लखनऊ की बारिश ने जहां आम लोगों को आफ़त में डाला, वहीं सोशल मीडिया पर पुलिसकर्मी की ड्यूटी और उसका अलग ही पहलू चर्चा का विषय बन गया। पत्रकार आशुतोष त्रिपाठी ने भीगते पुलिसकर्मी की तस्वीर और किस्सा साझा कर उसकी सराहना की। लेकिन इस पर वरिष्ठ पत्रकार नवल कांत सिन्हा ने सवाल खड़े किए कि “ये त्याग नहीं, नौकरी का हिस्सा है।” वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल कुमार का कहना है कि गलतियों की आलोचना जितनी ज़रूरी है, अच्छे कामों की तारीफ़ भी उतनी ही ज़रूरी है। नीचे पढ़ें…
पत्रकार आशुतोष त्रिपाठी ने मुख्यमंत्री की फ्लीट में लगे पुलिसवाले की तस्वीर अपलोड करते हुए लिखा है-
आज की बारिश किसी आफ़त से कम नहीं थी। मैं भीगने से बचने के लिए हनुमान सेतु के पास मेट्रो स्टेशन के नीचे खड़ा था और साथ ही बारिश के कुछ दृश्य कैमरे में कैद कर रहा था। तभी अचानक सायरन गूंजा और माइक पर अनाउंसमेंट हुआ—“कृपया रास्ता खाली करें, मुख्यमंत्री की फ्लीट निकलने वाली है।”

मेट्रो पुल के नीचे सैकड़ों लोग बारिश से बचने के लिए पनाह लिए खड़े थे। पुलिस ने सबको हटाने की कोशिश की, कुछ लोग हट भी गए, मगर कई वहीं जमे रहे। बारिश का पानी और लोगों की भीड़ मिलकर रास्ते को और मुश्किल बना रहे थे। तभी एक पुलिसकर्मी उस तेज़ बारिश में आगे बढ़ा, मोर्चा संभाला और अपनी कोशिशों से रास्ता खाली कराया।
ख़ाकी वालों की ज़िंदगी का भी क्या अज़ब फ़साना है।
तीर भी चलाना है और परिंदे को भी बचाना है।
आशुतोष की पोस्ट को रिट्वीट कर वरिष्ठ पत्रकार नवल कांत सिन्हा ने लिखा है-
बुरा न मानिएगा। पानी में भीगना कोई बहुत बड़ा त्याग नहीं है, वो भी सीएम की जीहुजूरी में। ये कोई बैंकर, सीए नहीं हैं। इनकी नौकरी का हिस्सा है। ये जज़्बा आम लोगों के लिए पैदा हो जाए तो पुलिस को भी लोग उस सम्मान की नजरों से देखने लगेंगे, जैसे कि सैनिकों को देखते हैं।
एक अन्य तस्वीर अपलोड करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अनिल कुमार लिखते हैं-
मैं मानता हूँ कि हम गलत कार्यों की आलोचना करते हैं तो अच्छे कार्यों की सराहना भी करनी चाहिए! पुलिस का व्यवहार कई मामलों में अच्छा नहीं रहता, लेकिन इन्हीं पुलिसकर्मियों में कुछ इतने अच्छे होते हैं, जो ईमानदारी से अपना काम करते हैं!
जिनमें विभागीय दिक्कतों के बावजूद संवेदनाएं बची रह जाती हैं! इन दो पुलिसकर्मियों के साथ उन सभी पुलिसकर्मियों को धन्यवाद, जो मुश्किल परिस्थितियों में भी डटकर अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं!





Abhishek pandey
September 18, 2025 at 10:32 pm
नक्सली की गोली खाने वालों से बड़ा त्याग है क्या पुलिस के बजाए कभी नक्सली गढ़ जाकर देखों श्रीनगर जाकर देखो कैसे सीआरपीएफ और भारतीय सेना और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स नौकरी करती है।। इतनी भीषण गर्मी में भीग के ना तो एक सुखद एहसास है अगर गोली लग जाती तब क्या होता जैसे सीआरपीएफ और तमाम फोर्सेज के साथ होता है उनको तो एयरलिफ्ट करते-करते जान चली जाती है लगता है यह सब पत्रकार सिर्फ लखनऊ तक सीमित है