
भास्कर गुहा नियोगी-
शिक्षा व्यवस्था को कमीशनखोरों और लुटेरों के हवाले कर दिया गया है। इन दिनों स्कूलों में नया सत्र शुरू होने के साथ ही कमीशनखोरी और लूट खेल अपना सर्वोच्च सूचकांक छू रहा है। मनमाना फीस बढ़ोतरी से लेकर किताबें, ड्रेस, स्टेशनरी के नाम पर उगाही जारी है। स्कूलों की कोई जवाबदेही नहीं है जिन्हें इस समूचे उगाही तंत्र पर रोक लगाकर एक सरल और जनहित वाली व्यवस्था लागू करनी चाहिये वो खामोश है। सरकार हो या सरकार के आधीन आने वाला शिक्षा विभाग सब मौन होकर इस लूट को हरी झंडी दिखाते नजर आ रहे है। एक लम्बे अर्से से यही दिखाई देता आ रहा है कि नये सत्र के शुरुआत के साथ शिक्षा मंत्री उदासीन हो जाते हैं और जिले दर जिले बैठे शिक्षा अधिकारी मूर्छित।
वैसे नई शिक्षा नीति के तहत कमीशनखोरी को भी पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहिए। क्यों कि जब शिक्षा को प्रोडेक्ट और बच्चों को कमीशन खोरी का जरिया बना दिया गया है तो बच्चों को भी यह जानने का हक है कि कमीशनखोरी की जिंदगी में कितनी अहम भूमिका है और कमीशन यहां का राष्ट्रीय चरित्र। जिन बच्चों के सहारे हम नया भारत बनाने चले है उन्हें बताना और सिखाना चाहिए कि Moral education कि जगह सिर्फ किताबों तक है और कमीशनखोरी की जगह आचरण से लेकर रोज के व्यवहार तक में। नया सत्र शुरू होने के साथ ही स्कूलों ने कमीशनखोरी का टेंडर खोल दिया है। इस टेंडर के तहत तयशुदा दुकानें है जहां हमे-आपको खामोशी के साथ जाना है और लूटकर चले आना है। स्कूल की फीस हो किताबें हो या ड्रेस जूते हो मोजे सबकुछ मनमाने कीमतों पर खरीदना है। दस-बीस रुपये की कापी 50 – 60 में किताबों की क़ीमत पूछिए मत। और स्कूल फीस में कितने प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करेगा ये स्कूल तय करेगा इसमें माननीय सरकारों की कोई भूमिका नहीं होगी।
लोक कल्याण कारी राज की अवधारणा जहां शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल है वहां की यह तस्वीर है। जो ये बताने के लिए काफी है कि हम अपने मूल अधिकारों से वंचित है। मूल अधिकारों में पढ़ने का अधिकार भी शामिल हैं और जानने का भी लेकिन क्या मजाल आप या हम स्कूल या दुकान दार से पूछ ले कि आप इतना कीमत क्यों वसूल रहे हैं? रही सरकार वो तो दूर की चीज है वो हमेशा जन के दुःख – दर्द से दूर ही रहती है। देश में सरकार केवल दूर दिल्ली में ही नहीं है बल्कि आप जिस भी शहर, कस्बे या गांव में रहते है वहां भी सरकारें हैं ये स्कूल चलाने वाले, किताब-कॉपी, स्कूल ड्रेस बेचने वाले भी किसी सरकार से कम नहीं है। हाथ बांधे आप इनके सामने किसी गुलाम सा खड़े रहकर इनकी हर बात सुनने को बाध्य है जरा सा बोले तो आपकी खैर नहीं। इतनी पीड़ा इतनी जलालत का एहसास शिक्षा के मंदिर और उसके फैलाये गए नेटवर्क जिसे आप लूट का संगठित गिरोह भी कह सकते है आपको होगा इसे हम और आप महसूस करते हैं और चुप रहते है।
साल दर साल बढ़ती फीस, बदले जाते स्कूल ड्रेस, निजी प्रकाशकों की मंहगी किताबों के पीछे स्कूल प्रबंधन से लेकर नेता, अधिकारियों का एक गठजोड़ है और मोटी कमीशनखोरी की छुरी अभिभावक के गले पर।
बनारस में कक्षा 2 में पढ़ रहे अपने बच्चें के लिए किताब- कापी खरीदने पहुंचे अभिभावक दुकानदार से अति नम्र स्वर में निवेदन करता है कि आप कापियों की संख्या कम कर दें शायद उस अभिभावक के पास पैसे कम पड़ रहे होंगे क्योंकि किताबों का बिल ही चार हजार के आंकड़े को पार कर रहा था दुकानदार का जवाब था फिर कापी दस दिन बाद आकर लीजिएगा। बेचारा अभिभावक लाचार करें तो क्या? बच्चा अगर बिना कापी स्कूल जाएगा तो टीचर की नसीहत है।
जरा सोचिए एक तरफ बच्चों के हक में शिक्षा का मूल अधिकार है तो दूसरी तरफ कमीशन और लूट का एजेंडा । शिक्षा का मूल अधिकार तब तक औचित्यहीन है जब तक शिक्षा के नाम पर लूट जारी है। इस लूट को बंद कौन करवाएगा? जवाब की तलाश में!
बनारस के वरिष्ठ पत्रकार भास्कर गुहा नियोगी का विश्लेषण.


