मनोरंजन सिंह-
भइया आपको शत-शत नमन

आज आपकी चौथी पुण्यतिथि है। बात कहां से शुरू करूं, यह समझ नहीं पा रहा हूं। एक मानवाधिकार योद्धा के तौर पर शुरू करना चाहूं, तो जगह कम पड़ जाए। हर वंचित के अधिकार के लिए बड़ा से बड़ा आंदोलन खड़ा कर देने वाले अपराजेय योद्धा, हर अन्याय के खिलाफ मोर्चा खोल देने का आपका जुनून और निष्क्रिय लोगों में भी गजब का जज्बा भर देने की आपकी अकूत क्षमता के बारे में क्या लिखूं-क्या छोडूं?
भइया, मैं आपका सहोदर भाई। अनुज का आपको शत-शत नमन। आप मेरे जीवन में ऐसे रहे जिसको मैंने न तो कभी जताया, न ही किसी को जल्दी बताया। हां जो जानते थे, वे जानते थे। बस मुझे आपको अपने आसपास देखना या महसूस करना ही मेरे लिए बहुत बड़ा संबल होता था। मुझे याद आ रहा है… बनारस में श्री संजीव क्षितिज अमर उजाला के संपादक थे। टेलीफोन पर बातचीत के बाद उन्होंने मुझे बनारस बुलाया। उन दिनों आप मेरे यहां ही थे। आपके गले का इलाज चल रहा था। आपको बताए बिना संजीव जी से मिलने बनारस आया। रात में तकरीबन पांच घंटे की लंबी बातचीत के बाद उन्होंने मुझे ज्वाइन करने का ऑफर दिया। आपका इलाज चल रहा था, इसलिए एक सप्ताह का समय लेकर मैं लखनऊ लौट आया, लेकिन आपके इलाज की वजह से मैं समय पर जा नहीं सका। संजीव जी ने घर पर फोन किया, तो आपने ही उठाया। तब संजीव जी जान पाए कि मैं आपका अनुज हूं। विधानसभा चुनाव चल रहा था, तो आपने मुझे तुरंत जाकर ज्वाइन करने को कहा और मैं बनारस में अमर उजाला में काम करने लगा। संजीव जी ने मिलते ही मुझसे कहा कि जिनका नाम लेकर लोग नौकरी पा जाते हैं, आपने भाई होते हुए भी एक बार उनका उल्लेख नहीं किया। उनको कैसे बताता कि मैं ऐसा ही हूं। किसी ने सच कहा है…
‘मुझको रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद
लोग हँसते हैं मुझे देख के आते-जाते’
यह सच है कि आपसे हर बात कहना मेरे लिए मुमकिन नहीं था, लेकिन यह हमेशा रहा कि आप मेरे अंदर की बातों को खूब ठीक से महसूस करते थे। कई बार मेरी तकलीफों को आपने मेरे बिन बताए जाना और उसका समाधान भी निकाला। अब तो उन्हीं यादों को सहेजकर, संभालकर हमेशा के लिए खुद के पास संजोए हुआ हूं।
वैसे तो बिछड़ना रीत है दुनिया की। सबको बिछड़ना पड़ता है। आप भी चार साल पहले बिछड़ गए। आप जैसा भाई शायद ही किसी को मिले। आपकी यादों की और बातें फिर कभी…!!


