संजय वर्मा-
मेरी मां अपने अंतिम दिनों में कोई बीमारी न होने पर भी डॉक्टर के यहां जाने की जिद करती थीं। मैं झुंझलाता- मां अभी तीन दिन पहले तो सारे टेस्ट कराए थे, सब ठीक आए…! प्रॉब्लम क्या है?
जब उन्हें कुछ नहीं सूझता तो कहतीं- राजा तू समझ नहीं रहा है, मेरी सांस जितनी अंदर जा रही है उतनी बाहर नहीं आ रही….!
मैं अपनी हंसी रोक कर कहता- बाप रे फिर तो यह सचमुच समस्या है चलिए तैयार हो जाइए। दरअसल कुछ एक एपिसोड्स के बाद मुझे समझ आ गया था कि मां के लिए डॉक्टर के यहां जाना एक किस्म का टूरिज्म था। वे आधा घंटा लगाकर अच्छे से तैयार होती। मेरा ड्राइवर सीताराम और मैं उन्हें हाथ पड़कर कार में बैठाते। पंद्रह मिनट की ड्राइव कर हम क्लिनिक पहुंचते। हमारे फैमिली डॉक्टर साहब उन्हें अपनी मां जैसा सम्मान देते थे। मां डॉक्टर साहब को तरह-तरह की बीमारियों के लक्षण बताती और साबित करने की कोशिश करतीं कि वे सचमुच बीमार हैं। डॉक्टर साहब मुस्कुराते, अच्छे से चेक करते। पांच सात मिनट इधर-उधर की बातें करते फिर कोई विटामिन या नींद की गोली देकर विदा करते।
फिर मां मेडिकल स्टोर पर जातीं। मेडिकल स्टोर वाला रामदयाल भी मेरा दोस्त था। वे उसे पुरानी गोलियां वापस करतीं, नई खरीदती। उससे झगड़ती कि तूने छह महीने पहले जो नीली गोली दी थी वह बहुत अच्छी थी वही लाकर दे। वह बेचारा बगैर नाम के कैसे जानता कि वह नीली गोली कौन सी थी। वह अलग-अलग गोलियां कैप्सूल निकाल कर दिखाता। काउंटर पर ढेर लग जाता। मां उससे लाड़ करती- तू तो गधा है, तुझे कुछ याद नहीं रहता।
यह सब एक खेल था जैसे मां को खुश करने का। इस षड्यंत्र में मैं डॉक्टर साहब मेडिकल वाला हम सब अपना पार्ट अदा करते। दो घंटे के इस नाटक के बाद मां खुश हो कर वापस आती, खाना खाकर तान के सो जाती।
मां के जीवन में कोई दोस्त सहेली कहीं आना-जाना नहीं था। डॉक्टर के यहां जाना उनकी अकेली सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधि थी।
मैं अक्सर मेडिकल स्टोर पर बूढ़ों को स्टोर वाले से बात करते देखता हूं। कभी वह एक गोली कम करवा देते हैं किसी गोली को बढ़ावा देते हैं। वे दरअसल खरीद फरोख्त के इस अनुभव को यथासंभव लंबा खींचना चाहते हैं। वे जानते हैं इसके बाद उन्हें फिर अपनी अकेली उदास दुनिया में लौट जाना होगा।
एक किस्सा और सुनिए। एक मित्र का बेटा सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। काफी समय से वर्क फ्रॉम होम करता है। एक शाम साथ टहलते हुए अपने मन की गिरहें खोल बैठा। उसने कहा पिछले दिनों मेरे साथ एक अजीब बात हुई। मैं अपने डेंटिस्ट के पास रूट कैनाल करवाने गया था।
आधे एक घंटे तक लगातार डेंटिस्ट का शरीर मेरे ऊपर था। उसके हाथ मेरे चेहरे को छू रहे थे। पता नहीं क्यों दर्द के बावजूद मुझे यह सब अच्छा लग रहा था। एक पल को मुझे डर लगा कहीं मैं ‘वो’ तो नहीं हो गया हूं। मुझे क्यों अच्छा लग रहा है?
फिर मैंने याद करने की कोशिश की- आखिरी बार मैं कब और किस के इतना करीब आया था? मैंने कब किसको गले लगाया था? मुझे समझ आया कि जो मुझे अच्छा लग रहा है यह वो ह्यूमन टच है जो मैं मिस कर रहा था …!
खतरनाक बात है ना..!
हमारी दुनिया सामाजिक सांस्कृतिक अनुभवों के लिहाज से उल्टा गरीब हो गई है। घर में रिश्तेदार नहीं, बाहर चौपाल नहीं, गली में रीछ बंदर का तमाशा नहीं, शादी में बन्ना बन्नी के गीत नहीं…! जाहिर है ऐसे में इंसान विकल्प ढूंढता है। यदि आप ध्यान से देखें तो जो गतिविधि ऊपर से आर्थिक सामाजिक राजनीतिक (या आपराधिक भी) लगती है वह अंततः एक सांस्कृतिक गतिविधि है। मेरी पत्नी अपनी कामवाली बाई से रोज आधा घंटा झिग झिग करती है। पहले मुझे बुरा लगता था। फिर समझ आया कि यह उन दोनों के लिए ही एक सांस्कृतिक अनुभव है। वे इस झगड़े में अपनी गुमशुदा देवरानी जेठानी तलाश रही हैं। एक अमीर महिला महंगी कार से उतरकर भिंडी वाले भैया से दो रुपए कम करवाने के लिए झगड़ा कर रही है। क्या आपको यह आर्थिक गतिविधि लगती है?
कुदरत ने हमें जन्म और मृत्यु के बीच कई बरस दे दिए हैं। हम इस खाली स्थान को भरने के लिए अभिशप्त हैं, कोई खेल खेल कर।
फिर चाहे वह व्यापार करना हो डॉक्टर के पास जाना हो या शराब पीना।
आप कौनसा खेल खेलते हैं?


