सुभाष सिंह सुमन-
अगर आप इकोनॉमी को समझना चाहते हैं, तो एशिया के इन दो उदाहरण को नहीं देखेंगे तो बहुत सारी बातें छूट जाएंगी. ये दोनों जबरदस्त केस स्टडी हैं. एक है ईरान और दूसरा जापान. अगर स्थितियां प्रतिकूल नहीं होतीं तो एशिया की सदी बहुत पहले शुरू हो गई होती…
पहले जापान की बात करते हैं. जापान ने दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही के बाद जबरदस्त तरीके से उठने का जज्बा दिखाया. शून्य होकर फिर से शिखर तक का सफर तय करने में जापानी और जर्मन नस्ल अद्भुत है. 1945 में ज्ञात मानवीय इतिहास की सबसे बड़ी कृत्रिम तबाही झेलने के बाद महज 15 साल में जापान फिर से एशिया की सबसे बड़ी इकोनॉमी था. करीब 5,500 करोड़ डॉलर का साइज था 60 के दशक की शुरुआत में. भारत-चीन भी उसी आस-पास थे, थोड़े अंतर से पीछे. 1980 में जापान 1 ट्रिलियन इकोनॉमी बन गया था. अगले 6 साल में मने 1986 तक एक ट्रिलियन और आ गए. तीसरा ट्रिलियन आने में सिर्फ 2 साल लगा. जहां भारत आज पहुंचा है, जापान वहां पर 1988 में ही था. 1995 में जापान ने 5 ट्रिलियन को पार किया. यहीं से जापान के ग्रहण की शुरुआत हो गई. उस समय चीन उसके छठे और भारत आठवें हिस्से के बराबर था. 2010 में चीन ने जापान को पीछे कर दिया. इन 15 सालों में चीन की इकोनॉमी 6 गुणी बड़ी हुई, पर जापान स्थिर पड़ा रहा. जापान अभी भी वहीं अटका है, या कुछ कम ही हुआ है. साल-दो साल में भारत भी उससे आगे निकल जाएगा.
अब सोचिए कि 1995 के आस-पास जापान के साथ क्या ऐसा हुआ कि उसकी इकोनॉमी ही थम गई, वही इकोनॉमी जो स्नोबॉल इफेक्ट से गुजर रही थी और 2 साल में एक ट्रिलियन डॉलर जोड़ने लग गई थी? जापान की इकोनॉमी का मॉडल भी शानदार था, जिसे पहले चीन-कोरिया ने कॉपी किया और अभी भारत से लेकर वियतनाम तक प्रयास कर रहे हैं.
ईरान 1960 के समय 450 करोड़ डॉलर की इकोनॉमी था और एशिया में छठे स्थान पर था, पाकिस्तान के ठीक ऊपर. इस समय सऊदी अरब टॉप-15 में कहीं नहीं था. फिर आया 1970-75 का एनर्जी क्राइसिस और यहां से शुरू हुआ क्रूड इकोनॉमी का दौर. 1980 में सऊदी अरब भारत के लगभग बराबर पहुंच गया था, लेकिन फिर लुढ़कने लग गया. 1980-90 का दशक खाड़ी देशों के लिए महत्वपूर्ण है. अमेरिका और सोवियत दोनों यहीं ताकत आजमा रहे थे. 1987 में ईरान भारत से आगे निकलकर एशिया की तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी बन चुका था. इसके 2 साल बाद 1989 में ईरान ने चीन को भी पीछे कर दिया और अब आधे ट्रिलियन से ज्यादा की इकोनॉमी बन गया. 1990 में टॉप पर पहुंचने के बाद 1991 से डाउनफॉल शुरू हुआ और इतनी रफ्तार से कि पूछिए मत. 1991 में 60,000 करोड़ तक पहुंचने के बाद 1992 में जीडीपी का साइज 10 हजार करोड़ भी नहीं बचा और ईरान टॉप-10 से बाहर. बाद में इसने फिर दम दिखाया, पर जहां वह 1989 में ही पहुंच गया था, वहां तक फिर आने में 20 साल लग गए. हालांकि इस बार भी इकोनॉमी टिकी नहीं. अभी ईरान टॉप-15 में कही नहीं है. ईरान के मामले में देखिए कि पहले 1991 में कुछ हुआ अचानक और फिर 2010 के आस-पास कुछ हुआ.
फॉर्च्यून की 1995 की ग्लोबल 500 लिस्ट को देखेंगे तो दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी मिलेगी इतोचु कॉरपोरेशन. दूसरी सबसे बड़ी सुमितोमो, चौथी सबसे बड़ी मारुबेनी, सातवीं सबसे बड़ी निशो इवाई और 10वीं सबसे बड़ी मित्शुबिशी. मने अभी जो दबदबा अमेरिकी कंपनियों का है, वही हाल तब जापान का था. इसमें दो पीओवी हैं. वेस्टर्न पॉइंट ऑफ व्यू फर्जी दोषारोपण करता है. इसके हिसाब से चीन से जापान कंपीट नहीं कर पाया, चीन कॉस्ट इफेक्टिव हो गया, ग्लोबल फैक्ट्री का स्थान जापान की जगह चीन ने ले लिया… ब्ला-ब्ला. अल्टर्न पीओवी कुछ काम की बातें बताता है. जापान की इकोनॉमी पर ब्रेक लगने का सबसे बड़ा कारण है अमेरिका. दूसरे वर्ल्ड वार के बाद जापान पर हर्जाने के अलावा कुछ शर्तें थोपी गईं कि जापान मिलिट्राइजेशन से दूर रहेगा, जिसका बहुत हद तक पालन अभी भी हो रहा है. जापानी कंपनियों को तकनीकी मामलों में मीलों आगे निकल जाने के बाद अमेरिका ने सारे तिकड़म अपनाए और मैन्यूफैक्चरिंग बेस जापान से उसके यहां शिफ्ट होता चला गया. चीन ने बहुत बाद में नुकसान किया, और जब किया तक तक जापान में बहुत दम बचा नहीं रह गया था. तो जापान के मामले से सबक मिलता है कि इकोनॉमी पर ध्यान देते रहने के साथ-साथ सामरिक ताकत को भी बढ़ाते रहना महत्वपूर्ण है. अल्टर्न व्यू वाले कहते हैं कि अगर जापान ने एक न्यूक बना लिया होता तो डॉलर की दादागिरी इस सदी की शुरुआत में ही समाप्त होने लग जाती. अगर कोई चांद पर जा रहे रॉकेट की धुन में या फ्रांस से आ रहे राफेल के स्वर में रोटी-मकान के शोर की मिलावट करने लगे, तो उसे एकदम से इग्नोर कर देना. बुद्धि से वह बेचारा है.
ईरान के मामले को देखिए. इस देश में बड़ी संभावनाएं हैं. यह वेस्टर्न कैपिटलिज्म को उत्तर देने वाला एशियाई मॉडल बन सकता था और वैसे तर्कों को भी चुप करा सकता था कि इस्लाम के साथ विकास संभव नहीं है. ईरान की भी कुंडली में अमेरिका ग्रह भारी पड़ा. ईरान की इकोनॉमी का पैटर्न देखिए. डेटा हमारे पास 1960 से ही है. 60-70 कोई खास डेवलपमेंट नहीं. 70 के दशक की शुरुआत में एनर्जी क्राइसिस… इकोनॉमी उठने लगी. फिर उसी दशक के अंत में इस्लामिक क्रांति, तो कुछ समय डिस्टर्बेंस, पर इसके बाद इकोनॉमी ओर तेजी से बढ़ने लगी. 10 साल में जबरदस्त तरक्की हुई. ईरान की इकोनॉमी रफ्तार से दौड़ रही थी कि 1990-91 में खाड़ी युद्ध हो गया. सारा गुड़ यहां पर गोबर हो जाता है. उसके बाद ईरान फिर संभलता है, लेकिन इस बार अमेरिका और पश्चिमी देश कई आर्थिक पाबंदी लगाकर उसे गिरा देते हैं. ईरान की इकोनॉमी पर क्रूड का काफी असर होता है. उसे क्रूड मार्केट से ही बाहर कर दिए. यही काम वेनेजुएला के साथ हुआ, रूस के साथ हो रहा है.
ईरान के मामले से सबक मिलता है कि अमेरिका आगे बने रहने के लिए बैलेंस बनाने में जुटा रहता है और इसके लिए उसे किसी हद की परवाह नहीं होती है. लाखों लोग मरते हों तो मरें, दसियों खुशहाल देश तबाह होते हों तो हों. सिर्फ ईरान ही क्यों, कई खाड़ी देश उदाहरण हैं. चीन बचा रह गया कि वह कभी फेर में आया नहीं. भारत बचा हुआ है क्योंकि अभी अमेरिका को भारत से ज्यादा किसी और की जरूरत नहीं है.
आने वाला समय न तो क्रूड के लिए ठीक है, न ही डॉलर के लिए. दुनिया सोवियत के दौर में नहीं बदल पाई, जापान को ताकत बनने नहीं दिया गया, लेकिन अब समीकरण बदलने का समय आ गया है. डॉलर को हथियार बनाकर अमेरिका ने उसका पूरा दोहन कर लिया. अब धीरे-धीरे डॉलर का महत्व कम होता जाएगा. क्रूड का महत्व कम होने से भी अमेरिका को नुकसान होगा और एशिया में सबसे ज्यादा घाटा होगा सऊदी अरब को. ईरान की इकोनॉमी कोलैप्स नहीं हुई, क्योंकि वहां कृषि महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसने ईरान को संभाले हुए है. सऊदी अरब के पास ऐसा कोई सहारा नहीं है. टूरिज्म को वैकल्पिक उपाय बनने का प्रयास चल रहा है, पर यह काफी नहीं होगा. यूरोप का उदाहरण देख सकते हैं. क्रूड और डॉलर के इस खेल में जापान की एक और बात बता देते हैं. इलेक्ट्रिक कार कोई नई चीज नहीं है. जापान में 100 साल पहले ही अच्छी इलेक्ट्रिक कार बन गई थी, पर पेट्रो पॉलिटिक्स ने तब उसे डेवलप नहीं होने दिया. अब स्थिति नियंत्रण से बाहर है.


