अंग्रेजी अखबारों में द टेलीग्राफ की खबर लखनऊ डेटलाइन से पीयूष श्रीवास्तव की है और इस प्रकार है, सोमवार को अयोध्या राम मंदिर ट्रस्ट ने दान की चोरी के मामले में जनरल सेक्रेटरी चंपत राय का इस्तीफ़ा मंज़ूर कर लिया। यह फ़ैसला एक हंगामेदार बैठक में लिया गया, जिसमें कोषाध्यक्ष से आरएसएस के एक “विशेष आमंत्रित” सदस्य को अंदर आने देने पर सवाल पूछे गए। तीन घंटे चली बैठक के बाद कोषाध्यक्ष गोविंद गिरि ने पत्रकारों को बताया कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पास राय और ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्र का इस्तीफ़ा मंज़ूर करने के अलावा कोई चारा नहीं था। वरिष्ठ सदस्य के परासरन (पूर्व अटॉर्नी-जनरल), जिन्होंने (ट्रस्ट का) संविधान बनाने में भूमिका निभाई थी, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए बैठक में शामिल हुए और इस बात पर ज़ोर दिया कि “किसी सदस्य का इस्तीफ़ा मिलते ही उसे मंज़ूर मान लिया जाता है।” गोविंद गिरि ने कहा, “लेकिन हमने राम मंदिर के लिए चंपत राय के पिछले तीन दशकों के काम की सामूहिक रूप से तारीफ़ की। हम उनका बहुत सम्मान करते हैं। उन्होंने इसलिए इस्तीफ़ा दिया क्योंकि वे तब तक इस पद पर नहीं रहना चाहते थे जब तक मंदिर में चोरी करने वालों को सज़ा न मिल जाए।” आप जानते हैं कि, मंदिर और ट्रस्ट के आठ कर्मचारियों को मंदिर में दान की चोरी के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है। जांचकर्ताओं का आरोप है कि इसके पीछे एक बड़ी साज़िश है और राज्य सरकार ने इसमें शामिल सभी लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की चेतावनी दी है। गिरि ने कहा कि जब तक इस पद पर किसी को चुना नहीं जाता, तब तक ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन कार्यवाहक जनरल सेक्रेटरी के तौर पर काम करेंगे। ट्रस्ट की अगली बैठक 22 जुलाई को होगी। RSS सदस्य और रिटायर्ड IFS अधिकारी मोहन ने कहा कि वे ट्रस्ट में जनता का भरोसा फिर से कायम करने के लिए “जितना हो सके, पूरी पारदर्शिता के साथ” काम करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, बैठक में अनिल मिश्रा का नाम एक बार भी नहीं लिया गया; ऐसा लगता है कि यह नाराज़गी इसलिए थी क्योंकि आरोप है कि ज़्यादातर आरोपियों को उन्हीं की सिफारिश पर मंदिर में भर्ती किया गया था।
ट्रस्ट के लिए आरएसएस से जुड़ी तकलीफ
बैठक में ट्रस्ट के कम से कम दो सदस्यों ने कहा कि वे सभी इस अपराध में बराबर के हिस्सेदार हैं क्योंकि यह सब उनकी जानकारी में हुआ। इनमें से एक, स्थानीय साधु दिनेन्द्र दास ने कहा, “जब भगवान राम के घर में चोरी हो रही थी, तब हम क्या कर रहे थे? इससे कई हिंदुओं का भरोसा टूट गया है।” कर्नाटक के उडुपी के साधु और ट्रस्ट के सदस्य स्वामी विश्वप्रसन्न तीर्थ ने कहा: “यह हमारे लिए एक स्थायी दाग़ है क्योंकि हम ट्रस्ट का प्रतिनिधित्व करते हैं।” “हम कभी भी अपने दामन पूरी तरह साफ़ नहीं कर पाएँगे।” सूत्रों के मुताबिक, कुछ सदस्यों ने गिरि से नाराज़ होकर पूछा कि उन्होंने आरएसएस सदस्य गोपाल राव को मीटिंग में कैसे शामिल होने दिया। राव का दावा है कि उन्हें मंदिर का प्रशासक नियुक्त किया गया है और वे ट्रस्ट के ‘विशेष आमंत्रित’ सदस्य हैं। लेकिन ट्रस्ट के सदस्यों का कहना था कि उन्होंने ऐसी किसी नियुक्ति के बारे में नहीं सुना है। ट्रस्ट के एक नाराज़ सदस्य ने पत्रकारों को बताया, “जब गिरि ने कहा कि राव ‘स्पेशल इनवाइटी’ हैं, तो दो सदस्यों ने उनसे कोषाध्यक्ष के पद से इस्तीफ़ा देने के लिए कहा। गिरी ने कोई जवाब नहीं दिया।” इसके बाद राव मुस्कुराते हुए मीटिंग से चले गए। सूत्रों के अनुसार, ट्रस्ट के सदस्यों ने नरेंद्र मोदी के करीबी और मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र (जो ट्रस्ट के पदेन सदस्य भी हैं) के उस सुझाव को ठुकरा दिया, जिसमें ट्रस्ट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) किसी सरकारी अधिकारी को बनाने की बात कही गई थी। ट्रस्टियों ने ट्रस्ट के सदस्य के तौर पर नियुक्ति के लिए आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद वीएचपी से जुड़े तीन लोगों के नामों पर चर्चा की, लेकिन अंतिम फ़ैसला केंद्र सरकार पर छोड़ दिया। सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2019 के अयोध्या फ़ैसले के बाद मोदी सरकार ने ही यह ट्रस्ट बनाया था और इसके सदस्यों को नियुक्त किया था। सोमवार की मीटिंग में आठ सदस्य भौतिक रूप से शामिल हुए, जबकि दो सदस्य वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए जुड़े। राय, अनिल मिश्र और नृपेंद्र मिश्र मीटिंग में मौजूद नहीं थे। बाद में गिरि और मोहन मीडिया वालों को उस कमरे में ले गए जहाँ भक्तों द्वारा दान किया गया सोना और चाँदी रखा जाता है, ताकि यह साबित किया जा सके कि “भक्तों का कीमती दान हमारे पास सुरक्षित है”। (समाप्त)
इस रिपोर्ट का पहला हिस्सा आज के अखबार : राम मंदिर मामले में संघ की ही चली और मंदिर ट्रस्ट हो या विश्वास संघ के भरोसे ही रहेगा
लिंक यह रहा : https://www.bhadas4media.com/ram-mandir-mamle-mein-sangh-kee-hee-chali/

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