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सियासत

महात्मा गाँधी की शहादत पर : कौन थे हत्यारे?

अशोक कुमार पांडे-

न तो वे आजादी की लड़ाई के उस दौर में सक्रिय उन नायकों में शामिल थे जिन्होंने सब कुछ दांव पर लगाकर मातृभूमि की आज़ादी की लड़ाई लड़ी, न ही वे उस दौर के उन बुद्धिजीवियों में से थे जिन्होंने अपने भारतीय समाज में व्याप्त समस्याओं को केंद्र में रखकर भविष्य की राह दिखाने वाले बौद्धिक काम किए।

परिचय सिर्फ़ इतना है उनका कि वे उन मोहनदास करमचंद गांधी के हत्यारे थे जिन्हें नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने राष्ट्रपिता कहा था और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने महात्मा।

परिचय सिर्फ़ इतना है उनका कि उन्होंने उस मोहनदास करमचंद गांधी की हत्या की जो उस उम्र में भी नोआखली के श्रीरामपुर गांव में एक साधारण से अरक्षित घर में दो महीने डेरा डालकर बांस की खपच्चियों से बने पुलों को पार कर सैकड़ों गांवों में विस्थापित हिन्दुओं के पुनर्वास के लिए काम करने के बाद दिल्ली में हिंसा के शिकार मुसलमानों की रक्षा के लिए कोशिश कर रहा था* और सरकार से पाकिस्तान जाकर वहां के अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने की कोशिश करने के लिए अनुमति मांग रहा था।

वह व्यक्ति जो धमकियों और हमलों से बेपरवाह बस्तियों में जा रहा था और एक हमले के बावजूद हर दबाव को दरकिनार कर प्रार्थना सभा की पवित्रता की रक्षा हेतु आगंतुकों की जांच के लिए सहमत नहीं हुआ था।

वह व्यक्ति जिसने आज़ादी की लड़ाई में कांग्रेस का नेतृत्व करने के बावजूद कभी कोई पद नहीं लिया और राजनीति के एक माध्यम के रूप में समाजसेवा को चुना।वह व्यक्ति जिसने एक विफल हमले के बाद उन्हें आकर बातचीत करने और अपनी शिकायतें बताने के लिए कहा था।

उस निहत्थे आदमी की हत्या कर वे भी अमर हो गए।अगर पिछले अवसरों की तरह इस बार भी गांधी हत्या का उनका प्रयास असफल हुआ होता तो इतिहास में कहीं उनका नाम भी नहीं होता और गांधी ने उन्हें फिर बातचीत का आमंत्रण दिया होता।

“उसने गांधी को क्यों मारा” किताब से!


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