सुप्रिया श्रीनेत-

नाम – शिखा मैत्रेय
उम्र – 23 साल
स्थान – उप्र ग़ाज़ियाबाद
काम – यूट्यूब चैनल
यूट्यूब पर नाम – कुँवारी बेगम
आरोप – नवजात बच्चों के यौनशोषण पर टिप्स दे रही थी
यह सब पढ़ कर मन खट्टा हो गया, लेकिन कुछ सवाल भी उठते हैं:
▪️क्या हो गया है हमारे समाज को, किस हद तक सड़ चुका है यह समाज?
▪️क्या यह ऐसा सिर्फ़ कुछ लाइक शेयर कमेंट के लिए कर रही थी?
▪️वो कौन लोग हैं जो ऐसा कंटेंट देख रहे हैं, वो और भी बीमार हैं?
▪️क्या इस लड़की के घरवालों को नहीं पता था यह यूट्यूब पर क्या कर रही है?
▪️सोशल मीडिया पर इंगेजमेंट के लिये आज युवा किस हद तक गिरने को तैयार हैं?
आपके बच्चे इंटरनेट पर क्या देख रहे हैं, क्या कर रहे हैं – इस पर ध्यान दीजिये.
मनीषा पांडेय-
यूट्यूब पर एक 22 साल की लड़की का वीडियो देखा, जो अपने गेमिंग चैनल पर यंग लड़कों को दुधमुंहे बच्चों का यौन शोषण करने के तरीके बता रही थी। कुंवारी बेगम नाम से उसका यूट्यूब चैनल था, जो मोस्टली इसी तरह के सेक्शुअल कंटेंट से भरा था।
यूट्यूब पर कुंवारी बेगम लिखकर सर्च करना चाहा तो देखा कि वहां उस लड़की के लिए गालियों की भरमार है। लोग बहुत गंदे शब्दों में अपना गुस्सा निकाल रहे हैं।
वो वीडियो इतना डरावना है कि उसे देखकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे। लेकिन गुस्से से ज्यादा शायद दुख और बेबसी का एहसास हो।
मैंने उस लड़की की तस्वीरें देखीं। बेहद कमजोर, निरीह सी लड़की। उसके दिमाग में क्या चल रहा है। वो ये सब क्यों कर रही है। क्या है उसकी कहानी।
ऐसे ढेरों सवाल हैं।
डॉ. ब्रूस डी. पेरी एक बड़े साइकोलॉजिस्ट हैं, जिनका चाइल्ड ट्रॉमा पर पिछले 40 सालों का काम है।
उनकी एक किताब है- ‘द बॉय हू वॉज रेज्ड एज ए डॉग’ और उस किताब का पहला चैप्टर है- ‘Tina’s World.’
1987 की बात है। डॉ. पेरी के पास एक 7 साल की अफ्रीकन-अमेरिकन लड़की आई। नाम था टीना। स्कूल ने टीना को साइकिएट्रिक हेल्प के लिए भेजा था क्योंकि स्कूल में, साथ के बच्चों और टीचर्स के साथ बच्ची का बिहेवियर बहुत अबनॉर्मल था। वो क्लास में कभी भी कपड़े उतारकर खुद को एक्सपोज कर देती, बच्चों के लड़कों के साथ सेक्शुअली सजेस्टिव व्यवहार करती। साथ ही टेंपेरामेंट के इशु थे। बच्चों से लड़ना, एग्रसिव, वॉयलेंट हो जाना, पढ़ाई पर ध्यान न देना वगैरह।
पहली बार डॉ. पेरी के कमरे में जब वो बच्ची आई तो बिलकुल गुमसुम उदास। उसने एक भी सवाल का जवाब नहीं दिया। सिर्फ सिर झुकाकर बैठी रही। जब उन्होंने बच्ची को एक चॉकलेट दी तो वो उठकर उनके पास गई, उनकी जांघों को छुआ और उनकी पैंट की जिप खोलने की कोशिश करने लगी।
वो बच्ची सिर्फ 7 साल की थी।
डॉ. पेरी की चिंता गहरे दुख में बदल गई। ये क्या हो रहा था।
जब उन्होंने बच्ची की रिपोर्ट अपने एक सीनियर को दी तो उसने बच्ची को मेडिकेशन देने और इस केस को वहीं ड्रॉप करने की सलाह दी। उस सीनियर का मानना था कि ऐसे केस होपलेस होते हैं। डॉ. पेरी लिखते हैं कि तब तक विज्ञान की यह शाखा बहुत डेवलप नहीं हुई थी। ह्यूमन ब्रेन के डेवलपमेंट से जुड़े क्रिटिकल सवालों के जवाब हमारे पास नहीं थे। तब लोगों के इलाज का एक ही तरीका था कि उनके एग्रसिव, वॉयलेंट बिहेवियर को शांत करने के लिए उन्हें दवाइयां दे दी जाएं। छोटे-छोटे बच्चों को भी दवाइयां खिलाना ही एकमात्र तरीका था, जिसे साइकोलॉजिस्ट प्रैक्टिस करते थे।
लेकिन डॉ. पेरी ने इस केस को और सीनियर लेवल पर डिसकस किया और बच्ची को दवाई देने के बजाय उसकी काउंसिलिंग शुरू की।
कई हफ्तों तक बच्ची ने कोई बात नहीं की। हर हफ्ते तयशुदा समय पर वह अपनी मां के साथ क्लिनिक में आती और एक घंटे डॉ. पेरी के कमरे में रहती। वो एक घंटे दोनों मिलकर सिर्फ ड्रॉइंग बनाते थे। कभी चिड़िया, कभी भालू, कभी कुत्ता, कभी नदी। ड्रॉइंग बनाते-बनाते थोड़ी दोस्ती हुई। फिर बीच-बीच में थोड़ी बातें, एक-दूसरे से क्रेयॉन्स उधार लेना, एक-दूसरे की पेंटिंग पर अपनी राय व्यक्त करना।
टीना की मां एक गरीब वर्किंग क्लास सिंगल मदर थी, जो घर चलाने के लिए तीन-तीन जॉब करती थी। उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो प्रोफेशनल चाइल्डकेयर अवेल कर सकती तो एक पड़ोसन उसकी गैरमौजूदगी में टीना की देखभाल करती थी। पड़ोसन का एक 16 साल का लड़का था, जिसने 4 साल की उम्र से टीना को सेक्शुअली अब्यूज करना शुरू किया। ये सिलसिला दो साल तक चला। जब तक उसकी मां को समझ में आता कि कुछ गड़बड़ है, टीना का ब्रेन अपने डेवलपमेंटल ईयर्स में काफी डैमेज हो चुका था।
पुरुष के साथ यह उस बच्ची का पहला इनकाउंटर था। घर में कभी-कभी मां के बॉयफ्रेंड भी आते, जो वॉयलेंट और एग्रेसिव होते थे। बच्ची के आसपास पुरुष के नाम पर यही उदाहरण मौजूद थे। कोई प्यार करने, साथ खेलने, सिखाने, समझाने वाला पिता नहीं, दुलारने वाले दादा, नाना नहीं, केयर करने वाला भाई नहीं। अपने और अपनी मां के अब्यूज को देखकर टीना को यही समझ में आया कि पुरुषों को सेक्स चाहिए। उससे भी और उसकी मां से भी।
उसके लिए ये चीजें नॉर्मलाइज हो गईं।
डॉ. पेरी उसकी जिंदगी में पहले ऐसे पुरुष थे, जिन्होंने ऐसी कोई डिमांड नहीं की। जो उसके साथ बैठकर ड्रॉइंग करते थे, उसके साथ खेलते थे, उसके लिए किताबें और खिलौने लेकर आते थे। उन्होंने बच्ची पर बात करने, अपने बारे में कुछ बताने का कभी दबाव भी नहीं डाला। लेकिन धीरे-धीरे बच्ची ने खुलना और बोलना शुरू किया।
डॉ. पेरी ने यह किताब 2006 में लिखी। तब तक ह्यूमन ब्रेन के डेवलपमेंट को लेकर काफी रिसर्च हो चुकी थी। न्यूरोसाइंस के पास बहुत से सवालों के जवाब थे।
56 पन्नों के इस चैप्टर में डॉ. पेरी बहुत विस्तार से समझाते हैं कि छुटपन की घटनाओं ने टीना के ब्रेन को कैसे डैमेज किया। कैसे अब्यूज और वॉयलेंस की उसकी प्राइमरी मेमोरीज फॉर्म हुईं, कौन से ब्रेन सेंटर विकसित होने से पहले ही डैमेज और सप्रेस हो गए और कैसे उसके साथ जो भी हुआ, वह उसके इनवायरमेंट की देन थी। वो ढेरों साइंस स्टडीज और रिसर्च के हवाले से लिखते हैं कि मनुष्य का स्वभाव, व्यक्तित्व, आदतें, व्यवहार और सोच कोई दैवी वरदान नहीं है। इंसान का दिमाग अपने इनवायरमेंट के साथ इंटरेक्शन में डेवलप होता है। हम कुछ भी लेकर पैदा नहीं होते। यहां आकर बनते हैं।
टीना के बारे में वो लिखते हैं कि लंबे समय तक चली काउंसिलिंग और थेरेपी वर्क के बाद उसके एग्रेशन में थोड़ी कमी आई। उसका व्यवहार बेहतर हुआ। लेकिन कुछ समय बाद वे वहां से शिकागो चले गए और फिर टीना की थेरेपी बंद हो गई। सरकारी एड पर मिल रही थेरेपी की भी एक टाइम लिमिट थी।
टीना का जीवन बहुत बेहतर नहीं हो पाया। सेक्शुअल अब्यूज उसकी बाद जिंदगी की भी कहानी रही।
डॉ. पेरी इन वाक्यों के साथ उस चैप्टर का अंत करते हैं- हफ्ते में एक दिन एक घंटे की काउंसिलिंग काफी नहीं थी। मैं अपने व्यवहार से एक दूसरे तरह के पुरुष का उदाहरण पेश कर सकता था, लेकिन उसकी बाकी जिंदगी के मुकाबले वो उदाहरण बहुत मामूली था। मैं इतने कम वक्त में उस टेंपलेट को बदल नहीं सकता था, जो इतनी नाजुक उम्र से उसके दिमाग में सेट कर दिया गया था। थेरेपी ने उसे फंक्शनल बना दिया, दुनिया में थोड़ा रहने जीने लायक लेकिन ये नाकाफी था। उसे अपने आसपास और बेहतर रोल मॉडल्स की, बेहतर उदाहरणों की, बेहतर माहौल की जरूरत थी, जो उसे नहीं मिला।

एडल्ट टीना को जानने वाले इसका दोष उसे दे सकते हैं, लेकिन वो नहीं जानते कि उसके साथ हुआ क्या था।


