Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

टीवी

पूरा इंटरव्यू देखकर आप समझ सकते हैं कि इस देश में डिक्टेरशिप किस स्टेज तक पहुंच चुका है… नंबर सबका आएगा!

राकेश कायस्थ-

जब पांवों में बांधे घुंघरू तो नाचना पड़ेगा ही

टीवी पत्रकारिता से अलग हुए मुझे एक अरसा बीत चुका है। अब खबरों के लिए टीवी वो लोग भी नहीं देखते जो वहां काम करते हैं। न्यूज़ चैनलों के बारे में जो बातें शाश्वत रूप से स्थापित है, उन्हें दोहराने का भी कोई फायदा नहीं है। इसलिए कुछ अपवादों को छोड़कर मैंने टीवी पत्रकारिता पर भी कभी कुछ नहीं लिखा, व्यक्तियों पर तो हर्गिज नहीं।

पिछले चौबीस घंटों में कई लोगों ने स्मृति ईरानी के इंटरव्यू वाला क्लिप मुझे व्हाट्स एप किया। देखकर बुरा लगा। उतना ही बुरा उस वक्त लगा था कि जब सौ करोड़ रुपये की उगाही के आरोपी सुधीर चौधरी को गाजे-बाजे के साथ टीवी टुडे प्रबंधन ने आजतक बुलाया था और नौ बजे `ब्लैक एंड व्हाइट’ करने की जिम्मेदारी दे थी।

जिंदगी असल में काले और सफेद के बीच के ग्रे एरिया में ही होती है। सिस्टम, पॉलिटिक्स और पावर से जुड़े सवालों के जवाब कभी भी ब्लैक एंड व्हाइट हो नहीं सकते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट के बीच जो कुछ उसी का नाम मानवीय विवेक है और उसे मिटाये बिना फासिस्ट समाज नहीं बनाया जा सकता है।

सत्ता प्रतिष्ठान अरबों रुपये खर्च करके इस ग्रे एरिया को मिटाने के लिए रात-दिन काम रहा है। जनता को बाध्य किया जा रहा है कि वो सरकार के पक्ष में खड़े हों या फिर दुश्मन के तौर पर चिन्हित होने के लिए तैयार रहें। सुधीर चौधरी ने अपने शो का नाम “ब्लैक एंड व्हाइट” किस मंशा के साथ रखा होगा ये बताने की ज़रूरत नहीं है।

आज से करीब बाइस पहले जब हम जैसे लोगों ने आजतक में काम करना शुरू किया था तो सीएनएन से आये लोगों से हमारी ट्रेनिंग करवाई गई थी। एडिटोरियल गाइड लाइन का एक मोटी पुलिंदा थमाया गया, जिसमें ये लिखा था– हम और वे जैसे शब्दों का इस्तेमाल न्यूज कवरेज में मना है।

सांप्रादायिक दंगों के कवरेज में किस तरह की सावधानी बरती जाये किसी भी पक्ष का नाम ना लिया जाये, सिर्फ सूचनाएं दी जायें, भाषा हर्गिज भड़काऊ नहीं होनी चाहिए, ये सब बातें एडिटोरियल ट्रेनिंग का हिस्सा थाी।

उसी आजतक ने 25 साल अपने प्राइम टाइम बुलेटिन के लिए ऐसे आदमी का चुनाव किया जिसकी पहचान ही समाज में सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाले न्यूज एंकर की रही है। सुधीर चौधरी वहीं व्यक्ति हैं, जिनके साथ इंटरव्यू मे प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया को आश्वस्त किया था कि भारत में अब पकौड़ा क्रांति हो चुकी है।

ज़ाहिर है, सिर्फ ज़हर फैलाना सुधीर चौधरी की एकमात्र योग्यता नहीं है। उनके ज़रिये सत्ता तंत्र को साधना भी टीवी टुडे मैनेजमेंट का उदेश्य हो सकता है, वर्ना इतने बड़े मीडिया हाउस के पास टैलेंट की क्या कमी थी?

अब आते हैं, आजतक के उस कार्यक्रम पर जब स्मृति ईरानी ने भरी सभा में सुधीर चौधरी को एक तरह बता दिया कि नौकर हो, अपनी औकात मत भूलो। स्मृति ईरानी की मौजूदा सरकार में क्या हैसियत है और ये हैसियत क्यों है, इस बारे में सबको पता है।
शायद यही सब देखते-समझते हुए टीवी टुडे ने बातचीत का जिम्मा सुधीर चौधरी को दिया ताकि अपने अनुभव के आधार पर वो ऐसे सवाल पूछ लें कि मंत्री महोदया नाराज़ ना हों और इंटरव्यू की रस्म अदायगी हो जाये।

सुधीर चौधरी ने सारे सवाल उस भाव-भंगिमा में पूछे जिस तरह प्रसून जोशी ने नरेंद्र मोदी से पूछे थे। लेकिन पूरे इंटरव्यू के दौरान श्रीमती ईरानी के नथुने फड़कते रहे। सत्ता की हनक और सवाल पूछने वाले के प्रति हिकारत पूरे इंटरव्यू के दौरान महसूस की जा सकती है।

सुधीर चौधरी ने कहीं भी स्मृति ईरानी से क्रॉस क्वेश्चन नहीं किया यूं कहें तो श्रीमती ईरानी ने उन्हें इसकी आज्ञा नहीं दी। बस एक मासूम सा सवाल पूछा था– ” जब टमाटर ढाई सौ रुपये किलो हुआ था, तब आपके घर में इस बारे में कोई बात होती थी।”

ये सवाल ऐसा है कि जो हरेक राजनेता से हर सरकार के दौर मे पूछा जाता रहा है। मुझे याद है, साल 2000 के आस-पास गैस सिलेंडर महंगा होने पर तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री राम नाइक की पत्नी के हवाले से एक स्टोरी की थी। श्रीमती नाइक ने कहा था कि कीमत बढ़ने का असर हर गृहणी पर पड़ता ही है। चैनल पर लगातार खबर चली कि मंत्रीजी की पत्नी तक मूल्य वृद्धि से परेशान हैं। लेकिन ना तो मंत्रीजी ने एतराज किया ना पार्टी के किसी गुर्गे ने फोन करके संपादक को हड़काया।

अब ज़रा टमाटर के भाव पर श्रीमती ईरानी का जवाब सुनिये “क्या मैं आप पूछूं कि जब आप जेल गये थे तो अनुभव कैसा रहा था।” मिमियाती हुई आवाज़ में पूछे एक सवाल के लिए श्रीमती ईरानी ने उस आदमी की इज्ज़त को तार-तार कर दिया जो नफरत के सरकारी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर रात-दिन काम कर रहा है।

पूरा इंटरव्यू देखकर आप समझ सकते हैं कि इस देश में डिक्टेरशिप किस स्टेज तक पहुंच चुका है। नंबर सबका आएगा। जो मीडिया हाउस इस बात से खुश हैं कि पत्रकारिता को कूडे़दान में डालकर उन्होंने आर्थिक हित साध लिये हैं, उन्हें अंदाज़ा नहीं है कि उनके लिए भी हालात बद से बदतर होंगे।

कॉरपोरेट मीडिया ने अपने पांव में घुंघरू बांधे तो उसे हमेशा नाचने के लिए तैयार होना होगा। अगर सरकार बदली तब भी जो सत्ता में आएगा वो मीडिया के मोदी डॉक्ट्रिन’ को ही फॉलो करेगा। एक छोटा सा उदाहरण अपने राज्य महाराष्ट्र का देता हूं। अर्णब गोस्वामी सारी सीमाओं को ताक पर रखकर सुपारी किलर की तरह काम कर रहे थे। उद्धव सरकार ने एक बारइलाज’ किया तो उसके बाद से बोलती हमेशा के लिए बंद हो गई।

जनता ने खबरों के लिए वैकल्पिक मीडिया की तरफ देखना शुरू कर दिया है। सदाचार की ताबीज पहनकर इस दुनिया में कोई नहीं आया है। यू ट्यूबर्स के साथ भी नैतिकता के सवाल जुड़े हो सकते हैं। लेकिन अच्छी बात ये है कि न्यूज इंडस्ट्री के मुकाबले जनता के पास यहां चयन का विकल्प है।

Local News Community
3 Comments

3 Comments

  1. Shiv shankar sarthi

    August 20, 2023 at 9:22 pm

    उम्दा लेख पीएम की राह पर हर राज्यों के मुख्यमंत्री चल पड़े हैं।स्मृति ने तो सिर्फ जेल यात्रा की बात की,छत्तीसगढ़ में तो जेल यात्रा करवा दी जाती है सीएम चाहे किसी भी दल का हो।

  2. शालीन वर्मा

    August 22, 2023 at 7:25 am

    इसमें सुधीर चौधरी या किसी भी एंकर की गलती नहीं है जब मीडिया हाउस का मालीक ही पैरों में घुंघरू बांधने के लिए तैयार रहता है सरकार के हर इशारे पर नृत्य करने की मुद्रा में रहता है एंकर इसी तरह बेइज्जत होता रहेगा 2014 के पहले मीडिया हाउस सरकार से सवाल करते थे उस वक्त भी मीडिया हाउस को विज्ञापन मिलता था दर्शक बने हुए थे और मीडिया हाउस मुझे लगता है कि 75% फ्री होकर काम करता था 25% ही उस पर दबाव होता था ढेर सारे वर्कर मीडिया हाउस में काम करते थे क्योंकि जनता चाहती है कि मीडिया सरकार से सवाल करें उनकी टीआरपी की दौड़ बनी रहती थी आर्थिक फायदे भी होते रहते थे लेकिन जब से मीडिया हाउस ने पैर में घुंघरू बांध लिए हैं तब से लगातार बेइज्जत हो रही है सरकार से भी और जनता से भी हालात यह हो गए हैं आर्थिक फायदा तो बिल्कुल नहीं हो रहा है क्योंकि कई मीडिया हाउस बंद हो चुके हैं और कई जगह 50% वर्करों को हटा दिया गया है और जनता की नजर में गिरते जा रहे हैं अब फैसला मीडिया हाउस को करना है कि सरकार से सवाल कर के सीना तान के जनता की नजरों में खरा रहना है या आर्थिक नुकसान सहते हुए भी बे इज्ज़त होते रहना है मंच पर

  3. संदीप श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार छत्तीसगढ़

    August 24, 2023 at 6:28 am

    स्मृति ईरानी अपने व्यक्तित्त्व को सुषमा स्वराज़ जैसा मानने की भूल कर रही हैं ! सुषमा जी हमारे बीच नहीं है लेकिन उनका राजनैतिक आकर्षण आज की किसी भी भारतीय महिला राजनैतिक में नहीं है!
    सत्ता के दम पर मीडिया से डील न करें उनके पास खोने के लिए ( पत्रकार सुधीर चौधरी ) के पास कुछ नहीं है!
    लेकिन स्मृति ईरानी कुछ दिनों बाद अनुभव करेंगी की करिश्मा कैसे होता है चरित्र को सम्हाले बिना राजनीती नहीं कीजिये… बहुत ही घातक हो सकता है !…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन