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ग़ाज़ियाबाद में दिनदहाड़े पत्रकार से फोन की छिनैती, पुलिस ने निराश किया

पत्रकार और लेखक रंगनाथ सिंह ग़ाज़ियाबाद के वसुंधरा सेक्टर 4-सी में रहते हैं। इंदिरापुरम थाना क्षेत्र में उनके साथ दिनदहाड़े छिनैती हो गई। पुलिस का रिस्पांस बेहद ख़राब रहा। कमिश्नरेट बनने के बाद भी ग़ाज़ियाबाद की स्थिति सुधरी नहीं है। अपराधियों के हौसले बुलंद हैं। थाना पुलिस अपराध रोकने का काम छोड़ कर बाक़ी सभी कामों में लिप्त है। पढ़िए रंगनाथ सिंह की आपबीती उनकी ही कलम से…


रंगनाथ सिंह-

सुनसान सड़क पर हम दो और वो दो… – कल दोपहर में एक भाईसाहब को लगा कि मेरे फोन की मुझसे ज्यादा जरूरत उन्हें है। मेरी सोसाइटी के पीछे वाली सुनसान सड़क पर उन्होंने मेरे पैण्ट के पिछली जेब से उसे निकाल लिया और चले गये। रोचक यह है कि हम दोनों उस सड़क पर इसीलिए गये थे कि वह सुनसान है। यानी फोन के अलावा सड़क को लेकर भी हमारा टेस्ट मैच कर रहा था।

मैं उस सड़क पर गया था कि टहलने के लिए वह ठीक है, क्योंकि सुनसान है। वह इसलिए आये थे कि सुनसान सड़क पर पीछे की पॉकेट में फोन रखकर घूमते हुए आदमी की जेब से फोन हासिल करना आसान है।

घटनाक्रम में तीसरा संयोग भी है लेकिन उसका कोई मतलब है या नहीं, पता नहीं। हम भी दो थे, वो भी दो थे। फोन लेकर वो दोनों भागे, उन्हें भागते देखकर हम दोनों उनके पीछे भागे। खैर, हम लोगों ने इस संगत में खलल डालते हुए तीसरे और चौथे इत्यादि को भी इकट्ठा कर लिया। हमारी इतनी ही जिज्ञासा थी कि उन दोनों ने भागने के बाद क्या किया? कौन सा रास्ता, कौन सा मोड़ लिया।

हम में से एक ने पुलिस को फोन किया और दो ने हमारे घर और घटनास्थल से दो सौ मीटर दूर अक्सर खड़ी रहने वाली पुलिस वैन के पास जाने का निर्णय लिया। फोन लगाने वाले फोन लगाने में लग गये और हम लोग पुलिस जीप तक पहुँच गये। वहाँ दो लोग अगली सीट पर लॉ एण्ड ऑर्डर कंट्रोल कर रहे थे। ड्राइविंग सीट पर बैठे सज्जन से हमने बताया कि हमारे साथ क्या हुआ। उन्होंने उतनी सादगी से कहा, ‘हम तो यहीं बैठे हैं जी, इधर तो कोई नहीं आया?’ हमारे यकीन दिलाने पर कि ऐसा हुआ है वो पुलिस वैन से उतरे और बगल में लग रहे ठेले वाले से पूछा, “क्यों भाई इधर कोई बाइक वाले आए क्या!” ठेले वाले ने कहा कि मैं तो अभी आया हूँ साहब! पुलिसजन ने कहा, “ओह्ह…तब तो निकल गया होगा”

जिस सड़क पर घटना हुई उसके और उस पुलिस वैन के बीच में दो सोसाइटी की इमारतें खड़ी रहती हैं लेकिन उन पुलिसजन को यकीन था कि दो इमारत से पीछे से भागकर कोई बाइकवाला उधर आएगा तो वह पहचान लेंगे वह किसी का फोन लेकर जा रहा है! खैर, हमने उनकी चौकस डायरी में अपना नाम, पता, फोन नम्बर, फोन छीनने वालों का गाड़ी नम्बर इत्यादि बता दिया। उन्होंने कहा, ठीक है। हमने भी कहा, ठीक है। हम समझ चुके थे कि यहाँ हमारा कुछ नहीं होना है। हम लौटकर घर और घटनास्थल की तरफ बढ़ने लगे।

हमें दूर से ही दिख गये कि तीसरे जन को दो बाइक पर सवार चार पुलिस वाले घेरे खड़े हैं। ये पुलिसवाले वैन वाली साहब से उलट थे। उन्होंने मुस्तैदी दिखायी। दो ने कहा चौकी चलिए, ब्योरा लिखा दीजिए। हम चौकी गये और ब्योरा लिखाया। चौकी से दो पुलिसजन हमारे साथ घटनास्थल पर पहुँचे। हम तीन ने उन दो को दिखाया कि उस सड़क पर कम से कम दो जगह पर सीसीटीवी कैमरा है जिसमें उनका फोन छीनने वालों का वीडियो जरूर कैद हुआ होगा। उनकी सलाह पर हमने स्थानीय थाने में जाकर लिखित शिकायत भी दर्ज करायी।

मोहवश मैंने चौकी वाले से पूछा कि फोन मिलने की क्या सम्भावना है, उन्होंने कहा आप पॉजिटिव रहिए। यही सवाल मैंने थाने में पीठासीन दो सितारों वाले अफसर से पूछा तो उन्होंने कहा, यह तो ऊपर वाले की मर्जी पर है। मैंने उनसे पूछा यदि ऐसा ही है तो मैं ऊपर वाले से बात करूँ और उनसे कहूँ कि वो आपको अपनी मर्जी बता दें। वो एक गरीब आदमी को यह समझाने में व्यस्त थे कि होली के दिन किसी ने पीकर तुम्हारी बीवी का सिर फोड़ दिया तो इतना बवाल क्यों उठा रहा है, होली पर हो जाता है! कि वो मेरी बात शायद सुन नहीं पाए। खैर, ऊपर वाले में उनकी आस्था देखकर मैं मुतमईन हो गया था कि यही वो पुलिस व्यवस्था हैं जिनसे गरीब डरता है और अमीर हँसता है।

हम में से एक ने कहा कि SHO को फोन करते हैं, मैंने कहा जाने दीजिए, होली है। किसी ने हमारी खराब कर दी तो किसी और कि हम क्यों खराब करें। कल देखेंगे। जिन पुलिसजन ने सकारात्मक रहने को कहा था, उन्होंने कहा आप लोग परसों फिर आइए। हम सब इस बात से खुश थे कि कंट्रोल रूम में फोन करने के चंद मिनटों में पुलिस मौके पर पहुँच गयी और ज्यादातर पुलिसवालों ने सकारात्मक रवैया दिखाया। उसके बाद हम सब चोरी के फोन के बाजार और गफ्फार इत्यादि की चर्चा करते हुए घर की तरफ बढ़ चले।

घर पहुँचने तक चोरी और उसके कारण इत्यादि की बहुकोणीय चीरफाड़ करने के बाद हम सब इसी नतीजे पर पहुँचे कि ‘संयोग खराब था।’ आज सुबह सोकर उठा तो अहसास हुआ कि यह बात तो हमारे पुरखों को न जाने कब से पता थी कि संयोग खराब हो तो ऊँट पर बैठे आदमी को कुत्ता काट लेता है तो फिर हमने इस विषय की व्याख्या में इतना समय क्यों खर्च किया। फिर लगा, रास्ता काटना था, चुप रहते तो फोन की मेमरी में रखी ममता और उसके दाम की माया घेर लेती। मन फेरवट के लिए कुछ करना था तो उसी सदियों पुराने निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए हमने नए सिरे से व्याख्या की और वहीं पहुँचे। जैसे आदमी अपने ही घर में कभी-कभी रास्ता बदलकर पहुँचता है।

अभी तक आपने जो कहानी पढ़ी उसे लिखने का मकसद एक लाइन का है लेकिन एक लाइन में आपको मजा नहीं आता इसलिए इतना लिखना पड़ा। बात इतनी सी है कि मेरा फोन खो गया है, नया नम्बर और फोन लेने में एक-दो दिन लगेगा। जिनके पास मेरा फोन नम्बर है और उन्हें हर दिन दो दिन पर मेरा नम्बर मिलाने की लत लगी हुई है वो परेशान न हों। मैं ठीक हूँ। पता नहीं मेरा फोन किस हाल में होगा!

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