दिलीप मंडल-
फोर्ड फाउंडेशनल से फंड पोषित रहा, दिल्ली का थिंक टैंक CSDS पिछले कई दशक से हर चुनाव के बाद एक फर्जी आंकड़ा देता है कि किस जाति और धर्म के लोगों ने किस पार्टी को वोट दिया.
भारतीय समाज को खंड-खंड करने और जाति व धार्मिक समुदायों के बीच कटुता फैलाने का पिछले 75 साल का ये सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट है. इन आंकड़ों का सभी अखबार इस्तेमाल करते हैं. ये लेखों और किताबों तथा पीएचडी थीसिस में प्रयोग होता है.
अगले पांच साल तक राजनीतिक लेखों में ये आता रहता है किस जाति ने किसको वोट डाला. इस वजह से हर जाति वाला दूसरी जाति वाले को और हर धर्म के लोग दूसरे धर्म के लोगों को संदेह से देखते हैं.
CSDS के आंकड़ों के आधार पर ऐसे विश्लेषण आते हैं-
- जाटव, पासी और खटिक साथ वोट नहीं डालते
- यादव और कुर्मी अलग अलग तरीके से वोट डालते हैं
- निषाद वोट किसके पक्ष में गया
- ब्राह्मण वोट कैसे पलट गया
- ठाकुर और ब्राह्मणों ने अलग अलग पार्टियों को क्यों चुना
- भूमिहार किनको वोट डालते हैं.
- अति पिछड़ों ने किसको वोट दिया
- बनिए किस पार्टी के साथ गए
- मुसलमान किनको वोट देता है… आदि.
धर्म के आधार पर भी ऐसे गंदे विश्लेषण आते हैं. इन सबका कच्चा माल CSDS से आता है. हमारे जैसे लोगों के पास भी इनको इस्तेमाल करने के अलावा कोई उपाय नहीं होता. ये गलत है. सीएसडीएस का सर्वे न आए तो ये लेख बंद हो जाएंगे.
इसका नतीजा ये भी होता है कि नेता उन जाति और धर्म के इलाको में काम नहीं करता, जिनके बारे में उसे इन तथाकथित सर्वे के जरिए बताया जाता है कि उसका वोट तो आपको मिला ही नहीं.
मैं अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी, बेंगलुरू में सीएसडीएस के संजय कुमार के साथ एक कार्यक्रम में वक्ता था. मैंने उनसे पूछा कि ये आंकड़ा उनको कौन देता है. मैंने इतने इलेक्शन देखे, लेकिन वोट डालने के बाद मतदाता अपनी जाति और किसको वोट दिया, दोनों बता दे, ये संभव नहीं है. गांव में तो ऐसी दुश्मनी कौन लेगा और शहर वाले आसानी से अपनी जाति बताते नहीं हैं.
फिर वहीं, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स और स्कॉलर्स के साथ उसी हॉल में मैंने 30 मिनट का एक सर्वे किया. मैंने सबके बीच एक पर्चियां बंटवाई, जिसमें लोगों को सिर्फ अपनी जाति लिखनी थी. इसके अलावा कुछ भी नहीं. फिर उसे बंद करके दे देना था. पहचान पूरी तरह गुप्त थी. इसके बावजूद, लगभग 300 लोगों में से 50 लोगों ने भी पर्ची नहीं दी.
जिस देश में आदमी गुप्त तरीके से अपनी जाति नहीं बताता, वहां वह कौन सा सर्वे करने वाला है, जिसे पूरे देश में लोग अपनी जाति और वोट करने वाली पार्टी का नाम बताते हैं.
अब सवाल की फोर्ड फाउंडेशन या किसी भी ग्लोबल संस्था को इससे क्या फायदा. वो क्यों पैसे देती है इन कामों के लिए? दरअसल भारत दुनिया की उभरती महाशक्ति है. इससे आगे चलकर अन्य महाशक्तियों को चुनौती मिलनी है. इसलिए पर्यावरण से लेकर LGBTQ और जाति विमर्श से लेकर धार्मिक सवालों से जुड़े मसलों पर फॉरेन फंडिंग आती है.
चुनाव आयोग को इस तरह के जाति और धर्म केंद्रित सर्वे पर रोक लगा देनी चाहिए.


