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भानु भारती को स्त्री लिखने वाले इस रिपोर्टर को रंगमंच की जानकारी न रही होगी

ओम थानवी-

त्रकारिता में जो आएँ, उन्हें साहित्य और कलाओं की थोड़ी समझ ज़रूर होनी चाहिए। पत्रकारिता का मुख्य उपकरण भाषा है, जो रचनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहने पर और निखरती है।

सुबह भानु भारती को मिले कालिदास सम्मान की ख़बर नेट पर टटोल रहा था कि उन्हें पहले मिल चुके एक अन्य पुरस्कार की ख़बर पढ़ने को मिल गई। प्रदेश के बड़े अख़बार के पोर्टल पर शाया थी। देख कर हैरानी हुई कि रिपोर्टर ने — शायद ‘भारती’ उपनाम पढ़ कर — भानुजी को ‘स्त्री’ समझ लिया था।

ज़ाहिर है, पत्रकार बंधु को देश और प्रदेश के रंगमंच की ज़रा जानकारी न रही होगी। यह भी हो सकता है कि रिपोर्टर ने सही लिखा हो और डेस्क पर किसी अतिउत्साही बड़ेभाई ने ‘सुधार’ कर दिया हो।

प्रसंगवश मुझे पश्चिमी राजस्थानी का व्याकरण तैयार करने वाले इतालवी भाषाविद और खोजकर्ता लुइजी पियो तैस्सितोरी का एक क़िस्सा ख़याल आ गया, जो उन्होंने बीकानेर में (जहाँ काम किया, प्राण त्यागे) ठा. जुगलसिंह खीची को सौ साल पहले सुनाया था: “शुरू में मेरी धारणा थी कि अकारांत नाम पुल्लिंग और आकारांत-ईकारांत स्त्रीलिंग होते हैं। एक बार मेरे मुँह से ‘अमुक पुरुष की बहनोई’ निकल गया था। लेकिन ऐसी ग़लती मैं ही कहाँ करता हूँ। मेरे ईकारांत नाम की वजह से एक बार कलकत्ते में डाकिया अर्दली से पूछ बैठा था — ये तैस्सितोरी कहाँ की रहने वाली है?”

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