
संजय कुमार सिंह
अरविन्द केजरीवाल ने जमानत पर रिहा होने के बाद अपने पहले भाषण में तानाशाही के खिलाफ एकजुट होने की बात की है। आज की खबर यही होनी चाहिये थी। यही नहीं, 11 बजे हनुमान मंदिर और फिर प्रेस कांफ्रेंस के लिये निमंत्रण की भी खबर है। इसमें यह सूचना भी है कि केजरीवाल वही कर रहे हैं जो नरेन्द्र मोदी यानी वोट के लिए मंदिर। पर जब जमानत मिलना ही सरकार की हार है तो सरकार (तानाशाही) के खिलाफ एकजुट होने की अपील तो डबल हमला है। शायद इसलिए आज इस अपील को कम महत्व मिला है। वरना केजरीवाल का जेल में होना और अब रिहा होना सरकार की तानाशाही का ही उदाहरण है जो मीडिया के बड़े वर्ग की सहायता और समर्थन से चल पा रहा है। जहां तक सत्तारूढ़ भाजपा की बात है, सुप्रीम कोर्ट पर भी आरोप लगाने से नहीं चूकती। व्हाट्सऐप्प पर जो चल रहा है उससे अलग, टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार जजों ने पक्ष लिया है। पूर्व सांसद विनय सहत्रहबुद्धे ने कहा है, मतदान के बीच में पक्ष लेकर जजों ने खुद को अभियान का भाग बना लिया है।
आज की खबर में जमानत की तकनीकी बारीकियों का मुझे बहुत मतलब नहीं लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने काफी सोच-विचार और स्पष्ट विरोध के बावजूद जमानत दी है और उसकी नजर में जरूरी है तभी मिली है। सब सार्वजनिक है और ईडी का विरोध ऐसा था जैसे जमानत मिलने से उसकी नालायकी साबित हो जायेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि ईडी का काम घोटाले की जांच करना और अपराध हुआ है तो सजा दिलाना है। इसमें आरोपी को जेल में रखना, चुनाव प्रचार से रोकना या सत्तारूढ़ दल की सहायता शामिल नहीं है लेकिन जमानत के विरोध में जो अंतिम कोशिश हुई वह स्पष्ट तौर पर उसका काम नहीं है। फिर भी उसने किया तो खबर यही होनी चाहिये थी कि जेल से छूटने वाले केजरीवाल ने लोगों को तानाशाही के खिलाफ एकजुट होने की अपील की। सरकारी पार्टी की चिन्ता अपनी जगह है कि मुख्यमंत्री आरोपों से बरी नहीं हुए हैं और मैं तब भी अखबार में खबर ढूंढ़ंगा जब वे आरोपों से बरी होंगे जैसा छत्तीसगढ़ वाले मामले में हाल में हुआ है। हालांकि, आज के अखबारों के लिए सबसे बड़ी खबर दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल को जमानत मिलना ही है।
वैसे तो इसका मतलब यही है कि देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं में से एक, सुप्रीम कोर्ट ने ही अपना काम किया है। सरकार यानी सत्तारूढ़ पार्टी और उसके समर्थक जब विरोधियों और विपक्षियों को हर तरह से कमजोर और निष्प्रभावी बनाने में लगे हैं तब सभी स्वतंत्र और निष्पक्ष लोगों तथा संस्थानों का काम था कि चुनाव के लिए समान स्थितियां बनाएं। तमाम संस्थाओं और लोगों ने जब अपना काम नहीं किया जो यह जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की थी। उसने अपना काम किया, किसी दबाव के बिना किया लेकिन उसका भी विरोध शुरू हो गया और व्हाट्सऐप्प पर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ मैसेज घूम रहा है जो अनुचित है और इसपर कार्रवाई होनी चाहिये थी पर हो रही होती तो यह स्थिति ही नहीं बनती। उस संदेश को यहां पेश करना उसका प्रचार ही होगा इसलिए मैं नहीं कर रहा हूं पर इससे सरकार समर्थकों की हिम्मत और सरकार के प्रोत्साहन का अनुमान तो लगता ही है। लेकिन यह प्रधानमंत्री जो कर रहे हैं उसके मुकाबले कम ही है और जब चुनाव आयोग उन्हें नहीं रोक पा रहा है तो प्रधानमंत्री मोदी के परिवार के लोगों को क्यों रोकें?
कहने की जरूरत नहीं है कि लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों का बैंक खाता फ्रीज कर देना और विपक्षी दल के स्टार प्रचारकों को जेल में रखना लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है। लेकिन इसकी परवाह मीडिया के एक बड़े हिस्से को या उसे नहीं है जो सरकार का समर्थन कर रहा है। ऐसे में आज अरविन्द केजरीवाल को जमानत मिलने से अगर सत्तारूढ़ पार्टी को राजनीतिक नुकसान हुआ है तो उसकी भरपाई करने की मीडिया की यह कोशिश मिसाल है। अमर उजाला में ये दो खबरें एक दूसरे को बराबर करती लग रही हैं। नवोदय टाइम्स में विज्ञापन है इसलिए दोनों खबरें एक साथ नहीं छप पाईं लेकिन एक खबर पहले पन्ने पर लीड है तो दूसरी, दूसरे वाले पहले पन्ने पर। अमर उजाला का पहला पन्ना आप खुद देखिये। रिहा होने के बाद अरविन्द केजरीवाल ने जो कहा है वह आज द टेलीग्राफ का कोट है। उन्होंने कहा है, “हमें देश को तानाशाही से बचाना है, अपनी पूरी ताकत से लड़ूंगा लेकिन 140 करोड़ लोगों की सहायता चाहिये।” यह ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ चार्जशीट दायर होगी, से बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे भी, जब तानाशाही नहीं रहेगी तो कार्रवाई होगी ही।

पहली नजर में भले आपको लगे कि दोनों एक सी खबरें हैं और इसलिए एक साथ छपी हैं और ठीक ही है लेकिन केजरीवाल को जमानत मिलना बिल्कुल अलग मामला है और सरकार या ईडी की तमाम कोशिशों के बावजूद मिली है। कहने की जरूरत नहीं है कि व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी में उसका विरोध भी हो रहा है क्योंकि सरकार अपनी कोशिशों में कामयाब नहीं हो पाई। दूसरी ओर, सरकार ने ब्रजभूषण सिंह को बचाने के हर संभव प्रयास किये, उनका टिकट जरूर काटा लेकिन बेटे को दे दिया और अब इतने समय बाद टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार अगर अदालत ने कहा है कि, ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ आरोप पत्र तैयार करने के लिए पर्याप्त सामग्री है तो यह भी पता चलता है कि उन्हें अब तक जेल जाने से बचाया गया है। भले गिरफ्तार होते तो जमानत मिल गई होती। यह पार्टी में प्रभाव दिखाने औऱ बेटे को जिताने के लिये कम नहीं है। वैसे ही जैसे साध्वी प्रज्ञा पिछली बार सासंद बन गईं और उनके खिलाफ मामला लटका रहा। इस बार लगा कि हार जायेंगी तो टिकट काट दिया गया। आज की खबर से सिर्फ इतना पता चलता है कि मामला अदालत में है। इससे सरकार ने उनके बचाव में जो किया वह जायज नहीं हो जायेगा। लेकिन दोनों खबरें एक साथ छाप कर यह दिखाने की कोशिश की जा रही है कि कानून का राज चल रहा है और सब ठीक है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने जमानत की खबर के साथ जेल से छूटने के बाद मुख्यमंत्री का पहला भाषण तीन कॉलम में छापा है और इसका शीर्षक है, जेल से रिहा होने पर मुख्यमंत्री ने पहले भाषण में कहा, देश को तानाशाही से बचाइये।
कहने की जरूरत नहीं है कि देश में सब ठीक तब होता जब ब्रजभूषण सिंह के खिलाफ समय पर कार्रवाई हुई होती या केजरीवाल को पहले ही जमानत मिल गई होता। जो कारण सुप्रीम कोर्ट ने गिनाए हैं वो दूसरी संवैधानिक संस्थाओं को क्यों नहीं दिखे और ईडी सरकार की तरफ से क्यों सक्रिय रहा। उसका काम मामले की जांच करना और दोषी को सजा दिलाना है। किसी नेता को चुनाव प्रचार से रोकना नहीं है। पर कल की खबर या जमानत से पहले की कोशिशों से तो यही लगता है कि ईडी की दिलचस्पी केजरीवाल को जमानत नहीं मिलने में भी थी जो नहीं होनी चाहिये। इसलिए, चुनाव से पहले लेवल प्लेइंग फील्ड के लिए जब किसी ने काम नहीं किया तो सुप्रीम कोर्ट को करना पड़ा। चूंकि दो दौर का मतदान हो चुका है इसलिए इसमें देर भी हुई है। मुझे लगता है कि यह काम चुनाव आयोग का था और जैसा अदालत ने कहा है, टाइम्स ऑफ इंडिया में शीर्षक है, 21 दिन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
चुनाव आयोग को निष्पक्ष चुनाव के लिए जो ठीक लगे वह करना चाहिये और यह उसका काम व अधिकार है। टीएन शेषण को इसीलिए याद किया जाता है। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसके लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का ख्याल रखना ही चाहिये। जरूरी नहीं है कि हर स्वतंत्र संस्था बहुमत पाने या बहुमत के लिए लड़ने-जीने वाले की तरह काम करे। ठीक है कि नियुक्ति सरकार करती है पर वेतन नियुक्ति करने वाला नहीं देता है वह जनता का पैसा है औऱ जनता के लिए काम किया जाना चाहिये। आपने देखा कि कल जमानत के खिलाफ खबर छाप और छपवा कर माहौल बनाने की कोशिश की गई थी और ईडी या मीडिया का काम नहीं है कि वह सरकार का समर्थन करे बल्कि सरकार के विरोधियों के अधिकारों की रक्षा करना उनका काम था। सुप्रीम कोर्ट ने किन कारणों से और किस आधार पर जमानत दी है उसे समझा जा सकता है।
दूसरी ओर व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी पर फैसले का विरोध खुलेआम जारी है और जैसा कहा जाता है उसके अनियंत्रित प्रचार ने लोगों के सोचने के तरीके को खराब किया है और उसपर भी नियंत्रण की आवश्यकता है। अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी से यह साबित हो गया है मीडिया के एक बड़े हिस्से के साथ बहुत सारी संवैधानिक संस्थाएं, सरकारी विभाग और सरकार के लोग सरकार के पक्ष में काम कर रहे हैं और यह गलत है। देखना चुनाव आयोग को है पर उसने नोटिस ही जारी किया है और इसीलिए आज नवोदय टाइम्स में एक खबर का शीर्षक है, कांग्रेस हिन्दू विरोधी, उसके लिए लूट, तुष्टिकरण वंशवाद पहले : मोदी। कहने की जरूरत नहीं है कि 2014 में नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस को भ्रष्ट कहा था, बाद में उसपर तुष्टिकरण का आरोप लगाते रहे और खुद संतुष्टिकरण की बात करते हैं। यह हिन्दू मुसलमान करना है और चुनाव के समय आदर्श आचार संहिता का ख्याल रखते हुए यह सब नहीं कहना चाहिये। यही नहीं, 10 साल सरकार में रहने के बावजूद वे कांग्रेस पर लूटने का आरोप साबित नहीं कर पाये, इलेक्टोरल बांड की लूट सबके सामने है और बिना लूटे बना कार्यालय भवन देखते बनता है। ऐसे में निष्पक्षता का तकाजा था कि अखबार भी ऐसे आरोप नहीं छापते, अगर कांग्रेस भी लगा रही हो तो अमर उजाला की तरह संतुलन बनाते हुए छापना भी अलग बात होती।
संदेशखाली और राजभवन
जहां तक सरकार के खिलाफ खबरों की बात है आप जानते हैं कि संदेशखाली का मामला कितना छपा था। अब जब खबर है कि संबंधित महिलाओं ने अपने आरोप वापस ले लिये हैं और कहा है कि उन्हें शिकायत की जानकारी ही नहीं थी उनसे सादे कागज पर दस्तखत करा लिये गये थे आदि तब ये खबरें नहीं छप रही हैं, कार्रवाई तो दूर की बात है। दूसरी ओर, अब यह छपना शुरू हुआ है कि महिलाओं पर दबाव डालकर शिकायत वापस करवाई जा रही हैं। इसके साथ यह बताया जाना चाहिये कि केंद्र सरकार कैसे चूक जा रही है या कमजोर पड़ रही है। पर खबरों में यह सब तो नहीं है और वैसे ही नहीं है जैसे पश्चिम बंगाल के राजभवन और राज्यपाल का मामला। कल आपने पढ़ा कि राज्यपाल ने वीडियो सार्वजनिक कर दिया है और इसमें शिकायतकर्ता महिला की पहचान उजागर हो गई है। आज पुलिस के हवाले से खबर है कि फुटेज में संबंधित महिला रोती हुई दिख रही है। पुलिस के पास लोक निर्माण विभाग का फुटेज है जो राजभवन में रख-रखाव का काम करता है।


