धर्मेन्द्र आज़ाद-
मुट्ठीभर लोगों के पास भारत की आधी संपत्ति : पूँजीवाद का नग्न चेहरा…
सोचिए ज़रा—आप ओवरटाइम कर रहे हैं, साइड बिज़नेस भी कर रहे हैं, दिन-रात खट रहे हैं… फिर भी महीने के आख़िर में अकाउंट ख़ाली ही रह जाता है। उस वक्त अक्सर लगता है, “शायद गलती मेरी ही है, बचत क्यों नहीं हो पाती।” लेकिन सच्चाई यह है कि ग़लती आपमें नहीं है, ग़लती पूरे सिस्टम में है। और आप अकेले नहीं—भारत की 90% जनता इसी जाल में फँसी हुई है।
इस सच्चाई को समय-समय पर आने वाली रिपोर्टें बार-बार सामने लाती हैं। हाल में जारी हुई हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2025 बताती है कि भारत में सिर्फ़ 1,687 अरबपति मिलकर 167 लाख करोड़ रुपये के मालिक हैं। यह दौलत पूरे भारत की आधी जीडीपी के बराबर है।
इनमें सबसे ऊपर मुकेश अंबानी हैं—9.55 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति के साथ। उनके ठीक पीछे गौतम अडानी 8.15 लाख करोड़ पर खड़े हैं। सोचिए, सिर्फ़ इन दो लोगों की दौलत उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों के पूरे सालाना बजट से भी ज़्यादा है।

विडंबना यह है कि 140 करोड़ लोगों वाले देश में सिर्फ़ 1,687 अरबपति—यानी 0.00012% लोग—आधी संपत्ति के मालिक बने बैठे हैं, जबकि बाकी 99.99988% आबादी आधी बची हुई संपत्ति में ही गुज़ारा कर रही है। यह तो ऐसा ही है जैसे एक बस में 100 सीट हों और 2 लोग 98 सीटों पर कब्ज़ा जमा लें और बाक़ी 98 प्रतिशत लोग बस की सीढ़ियों और छत पर लटककर सफ़र करें।
अगर यह संपत्ति सब में बराबर बाँट दी जाए तो हर भारतीय को लगभग 12 लाख रुपये मिलेंगे। औसतन एक परिवार में पाँच लोग मानें तो हर घर के हिस्से 60 लाख रुपये होंगे। अगर यह दौलत जनकल्याणकारी नीतियों पर खर्च हो तो भारत में रोज़गार, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और यातायात जैसी समस्याएँ हमेशा के लिए ख़त्म हो सकती हैं। मगर यह सब मुट्ठीभर हाथों में क़ैद है। और दूसरी ओर, 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन पर ज़िंदा रहने को मजबूर हैं।
सरकारें जनता को बार-बार “विकास”, “अमृतकाल” और “5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनॉमी” का सपना दिखाती हैं, लेकिन हक़ीक़त यह है कि यह विकास सिर्फ़ पूँजीपतियों के लिए है। टैक्स छूट, सरकारी प्रोत्साहन, बैंकों से सस्ते कर्ज़—ये सब उनके लिए। जबकि आम जनता के हिस्से आती है महँगाई, बेरोज़गारी और क़र्ज़ का बोझ।
ज़रा पीछे देखें। 2013–14 में भारत में करीब 300 अरबपति थे। आज 1,687 हैं—यानी ग्यारह साल में छह गुना वृद्धि। इस दौरान देश की जीडीपी बढ़ी, मगर आम जनता की जेब मोटी नहीं हुई। बढ़त सीधी-सीधी अमीरों की तिजोरी में गई। उधर महँगाई और बेरोज़गारी ने मध्यम और गरीब वर्ग की कमर तोड़ दी।
ऑक्सफैम की रिपोर्ट भी कुछ ऐसा ही कहती है, ऑक्सफैम के मुताबिक़ भारत की कुल संपत्ति का 77% सिर्फ़ 10% अमीरों के पास है, जबकि आधी आबादी के पास केवल 6%। पिछले दशक से यह खाई और तेज़ी से गहरी हुई है।
पूँजीवादी सिस्टम का फंडा साफ़ है—“मेहनत आम जनता करेगी, फल कुछ ख़ास लोग खाएँगे।” जनता टैक्स देती है, अमीरों को कर्ज़ माफी मिलती है। जनता रोज़गार माँगती है, तो कॉरपोरेट्स ऑटोमेशन-AI का इस्तेमाल कर काम के घण्टे कम करने के बजाय नौकरियाँ कम कर देते हैं। जनता महँगाई में पिसती है, पूँजीपति सरकारी इंसेंटिव और नीतिगत सौगातों से अरबों कमा लेते हैं। यह सिस्टम ऐसा है जिसमें आम लोगों की प्लेट में बस “छिलके” बचते हैं, और असली फल सीधे ख़ास लोगों की झोली में गिरते हैं।
आज की असली तस्वीर यही है—मुट्ठीभर लोग आधे भारत की दौलत पर क़ब्ज़ा किए बैठे हैं। आम जनता चाहे जितनी मेहनत कर ले, महीने के आख़िर में उनकी ज़ेब ख़ाली ही नज़र आयेगी। यही है पूँजीवाद का असली चेहरा—नीचे वालों के लिए जुमले और भाषण, ऊपर वालों के लिए दौलत और ताक़त।
सरकारें इस बढ़ती असमानता को भली भाँति समझती हैं और उससे उपजने वाले ग़ुस्से को भी। इसलिए एक तरफ़ वे विरोध की हर आवाज़ को दमनकारी क़ानूनों से कुचलती हैं, तो दूसरी तरफ़ 80 करोड़ लोगों को पेट की आग बुझाने लायक़ मुफ्त राशन बाँटकर उनके आक्रोश के बाँध को थामे रखने का प्रयास करती हैं।
इस मुनाफ़ाख़ोर पूँजीवादी से इससे अलग कुछ उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। जब तक मेहनतकश लोग संगठित होकर देश के समस्त संसाधनों पर जनता का सामूहिक मालिकाना हासिल नहीं करेंगे और पूँजीवादी ढाँचे को पलटकर जनता-केन्द्रित व्यवस्था स्थापित नहीं करेंगे, तब तक मेहनत का फल जनता को नहीं, बल्कि उसी पुराने मुट्ठीभर लोगों को ही मिलता रहेगा। और महीने के आख़िर में आम लोगों के खाते में वही पुराना “ज़ीरो बैलेंस” ही नज़र आयेगा।


