91 वर्ष के नामवरजी ने त्रिलोचन की चुनिंदा कविताएं अपनी मजेदार टिप्पणियों के साथ सुनाईं

Om Thanvi : लीलाधार मंडलोई ने ज्ञानपीठ की गतिविधियों को गति दी है, उन्हें विविध बनाया है। कल शाम ‘वाक्’ शृंखला के तहत इंडिया हैबिटाट सेंटर में नामवर सिंह को बुलवा कर उन्होंने वहाँ मौजूद हर शख़्स की ज़िंदगी बड़ी कर दी। हिंदी की दुनिया में ऐसी भावुक घड़ियाँ कम आई होंगी।

नामवरजी 91 वर्ष के हो गए हैं। स्वास्थ्य भी अस्थिर रहता है। लेकिन पूरी शाम वे प्रसन्न मुद्रा में रहे। उन्हें सुनने-मिलने बड़ी संख्या में हिंदी-प्रेमी आए थे। विश्वनाथ त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह, नित्यानंद तिवारी, अशोक वाजपेयी, रेखा अवस्थी, विष्णु नागर आदि से लेकर अनेक युवा लेखक-पत्रकार दिखाई दिए। पुणे के टीकम शेखावत तक (नीचे दी जा रही तसवीर उन्हीं के सौजन्य से)।

आयोजन का विषय था “नामवर के त्रिलोचन”, पर – जैसा कि अंदाज़ा था – नामवरजी कम बोले। अपना वक्तव्य हाल के दौर में वे लिखकर लाते रहे हैं। वक्तव्य के बाद जब वे त्रिलोचन की चुनिंदा कविताएँ सुनाने लगे, तो साथ में मज़ेदार टिप्पणियाँ भी उनसे फूटने लगीं।

उनकी बड़ी स्थापना यह थी कि वासुदेव सिंह उर्फ़ त्रिलोचन शास्त्री की कविता की सादगी हिंदी में दुर्लभ है। अवधी का यह ठाठ उनके अलावा जायसी और तुलसी में ही मिलता है। उन्होंने कहा, संयोग नहीं है कि त्रिलोचन रोज़ सुबह तुलसी के ‘मानस’ का पाठ करते थे; मैं भी करता था। मीर की शायरी में जो सादगी है, वह ग़ालिब में नहीं है। ग़ालिब में पुरकारी (इस शब्द का ठीक-ठीक अर्थ क्या होगा? बाँकपन?) ज़्यादा है। मगर त्रिलोचन में मीर की सादगी भी है और ग़ालिब की पुरकारी भी।

त्रिलोचन के सॉनेट-प्रेम की बात करते हुए उन्होंने बताया कि नागार्जुन इससे उचट कर कहा करते थे क्या सॉनेटबाज़ी करते रहते हो। पर सॉनेटबाज़ी कोई लौंडेबाज़ी तो नहीं थी। … यहाँ नामवरजी तुरंत सम्भले और कहा, क्षमा कीजिए कुछ अशिष्ट प्रयोग हो गया। पर तब तक हॉल में हँसी की लम्बी फुहार बह चली थी। सारा उद्बोधन और श्रवण इसी अन्दाज़ में सहज और आत्मीय बना रहा।

इससे पहले त्रिलोचन पर एक फ़िल्म देखने को मिली। मेरे मित्र अनवर जमाल ने इसे बाईस साल पहले बनाया था। अच्छी फ़िल्म थी। फक्कड़ और विनम्र त्रिलोचन। शब्दों के साथ अहम के विलय को भी जीते हुए। बस, अनवर जाने क्यों आगे और पीछे लम्बे-लम्बे दो वक्तव्य पिला गए। काश उन्होंने शमशेर की कविता पर ग़ौर किया होता, जिसकी ओर नामवरजी ने भी ध्यान खींचा – “बात बोलेगी, हम नहीं। भेद खोलेगी बात ही।” फ़िल्म ही ख़ूब बोलती है!

जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की एफबी वॉल से.

  • भड़ास की पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए आपसे सहयोग अपेक्षित है- SUPPORT

 

 

  • भड़ास तक खबरें-सूचनाएं इस मेल के जरिए पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *