. परिवार का कहना है कि उन्हें 20 लाख रुपये लेकर मामले को खत्म करने को कहा जा रहा है. गौरतलब है कि जगेंद्र ने मौत से पहले अपने बयान में पुलिसवालों पर यूपी के मंत्री राममूर्ति वर्मा के इशारे पर जलाने का आरोप लगाया था।

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जगेंद्र हत्याकांड पर राज्यपाल नाइक से मिले मुख्यमंत्री, निष्पक्ष जांच और मदद पर वार्ता

लखनऊः उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक से आज राजभवन में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुलाकात की तथा शाहजहांपुर जिले के पत्रकार जगेन्द्र सिंह की मृत्यु के मामले पर विस्तृत चर्चा की. राजभवन से जारी एक विज्ञप्ति के अनुसार, राज्यपाल ने मुख्यमंत्री यादव से कहा कि पत्रकार जगेन्द्र सिंह की मौत के मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए जिससे सही तथ्य सामने आयें.

गौरतलब है कि शाहजहांपुर में एक जून को पुलिस के छापे के दौरान पत्रकार जगेंद्र को कथित रुप से जला दिया गया था और आठ जून को लखनऊ के एक अस्पताल में उनकी मौत हो गयी थी. सिंह के पुत्र राघवेंद्र ने इस कांड के पीछे मंत्री वर्मा का हाथ होने का अरोप लगाते हुए उनके और छापे में शामिल दारोगा एवं चार पुलिस कर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करायी थी.

राज्यपाल ने कहा कि सही जांच से आम जनता में विश्वास पैदा करने की जरुरत है. राज्यपाल ने दिवंगत पत्रकार के परिवार को समुचित सहायता राशि देने की भी बात कही. नाईक ने कहा कि शाहजहांपुर मामले को लेकर कई राजनैतिक दल, पत्रकार संगठन तथा अन्य संस्थाओं ने भी उन्हें ज्ञापन दिया है. मुख्यमंत्री ने उन्हें बताया कि मामले की विस्तृत जांच पुलिस महानिरीक्षक बरेली आर के एस राठौर से करायी जा रही है. उन्होंने भरोसा दिलाया कि जांच पूरी निष्पक्षता, शीघ्रता एवं न्यायोचित ढंग से करायी जायेगी.

इस संबंध में कल भाजपा और कांग्रेस प्रतिनिधिमंडलों ने भी राज्यपाल से मुलाकात की थी और अलग अलग सौंपे ज्ञापनों के जरिये मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी. दोनों दलों ने इस मामले में आरोपी, प्रदेश सरकार के पिछडा वर्ग कल्याण राज्य मंत्री राम मूर्ति सिंह वर्मा को बर्खास्त किए जाने की मांग की है.    

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जगेंद्र हत्याकांड पर मुख्यमंत्री की हठधर्मिता और शिवपाल का बयान शर्मनाक

शाहजहांपुर : पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत के बाद उनके परिवार के लिए उत्तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव से मदद मिलने के बजाय सरकार अपनी हठधर्मिता पर उतारू है। सपा के कैबिनेट मंत्री शिवपाल सिंह ने जो बयान जगेंद्र की हत्या को लेकर दिया, वह शाहजहांपुर ही नहीं, पूरे देश को शर्मसार करने वाला है। 

एक मौत होती है स्वभाविक। जगेंद्र सिंह को एक मंत्री की साजिश का शिकार होना पड़ रहा है। उनको जिंदा फूंका गया है। उस पर कार्रवाई करने के बजाय प्रदेश के जिम्मेदार मंत्री बयान दे रहे हैं कि जांच से पहले कोई मंत्री हटाया नहीं जाएगा। एफआईआर का मतलब अपराधी नहीं होता! तो मैं पूछना चाहता हूं प्रदेश के इन जिम्मेदारों से क्या जगेंद्र पर मुकदमा लिखाने के बाद उसकी जांच करवाई गई थी। या वैसे ही कोतवाल को पेट्रोल लेकर दबिश देने भेज दिया। अगर ऐसा ही है तो प्रदेश के थानों से एफआईआर का सिस्टम खत्म कर दो और जांच कमेटियां बना दो। उनकी रिपोर्ट आने के बाद अपराधियों को पकड़वा लेना। 

एक ओर जगेंद्र के परिजनों को इंसाफ दिलाने के लिए पूरे देश के पत्रकार एकजुट होकर सीएम से न्याय मांग रहे हैं, उस पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा और वह मीडिया से सरकार की छवि खराब होने से बचाने को सहयोग मांग रहे हैं। यह कैसे दोहरी नीति है। किस मुंह से मीडिया से सहयोग मांग रहे हैं। उसी मुंह से, जिससे कोतवाल श्रीप्रकाश राय को यह कहा गया था कि जाओ जगेंद्र को फूंक दो! प्रदेश के मुखिया के कानों में उस विधवा की कराह नहीं पहुंची, उन बेटों की आह नहीं पहुंची, जिनके सिर से बाप का साया उठ चुका है। उस बूढे बाप की पथराई आंखों में अपने बेटे के इंतजार के आंसू भी नहीं दिखे! जो खुटार में अपने जांबाज जगेंद्र के मरने के बाद न्याय मांग रहा है। 

अरे न्याय भी तो सपा से और आप से ही चाहिए, कम से कम एक दिवंगत पत्रकार की मदद कर देते सीएम साहब। यूपी के उस मंत्री को बर्खास्त ही कर देते। जांच में बेगुनाह होता तो फिर सौंप देते ताज। जैसा राजा भैया को सौंपा था। पत्रकार तो एक मंत्री की बर्खास्तगी चाह रहे हैं। आप तो पूरे मीडिया से अपनी सरकार की छवि बनाने की भीख मांग रहे हैं। उसी सरकार की छवि, जिसको राममूर्ति जैसे मंत्री दागदार कर रहे हैं। अरे सीएम साहब छवि सुधारना है तो पहले मंत्रियों को सुधार लो, खुद ब खुद सुधर जाएगी छवि। सहयोग मांगने से पहले कम से कम एक बार सोच लिया होता कि जिस मीडिया कर्मी के लिए पूरा देश आपसे न्याय मांग रहा है, उसमें आप कतई सहयोग नहीं कर रहे हैं और आप मीडिया से सहयोग की अपेक्षा रख रहे हैं। 

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जगेंद्र हत्याकांड पर पीएम, सीएम से बात करेंगे राज्यपाल, अखिलेश अपनो की करतूत से विचलित

यूपी के राज्यपाल राम नाइक ने पत्रकार जगेंद्र सिंह के परिजनों को भरोसा दिया है कि वह घटना की विश्वसनीय जांच सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से बात करेंगे। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बहराइच में गत दिवस संकेतों में कहा कि हमारी सरकार के कुछ लोग गलत काम कर रहे हैं। उधर, जगेंद्र सिंह का परिवार पिछले कई दिनो से धरने पर बैठा है लेकिन आरोपी मंत्री के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार से पूरे घटनाक्रम पर रिपोर्ट तलब कर ली है। मामले की अगली सुनवाई आगामी 24 जून को होगी।

जिंदा जलाकर मारे गए पत्रकार जगेंद्र सिंह के बेटे राहुल से फोन पर बातचीत करते हुए उत्तरप्रदेश के राज्यपाल राम नाइक ने कहा है कि उनकी मौत की जांच में विश्वसनीयता सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने पीड़ित परिजनों को न्याय का भरोसा दिलाते हुए परिवार की सुरक्षा के बारे में बातचीत की। उन्होंने कहा कि वह पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बातचीत करेंगे।

उधर, बहराइच में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि हमारी सरकार अच्छा काम कर रही है लेकिन अपने ही कुछ लोग उल्टा-सीधा काम कर के सराकार की छवि को बट्टा लगा रहे हैं। उनका इशारा आरोपी मंत्री राममूर्ति वर्मा की तरफ माना जाता है। गौरतलब है कि सोशल मीडिया पत्रकार जगेंद्र के कथित हत्या के आरोपी मंत्री राममूर्ति वर्मा की अभी तक गिरफ्तारी नहीं हुई है। शिवपाल सिंह यादव कह चुके हैं कि जांच पूरी होने से पहले राममूर्ति को बर्खास्त नहीं किया जाएगा। पार्टी महासचिव रामगोपाल यादव भी कह चुके हैं कि रिपोर्ट दर्ज हो जाने से कोई अपराधी नहीं हो जाता है। 

उधऱ शाहजहांपुर में पत्रकार जगेंद्र सिंह का परिवार इंसाफ की उम्मीद में पिछले कई दिनो से धरने पर बैठा है। उनकी पत्नी, पिता और बच्चे धरने पर हैं। उनकी पत्नी धरनास्थल पर ही बेहोश होकर गिर पड़ी हैं लेकिन केस दर्ज होने के एक हफ्ते बाद भी आरोपी मंत्री को न तो बर्खास्त किया गया है न आरोपी थाना प्रभारी गिरफ्तार हुआ है। परिवार मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहा है। जगेंद्र सिंह हत्याकांड पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने राज्य सरकार से एक हफ्ते में जवाब तलब किया है। कोर्ट ने कहा है कि सरकार जांच की स्टेटस रिपोर्ट भी दाखिल करे। अगली सुनवाई 24 जून को होनी है।

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सीएम खट्टर ने मुझे मीडिया के पास जाने से मना किया है : सांसद अश्विनी चोपड़ा

सोनीपत / पानीपत (हरियाणा) : सांसद अश्विनी चोपड़ा ने खुलासा किया है कि मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने उन्हें मीडिया के पास जाने से मना किया है। सीएम ने कहा कि वे उनसे सीधी बात करें। आगे से अपने मुद्दों को लेकर मीडिया के पास न जायें। सांसद के अनुसार सीएम ने कहा- ‘क्या जरूरत है, आपको मीडिया में जाने की, मुझे बताओ, मैं सब ठीक करूंगा।’ इस पर चोपड़ा का सीएम को जवाब था – ‘मैं भी चाहता हूं कि आपसे बतौर सांसद बात करूं, पर क्षेत्र की उपेक्षा सहन नहीं कर पाता और मेरे भीतर का पत्रकार जाग उठता है, मैं क्या करूं?’

दो दिन पहले मुख्यमंत्री के साथ बैठक के बाद सांसद अश्विनी चोपड़ा का कहना था कि कुछ एक अधिकारी हैं, जो अभी भी भ्रष्टाचार करने के प्रयास में हैं। प्रमाण मिलने पर वे उन अधिकारियों को स्वयं बेनकाब कर देंगे। सांसद ने कहा कि मेरे और सीएम के बीच बड़े खट्टे-मीठे रिश्ते हैं, कई बार पहले भरत मिलाप हो भी चुका है और कई बार वनवास भी हो चुका है।

गौरतलब है कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के साथ स्वीडन का दौरा करके लौटे चोपड़ा ने कहा था कि केन्द्र सरकार की ओर से करनाल की उपेक्षा करके हिसार में हवाई अड‍्डे की मंजूरी दिये जाने से मैं दुखी हूं, हवाई अड‍्डे को करनाल लाने के लिये सीएम को भी जोर लगाना चाहिये था। फिर एक अन्य बयान में चोपड़ा ने पानीपत के पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा था कि सीएम खट्टर तो शरीफ आदमी हैं और उनका करियर बेदाग है, लेकिन कुछ लोग उनका नाम बदनाम करना चाहते हैं। इन एक-दो लोगों की वजह से सारी प्रॉब्लम है और यह आगे भी रहेगी।

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काश, कोई ‘हेमंत तिवारी’ जगेंद्र सिंह का केस भी सीएम तक पहुंचा दे

शाहजहांपुर के सोशल मीडिया पत्रकार जगेन्द्र सिंह का लखनऊ के सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान निधन हो गया। जगेंद्र सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय थे और वो सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर काफी मुखर थे। राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार एन यादव का हृदयगति रुक जाने से निधन हो गया। वे हिंदी दैनिक आज के ब्यूरो प्रमुख पद पर कार्यरत रहे थे।

दिवंगत पत्रकार एन यादव के लिए मुख्यमंत्री ने 20 लाख रुपये की सहायता दी। हेमंत तिवारी (अध्यक्ष मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति) के आग्रह पर अखिलेश जी आपने यह धनराशि स्वीकृत की। उत्तर प्रदेश सरकार के एक मंत्री से लोहा लोने वाले जुझारू पत्रकार जगेंद्र सिंह की मौत पुलिस द्वारा डाली गई दबिश के दौरान जलकर घायल होने से हुई। जगेंद्र सिंह ने भी लखनऊ में ही सिविल अस्पताल में आखिरी साँस ली। 

एक सवाल : क्या मुख्यमंत्री जोगिंदर के परिजनों की कुछ आर्थिक मदद करेंगे। हेमंत तिवारी “गजेन्द्र” आप का वोटर नहीं है, क्या इसलिए आप ने उसकी मौत की खबर पर गौर नहीं किया। शाहजहांपुर जिले में कार्यरत एक जुझारू पत्रकार और एक संपादक की तुलना नहीं हो सकती पर मृत्यु के बाद कम से कम संवेदना तो एक बराबर दिखाई जा सकती है। क्षमा करें, मेरा मकसद लाश पर राजनीति करने का बिलकुल नहीं है (जैसा कि अन्य पत्रकार नेताओं का प्रतीत होता है) पर बात दिल को लगती है, इसलिए मुखर हो कर बोल रहा हूँ।

एक क्षुब्ध पत्रकार के पत्र पर आधारित

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दम तो है केजरीवाल की तल्खी में

अरविन्द केजरीवाल की तल्खी और आरोपों को लगाने की दमदारी का मैं हमेशा कायल रहा हूं। एक सशक्त लोकतंत्र में जब तक इस तरह की बेबाकी नहीं होगी तब तक उसकी गूंज राजनीतिक गलियारों से लेकर मीडिया तक सुनाई नहीं देगी। सफल लोकतंत्र का तो सबसे बड़ा तकाजा भी यही बोलता है कि पक्ष से ज्यादा ताकतवर विपक्ष होना चाहिए तब ही जनता के हित सुरक्षित रह सकेंगे। इसमें भी कोई शक नहीं कि भाजपा ने विपक्ष का रोल पूरी दमदारी से निभाया और आज भी सत्ता पक्ष में आने के बावजूद वह अपने प्रचार-प्रसार और मार्केटिंग में कोई कोताही नहीं बरत रही है। इसके ठीक विपरित कांग्रेस की हालत यह है कि उसकी ट्यूबलाइट लगातार बुरी तरह हार के बावजूद आज तक नहीं जलती दिख रही है।

उसके युवराज राहुल गांधी रटारटाया भाषण देते हैं और फिर पता नहीं कहां गायब हो जाते हैं। अभी मणीपुर से लेकर जम्मू कश्मीर जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे रहे, जिन पर सोनिया से लेकर राहुल गांधी का एक भी जबरदस्त बयान सामने नहीं आया। इसके विपरित अरविंद केजरीवाल के बयानों में जहां दम रहता है वहीं वे नरेन्द्र मोदी से लेकर भाजपा और कांग्रेस पर हमला बोलने में पीछे नहीं रहते और रॉबर्ट वाड्रा से लेकर अम्बानी तक को नहीं बख्शते। यह बात अलग है कि नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी की तुलना में उन्हें उतना पॉजिटिव प्रचार नहीं मिलता और मीडिया भी बाल की खाल निकालने में जुटा रहता है। मैं खुद कई बार यह कह चुका हूं कि नरेन्द्र मोदी का विरोध करने की कूवत सिर्फ और सिर्फ अरविन्द केजरीवाल में ही है और यह बात खुद अन्ना हजारे भी कह चुके हैं। अभी तो विपक्ष यानि कांग्रेस भी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ हमलावर रुख अपनाने में लगभग असफल रही है। भूमि अधिग्रहण बिल जैसे मुद्दे को अगर छोड़ दिया जाए और मीडिया भी उतनी चीरफाड़ नहीं कर रहा जितनी पैनी निगाह उसकी नई दिल्ली की आप पार्टी सरकार और टीम केजरीवाल पर रहती है।

यहां तक कि न्यूज चैनलों के एंकर अमित शाह का इंटरव्यू लेने के वक्त ही भीगी बिल्ली नजर आते हैं और केजरीवाल के मामले में शेर की तरह गुर्राने लगते हैं। एनडीटीवी की बरखा दत्त को दिए गए इंटरव्यू में अरविंद केजरीवाल ने एक बार फिर दमदारी दिखाई और जोरदार तरीके से नरेन्द्र मोदी से लेकर दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग पर हमले बोले। उनकी बात इसलिए भी सही लगती है कि जनता ने उन्हें प्रचंड बहुमत से जिताया, तो दिल्ली में स्वतंत्र रूप से काम भी करने देना चाहिए। अरविन्द केजरीवाल ने एक और बड़े मार्के की बात कही जो मैं खुद पूर्व में कई बार लिख भी चुका हूं कि राहुल गांधी से अधिक राजनीतिक समझ अरविन्द केजरीवाल में है और इस बार तो खुद केजरीवाल ने अपने इंटरव्यू में दो टूक कहा कि नरेन्द्र मोदी उन्हें राहुल गांधी ना समझें।

व्यंग्यपूर्वक की गई इस बात में बड़े गहरे अर्थ छुपे हुए हैं। सोशल मीडिया में तो राहुल गांधी लगातार पप्पू करार दे ही दिए गए हैं और उनकी राजनीतिक समझ भी इस बात को प्रमाणित करती रही है। भाजपा दरअसल नई दिल्ली में तमाम अवरोध इसीलिए खड़ा कर रही है ताकि केजरीवाल सरकार सफल ना हो सके और विवादों में ही घिरी रहे। भाजपा के सारे सुरमा नई दिल्ली में इसीलिए ढेर हो गए और खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी नई दिल्ली के चुनाव में कोई चमत्कार नहीं दिखा पाए। इसी से यह साबित होता है कि नरेन्द्र मोदी का मुकाबला हर स्तर पर अरविंद केजरीवाल ही कर सकते हैं और यह समझ आज तक राहुल गांधी में नहीं देखी गई है और यह बात अब खुद केजरीवाल ने भी व्यंग्यपूर्वक कह दी है। कम से कम राहुल गांधी को अरविंद केजरीवाल से ही क्लास लेने की जरूरत है और पिछले दिल्ली के विधानसभा चुनाव में वे आप पार्टी से सीखने की बात भी कह चुके हैं। कम से कम दिल्ली के मामले में कांग्रेस को भाजपा की हां में हां मिलाना बंद करना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार काम कर सके। अभी तो भाजपा द्वारा लगाए गए आरोपों को ही कांग्रेस दोहराती नजर आती है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक राजेश ज्वेल संपर्क : jwellrajesh@yahoo.co.in

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जयललिता, हरे टोटके और अधूरा राष्ट्रगान

नायिका से नेत्री बनी जयललिता भले ही पांचवीं बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बन गईं हों. लेकिन हर बार किसी न किसी कारण से विवाद में घिर जाने वाली इस आयरन लेडी ने शपथ के साथ ही राष्ट्रगान के अपमान के विवाद को जन्म दे दिया है। 

ईश्वर के प्रति आस्था गर्व की बात है, होनी भी चाहिए क्योंकि इससे अनुशासन, न्याय और सम्मान का भाव जागृत होता है । ऐसा माना जाता है कि अज्ञात ईश्वरीय शक्ति के प्रति आस्था से स्वफूर्त जवाबदेही बनती है जो सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय के साथ आदर एवं सद्मार्ग दिखाती है। क्या जयललिता ने जब उसी ईश्वर के नाम पर शपथ ली तो मुहूर्त के चक्कर में 32 सेकेण्ड बचाने के लिए यह भी भुला दिया कि जिस राज्य और देश ने उन्हें इतना मान दिया, पद प्रतिष्ठा दिलाई उसके प्रति भी तो आदर भाव होना चाहिए, जिसके चलते ही उनका अस्तित्व है, महज 20 सेकेण्ड में छोटा राष्ट्रगान !

राष्ट्र सम्मान अनादर निवारक अधिनियम 1971 की धारा 69 में अपमान के रोकथाम के लिए विधान हैं। राष्ट्रगान को शॉर्ट वर्जन के रूप में 20 सेकेण्ड भी बजाया जा सकता है लेकिन उसके लिए भी स्पष्ट अनुदेश हैं। इस संबंध में गृहमंत्रालय के भी स्पष्ट आदेश हैं। आदेश के भाग क्रमांक 1 के बिन्दु 2 में साफ लिखा है कुछ अवसरों पर राष्ट्रगान की पहली तथा अंतिम पंक्तियों का संक्षिप्त पाठ भी गाया अथवा बजाया जाता है। इसका पाठ इस प्रकार है –

जन-गण-मन अधिनायक जय हे

भारत भाग्य विधाता ।

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे ।।

संक्षिप्त पाठ को गाने अथवा बजाने में 20 सेकेण्ड का समय लगना चाहिए। पूरे राष्ट्रगान में 52 सेकेण्ड लगते हैं। बिन्दु क्रमांक 2 में ही लिखा है- राष्ट्रगान का संक्षिप्त पाठ किसी के सम्मान में पेय पान करते समय बजाया जाएगा। इसी आदेश में बिन्दु 3 पर लिखा है जिन अवसरों पर राष्ट्रगान का पूर्ण गान अथवा संक्षिप्त पाठ गाया जाएगा उसका संकेत इन अनुदेशों में समुचित स्थलों पर कर दिया गया है। इसी आदेश के भाग 2 में राष्ट्रगान के वादन किए जाने की सूची दी गई है जिसमें पूरा पाठ और संक्षिप्त पाठ के गान को स्पष्ट किया गया है। बिन्दु क्रमांक 3 में लिखा है, किसी भी ऐसे अन्य अवसर पर राष्ट्र गान बजाया जाएगा जिसके लिए भारत सरकार ने विशेष आदेश जारी किए हों। जबकि बिन्दु क्रमांक 4 में कहा गया है सामान्यतः प्रधानमंत्री के लिए राष्ट्रगान नहीं बजाया जाएगा तथापि विशेष अवसर पर प्रधानमंत्री के लिए भी इसे बजाया जा सकता है। इसी आदेश में बैण्ड के साथ किस तरह श्रोताओं को पहले से ज्ञान करा दिया जाएगा फिर बजाया जाएगा ताकि राष्ट्रगान का सम्मान होए इसको स्पष्ट किया गया है।  आदेश के भाग 3 में राष्ट्रगान के सामूहिक गायन के लिए भी स्पष्ट निर्देश हैं।  इसी भाग के बिन्दु  में पूरी स्पष्टता से लिखा है – जिन अवसरों पर राष्ट्र गान के गायन की ; गान को बजाने से भिन्न अनुमति दी जा सकती है, उनकी संपूर्ण सूची देना संभव नहीं किन्तु राष्ट्र गान को इसे सामूहिक रूप से गाए जाने के साथ-साथ श्रध्दापूर्वक गाया जाए तथा गायन के समय उचित शिष्टता से पालन किया जाए ।

ऐसा नहीं है कि राष्ट्रगान के अपमान के आरोप से घिरने वाली जयललिता पहली राजनेता हैं। पूर्व केन्द्रीय मंत्री शशि थरूर भी घिर चुके हैं। लेकिन उनका मामला अलग था। उन्होने  16 दिसंबर 2008 को कोच्चि में एक सभा के दौरान जनसमूह से कहा था कि दाहिने हाथ को सीने पर रखकर राष्ट्रगान गाया जाए क्योंकि इस तरह की परंपरा अमेरिका में है। जिस पर मामला केरल उच्चन्यायालय तक भी गया। शशि थरूर के विरुध्द  राष्ट्र सम्मान अनादर निवारक अधिनियम 1971 की धारा 3 के तहत कोच्चि में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई जारी रखने के आदेश केरल उच्चन्यायालय ने दिए थे। 

राष्ट्रगान को उचित सम्मान न दिए जाने का मामला सितंबर 2014 में तिरुवनंतपुरम् से भी आया था जिसमें एक सिनेमा हॉल में राष्ट्रीय गान गाने के सम्मान में एक युवक अपनी जगह खड़ा नहीं हुआ था । 25 वर्षीय सलमान पर सिनेमा हॉल में राष्ट्रीय गान के दौरान बैठे रहने और हूटिंग करने के आरोप के साथ ही तिरंगे का अपमान और फेसबुक पर अशोभनीय टिप्पणी का मामला दर्ज किया गया जिस पर अदालत ने जमानत की याचिका खारिज कर दी  और कहा कि युवक का व्यव्हार राष्ट्र के खिलाफ है। उस पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 124 ए के तहत मामला कायम हुआ था।

इसी वर्ष 26 जनवरी को राजपथ पर उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के राष्ट गान के वक्त सैल्यूट न करने को लेकर भी खूब हंगामा हुआ और सोशल नेटवर्किंग साइट पर लोगों ने विरोध जताया। हुआ ये था कि उप राष्ट्रपति हाथ नीचे किए सावधान की मुद्रा में खड़े थे । उनकी यह तस्वीर चर्चा में आ गई । बाद में उनके कार्यालय से सफाई दी गई जब उप राष्ट्रपति प्रमुख हस्ती होते तो सलामी लेते। लेकिन राजपथ पर जब राष्ट्रपति के अलावा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, रक्षा मंत्री मनोहर पार्रिकर भी सैल्यूट की मुद्रा में थे तब उप राष्ट्रपति नहीं थे। बाद में मामले को बढ़ता देख उप राष्ट्रपति के ओएसडी गुरदीप सिप्पल ने कहा कि प्रोटोकाल के तहत जब राष्ट्रगान बजता है तब प्रमुख हस्तियों व सैन्य अफसरों सलामी देनी होती है जो कि गणतंत्र दिवस परेड में राष्ट्रपति को बतौर सुप्रीम कमांडर लेनी होती है। प्रोटोकाल के तहत उप राष्ट्रपति को केवल सावधान की मुद्रा में खड़े होने की जरूरत है। 

जयललिता ने शपथ के समय जो टोटका भी किया वो भी खूब चर्चा में है। जैसे हरी साड़ी, हरी अंगूठी, हरा पेन, राज्यपाल द्वारा भेट गुलदस्ता भी हरा, उनकी दोस्त शशिकला भी हरे रंग की साड़ी में प्रवेश द्वार और तोरण द्वार भी हरा। सब जगह हरियाली क्यों न हो, जब जयललिता का चुनाव चिन्ह भी हरा है। लेकिन हरियाली के बीच अधूरा राष्ट्रगान और मुहूर्त के लिए केवल 32 सेकेण्ड की बचत ये जरूर सबकी समझ से बाहर है। 

लेखक-पत्रकार ऋतुपर्ण दवे से संपर्क : rituparndave@gmail.com

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जनविरोधी है सचिवालय प्रवेश व्यवस्था, बदलने को प्रत्यावेदन

लखनऊ : आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने सचिवालय प्रवेश की वर्तमान व्यवस्था को पूरी तरह जनविरोधी, अव्यवहारिक और अनुचित बताते हुए इसे बदले जाने की मांग की है.

ये दोनों आज अपनी सुरक्षा और फर्जी मुकदमों से बचाव के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलने एनेक्सी गए थे, जहां उन्होंने देखा कि दूर-दूर से तमाम लोग अपनी फ़रियाद ले कर आये थे पर अन्दर के किसी अधिकारी द्वारा नहीं बुलाये जाने के कारण उनका प्रवेश पास नहीं बन रहा था.

इसी प्रकार मुज़फ्फरनगर दंगों की जांच कर रहे पुलिस इंस्पेक्टर धर्मपाल त्यागी और राम प्रताप सिंह, जिन्हें जे पी सिंह, विशेष सचिव गृह ने बुलाया था, सहित तमाम कर्मचारी भी अन्दर से किसी के नहीं बुलाये जाने के कारण परेशान घूम रहे थे.

इन दोनों को भी मुख्यमंत्री से मिलने के लिए पास नहीं मिला. अमिताभ और नूतन से प्रमुख सचिव, सचिवालय प्रशासन को पत्र लिख कर कहा है कि व्यवस्था पूरी तरह से दूषित है क्योंकि इससे आम आदमी को अकारण सचिवालय में जाने से रोका जा रहा है, साथ ही इससे सुरक्षा का कोई लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा है कि यदि 15 दिन में जरुरी परिवर्तन नहीं हुए तो वे इसे कोर्ट में चुनौती देंगे.  

आईपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर और उनकी पत्नी सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नूतन ठाकुर ने खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के खिलाफ अवैध खनन के परिवाद के बाद लगातार प्रताड़ित किये जाने और फर्जी मुकदमे में फंसाए जाने के सम्बन्ध में आज मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मुलाकात करने का पूरा प्रयास किया लेकिन सचिवालय गेट पर उन्हें रोक देने के कारण उनकी मुलाक़ात नहीं हो सकी.  

लिहाजा उन्होंने गेट पर ही अपना प्रार्थनापत्र देते हुए मुख्यमंत्री से मुलाकात हेतु समय देने का दुबारा अनुरोध किया.

प्रार्थनापत्र में श्री ठाकुर ने कहा है कि दिसंबर 2014 में यह परिवाद दायर करने के बाद उन दोनों को पहले मुक़दमा उठाने की धमकी मिली, फिर पूरी तरह फर्जी बलात्कार के दो आरोप लगाए गए और अब  उनकी पत्नी पर एक गवाह को उस समय पीटने, शर्त फाड़ने और घडी तोड़ने का फर्जी आरोप लगाया गया है जब वह लोकायुक्त के सामने बैठी थीं.

अतः स्वयं को पूरी तरह आशंकित बताते हुए उनसे साथ कोई अनहोनी या किसी झूठे मुकदमे में फंसाने के प्रयास की बात कहते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री से शीघ्र समय देने का अनुरोध किया है.

समाचार अंग्रेजी में पढ़ें –

Calling the present Secretariat entrance system anti-people, impractical and improper, IPS officer Amitabh Thakur and social activist Dr Nutan Thakur have sought its immediate change.

The two had gone to Secretariat Annexe to meet CM Akhilesh Yadav to pray for their security and to be saved from false criminal cases., where they saw large number of applicants from all over the State being denied entry pass because no officer from inside was asking them to be send inside.

Similarly Police Inspector Dharmpal Tyagi and Ram Pratap Singh, investigating Muzaffarnagar riots cases and called by Special Secretary Home J P Singh for issuing certain directions, along with many other government servants had to wait for hours because of not being called from inside.

The two also did not get pass to meet the CM. Amitabh and Nutan have written to Principal Secretary, Secretariat Administration saying that the present pass system is completely fallacious because here common men are being denied permission to go inside, while it has nothing to with security concern. They said that if the system is not changed within 15 days, they will challenge it in the Court.

IPS officer Amitabh Thakur and his wife social activist Dr Nutan Thakur, who have alleged alleged Mining Minister Gayatri Prasad Prajapati of harassing them, after her complaint of illegal mining against him today went to Secretariat to meet the Chief Minister Akhilesh Yadav but were not stopped at Secretariat gate and not permitted to meet.

Hence they gave the application on the gate itself seeking another time to meet Sri Yadav.

The application says that after filing of complaint in December 2014, they first got threat to take back the case, then were implicated in completely false rape cases and now another false case of his wife beating a witness at the time when she was sitting with Lokayukta has come up.

Hence calling themselves apprehensive of their safety and fear of getting implicated in any false case they have sought time to meet the Chief Minister.

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मजीठिया से बचने के लिए जागरण का नया हथकंडा, पहले पेज पर मुक्त कंठ से सीएम उपासना

मजीठिया वेतनमान देने से बचने के लिए दैनिक जागरण प्रबंधन अब तरह-तरह के हथकंडे अपना रहा है। कभी कर्मचारियों को धमकाता है तो कभी प्रलोभन देने लगता है। अब कर्मचारी उसके झांसे में आने वाले नहीं हैं। कर्मचारियों ने अब गांधीवादी तरीके से मजीठिया की लड़ाई जारी रखने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्‍य सरकारों को आदेश जारी कर गेंद कर्मचारियों के पाले में डाल दी है। 

अब कर्मचारियों पर कोई वश न चलते देख दैनिक जागरण ने पाला बदल दिया है और राज्‍य सरकारों को सेट करने में लग गया है। शायद यही वजह है कि कभी उत्‍तर प्रदेश की अखिलेश सरकार के पीछे पड़े रहने वाले दैनिक जागरण ने 9 मई के अंक में लखनऊ संस्‍करण के पहले पन्‍ने पर मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव का साक्षात्‍कार छापा है। उसमें भी इतना ज्‍यादा गुणगान कर दिया है कि उसकी बटरिंग साफ नजर आ रही है। 

पेज-एक पर बटरिंग से पेट नहीं भरा तो साक्षात्‍कार का शेष भाग अंदर के पेजों पर दे दिया है, जबकि विष्‍णु त्रिपाठी ने दैनिक जागरण के दिल्‍ली-एनसीआर संस्‍करणों में शेष की परंपरा ही बंद की हुई है। शेष देने में भी गलती यह हुई है कि खबर के नीचे लिखा है-साक्षात्‍कार का शेष भाग पृष्‍ठ 00 पर देखें। अब 00 पेज क्‍या होता है, यह तो संजय गुप्‍ता ही पाठकों को बता पाएंगे।  

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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सीएम शिवराज ने किया ‘आंखों देखी फांसी’ का लोकार्पण

भोपाल : किताब ‘ऑंखों देखी फांसी’ एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज है. किसी पत्रकार के लिये यह अनुभव बिरला है तो संभवत: हिन्दी पत्रकारिता में यह दुर्लभ रिपोर्टिंग. लगभग पैंतीस वर्ष बाद एक दुर्लभ रिपोर्टिंग जब किताब के रूप में पाठकों के हाथ में आती है तो पीढिय़ों का अंतर आ चुका होता है. बावजूद इसके रोमांच उतना ही बना हुआ होता है जितना कि पैंतीस साल पहले. एक रिपोर्टर के रोमांचक अनुभव का दस्तावेज के रूप में प्रकाशित ये किताब हिन्दी पत्रकारिता को समृद्ध बनाती है. देश के ख्यातनामा पत्रकार गिरिजाशंकर की इस किताब का विमोचन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने गत दिनो किया. इस अवसर पर कार्यक्रम में सम्पादक श्रवण गर्ग भी उपस्थित थे.

किताब लोकापर्ण समारोह में मुख्यमंत्री ने कहा कि उनके लिये यह चौंकाने वाली सूचना थी कि फांसी की आंखों देखा हाल कव्हरेज किया गया हो. गिरिजा भइया जितने सहज और सरल हैं और उतने ही संकोची भी बल्कि वे भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। सम्पादक श्रवण गर्ग ने कहा कि यह किताब रिपोर्टिंग का अद्भुत उदाहरण है. एक 25 बरस के नौजवान पत्रकार की यह रिपोर्टिंग हिन्दी पत्रकारिता के लिये नजीर है. 

गिरिजाशंकर ने अपने अनुभव साझा करते हुये कहा कि यह किताब कोई शोध नहीं है और न कोई बड़ी किताब, लाईव कव्हरेज एवं अनुभवों को पुस्तक के रूप में लिखा गया है. 25 बरस की उम्र में जब मुझे फांसी का लाइव कव्हरेज करने का अवसर मिला था, तब यह इल्म नहीं था कि कौन सा दुर्लभ काम करने जा रहे हैं. अखबार में फांसी का लाइव कव्हरेज प्रकाशित हो जाने के बाद जब देशभर में यह रिपोर्टिंग चर्चा का विषय बनी तब अहसास हुआ कि यह रिपोर्टिंग साधारण नहीं थी. उल्लेखनीय है कि वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी रायपुर के सेंट्रल जेल में वर्ष 1978 में बैजू नामक अपराधी को चार हत्याओं के लिये फांसी की सजा दी गई थी. 

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संदिग्ध पत्रकारों से मुख्यमंत्री अखिलेश की सुरक्षा को खतरा

उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने उन लोगों के लिए नए अवसरों के रास्ते खोल दिए हैं, जो एक साथ दो रोज़गार करना चाहते हैं। प्रदेश सरकार ने निर्धारित नियमों का अतिक्रमण करते हुए दर्जियों, निजि सचिवों, यात्रा एजेंटों, स्थावर संपदा (रियल एस्टेट) एजेंटों, सेवानिवृत्त सरकारी लिपिकों, फास्ट फूड बेचने वालों, फार्मेसिस्टों, शिक्षकों, राजनीतिज्ञों के पुत्रों और यहां तक कि हत्या के आरोपियों को भी पत्रकार के रूप मान्यता दे दी है। नियमानुसार पांच साल तक लगातार पत्रकारिता का अनुभव रखने वालों को ही मान्यता दी जा सकती है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार हाल के महीनों में 150 से अधिक ऐसे लोगों को अखिलेश सरकार ने मान्यता दी है, जिनका पत्रकारिता से कोई बहुत अधिक लेना-देना नहीं है। उदाहरण के लिए, ज्ञानेन्द्र सिंह, जो कि रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैय्या के पीआरओ के रूप में काम करते हैं, उन्हें भी राज्य स्तरीय पत्रकार के रूप में मान्यता दी गई है। उनका कार्ड नंबर 495 है। ज्ञानेन्द्र कथित रूप से एक उर्दू समाचार पत्र के संवाददाता हैं लेकिन सूत्र बताते हैं कि वह उर्दू लिख-पढ़ नहीं सकते।

राज्य सूचना विभाग के करीब 90 फीसदी कर्मचारी अपने पारिवारिक सदस्यों के नाम से समाचार पत्रों का प्रकाशन कर रहे हैं और हर महीने अपने वेतन से दोगुना पैसा अपने ही समाचार पत्र में विज्ञापन छाप कर बना रहे हैं। एक सचिवालय लिपिक, जो हाल ही में सेवानिवृत्त हुआ है, उसने तुरन्त ही मान्यता ले ली। इस मान्यता के सहारे वह अत्यधिक सुरक्षा वाले सरकारी कार्यालयों में जा सकता है और उसने एक सरकारी आवास भी हथिया लिया है। विभाग ने बहुत से गैरजिम्मेदार संपादकों को भी मान्यता दे रखी है। पत्रकारिता में अचानक पैदा हुई इस रुचि का कारण ये है कि इसके माध्यम से आप बड़े नेताओं तक पहुंच बना सकते हैं। आप छोटे-छोटे समाचार पत्रों के माध्यम से पैसा बना सकते हैं जो कि तभी छपते हैं, जब उन्हें विज्ञापन मिले। 

एक वरिष्ठ पत्रकार ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि कैसे लोगों को नियम कायदे ताक पर रख कर मान्यता दी जा रही है। लोकल इंटेलीजेंस की रिपोर्ट को या तो जांचा नहीं जा रहा है या फिर उसकी उपेक्षा की जा रही है। उन्होंने कहा कि हम ऐसे लोगों के साथ प्रेस गैलरी में बैठने में असहज महसूस करते हैं लेकिन कुछ कर नहीं सकते। सूत्रों ने बताया कि ज्यादातर मान्यताएं समाजवादी पार्टी के कार्यालयों की सिफारिशों पर दी गयी हैं। सत्ताधारी पार्टा के ऑफिसों के चपरासियों और ड्रइवरों की सिफारिशों पर भी राज्य सूचना विभाग ने मान्यताएं दी हैं।

उल्लेखनीय है कि लखनऊ के दो ऐसे पत्रकारों को भी मान्यता दे दी गयी है, जो हत्या के आरोपी हैं लेकिन अपने मान्यता कार्ड के सहारे उन्हें मुख्यमंत्री के दफ्तर के अन्दर-बाहर टहलते हुए देखा जा सकता है। ऐसे ही दो फर्जी पत्रकारों का हाल ही में विधानसभा में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया गया था। दोनों पत्रकारों को विधान सभा की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग करते पकड़ा गया था। लखनऊ में पदस्थ एक आईबी अधिकारी ने बताया कि ऐसे फर्जी पत्रकार जिन्होंने रिश्वत के माध्यम से कार्ड प्राप्त किए हैं, मुख्यमंत्री की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं।

आईब अधिकारी ने बताया कि उन्होंने सरकारी अधिकारियों को इस ख़तरे से आगाह कर दिया है लेकिन इस संबंध में कोई भी कुछ नहीं कर रहा है क्योंकि यह सारी मान्यताएं सत्ताधारी दल की सिफारिशों पर ही दी गयी हैं। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि उन्होंने करीब एक दर्जन पत्रकारों के बारे में सूचनाएं इकट्ठी की हैं, जिन्होंने अचानक ही बहुत संपत्ति अर्जित कर ली है और जिनकी गतिविधियां संदिग्ध हैं।        

लखनऊ के एक भूतपूर्व वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने बताया कि नेताओं की सिस्टम की सफाई में कोई रुचि नहीं है क्योंकि वही सिस्टम को गंदा कर रहे हैं। और जब कोई दुर्घटना हो जाती है, तब वे पुलिस को दोष देते हैं। सूचना विभाग के एक पूर्व निदेशक ने बताया कि बहुत से ऐसे लोग रातो-रात पत्रकार बन गए हैं, जो कभी इस काबिल नहीं थे। हाल ही में सूचना विभाग से 46 पत्रकारों की मान्यता से संबंधित फाइलें गुम हो जाने के चलते एक अधिकारी को हटा दिया गया था लेकिन इस संबंध में कोई और कार्यवाही नहीं की गई।

रमेश राजदार ई-मेल संपर्क : ramesh.rajdar@gmail.com

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इसी तरह गुजरात में ‘सीएम नरेंद्र मोदी’ को खत लिखकर एक और किसान ने की थी आत्महत्या

दौसा के किसान गजेन्द्र की आत्महत्या पर सभी दल अब अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने लगे हैं लेकिन ऐसे कई गजेन्द्र गुजरात में भी हैं. गुजरात के जामनगर जिले के कल्य़ाणपुरा तालुका के छिजवड़ गांव के अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा  ने भी ठीक गजेन्द्र की ही तरह 4 अक्टूबर 2012 को नरेन्द्र मोदी के नाम पत्र लिखकर आत्महत्या कर ली थी. उस समय नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 

उसी अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा का परिवार आज दाने-दाने को मोहताज है. उस गरीब किसान ने अपने पत्र में गुजराती भाषा में लिखा था कि 2005 से 2012 तक उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला। उसके परिवार में छह सदस्य हैं। वह उनका भरण-पोषण कैसे करे? उसने मोदी को लिखा था कि आप गरीब कल्याण मेले पर बहुत खर्च करते हैं लेकिन किसानों पर नहीं? ताज्जुब की बात यह है कि उस समय विपक्षी दल कांग्रेस ने गुजरात में कुछ किसानों को एक एक लाख की राशि बांटी लेकिन अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के परिवार को उसने भी कोई मुआवजा नहीं दिया. गुजरात के किसान भी आंदोलन के मूड में हैं। अपनी इस लड़ाई को लेकर अब उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाए हैं और अनिरुद्ध सिंह जाड़ेजा के पत्र को भी सुप्रीम कोर्ट के सामने अपनी दलील के रुप में रखा है. उनकी यह लड़ाई भरतसिंह झाला के नेतृत्व में बनी ‘क्रांति’ नाम की गैरस्वैच्छिक संस्था लड़ रही है.

झाला कहते हैं कि नर्मदा नदी को मोदी ने नर्मदे सर्वदे कहा था लेकिन अब जहां नर्मदा नदी का पानी जा रहा है, वहां की जमीन लेने का जुगाड़ किया जा रहा है. क्योंकि किसानों के लिए छोटी केनाल तो बनी नहीं, इसीलिए किसान को बड़ी केनाल से पानी लेने के लिए हर रोज एक हजार का खर्च आता है. वे कहते हैं कि मुंद्रा पोर्ट और जामनगर की कृषि आधारित जमीन तो किसानों को जबरन मार-मारकर अंबानी और अडानी बंधुओं को दे दी गई. धोलेरा जहां स्मार्ट सिटी का मोदी का सपना है, वहां के बावलयारी गांव के लोग अपनी जमीन के लिए अब भी संघर्ष कर रहे हैं. 

विधानसभा से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार मोदी ने उद्योगपतियों को टैक्स में छूट देकर 4000 करोड़ का फायदा पहुंचाया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार 2005 में आई बाढ़ में गुजरात के19 जिलों में 35 लाख किसानों की जमीन बंजर हो गई. उस समय पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेन्द्र मोदी ने 189 करोड़ के पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन 35 लाख के सामने मात्र 2 लाख किसानों को ही मुआवजा मिला, वो भी गुजरात हाईकोर्ट के आदेश पर दिया गया. लेकिन वह भी एक हेक्टर पर किसी को बीज की स्थिति पर 250 रु का मुआवजा और बंजर जमीन होने पर किसी किसान को 2000रु. का मुआवजा दिया गया. 

2012 में अकाल जैसी स्थिति आई, जिसमें जून 2012 से अक्टूबर में 52 किसानों ने आत्महत्या कर ली. लेकिन कोई मुआवजा नहीं दिया गया. सूचना अधिकार से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुल मिलाकर अब तक गुजरात में 6055 किसान आत्महत्या कर चुके हैं लेकिन सरकार इन किसानों को दुर्घटना या बीमारी मानकर पल्ला झाड़ रही है लेकिन सरकार की यह पालिसी है कि दुर्घटना में किसान को एक लाख का मुआवजा दिया जाता है लेकिन सरकार ने अभी मात्र 2000 किसानों को ही मुआवजा दिया है, सवाल यह उठ खड़ा हुआ है कि तो क्या 4055 किसानों ने आत्महत्या की? गुजरात विधानसभा में बताया गया है कि 2013 से 2018 में गुजरात में 89 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. झाला का कहना है कि अभी जो किसान आत्महत्या कर रहे हैं उन्हें कोई मुआवजा नहीं दिया जा रहा. वे कहते हैं कि 2007 में सोनिया गांधी से मिले थे लेकिन उन्होंने भी मात्र आश्वासन ही दिए. 

लेखिका उषा चांदना से संपर्क 09327012338 या ushachandna55@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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अलवर के किसानों को रोड पर लाने की शुरुआत!

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अलवर में जापानी कम्पनी को 500 एकड़ जमीन देंगी। क्यों? क्योंकि इस जमीन में जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित होगा! इसमें सैरेमिक्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर फॉक्स होगा। लेकिन सरकार को यह भी बतलाना चाहिए कि क्या उक्त निर्णय/घोषणा से पूर्व इस तथ्य का आकलन किया गया है कि इस कारण कितने किसान हमेशा को बेरोजगार हो जाएंगे?

यदि ऐसा नहीं तो क्यों नहीं किया गया? जिन किसानों की बेसकीमती उपजाऊ जमीन जापानी कम्पनी/कार्पोरेट को दी जाएगी, उनके स्थाई पुनर्वास की क्या कोई जमीनी योजना है या नहीं? इस बारे में राजस्थान सरकार को खुलासा करना होगा। स्थानीय किसान नेता होने का दावा करने वाले वर्तमान, निवर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों को इस बारे में सजग होकर सामने आना होगा। अन्यथा केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून (काले कानून) की आड़ में अगले चार सालों में न जाने कितने किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर किया जाएगा? जो भी पाठक सरकार की इस मनमानी को शोषण, अन्याय और अत्याचार मानते हैं, अपने विचार जरूर लिखें। 

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक़ रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन

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व्यापमं घोटाले में नाम आने के बाद सीएम शिवराज ने मीडिया से दूरी बनाई

भोपाल : अपना और अपने परिजनों का नाम व्यापमं घोटाले में आने के बाद से ही मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मीडिया से दूरी बना ली है। अब यूएनआई, पीटीआई और एएलआई के माध्यम से उनकी सूचनाएं मीडिया तक पहुंच रही हैं। 

मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव एवं जनसंपर्क आयुक्त एस के मिश्रा पहले एजेंसी के प्रतिनिधियों से प्रश्नोत्तरी तैयार करवाते हैं, फिर प्रश्नों की कांट -छांट के बाद मुख्यमंत्री से साक्षात्कार करवाते हैं। खुद ही कई तरह के विवादों में घिरे रहे एस. के. मिश्रा यह तय करते हैं कि मुख्यमंत्री से क्या सवाल पूछे जाएं और क्या नहीं। हाल ही में मुख्यमंत्री निवास में एजेंसी के कुछ पत्रकारों को जनसंपर्क विभाग ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रदेश दौरे पर आने एवं ओला प्रभावित क्षेत्रों में दौरे को लेकर मुख्यमंत्री की राय लेने को बुलाया था। 

ए.एन.आई. के पत्रकार की प्रश्नावली से व्यापमं मामले से जुड़े प्रश्न को आयुक्त जनसंपर्क ने हटवा दिया। इस संबंध में उन्होंने कहा कि व्यापमं का प्रश्न अभी आप मत पूछो क्योंकि एक सप्ताह के भीतर सरकार व्यापमं मामले में बड़ा धमाका करेगी। ए.एन.आई. के पत्रकार ने आयुक्त द्वारा प्रश्नों पर की गई सेंसरशिप को स्वीाकर लिया लेकिन अन्य एजेंसी के पत्रकारों ने अपने हिसाब से ही मुख्यमंत्री से प्रश्न किए।

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