
सुनील चतुर्वेदी-
रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून। जब से जल संकट गहराया है यह दोहा खूब दोहराया जाता है। मैंने पानी पर दर्जनों भाषण ‘जल ही जीवन है’ से शुरू होकर रहिम के इस दोहे पर खत्म होते देखे हैं। लेकिन असल में बात इतनी सी नहीं है। अकेले पानी का संकट नहीं है। पानी के साथ उसकी गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण मसला है। ईधर कुआं, ईधर खाई वाली मिसाल है। या तो बिना पानी के दम तोड़ो या प्रदूषित पानी पीकर। आइये, जान लेते हैं इस बारे में ‘मैं’ नहीं अलग-अलग दस्तावेजों में दर्ज आंकडें क्या कहते हैं।
भारतीय परिदृश्य की बात करें तो देश की लगभग आधी आबादी यानी 60 करोड़ से ज्यादा लोग जल संकट से जूझ रहे हैं। विश्व संसाधन संस्थान अमेरिका द्वारा प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार विश्व के सर्वाधिक जल संकट ग्रस्त 17 देशों में भारत 13वें स्थान पर है।
नीति आयोग द्वारा जारी कम्पोजिट वाटर मेनेजमेंट इंडेक्स रिपोर्ट, 2018, कहती है कि वर्ष 2020 तक देश के 21 शहर, दिल्ली, बेंगलूरू, चेन्नई, हैदराबाद आदि का भू-जल स्तर शून्य तक पहुँच जायेगा और इसके कारण लगभग दस करोड़ लोग प्रभावित होंगे। वर्ष 1994 में तो पानी की कमी के कारण चेन्नई को खाली करवाने की नौबत आ गयी थी। इस वर्ष बेंगलूरू के चर्चा में आने के बाद आप समझ लीजिये अब यह संख्या सिर्फ 21 पर रुकने वाली नहीं है।

केन्द्रीय भू-जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार 700 में से 256 जिले ओवर एक्स्प्लोईटेड की श्रेणी में हैं। अर्थात इन जिलों में 100% भू-जल का दोहन कर लिया गया है। जो क्षेत्र आज पानी की दृष्टि से सुरक्षित श्रेणी में हैं वो भी कितने दिन सुरक्षित रह सकेंगे!
पानी की कमी के साथ हमारे देश में पानी की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण पहलू है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में भारत का स्थान 120वां है। आप समझ सकते हैं कि हमारे यहाँ जल प्रदूषण के क्या हालात हैं।
केन्द्रीय भू-जल बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, तमिलनाडू राज्य का 2 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में सेलिनिटी की समस्या है।
19 राज्यों के 154 जिलों के विभिन्न क्षेत्रों में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित मापदंड से अधिक है। फ्लोराइड की अधिकता हड्डियों को कमजोर करती है जो जानलेवा है।
इसी प्रकार बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और उत्तरप्रदेश के 26 जिले भू-जल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा से प्रभावित हैं। आर्सेनिक की अधिकता से कैंसर जैसे रोग की संभावना बढ़ जाती है।
नीति आयोग की रिपोर्ट भी यही कहती है कि साफ पानी नहीं मिलने से हर वर्ष करीब 2 लाख लोग अपनी जान गँवा देते हैं जिनमे ज्यादा बड़ी संख्या बच्चों की होती है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वर्ष 2030 तक पानी की आवश्यकता वर्तमान में उपलब्ध कराये जा रहे पानी की मात्रा से दुगनी होगी। अर्थात जल संकट विकराल रूप ले लेगा और करोड़ों लोगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ेगा।
आँकड़े तो और भी बहुत है। पूरी किताब ही लिखी जा सकती है। लब्बे-लुबाब यह है अब सिर्फ जुमलों या मुँह ज़ुबानी जमा-खर्च करके पानी की समस्या को हल नहीं किया जा सकता। यह हालात चिंता पैदा करते हैं। अब भी यदि कुछ नहीं किया तो आने वाले कल की तस्वीर अच्छी नहीं है। कुछ तो करना ही पड़ेगा।
क्या करें, इस पर भी बात करेंगे लेकिन पहले मन पक्का तो कर लें। हाँ, हमें कुछ करना ही है।
क्रमशः
जल साक्षरता (पार्ट-6) : खर्च कम, आमदनी ज्यादा फिर भी बाबू ठन-ठन गोपाल!


