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चे गेवारा की भारत यात्रा को संजोने में इस वरिष्ठ पत्रकार ने खूब दौड़-धूप की, छपा पर श्रेय नहीं मिला!

ओम थानवी-

ल क्रांतिकारी चे गेवारा (ग्वेरा/गुएवारा नहीं) का जन्मदिन था। चे हिंसा में भरोसा रखते थे। जैसे चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह भी। मैंने हमेशा गांधीजी के अहिंसा के रास्ते को श्रेष्ठ माना है। लेकिन अन्य क्रांतिकारियों के जज़्बे को भी सलाम करता हूँ।

इसलिए मैंने बड़े उत्साह से चे गेवारा की भारत यात्रा (1959) की बिखरी कड़ियाँ खोजने की कोशिश की। 2007 में साहित्य अकादेमी के एक सांस्कृतिक प्रतिनिधिमंडल में क्यूबा जाने का मौक़ा मिला तो हवाना में चे गेवारा के घर जा पहुँचा, जहाँ उनके बेटे कामीलो की देखरेख में एक अध्ययन केंद्र चलता है। बेटे के सौजन्य से मुझे मूल स्पानी में चे की वह रिपोर्ट मिल गई जो भारत से लौटकर उन्होंने राष्ट्रपति फ़िदेल कास्त्रो को सौंपी थी।

उस रिपोर्ट में चे गेवारा ने भारत के स्वाधीनता संग्राम में गांधीजी के अहिंसक “सत्याग्रह” प्रयोग की तारीफ़ की थी। दिल्ली लौटकर मैंने कवि और स्पानी भाषा के विद्वान प्रभाती नौटियाल से उस रिपोर्ट का अनुवाद करवाया। अब वह अनुवाद प्रभातीजी के श्रेय या मेरे हवाले के बग़ैर जगह-जगह छपा मिलता है!

चे गेवारा की दिल्ली यात्रा की तसवीरों की तलाश में पहले मेरे सहयोगी विवेक सक्सेना भारत सरकार के फ़ोटो विभाग (सूचना-प्रसारण मंत्रालय) होकर आए। वहाँ उन्हें बताया गया कि चे की तसवीरें वहाँ नहीं, “वे भारत कब आए थे भला”?

तब मैं ख़ुद सीजीओ परिसर गया और फ़ोटो निदेशक सेनगुप्ता से मिल साबित कर आया कि चे भारत आए थे। अशोक होटल में ठहरे थे। वहाँ से माँ को ख़त लिखा। ऑल इंडिया रेडियो को इंटरव्यू दिया। नेहरूजी के घर खाना खाया। मंत्रियों से मिले। कोलकाता गए। आदि।

सेनगुप्ताजी को बात में दम लगा। उन्होंने मेहनत की और एक रोज़ 14 तसवीरें ढूँढ़ निकालीं। उन्होंने बताया कि उनके रेकार्ड में वे तसवीरें चे नाम से नहीं, मेहमान के आधिकारिक अर्नेस्तो दे ला सरना नाम से दर्ज थीं। तसवीरें फ़ोटो विभाग के तब के जाने-माने फ़ोटोग्राफ़र कुंदन लाल ने खींची थीं। बहरहाल, उन तसवीरों से मेरा लेख ही नहीं संवरा, उनके साथ मिला विवरण (कैप्शन) से उस यात्रा के दौरों, बैठकों और मुलाक़ातों के ब्योरे भी मिल गए थे।

बाद में वह तसवीर सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुई, जिसमें मेरठ के एक गाँव पिलाना में सैनिक वर्दी में पहुँचे चे गेवारा का स्वागत गांधी-टोपी-धारी एक किसान कर रहे थे।

दिल्ली में मैंने हिंदुस्तान टाइम्स के आर्काइव्ज़ को भी खंगाला, जो तब कस्तूरबा गांधी मार्ग वाली इमारत की सबसे ऊपर वाली मंज़िल पर हुआ करता था। लगातार दो अंकों में दो तसवीरें पहले पन्ने पर छपी मिलीं: एक नेहरूजी के साथ, दूसरी रक्षामंत्री वीके कृष्ण मेनन के।

हवाना में चे गेवारा के घर में चल रहे अध्ययन केंद्र में वह भेंट सुरक्षित है, जो उन्हें दिल्ली में प्रधानमंत्री नेहरू ने दी थी – एक नक़्क़ाशीदार कटारी, जिस पर दुर्गा की छवि अंकित है। चे के बेटे की यह जानने की गहरी इच्छा थी कि कटारी पर अंकित वह “औरत” कौन है।

हवाना के बाज़ार में मुझे चे से संबंधित अनेक किताबें और डॉक्युमेंटरी फ़िल्में मिलीं। इनमें एक किताब ऐसी थी जिसमें सारी तसवीरें ख़ुद चे गेवारा की खींची हुई थीं। किताब में चार तसवीरें कलकत्ता की निकलीं। हमारे समूह में भारत भारद्वाज भी थे। मैंने अपनी इस ख़रीददारी का बोझ उन पर लाद दिया, क्योंकि मुझे लंदन जाना था। भारतजी ने बाद में मेरी इस भाग-दौड़ को ‘वागर्थ’ एक संस्मरण में लिख डाला।

संयोग देखिए कि लंदन में ‘गार्डियन’ अख़बार की एक प्रदर्शनी में हमारे मशहूर कार्टूनकार अबू अब्राहम की क़लम से सृजित चे गेवारा का एक रेखांकन मिल गया, जो उन्होंने अपनी हवाना यात्रा में बनाया था। चे ने उस पर संक्षिप्त हस्ताक्षर किए थे।

दिल्ली में मैं केपी भानुमति (अब दिवंगत) से मिला, जिन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए चे गेवारा से अशोक होटल में इंटरव्यू किया था। उनसे भी काफ़ी जानकारी और तसवीरें (उन्होंने दीवार पर टांग रखी थीं) मिलीं। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मैंने हवाना से लाई दो फ़िल्मों का प्रदर्शन किया, एक लेख पढ़ा और अंत में केपी भानुमति को मंच पर बुलाया। ख़ूब तालियाँ बजीं और देर तक बजती रहीं।

काठमांडू से निकलने वाली पत्रिका हिमाल साउथएशिया चे पर मेरे लेख का अंगरेज़ी अनुवाद छापा था। फिर क़ाफ़िला और स्क्रोल आदि पोर्टलों ने। बेल्ज़ियम में एक संगोष्ठी के दौरान सिद्धार्थ वरदराजन (तब द हिंदू में) ने उस समूची जानकारी में गहरी दिलचस्पी ज़ाहिर की।

शायद चे के 75 वर्ष का प्रसंग था। बहुत लेख छप रहे थे। सिद्धार्थ सोचते थे कि एन. राम ‘हिंदू’ में चे की अल्पज्ञात भारत यात्रा पर अच्छा-ख़ासा सचित्र फ़ीचर प्रकाशित करना चाहेंगे। उन्होंने बात भी कर ली। मगर तस्वीरें ‘हिंदू’ के आर्काइव में जमा हो गईं। आगे फ़्रंटलाइन में काम आईं। तब तक सिद्धार्थ खुद ‘हिंदू’ के संपादक हो गए थे। इस बीच अख़बार में कोई रिपोर्ट मुझसे जमा जानकारियों के आधार छपी। पर स्रोत का हवाला नहीं था। सिद्धार्थ को पता चला। उन्हें पुराना प्रसंग याद था। उन्होंने विनम्रता से खेद प्रकाशित करवाया।

अब तो वह जानकारी, चे की लिखी रिपोर्ट और तसवीरें इतनी बार इतनी जगह छप गई हैं कि उनकी खोज की कहानी शायद धुँधली पड़ गई। पर आज मौक़ा था और दस्तूर भी, तो आपको फिर सुना दी।

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